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Tuesday, July 14, 2026

Santhali Kahni "Tara-Anchar" (तारा अंचार)

 तारा आञ्चार (काहनी)

At 71, Doyen Of Tribal Languages On A New Mission - The ...
प्रो. (डॉ.) कृष्ण चंद्र टुडू

Santhali Kahni "Tara-Anchar"  (तारा अंचार)
काल्पनिक तस्वीर

                   चाइत् बाइसाघ दिन ताँहेंकाना। “बासयाम तोराखोन गे लोलो होय साँवते, बारडू ओटाङ राकाप इदीः काना, सेरमा पेरेच् । मोने रे चेत् चो हेच आदेया “सानो मुरमू“ दो, सेंन्दरा ए सापड़ाव ओडोक एना, सारदी सितुङ, ती रेआः सार,साप् काते, “आरारू बू “ सेत । आरारू बुरू रे दो ञुत- ञुहुम तोरा खान गे हुडिञ-माराङ, जिब जियाली आर जानवारको दाः ञूको आँड़गोना, बाहा झारना ते, आर ओकावाः तेताङ को मारतोक इदिया।

                  सानो मुरमू हों सेंदरा आड़िस मोने रे, लोलो होय, सितुङ रेयाः एलाङ ते, गोसो तोलमोज आकान होड़मो, जिवी रेनाः तेताङ मारतोक लागित, आँडगो एनाय बाहा झारना सेत् गे। आँजले पेरेचदाः ए ञू आना । तेताङ मारतोक एन ताया। रूवाड़ चालाः कानाय, आजाः रूवाड़ होर ते । आचगा गे, सारदी सितुङ रे बिजोड़ पोताम लेका कुकुडुबुर सेरेञ राहाय आजोम आम केत आ।

                 आजोम आम साँवते गोसो तोलमोज आकान होड़मोहों फांडगार आरूगोंद एना। सेरेज राहा रेयाः मोज हेडेम सिबिल आटकार गोः आदेया। मोनेय दाड़ केदा, सेरेञ राहा आजोम लागि, मेनखान आतेन आतेन ते, बाई-बाई ते सेरेज राहा मुचात् इदीयेना सारदी सितुङ रेनाः लोलो आतास रें आर सेरेत्रिजाः उमुल आलहा हों दानाङ इदीयेना, सानोवाः मेत् आहा खोन सितुङ झाँज ते।

                    दोसार हिलोः आरहों जाव दिन लेका गे ती रे आः-सार साप काते, ओडोक एनाय सेंन्दरा बिर ते चेंड़े सेन्दरा। चालाव-चालाव तुलुच् तायोम सेत् ए कोयोः रूवाड केत् आ। जेलेयाय मित् कुड़ी होपोन ए पाँजा आकाः देया, माराङ आहार रेनाः आड़े दानाङ-दानाङ ते ।

-तिंगुयेनाय सानो मुरमू लाडया बाड़े दारे बुटा रे जाव दिन लेका गे।

   हेच् सुर सेटेर साँवते जेलेयाय, आजिज मिलोन जुरी “बाहा“ गे कानाय ।

- “माई बाहा, होला दो आमगेम ताँहेंकाना“ आटूपाटू सानोय मेनकेत् आ। 

   आमाः सेरेत्र राहागित्र आजोम लाःआ, पालेत्?

-  “होय इञाः सेरेस राहा गे ताँहेंकाना, आर इगित्र ताँहेंकाना।  

“ दृबोतोर सातालाः ए लाई केआय बाहा माई दो।

-  “चेदाः नोङका दो ?“ हाहाड़ायाते सानोय रोड़ केत् आ।

 -  बाहा चेत् हों बाय लाइ लेत् आ, नाडरी रोहोड़ पोसागोः कान लेकाय आइकाव लेदा पालेत् । एन हों जाव दिन लेकागे “तारा आञ्चार’ आटेत् काते दुडुप एनाय सानोवाः सुर रे, बोहोः कुटबुर आते थिर एनाय।

