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Wednesday, December 30, 2020

Jharkhand Ki Bhasha Aur Boli(झारखण्ड की भाषा और बोली)

Jharkhand Ki Bhasha Aur Boli

झारखण्ड की भाषा और बोली

➤भाषा और बोली के बीच विभाजन की रेखा बहुत ही पतली होती है

भाषा का क्षेत्र विस्तृत होता है, जिसमें साहित्यिक रचनाएं होती है

जबकि बोली का क्षेत्र छोटा होता है इसमें साहित्यिक रचनाएं नहीं होती

भाषा के आधार पर झारखंड की भाषाओं एवं बोलियों  को 3 वर्गों में बांटा जा सकता है

1) मुंडारी भाषा (आस्ट्रो एशियाटिक) परिवार

2) द्रविढ़ (द्रविड़ियन) भाषा परिवार और

3) इंडो-आर्यन भाषा परिवार

1) मुंडारी भाषा (आस्ट्रो एशियाटिक) परिवार

इस भाषा परिवार में संताली, मुंडारी, हो, खड़िया, करमाली, भूमिज,  महाली, बिरजिया, असुरी, कोरबा आदि भाषाएं शामिल है 

मुंडा भाषा परिवार की ये  बोलियां रांची,सिंहभूम , हजारीबाग आदि क्षेत्र में यहां की जनजातियां द्वारा बोली जाती है

 संथाली भाषा को होड़ -रोड़ अर्थात होड़  लोगों की बोली भी कहा जाता है 

➤यह भाषा संख्या की दृस्टि से झारखण्ड में बोली जाने वाली द्वितीय भाषा है 

➤42 वें संविधान संशोधन 2003 के द्वारा सविंधान की आठवीं अनुसूची में इस भाषा को स्थान दिया गया है 

➤यह भाषा सविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान पाने वाली  झारखंड की एकमात्र क्षेत्रीय भाषा है 

इसके दो रूप मिलते हैं:- शुद्ध संथाली एवं मिश्रित संथाली 

मिश्रित संथाली में बांग्ला, उड़िया, मैथिली आदि का मिश्रण मिलता है

मुंडारी :- मुंडा जनजाति की भाषा का नाम मुण्डारी है ,जिसके चार रूप मिलते हैं 

➤खूटी और मुरहू क्षेत्र के पूर्वी अंचलों में बोली जाने वाली मुंडारी को हसद मुंडारी कहा जाता हैं 

➤तामड़ के आस-पास के क्षेत्र में बोली जाने वाली मुंडारी तमड़िया मुंडारी कहलाती है

➤केर मुण्डारी राँच के आस-पास के के क्षेत्रों में बोली जाने वाली मुंडारी भाषा है 

नागपुरी भाषा मिश्रित मुंडारी को नगूरी मुंडारी कहा जाता है

➤यह तोरपा,कर्रा ,कोलेबिरा  वानों आदि क्षेत्रों में बोली जाती हैं

हो :-यह हो जनजाति की भाषा का नाम है इस भाषा की अपनी शब्दावली एवं उच्चारण पद्धति है। अपने में ही सीमित रहने के कारण इस भाषा का विकास अधिक नहीं हो सका है 

खगड़िया :- खगड़िया जनजाति की भाषा का नाम खड़िया ही है

2) द्रविड़ (द्रविड़ियन) भाषा परिवार

इस भाषा परिवार में मुख्यतः कुड़ुख (उरांव ) ,मालतो (सौरिया , पहाड़िया, व माल पहाड़िया) आदि शामिल है 

➤द्रविड़ भाषा परिवार की कुड़ुख बोली उरांव जनजाति के लोगों में प्रचलित है इस भाषा ने बड़ी उदारता से अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण किया है

कुड़ुख भाषा का ही  एक अन्य रूप मालतो है

➤मालतो को सौरिया  पहाड़ियां,गोंडी  तथा माल पहाड़िया आदि जनजातियां बोलचाल के रूप में प्रयोग करती हैं 

3) इंडो-आर्यन भाषा परिवार

हिंदी, खोरठा, नागपुरी,कुड़माली, पंचपरगनिया,आदि इस भाषा परिवार में आती है। इसे सदानी भाषा भी कहते हैं

हिंदी :- झारखंड की सर्वप्रमुख भाषा हिंदी है इससे झारखंड की राजभाषा होने का गौरव प्राप्त है यहां हिंदी बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक है

खोरठा :- इसका  संबंध प्राचीनी खरोष्ठी लिपि से जोड़ा जाता है यह मागधी  प्राकृत से विकसित एक भाषा है 

➤यह हजारीबाग, गिरिडीह, धनबाद, रांची जिले के उत्तरी भाग, संथाल परगना, एवं पलामू के उत्तर -पूर्वी भागों में बोली जाती है

इस भाषा के अंतर्गत रंगड़िया ,देसवाली, खटाही, खटाई,खोटहि और गोलवारी बोलियां आती है

पंचपरगनिया:- पंचपरगना क्षेत्र जिसके अन्तर्गत तमाड़ ,बुंडू ,राहे ,सोनाहातु और सिल्ली क्षेत्र आते हैं में प्रचलित भाषा पंच परगनिया कहलाती है 

कुड़माली :- मूल रूप से कुर्मी जाति की भाषा होने के कारण इसका नाम कुड़माली पड़ा 

यह रांची, हजारीबाग, गिरिडीह, धनबाद, सिंहभूम एवं संथाल परगना में बोली जाती है 

नागपुरी :- यह भी मागधी  प्राकृत  से विकसित एक भाषा है संपर्क भाषा के रूप में पूरे झारखंड में यह प्रचलित है 

