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Monday, May 31, 2021

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-1 (झारखंड की आदिम जनजातियां Part-1)

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-1

Mal Paharia

➧ माल पहाड़िया एक आदिम जनजाति है जिसका संबंध प्रोटो और ऑस्ट्रोलॉयड समूह से है
➧ रिजले के अनुसार इस जनजाति का संबंध द्रविड़ समूह से है
 रसेल और हीरालाल के अनुसार यह जनजाति पहाड़ों में रहने वाले सकरा जाति के वंशज हैं

झारखंड की आदिम जनजातियां Part-1

➧ बुचानन हेमिल्टन ने इस जनजाति का सम्बन्ध मलेर से बताया है 
इनका संकेन्द्रण मुख्यत संथाल परगना क्षेत्र में पाया जाता  है परन्तु यह जनजाति संथाल क्षेत्र के साहेबगंज को छोड़कर शेष क्षेत्रों में पायी जाती है 
➧ इनकी भाषा मालतो है जो द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित है 

➧ समाज एवं संस्कृति

➧ इस जनजाति में पितृसत्तात्मक एवं पितृवंशीय सामाजिक व्यवस्था पाई जाती है 
 इस जनजाति में गोत्र नहीं होता है
➧ इस जनजाति में अंतर विवाह की व्यवस्था पाई जाती है
इस जनजाति में वधु -मूल्य (पोन या बंदी)  के रूप में सूअर देने की प्रथा है क्योंकि सुअर इनके आर्थिक और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है 
➧ इस जनजाति में अगुवा (विवाह हेतु कन्या ढूंढने वाला व्यक्ति) को सिथ सिद्धू या सिथूदार कहा जाता है
➧ इस जनजाति में वर द्वारा सभी वैवाहिक खर्चों का भुगतान किया जाता है
➧ इनके गांव का मुख्य मांझी कहलाता है, जो ग्राम पंचायत का प्रधान भी होता है
➧ इस जनजाति ने माघ माह में माघी पूजा तथा अगहन माह में घंघरा पूजा की जाती है
➧ यह जनजाति कृषि कार्य के दौरान खेतों में बीज बोते समय बीचे आड़या नामक पूजा (ज्येष्ठ माह में) तथा फसल की कटाई के समय गांगी आड़या पूजा करती है
➧ बाजरा के फसल की कटाई के समय पुनु आड़या पूजा की जाती है 
➧ करमा, फगु और नवाखानी इस जनजाति के प्रमुख त्यौहार है    

आर्थिक व्यवस्था

➧ इनका मुख्य पेशा झूम कृषि, खाद्य संग्रहण एवं शिकार करना है 
➧ इस जनजाति में झूम खेती को कुरवा कहा जाता है  
➧ इस जनजाति में भूमि को चार श्रेणियों में विभाजित किया जाता है 
➧ ये हैं - सेम भूमि (सर्वाधिक उपजाऊ), टिकुर भूमि (सबसे कम उपजाऊ), डेम भूमि (सेम व् टिकुर के बीच) तथा बाड़ी भूमि (सब्जी उगते हेतु प्रयुक्त)
➧ इस जनजाति में उपजाऊ भूमि को सेम कहा जाता है

धार्मिक व्यवस्था

➧ इनके प्रमुख देवता सूर्य एवं धरती गोरासी गोसाईं है 
➧ धरती गोरासी गोसाईं को वसुमति गोसाई या वीरू गोसाईं भी कहा जाता है
➧ इस जनजाति में पूर्वजों की पूजा का विशेष महत्व दिया जाता है 
➧ इनके गांव का पुजारी देहरी कहलाता है

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Sunday, May 30, 2021

Gross Domestic Product (GDP) - Indian Economy

Gross Domestic Product (GDP) 

Gross Domestic Product (GDP) is the value of all final goods and services produced within the boundary of a nation during one year period. For India, this calendar year is from 1st April to 31st March.

It is also calculated by adding;

Gross Domestic Product (GDP) - Indian Economy

The use of the exports-minus-imports factor removes expenditures on imports not produced in the nation and adds expenditures on goods and services produced which are exported but not sold within the country.


The different uses of the concept of GDP are given below:

  • Per annum percentage change in it is the 'growth rate' of an economy. For example, if a country has a GDP of Rs.107 which is 7 rupees higher than the last year, it has a growth rate of 7%. When we use the term ' a growing ' economy, it means that the economy is adding up its income.


  • This is the most commonly used data in comparative economics. The GDPs of the member nations are ranked by the IMF at purchasing power parity (PPP). India's GDP is today 3rd largest in the world at PPP (after China and the USA). While at the prevailing exchange rate of Rupee (into the US dollars) India's GDP is ranked 6th largest in the world.

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Saturday, May 29, 2021

Santali Grammar (Noun) संज्ञा (ञुनुम)

Santali Grammar (Noun) संज्ञा (ञुनुम)

किसी व्यक्ति ,वस्तु, स्थान, भाव आदि के नाम को संज्ञा कहते है। 
अर्थ के आधार पर संताली में संज्ञाएँ निम्नलिखित है।  
1) जातिवाचक संज्ञा -(Common Noun) जा़त ञुनुम :- जिस संज्ञा शब्दों से जाति का बोध हो, उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे गाय (डंगरी), नदी (गाडा)  इत्यादि।

Santali Grammar (Noun) संज्ञा (ञुनुम)

2) व्यक्तिवाचक संज्ञा -(Proper Noun) ञुतूम ञुनुम
 :- जिस संज्ञा शब्दों से किसी खास व्यक्ति, वस्तु या स्थान का बोध हो उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं 
। जैसे :-राम, कृष्ण, हिमालय, (स्थान का नाम) चंपा फूल इत्यादि।

3) समूह वाचक संज्ञा (Collective Noun) गादेल ञुनुम :- जिस संज्ञा शब्दों से समूह का बोध होता है, उसे समूहवाचक संज्ञा कहते हैं । जैसे -मेला (पाता), सेना (फाद) आदि। 


5) भाववाचक संज्ञा (Abstract Noun) गुनान ञुनुम :- जिस संज्ञा शब्दों से किसी व्यक्ति या वस्तु के गुण या धर्म, दशा, स्वभाव, आदि का बोध होता है, उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे :- बलवान (दाड़ेयान), कसैलापन (कासा), बुढ़ापा (हड़ाम) आदि।


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Jharkhand Me Paryavaran Sanrakshan (झारखंड में पर्यावरण संरक्षण)

