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Thursday, April 22, 2021

Jharkhand Ki Sanskritik Sthiti (झारखंड की सांस्कृतिक स्थिति)

Jharkhand Ki Sanskritik Sthiti


➤जनजातीय जीवन की आधारशिला  उनकी परंपराएं हैं, क्योंकि समाज संस्कृति का नियमन भी वही होता है तथा अनुशासन और मानवीय संबंध उसी की छत्रछाया में पुष्पित पल्लवित होते हैं

आदिवासी प्रकृति पूजक होते हैं। उनके पर्व-त्यौहार भी प्रकृति से ही जुड़े होते हैं

झारखंड की जनजातियों के दो बड़े त्योहार सरहुल और करमा है इनमें प्रकृति की उपासना की जाती है। अन्य त्योहारों में भी प्रकृति को सर्वोपरि स्थान दिया जाता है

नामकरण, गोत्र बंधन एवं शादी-व्याह  जैसे उत्सव भी प्रकृति से प्रेरित होते हैं

झारखंड की प्रत्येक जनजाति की पूजा-पद्धति अपने परंपरागत विधि-विधान के अनुसार निर्धारित होती है इनमें मुख्यत: मातृदेवी और पितर देवता की पूजा होती है

धर्मांतरण के कारण झारखंड की जनजातियों का एक वर्ग भिन्न पूजा पद्धतियों में विश्वास करने लगा है, किंतु अभी भी यहां की जनजातियों की एक बड़ी संख्या मूल सरना धर्म की प्रथाओं के अनुसार पूजा-अर्चना करती है

झारखंड की जनजातियों में मृतक-संस्कार में भिन्नता पाई जाती है। यहां अलग-अलग जनजातियां भिन्न-भिन्न तरीकों से मृतक संस्कार करती हैं इस क्रिया में मुख्यत: दो तरीके प्रचलित है कहीं मृतक को जलाया जाता है, तो कहीं मृतक को मिट्टी में दफनाया जाता है। 

झारखंड का जनजातीय परिवार पितृसत्तात्मक है

प्रत्येक जनजाति कई गोत्र में विभक्त है प्रत्येक गोत्र का अपना गोत्र-चिन्ह होता है, जिसे टोटम कहा जाता है , जो टोटम सामान्यतः पशु-पक्षी या पौधों के नाम पर होता है जनजातियां गोत्र चिन्हों को पूज्य मानती है इसलिए उनकी हत्या या कष्ट पहुंचाने पर पाबंदी होता है 

प्रत्येक जनजाति गोत्र के बाहर ही विवाह करती है। गोत्र के अंदर विवाह करना जनजातीय समाज में अपराध माना जाता है। हालांकि  जनजातियां अपनी जाति के अंदर ही विवाह करती हैं

संतान पिता का गोत्र पाती है, माता का नहीं। शादी होने के बाद लड़की पति का गोत्र अपनाती है

जनजातीय परिवार अधिकांशतः एकाकी होता है होते हैं परिवार में माता-पिता और उनके अविवाहित बच्चे होते हैं परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है, परंतु कुछ जनजातियों में संयुक्त परिवार की परंपरा भी प्रचलित है 

पहाड़िया को छोड़कर अन्य जनजातियां कई गोत्रों में विभक्त है एक गोत्र के सभी सदस्य अपने को एक ही पूर्वज की संतान मानते हैं

जनजातियां जीवन में गोत्र सामाजिक संबंधों में आपसी सहायता और सुरक्षा के मजबूत धागों का सृजन करती हैं 

जनजातियों में स्थानीय प्रशासन के लिए गठित परिषद, पंचायत आदि में मुखिया, सरदार या  राजा का पद एक निश्चित गोत्र का सदस्य ही संभालता है प्रशासन संबंधी अन्य कार्य भी गोत्र के अनुसार चुने गए व्यक्ति ही करते हैं 

माता-पिता की संपत्ति पर पहला अधिकार पुत्रों  का होता है, किंतु अविवाहित बेटियों का भी संपत्ति में हिस्से का प्रावधान है

उरांव जनजाति में परिवार के धन पर सिर्फ पुरुष का अधिकार होता है, स्त्री का नहीं 

हो जनजाति में किली के आधार पर परिवार बनते हैं। किली एक सामाजिक और राजनीतिक इकाई होती है

सौरिया पहाड़ियां में संपत्ति पर सिर्फ पुत्रों का अधिकार होता है

बिरहोर जनजाति में पिता की मृत्यु के बाद संपत्ति बेटों के बीच बांट दी जाती है, लेकिन बड़े बेटे को कुछ ज्यादा हिस्सा मिलता है लेकिन बड़े बेटे को कुछ हिस्सा ज्यादा मिलता है बेटा न होने पर परिवार के साथ रहने वाले घर जमाई को पूरी संपत्ति मिलती है 

झारखंड की जनजातियों में धार्मिक विश्वास और आस्था का आधार है -बोंगा। उनके अनुसार बोंगा वह शक्ति है, जो संपूर्ण जग के कण-कण में व्याप्त है उसका न कोई रूप है और न रंग। 

संथाल, मुंडा, हो, बिरहोर आदि जनजातियों में आदि-शक्ति एवं सर्वशक्तिमान देव को सिंगबोंगा कहा जाता है।  माल पहाड़िया, उरांव और खड़िया जनजाति के लोग उसे धर्म-गिरीग आदि नामों से पुकारते हैं जनजातियों में ग्राम प्रधान को हाथों जनजाति में ग्राम देवता को हाथों बंगाली बंगाली बंगाली नामों से पुकारते हैं 

जनजातियों में ग्राम देवता को हेतु बोंगा, देशाउली बोंगा, चांडी बोंगा के नामों से पुकारा जाता है 

मुंडा, हो आदि जनजातियों में ग़ृह देवता को ओड़ा बोंगा के नाम से पुकारा जाता है 

जनजातियों के अधिकांश देवता प्रकृति प्रदत जंगल, झाड़ आदि होते हैं, बुरु बोंगा, इकरी बोंगा आदि      नामों से जाना जाता है गांव के बाहर सरना नामक स्थान होता है माना जाता है कि वह देवताओं का निवास स्थान है। वहीं पूजा होता है और बलि दी जाती है। इसके लिए हर गांव में एक पाहन होता है 

जनजातीय संस्कृति में अखड़ा का एक खास महत्व है यह एक ऐसी जगह है जो पंचायत स्थल के साथ-साथ गांव के मनोरंजन केंद्र के रूप में पहचानी जाती है

जनजातीय युवागृह  एक ऐसा सामाजिक संगठन है , जो जनजातीय क्षेत्र से बाहर की दुनिया में जिज्ञासा, उत्सुकता, कोतूहल और विस्मय के भाव से चर्चित रहा है यह एक प्रकार के प्रशिक्षण केंद्र अर्थात गुरुकुल की तरह कार्य करता है यहां जनजातियों को किशोरों और किशोरियों को सह-शिक्षा के लिए किसी अनुभवी ग्रामवासी की देख-रेख में रखा जाता है