इसे नागवंशी राजाओं की मातृभाषा होने का गौरव प्राप्त है इसे सादरी /गवारी  के नाम से भी जाना जाता है

इन भाषाओं के अतिरिक्त झारखंड में भोजपुरी, मैथिली,मगही ,अंगिका ,बांग्ला, उर्दू, उड़िया, जिप्सी,   आदि भाषाएं बोली जाती हैं 

➤राज्य के राँची तथा पलामू क्षेत्र के साथ ही अन्य क्षेत्रों में भोजपुरी में बात-चीत करने वाले झारखंड- वासियों तथा बिहारियों की एक बड़ी संख्या विद्यमान है

झारखंड राज्य में प्रचलित भोजपुरी को दो वर्गों में विभाजित किया गया है

1)आदर्श भोजपुरी :- यह मुख्यत: पलामू के कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है 

2) नागपुरिया, सादरी एवं सदानी, भोजपुरी :- इसका व्यवहार छोटानागपुर के गैर आदिवासी क्षेत्रों में होता है 

झारखंड राज्य के हजारीबाग, चतरा, कोडरमा, पूर्वी पलामू, रांची एवं सिंहभूम  में बोल-चाल की भाषा के रूप में मगही का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है

भाषा विज्ञानी डॉ जॉर्ज ग्रियर्सन ने मगही बोली को दो श्रेणी में विभक्त किया है

1)आदर्श मगही :- यह मुख्य रूप से हजारीबाग एवं पूर्वी पलामू में बोली जाती है 

2) पूर्वी मगही :- यह रांची, हजारीबाग आदि क्षेत्रों में बोली जाती है 

रांची के कुछ क्षेत्रों में बोली जाने वाली पूर्वी मगही के रूप को पचपरगनिया भी कहा जाता है

अंगिका प्राचीन मैथिली का वर्तमान स्वरूप समझी जाने वाली भाषा है

यह मुख्यत: गोड्डा, दुमका, साहिबगंज, देवघर आदि क्षेत्रों में प्रचलित है छठी शताब्दी के ग्रंथ ललित विस्तार की रचना इसी भाषा में की गई थी

जिप्सी झारखंड में छिट-पुट बोली जाने वाली बोली है या नट, मलाट तथा गुलगुलिया जातियों की संपर्क बोली है

उर्दू को झारखंड के द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया गया है

बांग्ला झारखंड राज्य की तीसरी जाने वाली भाषा हैउत्तरी 

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Tuesday, December 29, 2020

Jharkhand Ke Pramukh Patra Patrikaye (झारखंड के प्रमुख पत्र-पत्रिकाएं)

Jharkhand Ke Pramukh Patra Patrikaye

झारखंड के प्रमुख पत्र-पत्रिकाएं

घर बंधु:
1880 में  एनाट रॉड के संपादन में जर्मन मिशन रांची द्वारा ईसाईं दर्शन व समाचार के प्रचार के उद्देश्य से प्रकाशित

आर्यावर्त :- बालकृष्ण सहाय के संपादन में आर्य प्रतिनिधि सभा, रांची द्वारा झारखंड पर केंद्रित 1 अप्रैल 1898 से 11 नवंबर 1950 तक प्रकाशित


सोशल सर्जन :- 1918 में सुकुमार हलधर के संपादन में रांची से समाज सुधार, राष्ट्रीय स्वतंत्रता एवं समाचार के प्रसार के लिए आरंभ किया गया 

मैन  इन इंडिया :- 1929 में शरतचंद्र राय के संपादन में चर्च रोड रांची से मुंडा, उरांव ,खड़िया,असुर, बिरहोर आदि आदिवासी समुदायों के मानविकी अध्ययन पर प्रकाशित इसका प्रकाशन आज भी जारी है 

छोटानागपुर पत्रिका :- 1924 में  संपादक रामराज  शर्मा द्वारा अपर बाजार रांची से प्रकाशित  

इस पत्रिका में झारखंड की समस्याओं एवं आदिवासी भाषाओं में आदिवासी लेखकों द्वारा लिखे आलेखों को प्रमुखता दी गई

झारखंड :- बड़ाईक ईश्वरी प्रसाद सिंह के संपादन में गुमला से नवंबर 1937 में प्रकाशित झारखंड आंदोलन की भूमिका महत्वपूर्ण पत्रिका

सत्संग :- मुलत:ईसाई धर्म पत्रिका, 1937 से 1954 तक फादर पीटर शांति नवरंगी के संपादन में निकली, जिसमें छोटानागपुर का इतिहास धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ

आदिवासी पाक्षिक:-बंदीराम उरांव और जुलियस तिग्गा के संयुक्त संपादन में आदिवासी महासभा द्वारा प्रकाशित (जयपाल सिंह मुंडा के आदिवासी महासभा में प्रवेश के अवसर पर प्रकाशित)

आदिवासी सकाम :- जयपाल सिंह मुंडा के संपादन में प्रकाशित महासभा का मुख्य पत्र। हिंदी, बंगला और अंग्रेजी सहित सभी झारखंडी भाषाओं के आलेखों को इसमें प्रमुख स्थान मिला

अबुआ झारखंड :- 14 दिसंबर 1947 से इग्नेस कुजूर एवं आगे चलकर  इग्नेस बैक के संपादन में दासों  प्रेस ,पत्थरकुदवा, रांची से निकलना शुरू हुआ, जो 1950 से झारखंड पार्टी का मुख्यपत्र बन गया

आदिवासी :- पहले चार अंक नागपुरी में निकले बाद में यह हिंदी में प्रकाशित होने लगा, परंतु इसमें लगातार झारखंडी  भाषाओं की रचनाएँ  छपती रही