              सानो मुरमू दो आटोपाटो ब्राहावाः बोहो. ए.राकाप केतुआ। राका साँवते जेल केतु आय-बाहावाःताला होरासी रे “बाहा सिन्दुर’ आर लेंगा ती रे ’भेड़हेंत् साकोम” । एनरेहों कुली केदेयाय- “बाहा नोवा दोम चेका केआ? बाहा मेत् दाः जोत् जोत्ते मेन केदायदृ “दादा तोपोल लेना लाङ मोने ते, जिवी रेनाः तारा आञ्चार गाँट काते, साखीलाङ दोहो ले या नुई लाडया बाड़े दारे गे। आलाङा जिवीत् जिवोन आखिर दिन हाबिच सारीकोमा मेनते। मेनखान तेहेज ओना तोनोल तोपोल, आलाक जाड़ी नाड़ी लेका रेचराचाः तोपागोः काना-बाहा“ माई लाइ मुचात् साँवते रा राः ए धुराव एना।

                    “बाहा आम नुना चाँड़े,नुना लोगोन, इञ बागी कातेम ओडोक चालाःआ मेनते इञाः उइहार हों बाङ ताँहेंकाना आर नुनाः दुलाड़ ताहेंकाते रेहों, मोने आजाड़ी लेका तिस रेहों आमाः बाप्ला रेनाः काथा बाम लाई आहिञा, नोवा खोन हाहाड़ा दो चेत् हुय दाया आ।“ - सानोय मेन केतुआ।

                    “आर बाड़ती जाहाँनाः बाङ बिलोम काते, देलाङ जाहाँसेत् मेत्

लुतुर ओनते गेलाङ जिरा। “ - बाहाय मेन केत आ। आ पाटू सानोय मेन केत् आ- आलोम रागा, “नोङका दो चेका हुय दायाःआ। “ बाङा, बालाङ त्रिरा, आलाङा जिवित लिखोन तोपोल बानूः आनाङ । नोवा धारती रें तेहेत्र माँझी मोड़े होड़को तोल आकात् आ आमाः आञ्चार लुगड़ी, नोवा दो ओहोञ राड़ा केया। आलोम रागा, दू ओड़ाः ते रूवाड़मे,राही डाली ते सेटेर आकान, ओड़ाः दुवार रिनिच् सोनोत पेड़ा सागुनाय में जायजुग लागित् । दुलाड़ेम जिवित् जिबोन भूर । आलोम रागा, मेदाः आलोम जोरोया । दिसोम रे ताँहेंन लागित साँवताम आम केत् ।  ”दृ सानो मुरमू नोवा मेनकाते आजा धुती आञ्चार लगड़ी ते बाहावाः मेत्दाःए जोत्काः नाय एटाः सेत कोयोः काते।

                   आडी आडी काथाकिन रोपोड़ एना, मेनखान ओकोय हो ओकोय ते बाङकिन सांबडावोः काना। सानोवाः मोने जिवी रे सेदाय मारे काथा उइहार-उइहार ते कॉहिस हेच इदियाय काना, काइच काइच् ते तेहेञ आजिज सोहाग रिनिच जिवी मिरूय फारकाव ओडोकोः कानते, सानोवाः खाञ्चार खोन। दिसागे बाडे आइकाऊ लाओं, मोने-मोने ते चेत् कोचोय मेनकेत् । मुचात् तेत् आजोम एना- “नोवा होड़मो रेनाङ गोनोङ गे बानूः आनाङ, आर नोवा होड़मो दोहो काते चेत् इञ चेकाया ? “ सेदाय काथा उइहार-उइहार ते, बाई-बाई ते, आ सारए राकाप केआ, सार ए फेत् केआ, ताला कोड़ाम रे । जेल जेल ते सानो मुरमूवाः जिवी चालाव एना बाहावाः सामाङरे । मिलोन जुरी सानो बागियाः नाय, जाय जुग लागित नोवा धारती ओतेत दो।