Jharkhand Me Paryavaran Sanrakshan 

झारखंड में पर्यावरण को संरक्षित करने हेतु लिए गए महत्वपूर्ण कार्य

 PMIS : प्लांटेशन मैनेजमेंट इनफॉरमेशन सिस्टम

 NMIS :नर्सरी मैनेजमेंट इनफॉरमेशन सिस्टम

➧ वन और इसके आसपास रहने वाले लोगों को वृक्षारोपण से जोड़ने के लिए वन पट्टा का नियम सरल बनाया जा रहा है 
➧ वन विभाग में वन-पट्टा प्राप्त करने वालों का नाम रजिस्टर-2 में दर्ज करने का आदेश दिया है इसमें पट्टा पाने वाले की पूरी विवरण दर्ज रहेगा।
➧ ऐसे भूमि का दाखिल खारिज नहीं होगा, क्योंकि वनभूमि का लगान तय करने का अधिकार सरकार के पास है
➧ जंगलों के विस्तार एवं वृक्षारोपण को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए वन विभाग के अधिकारियों को इलाके में भ्रमण कर रिपोर्ट देने के लिए तकनीकी का प्रयोग किया जा रहा है 
➧ इसी का काम के लिए (PMIS)प्लांटेशन मैनेजमेंट इनफॉरमेशन सिस्टम और (NMIS) नर्सरी मैनेजमेंट इनफॉरमेशन सिस्टम एप्लीकेशन उपलब्ध कराए गए हैं

झारखंड में पर्यावरण संरक्षण

मुख्यमंत्री जन-वन योजना-2015

➧ इस योजना के तहत निजी भूमि पर वृक्षारोपण प्रोत्साहन की एक महत्वकांक्षी योजना है
➧ इस योजना के अंतर्गत प्रति एकड़ काष्ठ प्रजाति के 445 पौधों तथा फलदार प्रजाति के 160 पौधों का रोपण किया जा सकेगा
➧ मेड़ पर काष्ठ प्रजाति के 445 पौधे लगाने पर इसे 1 एकड़ के समतुल्य समझा जाएगा
➧ लाभुक के लिए वृक्षारोपण की न्यूनतम सीमा 1 एकड़ और अधिकतम सीमा 50 एकड़ होगी
➧ प्रोत्साहन स्वरूप वृक्षारोपण एवं उसके रख-रखाव पर हुए व्यय के 75% अंक की प्रतिपूर्ति विभाग द्वारा की जाएगी


झारखंड इको-टूरिज्म नीति-2015 

स्थान                 जिला
पारसनाथ         :    गिरिडीह
कैनहरी हिल     :    हजारीबाग 
फॉसिल पार्क     :   साहिबगंज
त्रिकूट पर्वत      :    देवघर
पलामू व्याघ्र परियोजना : लातेहार
तिलैया डैम       :   कोडरमा
नेतरहाट          :     लातेहार
दलमा गज अभयारण्य  : जमशेदपुर

मूलभूत संरचनाएं

(i) राज्य में इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने हेतु स्थानीय गांवों  में लोगों को 'नेचर गाइड' के रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय लोगों की आय में भी वृद्धि की जा सके
(ii) सड़क, बिजली, पानी की व्यवस्था और पर्यटकों के ठहरने हेतु आवासीय सुविधाएं और मनोरंजन हेतु साधन विकसित करना
(iii) वन पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित करना

डोभा निर्माण

➧ राज्य सरकार ने सूखे की समस्या से निपटने हेतु 2016  में मनरेगा के तहत डोभा निर्माण कार्य प्रारंभ किया है, जिसमें वर्षा जल को संचित किया जा सके
➧ पुरे राज्य में 6 लाख डोभा निर्माण करने का लक्ष्य रखा गया है। 
➧ 2016-17 में डोभा निर्माण हेतु 200 करोड़ रूपये प्रस्तावित था 
➧ पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए जल प्रोतों को प्राकृतिक स्वरुप में बनाए रखना-मुख्य उद्देश्य है 

प्रधानमंत्री कृषि कृषि सिंचाई 

 योजना के तहत केंद्र एवं राज्य सरकार की हिस्सेदारी 60:40 का है
➧ इसके तहत झारखंड में सिंचाई व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए जलछाजन का कार्य किया जा रहा है राज्य के ऊबड़ खाबड़  स्थलाकृति होने के कारण वर्षा जल का 70% भूमिगत हो जाता है
➧ राज्य में सिंचित भूमि का प्रतिशत 12 पॉइंट 1 प्रतिशत है, अतः 88% भूमि पर वर्षा जल का संरक्षण आवश्यक है
➧ देश में झारखंड पहला राज्य है, जहां जलछाजन विषय पर (Diploma in water Shed Management) "डिप्लोमा इन वॉटर शेड मैनेजमेंट" पाठ्यक्रम झारखंड राज्य जलछाजन मिशन के सहयोग से इग्नू द्वारा संचालित किया जा रहा है

समेकित जल छाजन प्रबंध कार्यक्रम

 नवंबर 2016 ईस्वी तक इस योजना के अंतर्गत 5744 वर्षा जलछाजन योजना प्रारंभ किया जा चुका है
➧ यह पांच 5 वर्षों का कार्यक्रम है
➧ विश्व बैंक एवं राज्य सरकार के 60:40 के अनुपात में नीरांचल-निरंजन राष्ट्रीय जलछाजन योजना द्वारा राज्य में चल रहे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की तकनीकी दृष्टिकोण से मजबूत बनाना है
➧ 2 जिलों रांची और धनबाद में शहरी जलछाजन कार्य के लिए पायलट परियोजना चलाई जा रही है

जापान इंटरनेशनल डेवलपमेंट एजेंसी (JICA)

➧ इसका उद्देश्य है बागवानी को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से माईक्रोड्रीप नामक योजना 30 प्रखंडों में प्रारंभ किया जा रहा है
➧ इस योजना के तहत जापान सरकार 282 पॉइंट 20 करोड़ की स्वीकृति मिल चुकी है

झारखंड में वनीकरण हेतु कार्य 

 झारखंड राज्य के शहरी क्षेत्र में पर्यावरण के संरक्षण तथा पर्यावरण प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन के प्रति नागरिकों में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से छोटे मनोरंजन उद्यान आदि का निर्माण वन विभाग द्वारा किया जा रहा है
➧ ग्रामीणों को लाह की खेती से स्वरोजगार एवं सिंहभूम, लातेहार, सिमडेगा, गुमला, पलामू, सरायकेला, गढ़वा, गिरिडीह, दुमका, देवघर, आदि में 1750 संयुक्त वन प्रबंधन समिति, स्वयं सहायता समूह के माध्यम से 1,75,000 लाह पोषक वृक्षों पर लाह की खेती की गई है