हड़िया सेवन जनजातियों की सर्वकालिक परंपरा है धार्मिक कृत्यों, सामाजिक त्योहारों और घर में आने वाले अतिथियों के सत्कार में हड़िया पीना-पिलाना अनिवार्य माना जाता है

👉Previous Page: झारखंड में धार्मिक आंदोलन

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Wednesday, January 20, 2021

Jharkhand Karmchari Chayan Aayog (झारखंड कर्मचारी चयन आयोग)

झारखंड कर्मचारी चयन आयोग

(Jharkhand Karmchari Chayan Aayog)



झारखंड सरकार न अराजपत्रित पदों पर नियुक्ति हेतु वर्ष 2011 में झारखंड कर्मचारी चयन आयोग का गठन किया है 

जिसके प्रथम अध्यक्ष भारतीय वन सेवा के सेवानिवृत्ति अधिकारी सी.आर. सहाय थे। इसका मुख्यालय रांची में है

इस आयोग का गठन झारखंड कर्मचारी चयन आयोग अधिनियम 2008 के अंतर्गत किया गया है 

आयोग

आयोग राज्य सरकार के अधीन वर्ग 'ग' के सभी पदों एवं वर्ग 'ख' के अराजपत्रित सभी सामान्य/प्रावैधिक/अप्रवैधिक सेवाओ/संवर्गों के  पदों  पर जिन पर आंशिक या पूर्ण रूप से सीधी  नियुक्ति का प्रावधान हो अथवा राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर निर्धारित पदों पर नियुक्ति हेतु अनुशंसा करती है 

अध्यक्ष

अध्यक्ष :- राज्य सरकार द्वारा नियुक्त अखिल भारतीय सेवा/अन्यून पंक्ति के कार्यरत या सेवानिवृत्त एक पदाधिकारी

सदस्य

सदस्य :- राज्य सरकार द्वारा नियुक्त 37400-67000/- ग्रेड पे-8700 (अथवा समय-समय पर यथा पुनरीक्षित समरूप वेतनमान प्रत्येक सदस्य को देय) से अन्यून वेतनमान के कार्यरत अथवा सेवानिवृत्त अखिल भारतीय सेवा/सेना के दो पदाधिकारी होते हैं

कार्यकाल

कार्यकाल:- आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य अपने पदग्रहण की तारीख से सामान्यत: 5 वर्ष की अवधि तक होता है

मुख्यालय

मुख्यालय :- आयोग का मुख्यालय रांची में स्थित है। यह कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग आयोग का प्रशासी  विभाग है इसका संचालन नामकुम स्थित कार्यालय भवन से होता है

चयन

चयन :- राज्य सरकार के पूर्णनुमोदन से आयोग, विभिन्न सेवाओं/ पदों के लिए चयन की प्रक्रिया का संचालन करता है

आयोग के कार्यकाल और आयोग के कार्य संपादन में होने वाले संपूर्ण व्यय राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाता है

आयोग, विभिन्न परीक्षाओं/ चयन के आयोजनों   के लिए अभ्यर्थियों से शुल्क प्राप्त कर सकेगा जो आयोग द्वारा राज्य कोषागार में जमा किया जाता है

आयोग स्नातक स्तरीय परीक्षाओं के जरिए 

1) प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी 

2) प्रखंड कल्याण पदाधिकारी 

3) सहकारिता प्रसार पदाधिकारी

4) सचिवालय सहायक

5) अंचल निरीक्षक

6) श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी 

7) प्रखंड कृषि पदाधिकारी

8) सहायक अनुसंधान पदाधिकारी

9) पौधा संरक्षण निरीक्षक

10) संख्यांकी सहायक 

11) मतस्य प्रसार पर्येवेक्षक 

12) वरीय अंकेक्षक

13) उद्योग विस्तार पदाधिकारी

14) भूतात्विक विश्लेषक, पदों पर नियुक्ति की अनुशंसा  करती है

इसके अतिरिक्त इंटरमीडिएट स्तर की प्रतियोगिता परीक्षा से लेकर

1) राजस्व कर्मचारी, 

2) अमीन 

3) पंचायत सचिव

4) निम्नवर्गीय लिपिक आदि की नियुक्ति की अनुशंसा की जाती है

आशुलिपिकीय सेवा के अंतर्गत 

1) आशुलिपिक  

2) सहायक जेलर

3) कनीय अभियंता,

4) सिपाही

5) फायर स्टेशन पदाधिकारी

6) उत्पाद अवर निरीक्षक,

7) उत्पाद सहायक अवर निरीक्षक आदि की नियुक्ति भी आयोग की अनुशंसा पर की जाती है

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Friday, January 1, 2021

Dhoklo shohor shashan vyavastha (ढोकलो सोहोर शासन व्यवस्था)

Dhoklo shohor shashan vyavastha

खड़िया झारखंड की एक प्रमुख जनजाति है

ढोकलो सोहोर शासन व्यवस्था को ही खड़िया शासन व्यवस्था भी कहा जाता है 

यह प्रोटो ऑस्ट्रोलॉयड से सम्बन्ध रखती है

इनकी भाषा खड़िया है

जिसमें मुण्डारी,उरांव ,तथा आर्य भाषा के शब्द मिलते है इस जाति के लोग झारखंड में गुमला ,सिमडेगा तथा रांची ,उड़ीसा ,छत्तीसगढ़ राज्य में फैले हुए है 

झारखण्ड में ज़्यादातर लोग बीरु क्षेत्र सिमडेगा से हैं

खड़िया भाषा में ढोकलो का अर्थ -बैठक और सोहोर का अर्थ - अध्यक्ष 

Dhoklo shohor shashan vyavastha

इनका उद्गम स्थान रो:जंग बताया जाता है

1934-35 ईस्वी के आस -पास जब समस्त आदिवासी समाज शिक्षा के विकास के साथ जाग्रत हो रहा था, लगभग इसी समय खड़िया जाति के अग्रणी लोगों के द्वारा भी अपने समाज को संगठित करने,सशक्त बनाने हेतु अखिल भारतीय महासभा का गठन किया गया,जिसे ढोकलो के नाम से जाना जाता है।  

खड़िया लोगों में किसी शबर गांव के सभी निवासी एक गोत्र के होते हैं

जो ढोकलो का सभापति जो संपूर्ण खड़िया समाज का राजा होता है 'ढोकलो सोहोर' कहलाता है।

ढोकलो में सभी क्षेत्र के प्रमुख प्रतिनिधि ,महतो ,पाहन, करटाहा इकठ्ठा होते हैं, इस सभा में ' ढोकलो सोहोर' का चुनाव खड़िया जनजाति के लोगों द्वारा करते हैं