संपादक -राधाकृष्ण फिलहाल यह जनसंपर्क विभाग झारखंड सरकार की पत्रिका है (प्रकाशन वर्ष- 1947)

होड़ संवाद :- डोमन साहू समीर के संपादन में 1947 से निरंतर प्रकाशित संथाली भाषा साहित्य की पत्रिका 

संप्रति इसका संपादन बाबूलाल मुर्मू कर रहे हैं 

राष्ट्रीय भाषा :- झारखंड का प्रथम हिंदी दैनिक पत्र राष्ट्रीय भाषा का प्रकाशन 1950 में रांची से हुआ प्रकाशक- देवी प्रसाद मित्र, संपादक बटुक देव शर्मा 

जगर साड़ा :- सुशील कुमार बागे द्वारा 1953 में रांची से संपादित-प्रकाशित मुंडारी पत्रिका 

नागपुरी :- अप्रैल 1961 में प्रकाशित नागपुरी पत्रिका, संपादक जोगेंद्र नाथ तिवारी

धरैया गुइठ:-   ईसाई धर्म तथा सादरी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए आदिवासी स्टूडेंट शिलांग की ओर से 1961 में बाखला जेफ और जोंस क्रिकेटर के संपादन में इसका प्रकाशन हुआ

रांची एक्सप्रेस :- यह समाचार पत्र बलवीर दत्त के संपादन में पहले सप्ताहिक और बाद में दैनिक (अगस्त 1976 में) रूप में प्रकाशित, प्रकाशन वर्ष 15 अगस्त, 1963 

तितकी :-  1963 में बीएन ओहदार एवं झारपात के संपादन में खोरठा भाषा साहित्य की निरंतर प्रकाशित पत्रिका 

नागपुरी महिनवारी कागज :- नागपुरी भाषा परिषद रांची द्वारा 1964 में योगेंद्र नाथ तिवारी के संपादन में प्रकाशित

नागपुरिया समाचार :- नागपुरी भाषा की पत्रिका 1966 में स्थापना, संपादक लक्ष्मी नारायण थे 

झारखंड समाचार:- अबुआ झारखंड की तरह ही झारखंड आंदोलन की पत्रिका 9 जून, 1968 से, इग्नेस कुजूर के संपादन में प्रकाशित

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Monday, December 28, 2020

Jharkhand Ke Mele (झारखंड के मेले)

झारखंड के मेले

(Jharkhand Ke Mele)

झारखंड के मेले

➤झारखंड में मेलों का काफी महत्व है यहां प्राय: मेले किसी ना किसी पर्व या त्योहार के अवसर पर तीर्थ स्थानों पर लगते हैं
 

झारखंड के कुछ प्रमुख मेले निम्नांकित हैं

हिजला मेला

यह मेला दुमका के निकट मयूराक्षी नदी के किनारे लगता है

यह संथाल जनजाति का एक मुख्य ऐतिहासिक मेला है 

बसंत ऋतु के कदमों की आहट के साथ शुरू होने वाला यह मेला 1 सप्ताह तक चलता है

संथाल परगना के तत्कालीन अंग्रेज उपायुक्त कास्टेयर्स ने 1890 ईसवी में इस मेले की शुरुआत की थी

हिजला शब्द 'हिजलोपाइट' नामक खनिज का संक्षिप्त  रूप है ,जो संथाल परगना की पहाड़ियों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है 

श्रावणी मेला

प्रत्येक वर्ष श्रावण महीने में देवघर में लगने वाला यह मेला विश्व का सबसे बड़ा मानव मेला है

प्रतिवर्ष श्रावण माह प्रारंभ होते ही 1 माह तक यहां भारत से ही नहीं बल्कि पड़ोसी देशों से भी शिव भक्त जल चढ़ाने आते हैं

विश्व का एकमात्र ऐसा मेला है जहां सभी एक ही रंग के वस्त्र पहन कर आते हैं

रथ यात्रा मेला 

रांची शहर में स्थित स्वामी जगन्नाथ का ऐतिहासिक मंदिर है 

प्रतिवर्ष यहां आषाढ़ शुल्क द्वितीय को रथयात्रा व एकादशी को धुरती रथयात्रा मेला लगता है

नरसिंह स्थान मेला 

हजारीबाग से करीब 5 किलोमीटर दक्षिण में लगने वाला नरसिंह स्थान मेला के नाम से प्रसिद्ध यह मेला एक बहुआयामी मेला है

यहां मेला कार्तिक पूर्णिमा को लगता है

यह ईश-दर्शन भी है, पिकनिक भी है, मनोरंजन भी है, प्रदर्शन भी है और मिलन-संपर्क का भी अवसर भी  है 

यह मेला मुख्यत: शहरी मेला माना जाता है, क्योंकि इस मेले में इस मेले में प्रया: शहर की स्त्री-पुरुष युवा वर्ग के एवं बच्चों की उपस्थिति अधिक रहती है

रामरेखा धाम मेला

सिमडेगा जिले में स्थित रामरेखा धाम में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर 3 दिनों का भव्य मेला लगता है 

➤किवदंती है कि भगवान श्रीराम ने दंडकारण्य जाने के क्रम में रामरेखा पहाड़ पर कुछ दिन बिताए थे  

इस मेले में झारखंड के अलावा मध्य प्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल से काफी संख्या में तीर्थ यात्रियों और दुकानदारों का आगमन होता है  

नवमी डोल मेला 

रांची के नजदीक टाटीसिल्वे में हर वर्ष होली के ठीक 9 दिन बाद एक बहुत बड़ा मेला लगता है 