CAMPA (Compensatory Afforestation Fund of Management and Planning)

➧ प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन और योजना प्राधिकरण का गठन 2002 ईस्वी में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर किया गया है 
➧ 2 जुलाई, 2009 ईस्वी में राज्य कैम्पा का गठन किया गया है
➧ कैम्पा कोष से सम्बंधित कैम्पा कानून 2016 ईस्वी में संसद द्वारा पारित किया गया है 

वनबंधु योजना 

➧ जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार से वर्ष 2015-16 में दो करोड़ की राशि की स्वीकृति प्रदान की गई है 
➧ पाकुड़ जिले के लिट्टीपड़ा प्रखंड को पायलट प्रखंड के रूप में चयन किया गया है, जिसमें आवश्यक मानव संपदा एवं कार्यालय संरचना, जल संचयन संरचना के अंतर्गत नया तालाब एवं चेक डैम तथा स्वास्थ्य क्षेत्र के आजीविका संवर्धन स्वास्थ केंद्र एवं एंबुलेंस क्रय की योजनाएं शामिल की गई
➧ वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत वनों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन्य निवासी, जो वर्ष 2006 से पूर्व से वनों में निवास कर रहे हैं एवं जीवन यापन हेतु वनोत्पाद पर निर्भर है, को वन भूमि का पट्टा वितरण किया जाता है

कचरों  के प्रबंधन हेतु राज्य सरकार के कार्य

➧ पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाले करणों में एक प्रमुख कारण महानगरों एवं नगरों से निकलने वाला कचड़ा (सॉलि़ड वेस्ट) है अतः कचड़ा कचरा प्रबंधन पर्यावरण संतुलन के लिए आवश्यक हो गया है
➧ झारखंड में रांची, धनबाद, चाकुलिया और पाकुड़ में पी.पी.पी मोड पर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट योजना की मंजूरी सरकार द्वारा हो गई है
➧ स्वच्छ भारत मिशन जो 2015 में केंद्र सरकार द्वारा प्रारंभ किया गया है 
➧ इसके तहत शहरी क्षेत्रों में कचरे का आधुनिक एवं वैज्ञानिक तरीके से व्यवस्थापन करते हुए 2 अक्टूबर, 2019 तक पूर्ण स्वच्छता का लक्ष्य हासिल करना है 
➧ इसी उद्देश्य से रांची नगर निगम की सफाई व्यवस्था का काम अगले 25 साल तक के लिए निजी कंपनी 'एक्सेल इंफ्रा' को सौंपा गया है 
➧ 'एक्सेल इंफ्रा' की ज्वाइंट वेंचर जापानी कंपनी 'हिताची' रांची से निकलने वाले कचरे पर आधारित बिजली उत्पादन प्लांट लगाएगी 

JSPCB (Jharkhad State Pollution Control Board)

➧ राज्य में प्रदूषण नियंत्रण तथा इससे सम्बंधित मामलों पर नियंत्रण रखने हेतु झारखण्ड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की स्थापना 2001 में की गई है 
➧ यह एक नियामक निकाय है जो उद्योगों को पर्यावरण संरक्षण हेतु उच्च तकनीकों के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित करता है 

पर्यावरण से जुड़े दिवस

➧ प्रमुख दिवस                     दिनांक 
विश्व वानिकी दिवस     -     21 मार्च
विश्व जल दिवस          -     22 मार्च 
विश्व स्वास्थ्य दिवस       07 अप्रैल 
पृथ्वी दिवस                     22 अप्रैल
विश्व ओजोन दिवस         16 सितंबर
विश्व वन्यजीव दिवस       03 मार्च 
विश्व जैव विविधता दिवस 22 मई 
तंबाकू मुक्ति दिवस           31 मई 
विश्व पर्यावरण दिवस        05 जून
विश्व जनसंख्या दिवस       11 जून 
विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस - 26 नवंबर
राष्ट्रीय प्रदूषण रोकथाम दिवस - 02 दिसंबर

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Friday, May 28, 2021

Jharkhand Me Paryavaran Sambandhit Tathya (झारखंड में पर्यावरण संबंधित तथ्य)

Jharkhand Me Paryavaran Sambandhit Tathya  

(झारखंड में पर्यावरण संबंधी तथ्य एवं परिवर्तन अपशमन एवं अनुकूल संबंधी विषय)

पर्यावरण शब्द का शाब्दिक अर्थ :- आस-पास, मानव जंतुओं तथा पौधों की वृद्धि एवं विकास को प्रभावित करने वाले बाह्य दशाएं, कार्यप्रणाली तथा जीवन-यापन की परिस्तिथियां आदि होती है। 

➧ पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 के अनुसार, पर्यावरण किसी जीव के चारों तरफ घिरे भौतिक एवं जैविक दशाएं एवं उनके साथ अंत: क्रिया को सम्मिलित करता है। 

झारखंड में पर्यावरण संबंधित तथ्य

➧ पर्यावरण के घटक 

(i) अजैविक पर्यावरण
(ii) जैविक पर्यावरण

(i) अजैविक पर्यावरण

(i) स्थलमंडलीय पर्यावरण
(ii) वायुमंडलीय पर्यावरण
(iii) जलमंडलीय पर्यावरण 

(ii) जैविक पर्यावरण

(i) वनस्पति पर्यावरण
(ii) जंतु पर्यावरण 

➧ सब जगह पाया जानेवाला अभिप्राय से है हमारे जीवन को प्रभावित करने वाले सभी जैविक और अजैविक तत्वों, तथ्यों, प्रक्रियाओं और घटनाओं के समुच्चय से निर्मित इकाई है। 
 
➧ पर्यावरण हमारे चारों ओर फैला हुआ है और हमारे जीवन की प्रत्येक घटना इसी के अंदर संपादित होती है तथा हम मनुष्य अपने समस्त क्रियाओं से इस पर्यावरण में प्रभाव डालते हैं। 
 इस प्रकार एक जीवधारी और उसके पर्यावरण के बीच एक दूसरे पर पारस्परिक आश्रित संबंध स्थापित करते हैं
➧ पर्यावरण के जैविक संघटकों के सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े, सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधों आ जाते हैं, और इसके साथ ही उनसे जुड़ी सारी जैव क्रियाएँ और प्रक्रियाएँ प्रक्रिया भी
➧ अजैविक संघटकों  में जीवनरहित तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएँ आती है :- जैसे चट्टानें, पर्वत,  नदी, हवा और जलवायु के तत्व इत्यादि 