इनका कार्यकाल 3 वर्षों के लिए होता है

खड़िया तीन प्रकार के होते है 

1) पहाड़ी खड़िया या शबर खड़िया

2) दूध खड़िया,

3) ढेलकी  खड़िया

तीनों के स्वशासन के पद नामों में कुछ अंतर है। इनका ग्राम पंचायत अपने ढंग का होता है। 

पहाड़ी खड़िया 

(क) डंडिया : - पहाड़ी खड़िया गांव के प्रधान या शासक को डंडिया कहा जाता है

(ख) डिहुरी : -पहाड़ी खड़िया गांव के दूसरे प्रधानमंत्री को डिहुरी कहते हैं, यही गांव का पुजारी होता हैयह पूजा-पाठ, शादी-विवाह तथा पर्व-त्योहारों में मुख्य भूमिका निभाता है साथ ही यह डंडिया का सहयोगी भी रहता है

➤ दो से तीन दूध खड़िया और डेलकी खड़िया : - इन दोनों प्रकार के खड़िया गांवों  के प्रशासक या प्रधान को ढ़ोकलो शोहोर कहते हैं 

(ग) ढ़ोकलो सोहोर का अर्थ है :-  फा.डॉ.निकोलस टेटे  ने अपने शब्द खड़िया शब्द में कोष में 'सभापति' बताया है 

ग्राम सभा या ग्राम पंचायत (स्वशासन) के अध्यक्ष को भी ढोकलो सोहोर कहते हैं

यही ग्राम सभा का संचालन करता है तथा आगत मामलों का निपटारा करता है 

खड़िया स्वशासन के निम्न पद होते हैं

(1) महतो :- परंपरागत रूप से जिन लोगों ने गाँव बसाया था उन्हें महतो कह कर संबोधित किया जाता है 

 महतो को गांव का मुख्य व्यक्ति माना जाता है यह पद सामान्यत: वशांनुगत होता है 

 गाँव वालो की सहमति से महतो को बदला जा सकता है  

(2) करटाहा :- प्रत्येक खड़िया पारंपरिक गांव में करटाहा होता है 

20-25 गांवों  के अनुभवी लोग मिलकर पंचायत में गांव के सुयोग्य व्यक्ति को करटाहा चुनते हैं

इमानदारी, न्यायी, निष्पक्ष, बुद्धिमान, सामाजिक-सांस्कृतिक  विधानों को जानने वालों को ही करटाहा चुना जाता है

यह अवनैतिक होता है परंतु समाज में उसका मान-सम्मान होता है

सामाजिक कार्य करने वालों को दंड देना करटाहा का कार्य है, यह वंशानुगत नहीं होता है 

(3) रेड :- करटाहा से बड़ा रेड का होता है 

(4) परगना का राजा  :- रेड से ऊपर का पद परगना के खड़ियाओं के राजा का पद होता है 

 ग्राम-पंचायत के शासन, न्याय तथा अन्य मामले देखने का अधिकार इसे प्राप्त होता है 

(5) खड़िया राजा  :- परगना से ऊपर का पद खड़िया राजा का होता है यह पुरे खड़िया महासभा का सर्वोच्च सभापति होता है

इसको ही खड़िया राजा कहते है इसका अंतिम निर्णय होता है

(6) लिखाकड़ (सचिव या मंत्री)  :- खड़िया राजा के सचिव या मंत्री होते हैं जो राजा के सामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक आदि कार्यों में सहयोग देते हैं

(7) तिंजाडकड़ या खजांची :- यह खड़िया राजा के आय -व्यय का विवरण रखता है 

(8) देवान या सलाहकार  :- यह भी खड़िया राजा का सलाहकार होता है 

खड़िया राजा, लिखवाड़ और देवान की सहायता से मामलों का निपटारा करता है।आवश्यकता पड़ने पर अपराधी को आर्थिक दंड भी दिया जाता है 

इस दंड से प्राप्त राशि से कुछ रकम अपने पदाधिकारियों, खजांची, लिखाकड़, देवान आदि को खड़िया राजा देता है,पर यह कभी भी वेतन की भांति नहीं होता। बाकी पैसे समाज या पंचायत को खस्सी भोज देने में लगाया जाता है 

(9) कालो या पाहन  :- प्रत्येक दूध खड़िया और डेलकी खड़िया गांव का एक पुजारी होता है उसे कालो या पाहन कहते हैं 

कालो धार्मिक कार्य करते हैं जो एक पुरोहित करता है हर गोत्र का एक कालो या पाहन होता है 

यह वंशानुगत होता है  

प्रायः बड़े खड़िया गांव के कालो को पाहन कहते हैं  

कालो तथा पाहन  दोनों परंपरागत होते हैं  

खड़िया समाज में भी पाहन (पुजारी) को गांव की ओर से पहनई जमीन दी जाती है

इसकी उपज से वह धार्मिक कार्यों का खर्च निकलता है

पाहन या कालो  के लिए मुंडा, उरांव में भी पहनई जमीन दी जाती है 

कालो या पाहन के वंश ना होने पर नए का चुनाव पारंपारिक पंचायत करती है 

मूलतः ढोकलाे  शोहोर  शब्द खड़िया महासभा के सभापति या अध्यक्ष के लिए प्रयोग किया जाता है 

परंतु अब खड़िया राजा के लिए ढोकलाे सोहोर का प्रयोग होने लगा है 

खड़िया समाज के नीचे के पदाधिकारी सभी खड़िया राजा या ढोकलाे  शोहोर के प्रति उत्तरदाई होते हैं

गांव की हर स्थिति की सूचना इसे देते हैं और इनकी निर्देश पर शासन या न्याय करते हैं 

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Sunday, October 11, 2020

Jharkhand Me Panchayati Raj Vyavstha Part-4(Panchayati Raj system in Jharkhand)


झारखण्ड में पंचायती राज व्यवस्था PART-4

(Panchayati Raj system in Jharkhand)


जिला परिषद

जिला परिषद पंचायती राज व्यवस्था का तृतीय एवं सर्वोच्च स्तर है 

जिला परिषद की स्थापना जिला स्तर पर होती है 

जिला परिषद का वही नाम होता है, जो उस जिला का होता है, जैसे :- रांची जिला परिषद हजारीबाग जिला परिषद आदि

गठन

झारखंड में जिला का गठन जिला परिषद के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचित सदस्यों (प्रति 50000 की जनसंख्या पर एक सदस्य का चुनाव), जिला क्षेत्र से निर्वाचित सभी प्रमुखों, विधायकों (विधान सभा के सदस्य) एवं सांसदों  (लोक सभा एवं राज्य सभा के सदस्य) से की जाती है

जिला परिषद का प्रधान 'अध्यक्ष' कहलाता है

 उसकी सहायता के लिए एक 'उपाध्यक्ष' होता है

अध्यक्ष/ उपाध्यक्ष के उम्मीदवार प्रत्यक्ष निर्वाचित सदस्यों में से होते हैं, तथा उन्हीं के मतों से बनाए जाते हैं