यह मेला नवमी डोल मेला के नाम से प्रसिद्ध है  

यहां भगवान कृष्ण और राधा की प्रतिमाओं का पूजन किया जाता है  

धार्मिक परंपरा अनुसार राधा और कृष्ण की मूर्तियां को एक डोली में झुलाया जाता है 

झारखंड के आदिवासियों की प्राचीन संस्कृति और परंपराओं का स्पष्ट रूप आज भी सैकड़ों वर्ष पुराने इस मेले में देखा जा सकता है 

सूर्य कुंड मेला  

हजारीबाग जिले के बरकट्ठा प्रखंड के बगोदर से 2. 5  किलोमीटर दूर सूर्यकुंड नामक स्थान पर मकर संक्रांति के दिन लगने वाला यह मेला 10 दिनों तक चलता है  

जिसे सूर्य कुंड मेला के नाम से जाना जाता है 

सूर्यकुंड की विशेषता है कि भारत के सभी गर्म जल स्रोतों में किस का तापमान सर्वाधिक है 

बढ़ई मेला  

देवघर जिला के दक्षिण-पश्चिम छोर पर बसे बुढ़ई ग्राम स्थित  बुढ़ई  पहाड़ पर सैकड़ों वर्षो से प्रत्येक वर्ष अगहन  माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मेला लगता है  

यह तिथि यहां नवान पर्व के रूप में मनाई जाती है 

नवान पर्व के अवसर पर नवान कर चुकाने के बाद लोग हजारों की तादाद में प्रसिद्ध बुढ़ई पहाड़ स्थित तालाब के पास बुढ़ेश्वरी देवी के मंदिर में जाते हैं। जहां 3 से 5 दिनों तक मेला लगता है 

गांधी मेला

प्रत्येक वर्ष गणतंत्र दिवस पर सिमडेगा जिले में 1 सप्ताह के लिए गांधी मेला लगता है

इस ऐतिहासिक मेले में विभिन्न सरकारी व गैर सरकारी विभागों द्वारा सामूहिक रूप से एक मनमोहक प्रदर्शनी लगाई जाती है जिससे विकास मेला कहा जाता है 

मंडा मेला

प्रत्येक वर्ष वैशाख, जेष्ठ , एवं आषाढ़  महीने में हजारीबाग, बोकारो तथा रामगढ़ के आस-पास के गांव में आग पर चलने वाला यह पर्व मनाया जाता है

अंगारों की आग पर लोग नंगे पांव श्रद्धापूर्वक चलते हैं और अपनी साधना को सफल बनाते हैं 

जिस रात आग पर चला जाता है उस रात को जागरण कहा जाता है दूसरे दिन सुबह मंडा मेला लगता है

हथिमा पत्थर मेला 

बोकारो जिले के फुसरो  के निकट हाथी की आकृति वाला चट्टान है 

लोक आस्था की अभिव्यक्ति स्वरूप हर वर्ष मकर सक्रांति के अवसर पर यहां सामूहिक स्नान की परंपरा है इस कारण विशाल मेला लगता है

बिंदु धाम मेला

साहिबगंज से 55 किलोमीटर दूर स्थित बिंदुधाम शक्तिपीठ में प्रत्येक वर्ष चैत महीने में रामनवमी के दिन 1 सप्ताह का आकर्षक मेला लगता है 

यहां मां विंध्यवासिनी का 3 शक्तिपीठ है


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Sunday, December 27, 2020

Coins in Ancient & Medieval India: Gupta Age Coin

Coins in Ancient & Medieval India



The word Coin is procured from the Latin word Cuneus. It is believed that the first recorded use of coin was in China & Greece around 700 BC, and in India in the 6th century BC.

The study of coins and medallions = Numismatics.

Coins Issued in Gupta Age:

  • The Gupta age (319 AD-550 AD) marked a period of a great Hindu revival.

  • The Gupta coins were made of gold, although they issued silver and copper coins too.

  • Silver coins were issued only after Chandragupta II overthrew the Western Satraps.


  • On one side of these coins, the king can be found standing and making oblations before an altar, playing the veena, performing Ashvamedha, riding a horse or an elephant, slaying a lion or a tiger or a rhinoceros with a sword or bow, or sitting on a couch.

  • On the other side was the Goddess Lakshmi seated on a throne or a lotus seal, or the figure of the queen herself.

  • The inscriptions on the coins were all in Sanskrit (Brahmi script) for the first time in the history of coins.

  • Gupta rulers issued coins depicting the emperors not only in martial activities like hunting lions/tigers, posing with weapons, etc. but also in leisurely activities like playing the Veena, with the reverse side of the coin having images of Goddesses Lakshmi, Durga, Ganga, Garuda, and Kartikeya.
Fig: King & Goddess Lakshmi




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Coins in Ancient & Medieval India: Indo-Greek Coins

Coins in Ancient & Medieval India



The word Coin is procured from the Latin word Cuneus. It is believed that the first recorded use of coin was in China & Greece around 700 BC, and in India in the 6th century BC.

The study of coins and medallions = Numismatics.


Indo-Greek Coins:


  • Indo-Greeks introduced the fashion of showing the head of the ruler on the coins.

  • The legends on their Indian coins were mentioned in two languages- in Greek on one side and in Kharosthi on the other side of the coin.

  • The Greek gods & goddesses commonly shown on the Indo-Greek coins were Zeus, Hercules, Apollo, and Pallas Athene.


These coins are significant because;
  • They carried detailed information about the issuing monarch, the year of issue, and sometimes an image of the reigning king.

  • Coins were made of silver, copper, nickel, and lead

  • The coins of the Greek kings in India were bilingual, i.e., written in Greek on the front side and in Pali language (in Kharosthi script) on the back.