                        बाहा आडीगेय राः हालाङ केतु आ, मेनखान चेकायाय, बाई-बाई तेय मेन केत् आ- “बिधी बिधान्तार रेनाः कोलोम दो ओकोय हों बाडे एड़ावकेया। इञाः नुसिब रे दो नोवा गे ओल ताँहेंकाना पालेत् । आर चेत ए चेकाया बाहा दो, बागियाः देयाय जाय जुग लागित आजिज मिलवा गाते । बाँदेयाकात् साड़ी लुगड़ी रेनाङ तारा आञ्चार चिरा काते,सानोवाः बोहोः ए पोटोम एसेत्काः ना, मोने जिवी रेनाङ सेदाय रोपोड़ काथा उइहार-उइहार ते । -पाटू दाड़ केत् आय ओड़ाः ते। जेलकोवाय बारयात कोड़ा हों  मेनाः कोगेया, आच बिदाये लागित ताँगि होर रे । 

                  ओड़ाः गानाडे लेबेत् साँवते हिलीत् तेत् ए मेन केत्आ- “माई ओकातेम चालाव लेना“ । चेत् हों बाङ ए लाईलेत् आ। कुसुत् कुसुत् राराः ए धुराव एना। एनखान गोड़ोम एगाँत् ए हेच एना, बाहा सुर ते। हेच् साँवते बुझाव ए छुटाव एना। - “गोड़ोम कुड़ी “आलोम रागा । कुड़ी होपोन जोनोम दो एटाः ओड़ाःगे। मित् दिन बाङ मित् दिन चालाः तेगे हुयूरू आ। इञ हों तो जानाम ओड़ाः बागी कातेञ हेच आकाना नोवा चाम्पानागार ते दो।“ माई एटाः ओड़ाः ते कुड़ी होपोनबो चालाव लेन एनाङ धारती आयोवाः रिन हालाःआ। आर नोवा गे काना कुड़ी होपोनाः धोरोम दो। एन हों राराः कान गेयाय बाहा दो। “मा, मा लोगोन सापड़ा मे, बिदाय मेया ले नावा चिरूनागार बाजार ते“ दृ आर हों गोड़ोम एंगात लाँदा सातालाः ए मेनकेतुआ।