 उप विकास आयुक्त (डिप्टी डेवलपमेंट कमिश्नर-डी0 डी0 सी0 ) जिला परिषद का पदेन सचिव होता है

पदाधिकारी

सर्व प्रमुख अधिकारी - अध्यक्ष उपाध्यक्ष :- प्रत्येक जिला परिषद का एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष होता है
 जिनका निर्वाचन जिला परिषद के सदस्य अपने सदस्यों के बीच से करते हैं

अध्यक्ष राज्य सरकार द्वारा भी पदच्युत किया जा सकता है

अध्यक्ष जिला परिषद का प्रधान अधिकारी होता है

 वह जिला परिषद की बैठक बुलाता है और उसकी अध्यक्षता करता है 

वह राज्य सरकार को जिला परिषद के कार्यों के संबंध में सूचित करता है तथा हर वर्ष जिला परिषद के सचिव के कार्यों का प्रतिवेदन जिला अधिकारी के पास भेजता है 

वह प्रखंड एवं पंचायत समिति के कार्यों पर भी निगरानी रखता है

 अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष उसके सभी दायित्वों का निर्वहन करता है

सचिव उप विकास आयुक्त :- उप विकास आयुक्त जिला परिषद का पदेन सचिव होता है

 वह अध्यक्ष के आदेश पर जिला परिषद की बैठक बुलाता है तथा सभा की कार्यवाही का प्रलेख रखता है

वह जिला परिषद का प्रमुख परामर्शदाता होता है और सभी समितियों में समन्वय स्थापित करता है

जिला परिषद के कार्य

जिला परिषद के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं 

1- परामर्शकारी  कार्य :- जिले में विकास कार्यों और सरकार द्वारा जिला परिषद को सौपे गए कार्यों के क्रियान्वयन संबंधी मसलों पर सरकार को परामर्श देना 

2- वित्तीय कार्य :- पंचायत समितियों के बजटों  का परीक्षण करना और उनको स्वीकृति देना तथा संघ व राज्य सरकार द्वारा आवंटित निधियों को पंचायत समितियों में वितरित करना

3- समन्वय और पर्यवेक्षण कार्य :- जिले के प्रखंडों द्वारा तैयार विकास योजनाओं का समन्वय और पर्यवेक्षण करना 

4- नागरिक सुविधा संबंधी कार्य :- सड़कें, पुल, पुलिया, पार्क, जलापूर्ति और सर्वाजानिक भवन इत्यादि का निर्माण तथा उनका रख-रखाव करना

आकाशवाणी से ग्रामीण प्रसारण व सामुदायिक केंद्रों की देखभाल करना 

स्थानीय प्राधिकरण से संबंधित आवश्यक सांख्यिकीय आंकड़ों का संग्रहं करना इत्यादि 

5- कल्याण सम्बन्धी कार्य :- हटो की स्थापना, मेले तथा त्यौहारों का आयोजन, पुस्तकालय, दवाखाना, सार्वजनिक स्वास्थ्य और परिवार नियोजन केंद्र की स्थापना और उसका संचालन, अकाल और विपदा के समय राहत कार्य की व्यवस्था करना

सभी स्तर के विद्यालयों तथा तकनीकी व औद्योगिक विद्यालयों की स्थापना, विस्तार, निरीक्षण और उनका रखरखाव सुनिश्चित करना

6- विकास संबंधी कार्य :- पंचायत समितियों और ग्राम पंचायतों के कार्यों की देखभाल करना और प्रखंडों में विकास योजनाओं, परियोजनाओं तथा अन्य कार्यक्रमों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना

जिला परिषद की आय के स्रोत 

जिला परिषद की आय के तीन प्रमुख स्रोत है

1- राज्य सरकार से प्राप्त सहायता अनुदान-निधि

2- विकास कार्यों के लिए राज्य सरकार द्वारा आवंटित निधि तथा 

3- भूमिकार और अन्य उपकर स्थानीय करों में हिस्सा

जिला परिषद जिला स्तर पर 

सर्वप्रमुख अधिकारी :- अध्यक्ष / उपाध्यक्ष 

सचिव  :- उप विकास आयुक्त (डी0 डी0 सी0) 

सदस्य

निर्वाचित सदस्य :- प्रति 50 हजार की आबादी पर एक सदस्य का चुनाव

पदेन सदस्य :- जिला स्तर से जिला क्षेत्र से निर्वाचित सभी प्रमुख

सह सदस्य :- जिला क्षेत्र से निर्वाचित विधायक (विधानसभा के सदस्य) तथा जिला क्षेत्र से निर्वाचित संसद (लोक सभा एवं राज्य सभा के सदस्य)

स्थाई समितियां 

स्थाई समिति (अध्यक्ष-अध्यक्ष) 

वित्त,अंकेक्षण  व योजना समिति (अध्यक्ष-अध्यक्ष)

सामाजिक न्याय समिति (अध्यक्ष-उपाध्यक्ष)

शिक्षण एवं स्वास्थ्य समिति (अध्यक्ष-कोई  एक सदस्य)

कृषि एवं उद्योग समिति (अध्यक्ष -कोई  एक सदस्य)


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Saturday, October 10, 2020

Jharkhand Me Panchayati Raj Vyavstha Part-3(Panchayati Raj system in Jharkhand)

 झारखण्ड में पंचायती राज व्यवस्था PART-3

(Panchayati Raj system in Jharkhand)


पंचायत समिति


पंचायत समिति पंचायत राज व्यवस्था की केंद्रीय धुरी होती है।  

पंचायत समिति की स्थापना प्रखंड स्तर पर होती है। 

पंचायत समिति का वही नाम होता है जो उस प्रखंड का होता है। 

 जैसे:- काके पंचायत समिति, रातू पंचायत समिति इत्यादि।  

गठन

झारखंड में पंचायत समिति का गठन पंचायत समिति के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचित सदस्यों (प्रति 5000 की जनसंख्या पर एक सदस्य का चुनाव होता है) प्रखंड क्षेत्र से निर्वाचित सभी मुखिया, विधायक (विधान सभा के सदस्य ) और सांसद (लोकसभा और राज्य सभा के सदस्य) से की जाती है। 

पंचायत समिति का प्रधान प्रमुख कहलाता है।  

उसकी सहायता के लिए एक उपप्रमुख होता है।  

प्रमुख / उपप्रमुख के उम्मीदवार प्रत्यक्ष निर्वाचित सदस्यों में से होते हैं तथा उन्हीं के मतों से बनाए जाते हैं।  


पदाधिकारी

सर्वप्रमुख अधिकारी - प्रमुख / उपप्रमुख :- प्रत्येक पंचायत समिति का एक प्रमुख एवं एक उपप्रमुख 