Later, Indo-Greek Kushan kings introduced the Greek custom of engraving portrait heads on the coins. Kushan coins were adorned with a helmeted bust of the king on one side, and the king's favorite deity on the reverse. The coins issued by Kanishka employed only Greek characters.


The substantial coinage of the Kushan Empire also influenced a large number of tribes, dynasties, and kingdoms, which began issuing their own coins.

Fig: Kushan Period Coin




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Coins in Ancient & Medieval India: Punch Marked Coins

Coins in Ancient & Medieval India



The word Coin is procured from the Latin word Cuneus. It is believed that the first recorded use of coin was in China & Greece around 700 BC, and in India in the 6th century BC.

The study of coins and medallions = Numismatics.


Punch Marked Coins:


  • One of the five marks or symbols incused on a single side and were termed as 'Punch Marked' coins. 

  • Panini's Ashtadhyayi cites that to make punch-marked coins, metallic pieces were stamped with symbols. Each unit was called 'Ratti' weighing 0.11 gram.

  • The first trace of this coin was available between the 6th & 2nd century BC.


The following two classifications are available:


Punch marked coins issued by various Mahajanapadas:

  • The first Indian punch-marked coins called Puranas, Krishnapadas, or Pana were minted in the 6th century BC by the various Janapadas and Mahajanapadas of the Gangetic Plain.

  • These coins had irregular shapes, standard weight and were made up of silver with different markings like Saurashtra had a humped bull, Dakshin Panchala had a Swastika and Magadha had generally five symbols.

  • Magadhan punch-marked coins became the most transmitted coins in South Asia.

  • They were mentioned in the Manusmriti and Buddhist Jataka stories and lasted three centuries longer in the South than in the North.
Fig: Magadha coin (five symbols)


Punch marked coins during Mauryan Period (322-185 BC):

  • Chanakya, Prime Minister to the first Mauryan emperor Chandragupta Maurya, mentioned the minting of punch-marked coins such as Rupyarupa (silver), Suvarnarupa (gold), Tamrarupa (copper), and Sisarupa (lead) in his Arthashstra treaties.


  • The coin contained an average of 50-54 grains of silver and 32 rattis in weight and was termed as Karshapanas.
Fig: Mauryan Karshapana


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Saturday, December 26, 2020

Jharkhand Ke Pramukh Parv Tyohar (झारखंड के प्रमुख पर्व त्यौहार)

Jharkhand Ke Pramukh Parv Tyohar

झारखंड के प्रमुख पर्व त्यौहार

➤प्राचीन समय से ही झारखंड में पर्व और त्योहार की परंपरा रही है ये पर्व त्यौहार अलग-अलग ऋतु में किसी न किसी उपलक्ष्य में अत्यंत उल्लास और श्रद्धा से मनाया जाता है

झारखंड में मनाया जाने वाले कुछ प्रमुख पर्व और त्योहार निम्नलिखित हैं 

सरहुल

यह आदिवासी का सबसे बड़ा त्यौहार है 

यह पर्व  कृषि कार्य शुरू करने से पहले मनाया जाता है 

यह पर्व चैत शुक्ल की तृतीय को मनाया जाता है

इसमें पाहन (पुरोहित)  सरना (सखुए का कुंज) की पूजा करता है 

सरहुल फूल का विसर्जन स्थल गिड़ीवा  कहलाता है 

➤खड़िया लोग इसे जंकारे सोहराई के नाम से मानते हैं 

मुंडा, उरांव, एवं संथाल जनजातियों में यह पर्व क्रमशः सरहुल, खद्दी , एवं बाहा  के नाम से जाना जाता है

करमा 

यह आदिवासियों का एक प्रमुख त्योहार है, जो पूरे झारखंड में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है

इस पर्व को मुख्य रूप से उरांव जनजाति के लोग मनाते हैं

यह पर्व भादो शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है

कर्मा और धर्मा नामक दो भाइयों पर आधारित इस त्यौहार में करम  डाली की पूजा की जाती है

इसमें पूरे 24 घंटे का उपवास रखा जाता है

इस त्यौहार में नृत्य के मैदान (अखाड़ा) में करम  वृक्ष की एक डाल गाड़  दी जाती है और रात भर नृत्य- गान का कार्यक्रम चलता  रहता है

➤हिन्दुओं के रक्षाबंधन से मिलता जुलता यह पर्व एकता ,सदभाव ,के साथ कर्म को धर्म और धर्म को कर्म बनाने का सन्देश देता है 

फगुआ

यह होली का झारखंडी रूप है

यह हिन्दुओं की होली या फ़ाग के सामान होती है,लेकिन इसमें क्षेत्रीय या स्थानीय रंगत देखने को मिलती है  

➤यह फागुन महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है 

➤फगुआ में गैर-आदिवासी संबत  काटने के लिए बलि नहीं चढ़ाते हैं, किंतु आदिवासी लोग सेमल की डाली गाड़ कर उसे काटते हैं, तापन और मुर्गे की बलि चढ़ाते हैं

➤उरांव, मुंडा, खरवाल, भूमिज, महाली, बेतिया, चिक बढ़ईक, करमाली, चेरो, बैगा ,

बिरजिया आदि जनजातियों की इस त्यौहार में विशेष रूचि होती है

अषाढ़ी पूजा

➤यह सदनों एवं आदिवासियों दोनों में प्रचलित है

इसमें आषाढ़ माह में किसी दिन अखड़ा में या घर-आंगन में काले रंग की बकरी की बलि दी जाती है और तपान चढ़ाई जाती है 

ऐसी मान्यता है कि इस पूजा को करने से गांव में चेचक जैसे भयानक बीमारी नहीं होती है