 पर्यावरण से जुड़े विषय

➧ वर्तमान में पर्यावरण से जुड़े विषयों में जैव विविधता एवं उनका संरक्षण, पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव अर्थात पर्यावरण प्रदूषण आदि को शामिल किया जाता है 
➧ पर्यावरण प्रदूषण का व्यापक प्रभाव जैव विविधता पर पड़ा है जैव विविधता का अभिप्राय किसी स्थान-विशेष में रहने वाले विभिन्न प्रजातियों की कुल संख्या और प्रत्येक प्रजाति में पाई जाने वाले अनुवांशिक भिन्नता से है➧ पृथ्वी पर विभिन्न प्रजातियों के असंख्य जीव निवास करते हैं ये भिन्न प्रकार के जीव एक-दूसरे से अनेक रूपों में भिन्न होते हुए एक-दूसरे पर निर्भर है 
➧ एक-दूसरे पर भोजन के लिए निर्भरता एवं जैव विविधता के कारण पर्यावरण में संतुलन स्थापित होता हैजितनी अधिक जैव विविधता होगी, उतना ही पर्यावरण में अधिक संतुलन होगा
➧ जैव विविधता शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले डब्लू जी.रोजेन ने 1950 ईस्वी में किया था
➧ प्रत्येक वर्ष 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है इसे विश्व जैव विविधता संरक्षण दिवस भी कहते हैं 

 झारखंड पर्यावरण से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य 

➧ झारखंड की जलवायु तथा उसकी औद्योगिक स्थित झारखण्ड को जैव विविधता में काफी धनी राज्य बनाता है 
➧ झारखंड के जंगलों में कई तरह के पेड़, औषधीय पौधे, घास, फूल इत्यादि मौजूद है
 प्रमुख जैव विविधता से पूर्ण स्थान पिठोरिया घाटी, नेतरहाट की पहाड़ी, सारंडा का जंगल, पारसनाथ की पहाड़ी, दलमा की पहाड़ी है 
➧ प्रमुख नदियों में कोयल, दामोदर और स्वर्ण रेखा के क्षेत्र के जंगल जैव विविधता में धनी है, लेकिन बढ़ता पर्यावरणीय  प्रदूषण जैव विविधता के क्षरण का कारण बनता जा रहा है 

➧ झारखंड में पर्यावरण से जुड़े विषय 

वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, झारखंड सरकार के अनुसार 2015 ईस्वी में 23605 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर वनावरण था, जो कि झारखंड के कुल क्षेत्रफल का 26 पॉइंट 61 प्रतिशत था 
➧ झारखंड राज्य के पर्यावरण को स्वच्छ बनाने हेतु व्यापक पैमाने पर वन रोपण अभियान चलाया जा रहा है➧ वृक्षारोपण के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों में मुख्य हैं :- मुख्यमंत्री जन-वन योजना 
➧ अफ्रीकी मूल का कल्पतरु वृक्ष, जो चिकित्सीय महत्व के लिए प्रसिद्ध है, पूरे भारत में इसकी संख्या 9 है जिसमें 4 रांची में है इस वृक्ष की खासियत अतिशुष्क वातावरण के समय जल भंडारण की अत्यधिक क्षमता होती है 
तथा इसमें कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, प्रोटीन और कैल्शियम 
.
काफ़ी मात्रा में पाया जाता है
➧ शिवलिंगम फूल काफी आकर्षक होता है लाल और सफेद रंग के ये फूल मनमोहन खुशबू बिखरते हैं यह हिमाचल प्रदेश की तराई क्षेत्र में पाया जाता है इसके फूल से आस-पास काफी दूर तक क्षेत्र सुगंधित हो जाता है देवघर में रूट काँवरिया पथ में इसे लगाया जा रहा है
➧ इसके अलावा प्रदेश में रुद्राक्ष, हाथी कुंभी, सोला छाल और मेघ के पेड़ों पर रिसर्च किया जा रहा है 
➧ मेघ का पेड़ काफी संख्या में पाया जाता था, लेकिन इसकी संख्या घटती जा रही है इसके छाल का उपयोग अगरबत्ती बनाने में किया जाता है 
➧ सखुआ का पेड़, जो झारखंड का प्रमुख वृक्ष है इससे पेड़ के आस-पास पौधों को प्राकृतिक रूप से जीव विविधता में सहयोग मिलता है पर्यावरण के लिहाज से काफी बेहतर है एशिया के सबसे घने जंगल सारंडा में काफी संख्या में पाया जाता है
➧ गिद्ध मृत पशुओं को खाकर पर्यावरण को शुद्ध करते हैं। इसलिए इन्हें प्राकृतिक सफाई कर्मी कहा जाता है
➧ 9 प्रजातियां जातियां पाई जाती है, जिसमें से (IUCN) आईयूसीएन की सूची के अनुसार 3 प्रजातियां विलुप्त के कगार पर है 
झारखण्ड में गिध्दों की 3 प्रजातियाँ पायी जाती हैं 

➧ 1980 के दशक में इनकी संख्या हजारों में थी, परंतु पिछले 28 सालों में इनकी संख्या में 97% की कमी आई हैइनके विलुप्त का मुख्य कारण 'डाइक्लोफेनेक' दर्द निवारक दवा है 
➧ इनका प्रयोग पशुओं के इलाज में होता है ये  पशु जब मृतप्राय होते हैं तो इनके शरीर के अवशेषों को खा कर मर जाते हैं गिद्धों की संख्या के कमी के दूसरे कारणों में प्रमुख है- पेड़ों की कटाई, जिस कारण घोंसले बर्बाद होते हैं और अगली पीढ़ी जन्म नहीं ले पाते हैं
 
➧ वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची- 1 में गिद्ध को संरक्षण प्राप्त है इस एक्ट के अनुसार किसी भी तरह से गिद्ध का नुकसान पहुंचाना कानूनन जुर्म है

➧ ऐसा करने पर कम-से-कम 3 से 7 साल की सजा या 25000 हज़ार रूपये जुर्माना या दोनों हो सकता है

➧ डाइक्लोफेनेक दवा का इस्तेमाल भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया है