होता है जिनका निर्वाचन पंचायत समिति के सदस्य अपने सदस्यों के बीच से सकते हैं।  

इन दोनों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है 

दो तिहाई सदस्यों के अविश्वास प्रस्ताव द्वारा प्रमुख को उसके पद से हटाया जा सकता है

प्रमुख पंचायत समिति का प्रधान अधिकारी होता है 

वह पंचायत समिति की बैठक बुलाता है और उसके अध्यक्षता करता है 

वह पंचायत समिति के कागजों की जांच पड़ताल करता है, और सचिव प्रखंड विकास पदाधिकारी पर नियंत्रण रखता है 

प्रमुख की अनुपस्थिति में 'उपप्रमुख' उसके सभी दायित्वों का निर्वाह करता है

सचिव - प्रखंड विकास पदाधिकारी 

प्रखंड विकास पदाधिकारी पंचायत समिति का पदेन सचिव होता है

 वह प्रमुख के आदेश पर पंचायत समिति के निर्णयों को क्रियान्वित करता है तथा उसके कोष से धन खर्च करता है

वह अन्य महत्वपूर्ण कार्यों का संपादन करता है

वह पंचायत समिति की कार्यवाही में भाग लेता है, लेकिन मतदान नहीं करता है

पंचायत समिति के कार्य 


1- प्रदत कार्य :- पंचायत समिति के विकास और विस्तार कार्यक्रमों से संबंधित राज्य सरकार के नीति 
निर्देशों का कार्यान्यवन  

2- सामुदायिक विकास कार्यक्रम :- विशेषतया कृषि, कुटीर,सिंचाई और लघु उद्योग, पशु पालन और मत्स्य उद्योग , सहकारी , शिक्षा , स्वास्थ्य , सम्प्रेषण तथा महिला कल्याण सहित, सामाजिक कल्याण ,आपातकालीन राहत, आँकड़ों के संग्रह स्वावलम्बी कार्यक्रम

3- पर्यवेक्षण कार्य :- ग्राम पंचायत के कार्यों का पर्यवेक्षण, ग्राम पंचायतों के बजट की जाँच और संशोधन, पुनर्विनियोग करना ,नये कर लगाना, प्रखंड विकास अधिकारी और विस्तार अधिकारी के कार्यों का पर्यवेक्षण आदि 

पंचायत समिति के आय के स्रोत 

समिति की पंचायत समिति के दो प्रमुख स्रोत है 

1- विकास गतिविधियों के लिए सरकार से प्राप्त सहायता अनुदान तथा 

2-भूमि कर के उपकरण (अंश) से उपार्जित कर
 

पंचायत समिति प्रखंड स्तर पर

➤सर्व प्रमुख अधिकारी- प्रमुख /उप प्रमुख 

सचिव:-प्रखंड विकास पदाधिकारी

सदस्य - निर्वाचित सदस्य :- प्रति 5,000 की आबादी पर एक सदस्य का चुनाव 

पदेन सदस्य:-  प्रखंड क्षेत्र से निर्वाचित सभी मुख्य 

➤सह सदस्य :- प्रखंड क्षेत्र से निर्वाचित विधायक विधानसभा के सदस्य तथा प्रखंड क्षेत्र से निर्वाचित  सांसद (लोकसभा एवं राज्यसभा के सदस्य)

➤स्थायी  समितियां :- 

सामान्य स्थायी समिति (अध्यक्ष- प्रमुख)

वित्त, अंकेक्षण व योजना समिति (अध्यक्ष - प्रमुख)

 सामाजिक न्याय समिति (अध्यक्ष - उपप्रमुख)



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Wednesday, October 7, 2020

Jharkhand Me Panchayati Raj Vyavstha Part-2(Panchayati Raj system in Jharkhand)


झारखण्ड में पंचायती राज व्यवस्था PART-2

(Panchayati Raj system in Jharkhand)

ग्राम पंचायत के कार्य



पहला प्रशासनिक कार्य :- बजट, लेखा, वसूली, दस्तावेज सांख्यिकीय के आंकड़ों का रख रखाव, जन्म, मृत्यु और विवाह का पंजीयन  तथा गांव के पशुओं से संबंधित आंकड़े और भूमि प्रबंधन। 

कानून व्यवस्था संबंधी कार्य :- गांव की सावधानी पूर्वक निगरानी, सुरक्षा सेवा तथा ग्राम स्वयं सेवक बल का रखरखाव।  


➤नागरिक सुविधा संबंधी कार्य :- सड़कों और गलियों, छोटे-बड़े पुलों की मरम्मत, नालियों,कुओ और तालाबों की सफाई की व्यवस्था तथा उनकी देख-रेख घरेलू उपयोग के लिए पानी की व्यवस्था तथा गलियों में प्रकाश व्यवस्था का पर्यवेक्षण इत्यादि।  

कल्याण संबंधी कार्य :- सूखा और बाढ़ सहायता कार्य, विकलांगों की सहायता, महिलाओं बच्चों तथा पिछड़ी जातियों के लिए कल्याण कार्यक्रम, पंचायत, विद्यालय, पुस्तकालय, अध्ययन कक्ष का रख -रखाव और गांव में लगने वाले मेलों का आयोजन।  


ग्राम पंचायत की आय के स्रोत

ग्राम पंचायत के आय के तीन प्रमुख स्रोत है।  

करारोपण से प्राप्त आय :- संपत्ति, व्यवसाय, पशु-वाहन, विद्युत और जल पर निर्धारित कारों से प्राप्त आय इसके अतिरिक्त भूमि कर पर उपकर, चुंगी, विश्राम गृह  के उपयोग पर शुल्क और दुकानों पर लगाए गए करों से प्राप्त आय।  

राज्य सरकारों से अनुदान सहायता तथा।  

सार्वजनिक योगदान और स्वैच्छिक दान। 

ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर पर)

ग्राम पंचायत स्तर पर सर्वप्रमुख अधिकारी - मुखिया / उप मुखिया , 

सचिव - पंचायत सेवक 

सदस्य - प्रति 500 की आबादी पर एक सदस्य का चुनाव 

स्थाई समितियां :-

1 - उत्पादन समिति (अध्यक्ष - मुखिया)
2 - सामाजिक न्याय समिति (अध्यक्ष- मुखिया)
3 - सुख-सुविधा समिति (अध्यक्ष- मुखिया )


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Tuesday, October 6, 2020

Jharkhand Me Panchayati Raj Vyavstha Part-1(Panchayati Raj system in Jharkhand)


झारखण्ड में पंचायती राज व्यवस्था PART-1

(Panchayati Raj system in Jharkhand)