धान बुनी  

आदिवासी तथा सदन इसे त्योहार के रूप में मनाते हैं

इसमें हड़िया का तपान तथा प्रसाद चलता है

मंडा के दिन ही नए बांस की टोकरी तथा धोती में धान ले जाकर खेत जोत कर बोया जाता है

वस्तुत :एक-दो मुट्ठी बोकर शुभ मुहूर्त में धान बुआई का शुरुवात किया जाता है इसे ही धान बुनी कहा जाता है 

मंडा

यह पर्व अक्षय तृतीय वैशाख माह में शुरू होता है  

इसमें महादेव शिव की पूजा महादेव मंडा में होती है 

यह त्यौहार सदन और आदिवासियों दोनों में सामान्य रूप से प्रचलित है  

इस त्यौहार में घर का एक सदस्य जो व्रती होता है, भागता कहलाता है उसकी मां या बहन उपवास रखती है जिससे सोख्ताईन कहा जाता है  

इसमें भगताओं को रात्रि में धूप-धवन की अग्नि शिखाओ  के ऊपर उल्टा लटकाकर झुलाया जाता है जिससे धुवांसी से कहते हैं फिर अंगारों पर उन्हें चलना होता है, जिससे फूल-खुदी  ही कहा जाता है 

इस पर्व  में  सिर की आराधना की जाती है 

चांडी पर्व

चंडी पर्व माघ पूर्णिमा के दिन उरांवों  के द्वारा मनाया जाता है 

इसमें महिलाएं भाग नहीं लेती हैं 

युवक की चंडी स्थल में देवी की पूजा करते हैं  

यहां एक सफेद और एक लाल मुर्गा तथा सफेद बकरा बलि के रूप में चढ़ाया जाता है 

जिस परिवार में कोई गर्भवती महिला होती है, उस परिवार का कोई भी सदस्य इस पूजा में भाग नहीं लगता है 

जनी शिकार 

यह प्रत्येक 12 वर्ष में एक बार मनाया जाने वाला महिलाओं का सामूहिक त्यौहार है  

इसमें महिलाएं पुरुष वेश धारण कर परंपरागत हथियार लेकर शिकार खेलने निकलती है  

➤वे रास्ते में मिलने वाले सभी जानवरों का शिकार करती हैं 

शाम में अखाड़ा में सभी इकट्ठा होते हैं, जहां पाहन  द्वारा सभी को मास बांटा जाता है 

देशाउली

 यह 12 वर्षों में एक बार मनाया जाने वाला त्यौहार है

 इस में पूरे गांव के लोग भैंसा की बलि बढ़ पहाडी या मरांग बुरु के नाम पर चढ़ाते हैं 

यह बलि भूयहरदारी  की ओर से दी जाती है 

इस बली को वहीं जमीन में गाड़ दिया जाता है

सोहराय

 यह पशुओं का एक श्रद्धा अर्पित करने वाला त्यौहार है, अर्थात उसके साथ नाचने-गाने और खुशियां मनाने का त्योहार है

इसमें कार्तिक अमावस्या के दिन पशुओं को नदी-तालाब में नहाला कर उनका सिंगार किया जाता है

➤सींगों  में घी और सिंदूर लगाकर उन्हें सुंदर बनाया जाता है 

दूसरे दिन गाजे-बाजे के साथ पशुओं को सड़कों और मैदान में दौड़ाया जाता है 

माघे पर्व 

➤यह पर्व माघ महीने में मनाया जाता है  

➤इसी दिन धांगर (कृषि श्रमिक) की अवधि पूरी होती है 

इस पर्व माघ महीने  के साथ ही कृषि वर्ष का अंत समझा जाता है 

इसके बाद नया कृषि वर्ष आरंभ होता है  

यह धांगरों  की विदाई का पर्व है  

ईरो-अंगा पर्व

➤हेरो  का शाब्दिक अर्थ होता है छटनी, बुआई करना   

➤मागे व् बाहा के बाद कोल्हान में एरो पर्व का आयोजन किया गया  

हेरो पर्व में बोये गए बीज  की सलामती के लिए मनाया जाता है  

मान्यता है कि एरो पर पूजा नहीं करने की स्थिति में कृषि कार्य बाधित होती है   

यह पर्व हो जनजाति द्वारा मनाई जाती है  

टुसू

यह पर्व झारखंड के आदिवासियों विशेषकर कुर्मी (महतो) जाति के लोगों का प्रमुख त्योहार है  

यह त्यौहार सूर्य पूजा से संबंधित है तथा मकर सक्रांति के दिन मनाया जाता है 

यह टूसू  नाम की कन्या की स्मृति में मनाया जाता है 

➤सिंहभूम,रांची जिले के पूर्वी क्षेत्र ,हज़ारीबाग के दक्षिणी क्षेत्र  एवं  पंचपरगना के क्षेत्र में यह पर्व बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है 

➤टुसु त्यौहार के अवसर पर पंचपरगना के क्षेत्र में  लगने वाले टुसू मेला काफी प्रसिद्ध है 

बहुरा

यह पर्व भादो के कृष्ण पक्ष चतुर्थी के दिन अच्छी वर्षा एवं संतान प्राप्ति के लिए स्त्रियों द्वारा मनाया जाता है  

यह राजा राइज  बहरलक  के नाम से भी जाना जाता  जाता है 

जावा पर्व

अविवाहित आदिवासी युवतियों द्वारा अच्छी प्रजनन क्षमता की उम्मीद और बेहतरीन कुटुमब  के लिए भादो माह में मनाया जाता है 

भागता  पर्व

तमाड़ के आस-पास के क्षेत्रों में अधिक लोकप्रिय है 

यह बसंत ऋतु एवं गर्मी के मौसम के बीच में मनाया जाता है 

इस दिन लोग उपवास रखते हैं और गांव के पुजारी पाहन को कंधों पर उठाकर सरना मंदिर ले जाते हैं