                आडी गेय राः केतुआ। कोड़ाम चेतान ते हिडिर-हिडिर मेत दाः जोरोयेना। तारा आञ्चार लोहोत् चाबायेना। इखान चेकायाय, निट ते। आडी जाँक जोमोक राही डाली ते । हान्ते सानोवाः गोयच होड़मो, आको ओड़ाः होड़ हेच्काते को इदिकेत्आ। बाप्ला तायोम इदी रूवाड़,आगू रूवाड़ केत्किना को । आतो टोला रिन कोड़ा कुडीकोहों “सिसिर हाँडी“ एम काते को बिदाय कात कोवा । एकोड़िया केत् किना को मेनखान ओना आरे माहा हों, पारोम एना। बाहा को इदी रूवाड़ केदेया जाँवाय ओड़ा “चिरू नागर ते । किदू दाका जोम बाड़ा काते सानाम को जापित केत् आ ओड़ारे । जापित् साड़ा सातित्र ओक्तो, ताला त्रिदा बेड़ा रे लाड़ ए जोटेत् आदेया बाहायिच जिवी जुरी सामोल हाँसदाः दो। आडी गेको रान मुरगान केदेया, आडी गेको ओझा पाती केदेया। मेनखान बाङ ए बेस लेना। जिवी बेड़ा बाङ रूवाड़ लेना, बगियाः नाय जाय जुग लागित धारती ओतेत् सामोल दो। सामोल दो कायरा ढोंगा रेको आतू कादेया दारड़ा गाड़ारे । बाहा दो गेल सेरमा हाबिच जाँवाय ओड़ाः रे ताँहेंएनाय । मित् दिन दो कुड़ाम सेत रे दुडुप काते मोने मोनेते मेन जोङ काना । चेत् इञ चेकाया नोडे दो ? ओकोय साँव इञ ताँहेंना? जाहाँयगे इञ रेनको ताँहेंकाना, सानाम को  चालाब एना, इञ हुञ चालाः आ। जांहासेत् मेत् लुतुर,ओन्ते गित्र चालाः आ। होर गे होर दोय उदुःआञा,लाहा अकागित्र ताँहेंना। मित् दिन दो बाई बाई ते जुत् हुम तोरा ओडोक चालाव एनाय । कोयोः रूवाड़ सानाय काना जाँवाय ओड़ाः । मेनखान बाय कोयोः रूवाड़ दा यात् आ। जानाम ओड़ाःए हेच एना, हिली दादा बाङकिन बुगिना आडिगे किन एद्रे आड़िस आया। मित् दिन दो मोने जिवी काँहिस एनते, मोने गोटा काते मेन जोङ कानाय एकलारे “नोवा होड़मो दो चेत् ए चिकाया? चेत् ए कामीया, आपान आपिन बो हेच आकाना नोवा धारती ते दो, आर, आपान आपिन बो रूवाड़ चालाः आ, ओकोय हों ओकोय रिन हो बोन बाङ काना। “ आड़ी लेकान काथा बाहावाः मोने रे गुलावाते तारको राकाप् एना जिवीरे । ताकेर हारकेत् तारकोयेना ताला कोड़ाम रे । लाहा एनाय माड़ाङ सेत्गे, माराङ आहार रेनाः लाडया बाडे दारे बुटा तेगे। सेटेर साँवते,हानते नाते कायोः बाड़ा केत् आय। देच् एनाय दारेते, बादेयाकात् साड़ी लुगड़ी रेनाः तारा आञ्चार चिरा काते, बिन बाहा हारमालाय बेनाव केत् आ, आराव केत आय होटो रे, मेनखान जेल जेल ते, बाई बाई ते हासित एना होटोः रेनाः ’तारा आञचार बाहा माला’ दो। लाडया बाड़े दारे रेनाः डार रे,बाहामाई दोय आकायेना, जिवी मिरू हों फारकाव ओडोक एना जायजुग लागित, होड़मो खानचार खोन। खान गे सेरमा रे बिजली साँवते हुडुर साडेयेना। बाहा माईवाः जियोन खेलोड दो तारा आञ्चार लेका तारा रेगे मुचात्एना।

स्रोत संग्रह   संथाली गद्य-पद्य संग्रह
                      काल्पनिक तस्वीर




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Saturday, December 6, 2025

Teaching Aptitude (शिक्षण अभिक्षमता)

Teaching Aptitude  शिक्षण अभिक्षमता का तात्पर्य शिक्षण कार्य और शिक्षण सिद्धांत तथा उसकी विधियों के किसी नए वातावरण, भूमिका या अवधारणा से परिचित होना या उसे समझने से है। शिक्षण एक कला है जिसमें उसकी प्रतिभा और सृजन की झलक मिलती है। शिक्षण एक कार्य प्रणाली है जो सामाजिक और भौतिक वातावरण के अनुकूल प्रशिक्षु को अपने ज्ञान से सृजित करता है। शिक्षण एक पारस्परिक क्रिया है जो किसी उद्देश्य हेतु जो विद्यार्थी के बौद्धिक विकास में सहायक होता है।

शिक्षण एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें शिक्षक और विद्यार्थी के बीच परस्पर संवाद होता है। शिक्षण एक कला है जो प्रशिक्षुओं को प्रभावशाली ज्ञान प्रदान करता है। शिक्षक औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनों रूप में होता है जो प्रशिक्षुओं को अधिक से अधिक सीखने के लिए प्रोत्साहित करती है तथा उसे सामाजिक वातावरण में ढलने में मदद करता है।

शिक्षण की प्रकृति एवं विशेषताएं (The Nature and Characteristics)