झारखंड में पंचायती राज व्यवस्था

झारखंड सरकार ने झारखंड विधानसभा में 'झारखंड पंचायती राज विधेयक, 2001' पेश किया
विधान सभा से पारित होने के बाद इस विधेयक को राज्यपाल के पास मंजूरी (स्वीकृति) के लिए भेजा गया 
➤23 अप्रैल, 2001 को इस विधेयक को राज्यपाल प्रभात कुमार ने अपनी मंजूरी प्रदान की
राज्यपाल की मंजूरी के बाद यह विधेयक (बिल) झारखंड पंचायती राज अधिनियम, 2001 (झारखंड पंचायती राज एक्ट 2001) बन गया
इस अधिनियम के तहत राज्य में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था अपनाई गई है 
त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का अर्थ है ग्राम स्तर पर 'ग्राम पंचायत', प्रखंड स्तर पर 'पंचायत समिति' एवं जिला स्तर पर 'जिला परिषद' की व्यवस्था होगी
इस अधिनियम में जिन आदर्शों की स्थापना की गई है वे  महात्मा गांधी के सुनहरे सपनों का साकार रूप है
इसमें ना केवल समाज के कमजोर वर्गों एवं महिलाओं के की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित की गयी है 
पंचायती राज संस्थाओं को पर्याप्त शक्तियां एवं आर्थिक स्वायत्तता  प्रदान कर इसे  सत्ता के विकेंद्रीकरण का वास्तविक स्वरुप भी प्रदान किया गया है 

ग्राम पंचायत

ग्राम पंचायत ग्रामीण क्षेत्र की स्वायत्त संस्थाओं से सबसे नीचे है पर इसका स्थान सबसे अधिक महत्वपूर्ण है 
यह पंचायती राज व्यवस्था का प्रथम एवं सबसे निम्न स्तर है
गठन :- झारखंड पंचायती राज अधिनियम के तहत प्रति 5,000 की जनसंख्या पर एक 'ग्राम पंचायत' के गठन का प्रावधान किया गया है
प्रति 500 की जनसंख्या पर ग्राम पंचायत के एक सदस्य के चुनाव का प्रावधान किया गया है 
पंचायत में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ी जातियों एवं महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था है 
ग्राम पंचायत में महिलाओ के लिए 50% पद आरक्षित है 
ग्राम पंचायत का प्रमुख मुखिया होता है उसकी सहायता के लिए एक उप मुखिया होता है
इन दोनों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है
मुखिया का चुनाव प्रत्यक्ष रीति से ग्राम सभा के सदस्यों के द्वारा होता है 
ग्राम पंचायत के सदस्य दो तिहाई बहुमत द्वारा मुखिया के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित कर उसे अपने पद से हटा सकते हैं 
मुखिया की अनुपस्थिति में उप मुख्य उसके सभी दायित्व का निर्वाह करता है 
परंतु उपमुखिया 6 महीने से अधिक मुखिया के रूप में कार्य नहीं कर सकता है 
6 महीने के बाद भी यदि किसी कारणवश उपस्थित नहीं हो पाता है तो नए मुखिया का निर्वाचन 
आवश्यक हो जाता है 
पंचायत सेवक ग्राम पंचायत का पदेन सचिव होता है 
पंचायत सेवक की नियुक्ति राज्य सरकार के द्वारा की जाती है अर्थात वह सरकारी कर्मचारी होता है  
वह ग्राम पंचायत कार्यालय प्रबंधक होता है
वह सरकार एवं ग्रामवासियों के बीच कड़ी का काम करता है 
सरकार के कार्य योजना ,कार्य के विषय में हुए निर्णयों से ग्राम पंचायत को अवगत कराता है  
ग्राम पंचायतों की गतिविधियों की जानकारी सरकार को देता है 

ग्राम पंचायत के अंग :-ग्राम पंचायत के 4 अंग है 

💥ग्राम सभा ( प्रमुख- मुखिया) -ग्राम पंचायत की विधायिका /व्यवस्थापिका 
💥ग्राम पंचायत (प्रमुख -मुखिया )-ग्राम पंचायत की कार्यपालिका 
💥ग्राम कचहरी  (प्रमुख -सरपंच )-ग्राम पंचायत की न्यायपालिका  
💥ग्राम रक्षा दाल (प्रमुख -दलपति )-ग्राम पंचायत की पुलिस व्यवस्था 

ग्राम सभा

ग्राम सभा ग्राम पंचायत के आधार भूमि है यह प्राथमिक स्तर है
ग्राम सभा स्थानीय नागरिकों की आम सभा होती है
 ग्राम पंचायत क्षेत्र में रहने वाले सभी वयस्क मतदाता ग्राम सभा के सदस्य होते हैं 
ग्राम सभा देश की विकेंद्रित प्रशासकीय व्यवस्था का सबसे निचला स्तर है 
इसके ऊपर ग्राम पंचायत होती है
ग्राम सभा के सदस्य ही ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव करते हैं 
प्रति 250 की संख्या पर 'ग्राम सभा' के गठन का प्रावधान किया गया है
सामान्यतः प्रत्येक गांव में 1 ग्राम सभा होती है 
जबकि एक पंचायत क्षेत्र में जिसमें सामान्यता दो से 3 गांव आते हैं 
1 ग्राम पंचायत होती है 
वर्ष में कम से कम 2 बार खरीफ एवं रबी की फसल कटने के बाद ग्रामसभा की बैठक करने का प्रावधान है 
ग्राम सभा ग्राम पंचायत की सुविधा के लिए ग्राम स्तरीय योजनाओं तैयार करती है तथा ग्राम पंचायत 
द्वारा निर्धारित व्यवस्था को लागू करती है 
ग्राम सभा एक निगरानी समिति का गठन करती है, जो ग्राम पंचायत द्वारा किए जाने वाले प्रशासनिक 
एवं अन्य कार्यों पर निगरानी रखती है
➤ग्राम सभा को सुरक्षा प्रहरी भी कहा जाता है जो ग्राम पंचायत पर नज़र रखती है 
ग्राम पंचायत ग्राम सभा के प्रति उत्तरदाई होती है जिस प्रकार राज्य सरकार  विधान सभा के प्रति 


ग्राम सभा के कार्य इस प्रकार है:-

 1)  ग्राम पंचायत के प्रशासनिक कार्यों का अनुमोदन करना 
2)  वर्ष के बजट, लेखा एवं लेखा परीक्षण रिपोर्ट का अनुमोदन करना 
3)  समुदाय सेवा, स्वैच्छिक श्रम , इत्यादि सहित विकास कार्यक्रमों, वर्ष के दौरान हाथ में ली जाने वाली 
परियोजनाओं को स्वीकृति देना तथा ग्राम की उत्पादन योजना को अंगीकार करना 
4) कर संबंधी प्रस्तावों पर विचार करना और उनकी स्वीकृति देना तथा  
5) ग्राम पंचायत के लिए सदस्य चुनना 