यह पर्व बूढ़ा बाबा की पूजा के रूप में जाना जाता है

सेंदरा 

➤सेंदरा उरॉवो  की संस्कृति और परंपरा इतिहास का जीवित साक्ष्य है

सेंदरा का शाब्दिक अर्थ शिकार होता है 

यह एक ऐसा पर्व है, जो उनकी आत्मरक्षा, युद्ध विद्या, भोजन और अन्य जरूरतों को पूरा करता है 

उरॉवो के बीच महिलाओं द्वारा भी शिकार खेलने की परंपरा है

इसे उरॉवो अपने कुरुख भाषा में मुक्का सेंदरा भी कहते हैं

सेंदरा कई प्रकार के होते हैं इस पर्व का आयोजन अलग-अलग समय और अवसरों पर होता है 

➤फग्गू सेंदरा  का आयोजन फागुन महीने में होता है

विशु सेंदरा वैशाख महीने में होता है 

सेंदरा पर निकलने के पूर्व गांव का पाहन  पूजा पाठ करता है

बंदना

बंदना कार्तिक महीने की अमावस्या के दौरान मनाया जाने वाला सबसे प्रसिद्ध त्योहारों में से एक है

यह त्यौहार मुख्य रूप से पालतू जानवरों से संबंधित है

इसमें लोग अपनी-अपनी गायों और बैलों को धो -पोंछकर अच्छे-अच्छे कपड़ों तथा गहनों से सजाते हैं और उनके जीवन में पशुओं द्वारा दी गई योगदान के लिए समर्पण गीत गाते हैं 

सप्ताह भर तक मनाया जाने वाला इस पर्व का आखिरी दिन काफी रोमांच होता है

आमतौर पर लोग जानवरों को सजाने के लिए प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करते हैं और उस पर लोग कलाकृति अंकित करते हैं

इसके अलावा झारखण्ड में और भी बहुत सारे त्यौहार मनाये जाते है जैसे :- होली ,दिवाली ,छठ ,दुर्गापूजा, क्रिसमस , ईद , बकरीद, मोहर्रम इत्यादि 




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Festivals of North-East India

Festivals of North-East India

SIKKIM:

Saga Dawa (Triple Blessed Festival):

  • It is substantially celebrated in the Buddhist communities existing in the state of Sikkim.

  • It is celebrated on the full moon day that descends in the middle of the Tibetan lunar month called the Saga Dawa.


  • This descends between May and June and this month is called Saga Dawa or the 'Month of merits'.

  • The festival is celebrated to memorialize the birth, enlightenment, and death (parinirvana) of Buddha.


  • People also spread the Gompas of the monastery and chant mantras, recite the religious texts and turn the prayer wheels.

Around the month of Saga Dawa, the community of Buddhists has to follow three teachings of Buddhism:
  • Generosity (dana)
  • Morality (sila)
  • Meditation or good feelings (bhavana)
Fig: Saga Dawa



Losoong Festival:


  • It is solemnized all across Sikkim during December every year. 

  • The paramount profession in the State of Sikkim is agriculture and it is the celebration of the harvest season by the farmers and other occupational communities.

  • Traditionally, it is regarded to be the festival of the Bhutia tribe but nowadays even the Lepchas celebrate it with alike stamina and delight.

  • The idiosyncratic point of the festival is that people drink the locally brewed wine, called Chaang, as part of the celebration.

  • They also get together to accomplish traditional dances like the Cham dance, and the Black hat dance at the monasteries.

  • The spirit also reviews the warrior sentiments (opinions) of the Sikkimese community through the archery festivals, etc. 
Fig: Losoong Festival




ASSAM:

Bihu Festival:

  • Rangoli or Bohang Bihu (falls on Assamese New Year in April),
  • Kongali or Kati Bihu remarked in October, and 
  • Bhogali or Magh Bihu was remarked in January. 

Rangoli Bihu is the cardinal among the three and it coincides with Assamese New Year. Songs and dances are the main charismata during Bihu.


Bohang Bihu is one of the most admired festivals of Assam. Although the Assamese honor Bihu thrice a year, the Bohnag Bihu is the most predicted one.


The festival of Bihu is traditionally secured to the changing seasons and harvests


The celebrations range from one week to almost a month depending on the communities and tribe's commitment (decision).
  • On the First Day of the festival, cows, and bulls that are the backbone of the community are bathed and fed. The decorum (ceremony) is called the 'Gora Bihu'.

  • The Second Day is the main day of the celebrations that Initiate Bihu, as people greet one another and they exchange Gamosa (a handwoven cotton towel) with their relatives.

  •  All the houses make ready Pitha or a traditional dish made of rice powder, flour, sesame, coconut, and jaggery.

  • They also arrange stages where men and women from all communities come together to perform the Bihu dance. 
Fig: Bihu



Ambubachi Mela:

  • It is confined at the Kamakhya temple of the Guwahati in the State of Assam.

  • The celebration falls in June and is one of the outstanding festivals in North-East India, so much so that it has been categorized as the 'Mahakumbh of the East'.

  • The festival has been kindred with richness rituals and many devotees come to seek the blessing of a child from the Goddess.

  • The temple has chased controversy because of the alleged tantric activities conducted during this mela.

  • During the festival, the patron Goddess Kamakhya is said to be undergoing her annual menstrual cycle. Hence, the temple remains closed for three days.
Fig: Ambubachi Mela



Majuli Festival:

  • This is one of the contemporary festivals held at Majuli in the State of Assam.

  • The festival is arranged in November, as it is the best time considering the rotating climatic conditions in Assam.