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Thursday, May 27, 2021

Kora Janjati Ka Samanya Parichay (कोरा जनजाति का सामान्य परिचय)

Kora Janjati Ka Samanya Parichay

➧ कोरा जनजाति प्रजातीय दृष्टि से प्रोटो- आस्ट्रोलॉयड समूह से संबंधित है परंतु रिजले ने इन्हें द्रविड़ प्रजाति  समूह में वर्गीकृत किया है 

 इस जनजाति को कई स्थानों पर दांगर भी कहा जाता है 

कोरा जनजाति का सामान्य परिचय

➧ इस जनजाति की बोली का नाम भी कोरा है जो मुंडारी परिवार(ऑस्ट्रो-एशियाटिक) से संबंधित है

➧ इस जनजाति का संकेन्द्रण मुख्यत: हजारीबाग, धनबाद, बोकारो, सिंहभूम एवं संथाल परगना क्षेत्र में है

➧ समाज एवं संस्कृति

➧ इस जनजाति का परिवार पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय होता है 

➧ रिजले के अनुसार इस जनजाति की 7 उपजातियां है  

 यह जनजाति मुख्यत: ठोलो, मोलो , सिखरिया और बादमिया नामक वर्गों में विभाजित है

➧ कोरा लोग अपने घर को ओड़ा तथा गोत्र को गुस्टी कहते हैं 

➧ इस जनजाति के युवागृह को 'गीतिओड़ा' कहा जाता है 

➧ इस जनजाति में समगोत्रीया विवाह निषिद्ध माना जाता है  

 इस जनजाति में गोदना की प्रथा पाई जाती है तथा ये गोदना को स्वर्ग या नरक में अपने संबंधियों को पहचानने हेतु आवश्यक चिन्ह मानते हैं

➧ इनके गांव के प्रधान को महतो कहा जाता है

➧ कोरा जनजाति के प्रमुख गोत्र है :-मागडू , कच, चीखेल, मेरोय, बुटकोई    

➧ इनके गोत्रों  में सबसे ऊपर 'कच' तथा सबसे नीचे 'बूटकोई' है

 इस जनजाति के प्रमुख त्यौहार सवा लाख की पूजा (सवा लाख देवी-देवताओं की पूजा), नवाखानी, भगवती दाय, काली माय पूजा, बागेश्वर पूजा, सोहराई आदि है 

➧ जनजाति के प्रमुख नृत्य खेमटा, गोलवारी, दोहरी, झिंगफुलिया आदि है 

➧ आर्थिक व्यवस्था 

➧ इस जनजाति का परंपरागत पेशा मिट्टी कोड़ना था. जिसके कारण ही इनका नाम 'कोड़ा' पड़ा  

➧ धार्मिक व्यवस्था 

➧ इनके पुजारी को बैगा कहा जाता है

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Wednesday, May 26, 2021

Gel Electrophoresis of Protein - CSIR/ DBT/ ICMR (Life Sciences)

Gel Electrophoresis of  Protein

Gel Electrophoresis:

Features:

  • Gel matrix is the stationary phase and liquid (buffer with various ions) is the mobile phase.

  • Gel matrix is made up of some polymers viz. polyacrylamide polymer or agarose polymer.

  • The gel is a three-dimensional molecular network and this molecular network has various pores through which molecules can pass. Hence, it acts as a mobile sieve.


  • The distribution of the pore size in a gel determines the size range of the ions that can be separated.

Theory of Gel Electrophoresis:

A molecule with net charge 'q' moves in an electric field with velocity 'v'.

v = E*q/f

Where, 

  • 'E' is electric field in volts/cm. 
  • 'f' is a frictional coefficient, which depends upon the shape and mass of the molecules.

Experiments are typically done at a constant voltage. Then the movement of molecules depends only on q/f.

For molecules of similar shapes, such as DNA or SDS-bound proteins, the movement depends only on the size of the molecules. Small molecules move faster than large molecules.


Methods of gel electrophoresis:

Polyacrylamide Gel Electrophoresis (PAGE):

  • Used to separate large biomolecules such as proteins and DNA.
  • It typically runs under two conditions: denaturing and native.
  • High-resolution power for biomolecules up to 1000 kDa.
  • Gel matrix has good physical stability, thus, easy to handle.
  • Sample separation is due to both molecular sieving and electrophoretic mobility.
  • No void volume in the matrix. An only continuous network of pores.
  • Small molecules move faster than larger molecules.
  • The pore size of the gel matrix is controlled by the concentration of acrylamide and N, N'-methylenebisacrylamide.
  • Caution: Monomer acrylamide is a neurotoxin and is also suspected to be a carcinogen.
acrylamide (4 to 20%)
Fig: acrylamide (4 to 20%)


N, N'-methylenebisacrylamide (1 to 5% of acrylamide)
Fig: N, N'-methylenebisacrylamide (1 to 5% of acrylamide)

Polyacrylamide Matrix
Fig: Polyacrylamide Matrix



Advantages of Polyacrylamide Gel:

  • It does not interact with protein or nucleic acid.
  • It is chemically stable, hydrophilic, free of ions.
  • It does not interfere with common staining reactions.


SDS-PAGE denaturing condition:

Discontinuous Gel Electrophoresis:

  • Two gel layers: stacking gel (upper) and resolving gel (lower).
  • These are prepared with buffers with different ionic strengths and pH.
  • Stacking gel concentrates all protein molecules into a tight band before entering the resolving gel.
  • Sodium dodecyl sulfate (SDS) is a detergent.
  • SDS binds hydrophobic regions of the denatured protein, resulting in a constant charge/mass ratio and uniform shape. Proteins are now separated by size.
  • The majority of the current is carried by the buffer ions i.e.tris, glycine, and chloride.
  • Protein ions have a negligible contribution to the current.
  • At low buffer concentration, proteins will migrate fast, resulting in smeared bands.
  • At high buffer concentration, proteins will move very slowly.
  • Visualizing the protein bands with Bromophenol blue (negatively charged and high electrophoretic mobility, runs fastest), Coomassie Brilliant Blue R-250, and Coomassie Brilliant Blue G-250.

Functions of Stacking gel:

  • The stacking gel is polymerized from a dilute acrylamide solution. The large pore size does not provide a molecular sieving effect.
  • Stacking gel ensures that all of the proteins arrive at the running gel at the same time so proteins of the same molecular weight will migrate as tight bands.

Functions of Resolving gel:

  • The resolving gel is to separate the protein based on their molecular weight.