  • शिक्षण एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है।
  • शिक्षण औपचारिक और अनौपचारिक दोनों प्रकार के होते हैं।
  • शिक्षण एक कला है जो अध्यापकों को  प्रभावी ढंग से ज्ञान प्रदान करती है।
  • शिक्षण एक विज्ञान भी है जो विषय से संबंधित विभिन्न तथ्यों और उसके कारणों की शिक्षा प्रदान करता है।
  • शिक्षण कला अध्यताओ को अधिक से अधिक सीखने के लिए प्रोत्साहित करती है।

शिक्षण के उद्देश्य (Objectives of Teaching)

शिक्षण एक सामाजिक प्रक्रिया है  जिसमें मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक दृष्टिकोण सम्मिलित होता है। शिक्षण व्यवसाय को अपनाने वाले व्यक्ति में शिक्षा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण होना चाहिए। यदि शिक्षक की शिक्षा में अभिरुचि एवं शिक्षा के प्रति सकारात्मक सोच रहता है तो उसके लिए शिक्षा मात्र औपचारिक ना होकर जीवन के लिए मूल्यवान और उपयोगी होती है। शिक्षण एक उद्देश्य पूर्ण प्रक्रिया है जिसमें सामाजिक मनोवैज्ञानिक दार्शनिक दृष्टिकोण सम्मिलित होता है।ताकि शिक्षा को जीवन में उपयोगी एवं मूल्यवान बनाया जा सके। शिक्षण प्रक्रिया मुख्य रूप से छात्र और शिक्षक के अंतरक्रिया पर आधारित होती है। जिसमें शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों को सीखने के लिए प्रेरित किया जाता है।

शिक्षण के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

  • अध्येताओं के संपूर्ण विकास
  • व्यवहार परिवर्तन
  • सामंजस्यता का विकास
  • पाठ अभ्यास
  • अध्येताओं के मानसिक योग्यता का विकास
  • ज्ञान संचार
  • कक्षा वातावरण
  • शिक्षण प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य अध्येताओं के संपूर्ण विकास है जिसमें भौतिक, मानसिक, अध्यात्मिक व नैतिक विकास शामिल है।
  • शिक्षण प्रक्रिया में अध्येताओं के व्यवहार परिवर्तन होता है शिक्षा व्यक्ति में व्यवहारिक परिवर्तन लाता है। इसी से किसी व्यक्ति की दृष्टिकोण और उसकी व्यक्तिगत आदर्श की झलक मिलती है।
  • शिक्षण से अध्येताओं में मानसिक विकास के साथ तार्किक क्षमता, विषय वस्तु की समझ तथा सामाजिक सामंजस्यता का विकास भी होता है। तथा विश्व बंधुत्व की भावना जागृत होती है।
  • शिक्षण प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य शिक्षक के द्वारा छात्राओं में सूचना तथा ज्ञान संचार करना होता है। शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षक का अपने व्याख्यान को लगातार रखते हैं और छात्रों को गृह कार्य भी देते हैं। शिक्षकों का उत्तरदायित्व होता है कि छात्रों ने क्या सीखा है इसकी जांच करना। छात्रों ने क्या पढ़ा औऱ क्या सीखा इसकी जांच करना शिक्षण प्रक्रिया का महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है।
  • शिक्षण के लिए कक्षा-वातावरण होना अति आवश्यक है क्योंकि यदि शिक्षक- छात्र के बीच दोस्ताना तथा व्यवहारिक शिक्षण प्रक्रिया नहीं होती है तो सीखने की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होती है। इसलिए शिक्षक-छात्रों को हमेशा शिक्षण प्रशिक्षण की प्रक्रियाओं में सहज महसूस करना चाहिए।

शिक्षा दर्शन में शिक्षण एक त्रिकोणीय प्रक्रिया है जिसमें शिक्षक, छात्र (अध्येता) और विषय-वस्तु तीनों शामिल होते हैं। शिक्षण की त्रिकोणीय प्रक्रिया में कक्षा वातावरण शामिल किया जा सकता है। शिक्षण के लिए स्वच्छ स्वस्थ वातावरण की आवश्यकता होती है। जहां शिक्षक, छात्र, विषय-वस्तु और स्वच्छ स्वस्थ वातावरण का मिलन होता है वहां शिक्षण प्रशिक्षण का केंद्र बन जाता है। शिक्षण के इन आवश्यक तत्वों का अपना-अपना महत्व है शिक्षण की प्रक्रिया में इन चार तत्वों का होना अति आवश्यक है जो निम्न हैं :-