  • The Department for Culture of Assam organizes numerous events during the festival like seminars that pinnacle the traditional history and eminence of Assam.

  • The festival is organized on a huge scale in an open area or Namghar. The tribal dishes of Majuli and Assam are exhibited and put on sale.


  • Some famous artists are also invited to showcase their art and public collaborations.

  • The local patron deity is also invoked during the opening and closing etiquettes (ceremony).

  • Various dances and singing competitions are organized for the entertainment of the gala.
Fig: Majuli Festival



NAGALAND:

Hornbill Festival:

  • It is one of the notable festivals celebrated in Nagaland.

  • It is a 10 days festival that launches on 1st December every year.

  • All the major Naga tribes attend this festival and assemble at the Kisma Heritage Village.

  • All the tribes showcase their talent and cultural vividness through costumes, weapons, bows & arrows, and headgears of the clans.

  • This is also a good community to escort all the tribes together and for the younger generation.
Fig: Hornbill Festival



Moatsu Mong Festival:

  • It is celebrated by the Ao tribe of Nagaland in the first week of May after sowing is done.

  • The festival furnishes them a period of amusement and refreshment after the stressful work of clearing fields, burning jungles, sowing seeds, etc.

  • It is pronounced by songs and dances. A part of the commemoration is Sangpangtu where a big fire is lit and women and men sit around it.
Fig: Moatsu Mong Festival 



Yemshe Festival:

  • It is a harvest festival celebrated predominantly by the Pochuri tribe.

  • Catching of frogs is prohibited during this festival. It is acknowledged in September.
Fig: Yemshe Festival


Lui-Ngai-Ni Festival:

  • Almost all the branches of the Naga tribes celebrate this festival.

  • It is celebrated all over Nagaland and in some of the Naga populated parts of Manipur State too.

  • It has delighted as the mark for the seed-sowing season.

  • The festival escorts the agricultural branches of Naga tribes closer to the non-agricultural based communities of Nagas.

  • The festival is glared by a huge amount of celebration and pomp (rituals) & show.

  • It is a festival to bring communities closer and escalate the message of peace & harmony.
Fig: Lui-Ngai-Ni Festival




MANIPUR:

Cheiraoba Festival:

  • This festival is celebrated all across the State of Manipur, as it is the New Year according to the Manipuri tribes.

  • It is celebrated in April (it means the first day of the month Sajibu).

  • The festival is also correlated to the domestic deity called Sanamahi worshipped by the Meitei tribe.

  • The festival is usually administered in the temple of Sanamahi but every household cleans, buys new utensils, and new clothes for the family members.
Fig: Cheiraoba Foods



Kang Chingba (Rath Yatra):

  • The festival of Kang Chingba is one of the biggest Hindu festivals celebrated in the State of Manipur.

  • It is similar to the 'Jagannath Puri Rath Yatra' and draws many antecedents from the same.

  • It is a 10 days long festival that is celebrated in July every year.

  • The Yatra begins from the very famous holy temple of Sri Govindjee situated in Imphal.

  • The idols carved of wood and laboriously decorated are carted around in massive chariots that are called 'Kang'

  • These deities are then carried to another temple and people dance through the night to celebrate the journey.
Fig: Kang Chingba (Rath Yatra)




TRIPURA:

Kharchi Puja:


  • While it began as a festival of the royal family of Tripura, currently even the common household celebrate this festival.

  • It is celebrated for over a week and takes place in July.

  • The festival is celebrated in the honor of Earth and to worship 14 other deities.

  • Each year thousands of people trek to this temple in Agartala so that can pay adoration to the deities.
Fig: Kharchi Puja




MEGHALAYA:

Wangala Festival (The 100 Drums Festival):

  • The dominant of Garo Tribe primarily is Meghalaya.

  • The festival indicates the beginning of winter and is celebrated as a nod to the post-harvest season.

  • The festival is celebrated in the honor of 'Saljong', a local deity who is considered to be generous. He is supposed to be the force behind the good things that happen to the community. This festival is a thanksgiving for him.

  • Drums, flutes, and other orchestras instruments are played to create a festive ambiance. 

  • It is also known as the '100 Drums Wangala Festival' as loud drum noises herald the beginning of the festival.

  • The day is also set apart by the wonderful costumes worn by the participants.

  • An extraordinary feature is the feathered head-gear that is worn by everyone celebrating the festival and also reflects their clan's color.
Fig: Wangala Festival





ARUNACHAL PRADESH:

Apatani Tribe:

  • The Apatani tribe that reside in Arunachal Pradesh primarily celebrate the festival.

  • Currently, more and more tribes have started observing the rituals of the Dree festival

  • It is one of the biggest celebrations held in the Ziro valley.

  • During the festival, people offer prayers and offerings to four main Gods: Tamu, Metti, Medvr, Danyi, and Mepin.

  • These offerings are given to pray for a good and plentiful harvest.

  • People gather around the valley and perform traditional dances.

  • One of the most unique points of this festival is that cucumber is distributed to all the attendees as a symbol of a good harvest.
Fig: Apatani Festival 


Losar Festival:

  • It falls on the first day of the lunar calendar and is quite popular in Arunachal Pradesh.

  • It is mainly celebrated by the Monpa tribe who practice agriculture and animal husbandry and follow Buddism.

  • Losar is a three-day festival and is celebrated with great pomp and show at Tawang.
Fig: Losar Festival


Khan Festival:

  • It is a religious festival celebrated by the Miji tribe of Arunachal Pradesh.

  • The festival is significant because it brings together people from every background irrespective of their caste and faith to celebrate it.

  • During this, the priest ties a piece of wool in the neck of all the participants, and the thread is considered sacred.
Fig: Miji Tribes












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