Processes:

  • Protein purified sample incubated with Sodium Dodecyl Sulfate (SDS) to provide a uniform negative charge.
  • Sample from different animals loaded into different "wells" of an electrophoresis chamber.
  • Acrylamide gel, containing microscopic pores, separates the cathode/anode.
  • The first "well" contain loading control. A mixture of multiple proteins of known molecular mass added as a reference to experimental wells. Tracking dye added to loading control to visualize protein migration.
  • When electrical current is run through the chamber, negatively charged proteins migrate towards a positive anode.
  • Smaller proteins "slip" through resolving gel more quickly than larger bulky proteins.
  • Visualization of protein by western blotting.

SDS- Polyacrylamide Gel Electrophoresis

Fig: SDS- Polyacrylamide Gel Electrophoresis





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Kanwar Janjati Ka Samanya Parichay (कंवर जनजाति का सामान्य परिचय)

Kanwar Janjati Ka Samanya Parichay

➧ यह जनजाति कौरवों के वंशज के हैं 

➧ इस जनजाति का संबंध प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉयड प्रजाति समूह से है

➧ इनकी भाषा का कवराती (कवरासी) या सादरी है

कंवर जनजाति का सामान्य परिचय

➧ कंवर झारखंड की 31वीं जनजाति है जिसे भारत सरकार ने 8 जनवरी, 2003 में जनजाति की श्रेणी में शामिल किया है 

➧ यह जनजाति पलामू, गुमला व सिमडेगा जिले में निवास करती  हैं 

समाज और संस्कृति

➧ इनका परिवार पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय होता है 

➧ इस जनजाति में कुल 7 गोत्र पाए जाते हैं, जिसके नाम प्रहलाद,  अभीआर्य, शुकदेव, तुण्डक, वरिष्ठ, विश्वामित्र व पराशर है

 इनका समाज वहिविर्वाही होता है अर्थात विवाह हेतु अपने वंश या  गोत्र के बाहर की कन्या को ढूंढा जाता है जिसे 'कूटमैती प्रथा' कहते हैं

➧ इस जनजाति में चार प्रकार के विवाह प्रचलित है जिसमें क्रय विवाह सर्वाधिक प्रचलित है

➧ इसके अतिरिक्त इसमें सेवा विवाह, ढुकु विवाह, जिया विवाह का प्रचलन पाया जाता है

➧ इस जनजाति में वधू मूल्य को सुक-दाम कहा जाता है

➧ वधु मूल्य रूप में नगद के अतिरिक्त 10 खण्डी चावल दिए जाने पर इसे 'सुक-मोल' कहा जाता है

➧ इस जनजाति का पंचायत प्रधान सयान कहलाता है तथा इनकी ग्राम पंचायत का संचालन प्रधान या पटेल करता है 

➧ इस जनजाति के लोग मुख्यत: करम, तीज, जयाखानी, हरेली, पितर पूजा आदि पर्व मनाते हैं

आर्थिक व्यवस्था 

➧ इस जनजाति का प्रमुख पेशा कृषि कार्य है

➧ धार्मिक व्यवस्था 

➧ कंवर सरना धर्मावलंबी है तथा इस जनजाति का सर्वोच्च देवता भगवान है, जो सूर्य का प्रतिरूप है

 इनके ग्राम देवता को खुँट देवता कहा जाता है

➧ इनके गांव का पुजारी पाहन या वैगा कहलाता है

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Bedia Janjati Ka Samanya Parichay (बेदिया जनजाति का सामान्य परिचय)

Bedia Janjati Ka Samanya Parichay

➧ यह जनजाति एक अल्पसंख्यक जनजाति है 

➧ प्रजातिया दृष्टि से यह जनजाति द्रविड़ समूह से संबंधित है

➧ यह अपने को वेद निवस या वेदवाणी कहते हैं

बेदिया जनजाति का सामान्य परिचय

➧ इस जनजाति के लोग स्वयं को ऊंच हिंदू मानते हैं 

➧ अपने नाम के साथ ये बेदिया और मांझी की उपाधि धारण करते हैं

 इस जनजाति का संकेन्द्रण मुख्यत: रांची, हजारीबाग और बोकारो जिला में है 

➧ समाज एवं संस्कृति 

➧ इस जनजाति में बधु मूल्य को 'डाली टाका' के नाम से जाना जाता है 

➧ इनके गांव के मुखिया को प्रधान कहा जाता है। इसे महतो या ओहदार भी कहते हैं  

➧ इसके नाच के मैदान को अखाड़ा कहते हैं  

➧ इस जनजाति में सबसे प्रचलित विवाह 'आयोजित विवाह' है

 इसमें विजातीय विवाह को ठुकुर ठेनी कहा जाता है तथा यह सामाजिक रूप से  निषिद्ध होता है

 इस जनजाति में पुरुषों का परंपरागत वस्त्र केरया, कच्छा/भगवा है जबकि महिलाओं का परंपरागत वस्त्र ठेठी और पाचन है

➧ इस जनजाति में दशहरा, दिवाली, छठ, सोहराय, कर्मा आदि पर्व धूमधाम से मनाया जाता है

➧बेदिया जनजाति के प्रमुख गोत्र :- थेरहर , सूड़ी, चिडरा, बाम्बी, बड़वार, काछिम, फेचा     

➧ आर्थिक व्यवस्था

➧ इनका प्रमुख पेशा  कृषि कार्य है

धार्मिक व्यवस्था 

➧ इस जनजाति के प्रमुख देवता सूर्य है तथा इसमें सूर्याही पूजा का प्रचलन है

➧ इस जनजाति के धार्मिक स्थल को सारना कहा जाता है

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Kol Janjati Ka Samanya Parichay (कोल जनजाति का सामान्य परिचय)

Kol Janjati Ka Samanya Parichay

➧ यह जनजातीय प्रोटो-आस्ट्रोलॉयड समूह से संबंधित हैं 

➧ इनकी भाषा का नाम भी कोल है तथा भाषायी रूप से इनका संशोधन कोलेरियन समूह से है 

कोल जनजाति का सामान्य परिचय

➧ कोल झारखण्ड की 32वीं जनजाति है जिसे  भारत सरकार ने 2003 में जनजाति की  श्रेणी में शामिल किया है