शिक्षक  (Teacher) 

शिक्षण- प्रशिक्षण की प्रक्रिया में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है जो अध्येताओं में व्यवहार परिवर्तन के साथ-साथ नैतिकता का संचार करता है। शिक्षक विषय के ज्ञाता होते हैं और अध्येता के व्यवहार परिवर्तन के लिए प्रभाव कारी संचार के लिए पूर्णता उत्तरदायित्व होता है। आज के विज्ञान एवं तकनीकी युग में शिक्षण को प्रभाव कारी संचार के लिए शिक्षकों को अत्याधुनिक तकनीकी का प्रयोग करना चाहिए। शिक्षक पथ प्रदर्शक होते हैं वह ज्ञान का सृजन कर अध्येताओं में भौतिक, सामाजिक, मानसिक तथा भावनात्मक विकास को जागृत करता है।

अध्येता (Learner)

शिक्षण-प्रशिक्षण का केंद्र बिंदु अध्येता होता है जो ज्ञान और सूचना प्राप्त करने के लिए शिक्षकों का अनुसरण करते हैं।अध्येताओं का ध्येय अधिक से अधिक सूचना और ज्ञान प्राप्ति की जिज्ञासा होती है तथा शिक्षकों का उत्तरदायित्व होता है कि वह अपना अद्यतन ज्ञान को उचित रूप से अध्येता को दे ताकि उसका बोद्धिक विकास हो सके। अध्येता कोई छात्र या विद्वान हो सकता है। शिक्षण प्रशिक्षण की प्रक्रिया में अध्येता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अध्येता की विषय जिज्ञासा तथा उसकी आवश्यकता के अनुसार शिक्षकों को ज्ञान और सूचना का संचार करना चाहिए। ताकि वे एक सफल नैतिकवान नागरिक बन सके और देश और समाज का कल्याण हो सके।

विषय वस्तु (Subject Matter)

शिक्षण प्रशिक्षण की प्रक्रिया में विषय वस्तु की अहम भूमिका होती है। विषय वस्तु महत्वपूर्ण तत्व है जो सामान्यता शिक्षकों द्वारा निर्धारित की जाती है किंतु विषय के निर्धारण में अध्येताओं की सहभागिता हो सकती है। विषय वस्तु को सुगम बनाने हेतु संबंधित आवश्यक चार्ट, मानचित्र ,तालिका एवं मॉडल की तैयारी शिक्षकों या प्रशिक्षकों के द्वारा की जाती है। शिक्षण उपकरण में मीडिया तकनीकी का प्रयोग शिक्षकों द्वारा किया जाना किसी भी विषय वस्तु को अध्येताओं के लिए अधिक से अधिक बोध्यगम व रुचिकर बनाने का कार्य करती है। शिक्षण में विषय वस्तु एक महत्वपूर्ण तत्व होता है। जिसका निर्धारण शिक्षकों द्वारा की जाती है विषय वस्तु को सुगम बनाने के लिए संबंधित आवश्यक शिक्षण उपकरण का प्रयोग किया जाना वांछित होता है।

स्वच्छ-स्वस्थ कक्षा वातावरण (Cool-Healthy Classroom Environment)

शिक्षण का मुख्य उद्देश्य अध्येताओं के बहुमुखी विकास होता है और यह तभी संभव है जब शिक्षण प्रशिक्षण के लिए अनुकूल वातावरण हो। क्योंकि शोरगुल शोर शराबा की वातावरण में शिक्षण प्रक्रिया बाधित होती है। इसका प्रभाव शिक्षण पर पड़ता है। शिक्षण कक्ष का वातावरण पिंड्राप साइलेंट होना चाहिए ताकि शिक्षकों द्वारा जो ज्ञान या सूचना अध्येताओं को दिया जा रहा है और वह बिना किसी बाधा के अध्येताओं के पास पहुंचे। इसलिये शिक्षण प्रशिक्षण के लिए अनुकूल वातावरण के साथ स्वच्छ-स्वस्थ कक्षा वातावरणका होना आवश्यक है।