ग्राम पंचायत

ग्राम पंचायत अपने अधिकार क्षेत्र में ग्राम सभा की कार्यकारिणी समिति के रूप में कार्य करती है
ग्राम पंचायत को 'ग्राम पंचायत का कार्यपालिका अंग' या 'ग्राम सभा की कार्यकारिणी समिति' कहा जाता है 
कार्यकारिणी समिति में 9 सदस्य होते हैं एक मुखिया एवं आठ अन्य सदस्य
कार्यकारिणी समिति का प्रधान मुखिया होता है, जिसका चुनाव गांव की जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है
मुखिया संपूर्ण ग्राम पंचायत का प्रतिनिधित्व करता है 

मुखिया के प्रमुख कार्य इस प्रकार है:-

1) ग्राम सभा एवं पंचायत ग्राम पंचायत की बैठकों का संयोजन, उसकी अध्यक्षता और उसका संचालन करना 
2) ग्राम सभा एवं ग्राम पंचायतों के संकल्पों या निर्णयों के कार्यान्यवयन को सुनिश्चित करना 
3) वित्तीय  और कार्यपालिका प्रशासन के लिए सामान्यता उत्तरदायी होना
4) पंचायत के अभिलेखों के संचरण करने का उत्तरदाई होना तथा 
5) ऐसे कार्यों को जो ग्राम सभा/ ग्राम पंचायत या या राज्य सरकार द्वारा सौंपी जाए, करना।

ग्राम कचहरी

इसे 'ग्राम पंचायत की न्यायपालिका' कहा जाता है
यह ग्राम पंचायत का न्यायालय होता है जिससे छोटे-मोटे दीवानी एवं फौजदारी मुकदमों को निपटाने का जिम्मा सौंपा गया है
इसका उद्देश्य है गांवो में मुकदमेबाजी कम करना एवं जनता को सस्ता न्याय सुलभ कराना 
इसका प्रमुख सरपंच होता है 
सरपंच की सहायता के लिए एक उपसरपंज होता है 
सरपंच के अनुपस्थिति में वह सरपंच के दायित्व को निभाता है 
झारखंड राज्य में केंद्र की भांति कार्यपालिका और न्यायपालिका एक दूसरे से अलग रखा गया है 
➤मुखिया  तथा कार्यकारिणी समिति कोई भी सदस्य कचहरी का सदस्य नहीं हो सकता
प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक ग्राम कचहरी स्थापित करने का प्रावधान है
ग्राम कचहरी में प्रत्यक्ष निर्वाचित एवं सरपंच तथा प्रति 500 की आबादी पर ग्राम कचहरी के लिए एक 
प्रत्यक्ष निर्वाचित सदस्य का प्रावधान है 
➤ग्राम कचहरी में 9 सदस्य होते हैं एक सरपंच और 8 अन्य सदस्य 
सरपंच एवं पंच मिलकर अपने बीच में एक उप उप सरपंच का चुनाव करते हैं
इन सभी का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है 
ग्राम कचहरी में अधिकतम ₹10,000 तक के मामले स्वीकार किए जा सकते हैं 
ग्राम कचहरी को अधिकतम 3 महीने का साधारण कारावास तथा ₹1,000 तक का जुर्माना लगाने का 
अधिकार है, जुर्माने की राशि नहीं चुकाने पर अधिकतम 15 दिन का अतिरिक्त कारावास का दंड देने का 
अधिकार है

ग्राम रक्षा दल

यह 'गांव की पुलिस व्यवस्था' है 
इसमें 18 से 30 वर्ष के युवा शामिल हो सकते हैं
ग्राम रक्षा दल का एक नेता होता है जिसे दलपति कहा जाता है
दलपति की नियुक्ति मुखिया एवं कार्यकारिणी समिति की राय से की जाती है 
ग्राम रक्षा दल के ऊपर गांव की रक्षा और शांति का उत्तर दायित्व सौंपा गया है 
➤संकट कालीन स्थितियों में जैसे:- आगलगी,डकैती,बाढ़, संक्रमक बीमारियों आदि में यह लोगों की सहायता करता है


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Tuesday, September 22, 2020

Jharkhand Ki Prashasanik Vyavastha Part-4(Administrative System Of Jharkhand)


झारखण्ड की प्रशासनिक व्यवस्था PART-4

(Administrative System Of Jharkhand)


प्रखंड प्रशासन (Block)

जिला प्रशासन की दूसरी सीढ़ी प्रखंड प्रशासन है
 


इसमें अंचलाधिकारी और प्रखंड विकास पदाधिकारी के पद और कार्य प्रमुख होते हैं

➤झारखण्ड  निर्माण के समय प्रखंडों की संख्या कुल संख्या 210 थी 

➤झारखण्ड राज्य निर्माण के बाद  57 और प्रखंडों का सृजन किया गया

इस तरह से वर्तमान में 267 प्रखंड  है 

➤अन्य राज्यों की भांति झारखंड में अनुमंडल को दो या अधिक प्रखंड या राजस्व अंचल में विभाजित करने की  प्रथा है
 
प्रखंड का प्रमुख प्रखंड विकास पदाधिकारी (ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर) होता है 

➤अंचल का प्रमुख अंचलाधिकारी होता है 

➤इस पद पर राज्य प्रशासनिक सेवा के सदस्यों की नियुक्ति की जाती है 

प्रखंड विकास अधिकारी और उसके कार्य

यह राज्य प्रशासनिक सेवा के पदाधिकारी अथवा राज्य कृषि सेवा के अधिकारियों को सौंपा जाने वाला 
पद है  

यह अधिकारी प्रखंड के सभी विभागों के अधिकारियों के बीच सहयोगी और समन्वयक की भूमिका 
निभाता है 

इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित है:-

केंद्र सरकार की योजनाओं का क्रियान्वयन करना 

 ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार संबंधी आवेदनों की अनुशंसा करना  

ग्रामीण क्षेत्रों में विकास योजनाओं का क्रियान्वयन करना 

अंचलाधिकारी और उसके कार्य

अंचलाधिकारी  और उसके कार्य पदाधिकारी को दिया जाता है 

➤अंचल का प्रमुख अंचलाधिकारी होता है 

 अंतर्गत आने वाले ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार है  

भू-राजस्व, भू -अभिलेख, विधि व्यवस्था का संधारण करना है  

चुनाव, जनगणना, कृषि सांखियकी, आय प्रमाण-पत्र, जाति प्रमाण-पत्र, आवासीय प्रमाण-पत्र जारी करना

पर्व-त्योहारों में शांति-व्यवस्था, सौहार्द बनाने और विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा का प्रबंधन करना

 राज्य में आदिवासियों की भूमि-संबंधी अधिकारों की सुरक्षा करना

समाज कल्याण के सभी कार्यों का संपादन करना

 आपदा, दुर्घटना, दंगा, पीड़ित लोगों के मुआवजे का आकलन और मुआवजा देने का कार्य करना