➧ झारखंड में इस जनजाति का संकेन्द्रण मुख्यत: देवघर, दुमका, व गिरिडीह जिले में है

➧ समाज और संस्कृति 

➧ इनका परिवार पितृसत्तात्मक और पितृवंशीय होता है

➧ यह जनजाति 12 गोत्रों में विभक्त है, जिनके नाम हांसदा , सोरेन , किस्कू, मरांडी, हेम्ब्रम, बेसरा, मुर्मू, टुडू, चौड़े , बास्के ,चुनिआर और किसनोव है

 इस जनजाति में वधू मूल्य को 'पोटे' कहा जाता है

 इनके गांव प्रधान को मांझी कहा जाता है

➧ आर्थिक व्यवस्था

➧ इस जनजाति का परंपरागत पेशा लोहा गलाना तथा उनके सम्मान बनाना है 

➧ वर्तमान में इस जनजाति के लोग तीव्रता से कृषि को अपना व्यवसाय बना रहे हैं 

➧ धार्मिक व्यवस्था 

➧ कोल जनजाति के लोग सरना धर्म के अनुयायी हैं तथा इनका प्रमुख देवता सिंगबोंगा है 

➧ इस जनजाति में शंकर भगवन, बजरंगबली, दुर्गा एवं काली मां की भी पूजा की जाती है 

➧ इस जनजाति पर हिंदू धर्म का सर्वाधिक प्रभाव है

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Tuesday, May 25, 2021

Gond Janjati Ka Samanya Parichay (गोंड जनजाति का सामान्य परिचय)

Gond Janjati Ka Samanya Parichay

➧ गोंड जनजाति भारत की दूसरी सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है तथा इनका मूल निवास मध्य प्रदेश और गोंडवाना क्षेत्र में है

➧ झारखंड में इस जनजाति का मुख्य निवास क्षेत्र गुमला तथा सिमडेगा में है

गोंड जनजाति का सामान्य परिचय

 इसके अतिरिक्त यह जनजाति रांची, पलामू और कोल्हान में भी निवास करती हैं 

➧ इस जनजाति का संबंध द्रविड़ समूह से है

➧ इस जनजाति की भाषा गोंडी है, किंतु ये लोग बोलचाल में सादरी-नागपुरी का प्रयोग करते हैं 

➧ समाज और संस्कृति 

➧ यह जनजाति निम्न  तीन वर्गों में विभाजित है :-

 राजगोंड -  अभिजात्य वर्ग 

घुरगोंड  - सामान्य वर्ग

कमियां  - खेतिहर मजदूर 

 गोंड लोग संयुक्त परिवार को भाई बंद तथा संयुक्त परिवार के विस्तृत रूप को भाई बिरादरी कहते हैं

➧ यह जनजाति पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय है 

➧ इस जनजाति में युवागृह को घोटूल/गोटूल कहा जाता है

➧ इनका प्रमुख पर्व फरसा पेन, मतिया, बूढ़देव, करमा, सोहराई, जितिया आदि है 

➧ इनका प्रमुख पर फंसा पेन मतिया गुरदेव कर्मा सोहराय सरहुल जितिया आदि हैं

 आर्थिक व्यवस्था 

 इस जनजाति का प्रमुख पेशा कृषि कार्य है 

➧ इस जनजाति द्वारा झुम खेती को दीपा या बेवार कहा जाता है

➧ धार्मिक व्यवस्था 

➧ इनके प्रमुख देवता ठाकुर देव (अन्य नाम- बूढ़ा देव) और ठाकुर देई है

➧ ठाकुर देव सूर्य के तथा ठाकुर दीई धरती के प्रतीक हैं

 गोंड जनजाति में प्रत्येक गोत्र द्वारा 'परसापन' नामक कुल देवता की पूजा की जाती है

➧ कुल देवता की पूजा करने वाले व्यक्ति को 'फरदंग' कहते हैं

➧ इस जनजाति में पुजारी को वैगा कहा जाता है तथा इसके सहायक को मति कहा जाता है 

➧ इस जनजाति में शवों के दफनाने के स्थान को 'मसना' के नाम से जाना जाता है

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Chik Badaik Janjati Ka Samanya Parichay (चीक बड़ाईक जनजाति का सामान्य परिचय)

Chik Badaik Janjati Ka Samanya Parichay

➧ चीक बड़ाईक झारखंड की एक बुनकर जनजाति है जो झारखंड के लगभग सभी जिलों में पाई जाती हैं। 

➧ हालांकि इस जनजाति का सर्वाधिक संकेन्द्रण गुमला-सिमडेगा क्षेत्र में पाया जाता है। 

 इनकी भाषा नागपुरी है। 

चीक बड़ाईक जनजाति का सामान्य परिचय

 समाज एवं संस्कृति

➧ इनका समाज पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय होता है। 

➧ यह  जनजाति बड़ गोहड़ी (बड़ जात) तथा छोट गोहड़ी (छोट जात) नामक दो वर्गों में विभाजित है।  

➧ इस जनजाति के प्रमुख गोत्र  तनरिया, खम्बा एवं तजना है

➧ इस जनजाति में अन्य जनजातियों की तरह अखरा (नृत्य स्थल) तथा पंचायत व्यवस्था नहीं मिलती है

➧ इस जनजाति में पुनर्विवाह को सगाई कहा जाता है

 इनका प्रमुख त्योहार सरहुल, नवाखानी, करमा, जितिया बड़ पहाड़ी, सूर्याही पूजा, देवी माय, देवठान, होली, दीपावली आदि है 

➧ इस जनजाति में पहले नर बलि की प्रथा प्रचलित थी, जो अब समाप्त हो गया है 

➧ आर्थिक व्यवस्था 

 इनका मुख्य पैसा कपड़ा बुनना है जिसके कारण इन्हें हाथ से बने कपड़ों का जनक भी कहा जाता है  

➧ धार्मिक व्यवस्था 

➧ इस जनजाति के प्रमुख देवता सिंगबोंगा है   

➧ देवी माई इनकी प्रमुख देवी है   

➧ इस जनजाति में शवों के दफनाने के स्थान को 'मसना' कहा जाता है  

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Monday, May 24, 2021

Thungon Committee (1988) - Panchayati Raj (Rural Economics)

Thungon Committee-Panchayati Raj 

In 1988, a sub-committee of the Constitutive Committee of Parliament was constituted under the chairmanship of P.K.Thungon to examine the political and administrative structure in the district for the purpose of district planning. This committee suggested the strengthening of the Panchayati Raj system.

Thungon Committee (1988)

Recommendations by Thungon Committee:

  • The Panchayati Raj bodies should be constitutionally recognized.