शिक्षण एक सामाजिक दृष्टिकोण है जबकि सीखना एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। शिक्षण बिना अध्येताओं के संभव नहीं है जबकि सीखना अपने व्यक्तिगत अनुभव से भी हो सकता है। शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने के लिए निम्न चरणों की जरूरत होती है।

योजना (Preparation)

किसी भी कार्य को संपादित करने के लिए योजना की जरूरत होती है। योजना कार्य को गति प्रदान करती है। शिक्षण प्रशिक्षण की प्रक्रिया में शिक्षक अपनी क्षमता के अनुकूल, छात्रों की संख्या, विषय वस्तु के अनुसार शिक्षण के लिए योजना तैयार करते हैं और शिक्षण कार्य को संपादित करते हैं। जब शिक्षक छात्रों को पढ़ने के लिए अपने हर दृष्टिकोण से अपना अच्छा सही ज्ञान के संचार के लिए योजना बनाते हैं तो शिक्षण बोध्यगम सुगम हो जाता है बिना योजना के कोई भी कार्य संपादन नहीं की जा सकती है।

तैयारी (Planning)

शिक्षण प्रशिक्षण का आयोजन किसी विशेष स्कूल, कॉलेज तथा विश्वविद्यालय में होती है जहां शिक्षक नई संभावनाओं की तलाश में आए छात्र छात्राओं को चरणबद्ध तरीके से विषय वस्तु का ज्ञान देते हैं। जब किसी कार्य को संपादित करने के लिए योजना बनाते हैं तो उस समय अपने योजना अनुसार तैयारी भी करनी होती है। शिक्षकों को जो विषय वस्तु पर पढ़ानी होती है उस विषय वस्तु अच्छी तरह से तैयार करनी होती हैं और उस विषय वस्तु को अधिक से अधिक रुचिकर बनाने का प्रयास किया जाता है ताकि अध्येता उस विषय वस्तु को अच्छे ढंग से हृदयागम्य करें। शिक्षण प्रक्रिया में तैयारी का अर्थ किसी विषय वस्तु को कैसे अध्येताओं के लिए सुगम बनाया जाए ताकि विषय वस्तु रुचिकर हो।शिक्षण विधि में शिक्षण सहायक उपकरण सामग्री का प्रयोग तथा उपयोग आदि पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है।

प्रस्तुतीकरण (Presentation)

तैयारी के पश्चात किसी विषय वस्तु का अच्छे से प्रदर्शन करना आवश्यक होता है। किसी विषय वस्तु का प्रदर्शन ऐसा होना चाहिए ताकि उसे विद्यार्थी पूर्णता से ग्रहण कर सके और प्रशिक्षु संतुष्ट हो सके। शिक्षण प्रक्रिया में विषय वस्तु की प्रस्तुतिकरण महत्वपूर्ण चरण होते हैं जिसके माध्यम से कक्षा में शांतिपूर्वक विद्यार्थी विषय को समझ पाता है। शिक्षकों के द्वारा अपनी योग्यता और क्षमता के अनुकूल अच्छे ढंग से विषय वस्तु को प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है ताकि अध्येता उसे ग्रहण कर सके। अध्येता अपनी क्षमता के अनुकूल ग्रहण या समझने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार प्रस्तुतीकरण शिक्षण का एक महत्वपूर्ण चरण हैं।

 तुलना (Comparison)

तुलना भी शिक्षण का महत्वपूर्ण विशेषता है जिसके माध्यम से हमें अपनी गलती को सुधारने का मौका मिलता है। शिक्षण प्रशिक्षण की प्रक्रिया में तुलना कर प्रथम कक्षा प्रदर्शन से दूसरा कक्षा प्रदर्शन को बेहतर तथा सारगर्भित सुसंगत बनाया जा सकता है। इस प्रकार तुलनात्मक अध्ययन अध्यापन से अध्येताओं में जागृति आती है और वे अच्छे से ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