पुलिस प्रशासन

झारखंड राज्य पुलिस संरचना


महानिदेशक  (Director General Of Police) 

अपर महानिदेशक (Additional Director General) 

महानिरीक्षक (Inspector General)

उपमहानिरीक्षक (Deputy Inspector General)

आरक्षी पुलिस अधीक्षक (Superintendent of police)

 आरक्षी उपाधीक्षक या अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी (Deputy superintendent or sub-divisional police officer)

आरक्षी निरीक्षक ( Inspector Of Police)

आरक्षी अवर निरीक्षक या थाना प्रभारी (Sub- Inspector Of Police)

 सहायक अवर निरीक्षक  (Assistant Sub- Inspector)

➤हवालदार (hawaldar)

सिपाही (constable)

महानिदेशक (डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस)- राज्य स्तरीय पुलिस संरचना में सबसे ऊपर महानिदेशक होता है 

अपर महानिदेशक इसके नीचे क्रमशः अपर महानिदेशक एवं महानिरीक्षक होता है 

महानिरीक्षक के नीचे उपमहानिरीक्षक होता है

उपमहानिरीक्षक  जो प्रमंडल का प्रधान पुलिस अधिकारी होता है और आयुक्त के समक्ष होता है 

उपमहानिरीक्षक के नीचे आरक्षी अधीक्षक का पद होता है 

आरक्षी पुलिस अधीक्षक जो जिला का प्रधान पुलिस अधिकारी होता है 

आरक्षी अधीक्षक( एस पी) के नीचे आरक्षी उपाधीक्षक अनुमंडल आरक्षी पदाधिकारी होता है

आरक्षी उपाधीक्षक या अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी  जो अनुमंडल का प्रधान पुलिस अधिकारी होता है

पुलिस मुख्यालय में नियुक्त होने पर यह आरक्षी उपाधीक्षक एवं क्षेत्र में नियुक्त होने पर अनुमंडल आरक्षी पदाधिकारी कहलाता है

आरक्षी उपाधीक्षक या अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी के नीचे आरक्षी निरीक्षक का पद होता है 

आरक्षी निरीक्षक जो एक से अधिक थानों का प्रभारी होता है

 बड़े इलाके में (उदाहरण - राँची कोतवाली थाना) एक ही थाना का प्रभारी होता है

आरक्षी निरीक्षक  के नीचे आरक्षी अवर निरीक्षक या थाना प्रभारी का पद होता है  

आरक्षी अवर निरीक्षक या थाना प्रभारी जो थाना का प्रधान पुलिस अधिकारी होता है इसे थाना प्रभारी भी कहा जाता है 

विदित हो कि सबसे निचली इकाई थाना ही होता है जो प्रखंड या अंचल के समकक्ष होता है

अवर निरीक्षक के नीचे क्रमशः सहायक अवर निरीक्षक, हवलदार और सिपाही होते हैं

➤सिपाही पुलिस संरचना का सबसे नीचे पद होता है 

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Monday, September 21, 2020

Jharkhand Ki Prashasanik Vyavastha Part-3(Administrative System Of Jharkhand)

झारखण्ड की प्रशासनिक व्यवस्था PART-3

(Administrative System Of Jharkhand)



अनुमंडल प्रशासन

➤ जिला प्रशासन के बाद क्षेत्रीय प्रशासन में अनुमंडल प्रशासन आता है

➤ यह पद भारतीय प्रशासनिक सेवा के पदाधिकारी या  राज्य प्रशासनिक सेवा के पदाधिकारी को सौंपा जाता है

➤ झारखंड के अनुमंडल प्रशासन में दोनों प्रकार के पदाधिकारी हैं 

➤ये पदाधिकारी भी अपने क्षेत्र में जिला पदाधिकारी की भांति ही बहुत तरह की भूमिका का निर्वाह करते हैं 

➤राजस्व ,विधि और न्याय संबंधी कार्यों में इनकी प्रमुख भूमिका होती है

➤ जिसका प्रमुख अनुमंडल पदाधिकारी ( एस0 डी0 एम0) होता है

➤ इसके साथ ही यह विकास संबंधी योजनाओं का पर्यवेक्षण और क्रियान्वयन करने का कार्य करते हैं

➤यह पदाधिकारी कृषि और भूमि संबंधी राजस्व वसूलने और अंचलाधिकारियों  के आदेशों के विरुद्ध

 अपील सुनने का कार्य करता है

➤अपने अधीनस्थ प्रतिनियुक्तियों का कार्य करता है 

➤क्षेत्र में कानून व्यवस्था बनाए रखने हेतु पुलिस पर नियंत्रण और आदेश जारी करता है 

क्षेत्र में शस्त्र आवेदनों पर अनुशंसा के साथ शास्त्रों का वार्षिक निरीक्षण करता है

➤इसके अलावा अपने क्षेत्र में आने वाले जिला के विशेष व्यक्तियों की सुरक्षा का प्रबंध करता है

 झारखंड में अनुमंडल की संख्या 45 है

 झारखंड राज्य निर्माण के समय अनुमंडल की संख्या 33 थे

 प्रखंडों को मिलाकर अनुमंडल बनता है


जिला          संख्या       अनुमंडल 

1        रांची                                 2                   राँची  और  बुंडू 

2       दुमका                               1                   दुमका 

     गुमला                                3                   गुमला, चैनपुर, बसिया

4      पश्चिमी सिंहभूम                 3                   चाईबासा,पोड़ाहाट,

                                                                      जगन्नाथपुर 

5      गिरिडीह                           4                   गिरिडीह, खोरी महुआ,

                                                                      डुमरिया,सरिया 

6      पलामू                                3                  मेदिनीनगर, हुसैनाबाद, 

                                                                      छतरपुर 

7      लातेहार                             2                   लातेहार, महुआडांड़ 

8      गढ़वा                                 3                   गढ़वा,नगरउंटारी,रंका

9      सिमडेगा                            1                   सिमडेगा 

10    चतरा                                 2                    चतरा, सिमरिया

11    हजारीबाग                         2                    हजारीबाग, बरही

12   पूर्वी सिंहभूम                       2                    धालभूमगढ़, घाटशिला

13   बोकारो                               2                    चास, बेरमो

14   सरायकेला खरसावां           2                    सरायकेला खरसावां ,

                                                                        चाण्डिल 

15   खूंटी                                   1                     खूंटी

16   देवघर                                 2                     देवघर, मधुपुर

17   गोड्डा                                   2                     गोड्डा ,महागामा 

18   साहिबगंज                          2                     साहिबगंज, राजमहल

19   धनबाद                               1                     धनबाद 

20  जामताड़ा                             1                     जामताड़ा  

21  पाकुड़                                  1                      पाकुड़ 

22  लोहरदगा                             1                      लोहरदगा

23  कोडरमा                              1                       कोडरमा 

24   रामगढ़                                1                        रामगढ़ 

   


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