  • A three-tier system of Panchayati Raj with panchayats at the village, block, and district levels.

  • Zila Parishad should be the pivot of the Panchayati Raj system. It should act as the planning and development agency in the district.

  • The Panchayati Raj bodies should have a fixed tenure of five years.


  • A planning and coordination committee should be set up at the state level under the chairmanship of the minister for planning. The presidents of Zila Parishads should be its members.

  • A detailed list of subjects for Panchayati Raj should be prepared and incorporated in the Constitution.


  • A state finance commission should be set up in each state. It would lay down the criteria and guidelines for the devolution of finances to the Panchayati Raj institutions.

  • The district collector should be the chief executive officer of the Zila Parishad.

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Binjhiya Janjati Ka Samanya Parichay (बिंझिया जनजाति का सामान्य परिचय)

Binjhiya Janjati Ka Samanya Parichay

➧ बिंझिया जनजाति एक अल्पसंख्यक जनजाति है जो स्वयं को विंध्य निवासी कहती है

 इस जनजाति का संबंध द्रविड़ समूह है

➧ इनका सर्वाधिक संकेन्द्रण रांची और सिमडेगा जिले में है

बिंझिया जनजाति का सामान्य परिचय

➧ यह अपने को राजपूत मानते हैं तथा नाम के अंत में सिंह शब्द जोड़ते हैं 

➧ यह जनजाति ब्राह्मण तथा राजपूत को छोड़कर किसी के यहां भोजन नहीं करती हैं 

➧ इनकी भाषा सदानी है  

➧ समाज एवं संस्कृति

 यह जनजाति सात गोत्रों में विभाजित है इनका प्रमुख गोत्र कुलूमर्थी नाग, डाडुल, साहुल, भैरव,अग्निहोत्री, करटाहा आदि हैं 

➧ इस जनजाति में समगोत्रीय विवाह निषिद्ध माना जाता है

➧ इस जनजाति में गुलैची विवाह, ढुकु विवाह तथा सगाई साध विवाह प्रचलित है

➧ इस जनजाति में वधू मूल्यों को 'डाली कटारी' कहा जाता है 

➧ इस जनजाति में तलाक को छोड़ा-छोड़ी कहा जाता है 

➧ इस जनजाति में युवागृह  जैसी संस्था नहीं पाई जाती है  

➧ इस जनजाति में हड़िया पीना वर्जित है

➧ इस जनजाति का प्रमुख त्यौहार सरहुल, करमा, सोहराय, जगन्नाथ पूजा आदि हैं

➧ आर्थिक व्यवस्था

➧ इनका प्रमुख पेशा कृषि कार्य है

➧ धार्मिक व्यवस्था

 इनके सर्वाधिक प्रमुख देवता विंध्यवासिनी देवी है इसके अतिरिक्त यह लोग चरदी देवी की पूजा करते हैं

➧ इस जनजाति में तुलसी पौधों पौधों को पूजनीय माना जाता है 

➧ ग्रामश्री इनकी ग्राम देवी है

➧ इनके पुजारी को बैगा कहा जाता है

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Chero Janjati Ka Samanya Parichay (चेरो जनजाति का सामान्य परिचय)

Chero Janjati Ka Samanya Parichay

➧ प्रजातीय दृष्टि से इस जनजाति का संबंध प्रोटो-आस्ट्रोलॉयड समूह से है

➧ इनका झारखंड में सबसे अधिक संकेन्द्रण पलामू और लातेहार जिले में है 

➧ यह जनजाति स्वयं को  च्वयन ऋषि का वंशज मानती है

चेरो जनजाति का सामान्य परिचय

➧ यह जनजाति स्वयं को चौहान या राजपूत कहती हैं

➧ यह झारखंड की एकमात्र जनजाति है जो जंगलों और पहाड़ों में रहना नहीं पसंद करती हैं

➧ इनकी बोलचाल की भाषा सदानी है 

 समाज एवं संस्कृति 

➧ इनका समाज पितृसत्तात्मक और पितृवंशीय होता है

➧ यह जनजाति दो उपसमूहों बारह हजारी/बारह हजारिया और 13 हाजिरी और वीरबंधिया में विभक्त है 

➧ बारह हजारी स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं

 यह जनजाति 7 गोत्रों (पारी) में विभाजित है इनके प्रमुख गोत्र (पारी) छोटा मुउआर, बड़ा मुउआर, छोटा कुंवर,  बड़ा कुंवर, सोनहैत आदि है

➧ इस जनजाति में विवाह के दो प्रकार ढोला विवाह (लड़के के घर लड़की लाकर विवाह) व चढ़ा विवाह (लड़की के घर बरात ले जाकर विवाह) है 

➧ ढोला विवाह सामान्यता गरीबों के यहां देखा जाता है

➧ इस जनजाति में वधू मूल्य को दस्तूरी कहा जाता है 

➧ चेरों  लोग गांव को डीह कहते हैं 

➧ इस जनजाति का प्रमुख त्योहार सोहराय, काली पूजा, छठ पूजा, होली आदि है

 आर्थिक व्यवस्था 

➧ इनका प्रमुख पेशा कृषि कार्य है

 धार्मिक व्यवस्था 

➧ इस जनजाति के धार्मिक प्रधान को वैगा कहा जाता है 

➧ इस जनजाति में जादू टोना करने वाले व्यक्ति को माटी कहा जाता है

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Sunday, May 23, 2021

Gadgil Committee (1988) - Panchayati Raj (Rural Economics)

Gadgil Committee - Panchayati Raj

The committee on Policy and Programmes was constituted in 1988 by the Congress Party under the chairmanship of V.N. Gadgil. This committee was asked to consider the question of "how best Panchyati Raj institutions could be made effective".

Gadgil Committee (1988)

Recommendations by Gadgil Committee:

  • A constitutional status should be bestowed on the Panchayati Raj institutions.

  • A three-tier system of the Panchayati Raj with panchayats at the village, block, and district levels.


  • The members of Panchayats at all three levels should be directly elected.

  • Reservations for SCs, STs, and women.

  • The Panchayati Raj bodies should have the responsibility of preparing and implementation plans for socio-economic development. For this purpose, a list of the subjects should be specified in the constitution.


  • Establishment of a State Finance Commission for the allocation of finances to the Panchayats.

  • Establishment of a State Election Commission for the conduction of elections to the panchayats.

The above recommendations of the Gadgil Committee became the basis for drafting an amendment bill aimed at conferring the constitutional status and protection to the Panchayat Raj institutions.

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