समान्यनिकरण (Generalization)

शिक्षण की प्रक्रिया में एक कक्षा प्रदर्शन का दूसरे कक्षा प्रदर्शन का तुलना कर समान्यनिकरण किया जा सकता है जो शिक्षण को अधिक आकर्षक बेहतर परिणाम दे सकता है। समान्यनिकरण शिक्षण का महत्वपूर्ण चरण होती है जिसमें कक्षा प्रदर्शन परिणामों का तुलनात्मक अध्ययन कर शिक्षण प्रक्रिया को और बेहतर परिणाम देने वाला बनाया जा सकता है। शिक्षण प्रक्रिया में सामान्यनिकरण बेहतर परिणाम का द्योतक है। शिक्षण कार्य नियम संगत होना चाहिए।

अनुप्रयोग (Application)

शिक्षण का मुख्य उद्देश्य समाज को विकासशील बनाना है। शैक्षिक वातावरण समाज में विकसित करने में शिक्षकों का महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नित्य नए सूचना तथा ज्ञान का सृजन कर देश और समाज के सर्वांगीण विकास करना है। व्यक्ति में नैतिक गुण को विकसित किया जाता है। इसलिए शिक्षण में शिक्षक अपने योजना अनुसार बेहतर नियमतः कक्षा प्रदर्शन कर नित्य प्रतिदिन नये अनुप्रयोग करना आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य है। क्योंकि किसी नियम का समान्यनिकरण का अनुप्रयोग से ही विकास की गति को जारी रखा जा सकता है इसलिए शिक्षण प्रक्रिया में नित्य नये अनुप्रयोग करना चाहिए।

किसी कक्षा में विषय वस्तु का प्रदर्शन शैली शिक्षण विधि है। विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास हेतु सूचना तथा ज्ञान को संचारित करने की विधि शिक्षण विधि है। शिक्षण विधि का अर्थ समान्यतः शिक्षण प्रक्रिया की योजना तथा नीति को क्रियान्वित करने से लिया जाता है। शिक्षण अभिरुचि मुख्यतः पहलू होते हैं- किसी विषय वस्तु के प्रदर्शन की योजना बनाना तथा अध्येताओं में बौद्धिक विकास एवं व्यवहारिक परिवर्तन लाना। यह विधि तार्किक एवं वैज्ञानिक हो सकती है।

व्याख्यान विधि (Lecture Method)

व्याख्यान विधि शिक्षण की महत्वपूर्ण एवं पुरानी शिक्षण विधि है। यह ऑटोक्रेटिक शिक्षण विधि है। यह ज्ञान संचार का सशक्त माध्यम है। इस विधि में शिक्षक सक्रिय तथा विद्यार्थी निष्क्रिय होते हैं। लेकिन शिक्षक प्रश्नोत्तर तकनीक को अपनाकर कलात्मक ढंग से छात्रों पर प्रभावकारी नीति अपनाकर शिक्षण को बोध्यगम बनाया जाता है। शिक्षण की प्रक्रिया में व्याख्यान विधि को लेकर निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है –

  • विषय शीर्षक संपूर्ण विषय को प्रदर्शित करें
  • प्रदर्शन की कला में प्रवीणता
  • छात्रों में सुनने की आदत
  • एक विषय वस्तु को अन्य रोचक विषय वस्तु के साथ जोड़ने की कला
  • नए ज्ञान को पुराने ज्ञान से जोड़ने की कला

यद्यपि व्याख्यान विधि शिक्षण की प्रभाव कारी शिक्षण विधि है परंतु शिक्षकों को व्याख्यान को रोचक बनाने के लिए शिक्षण उपकरण आदि का प्रयोग किया जाना अनिवार्य होता है। व्याख्यान के दौरान छात्रों से प्रश्नोत्तर करना आवश्यक होता है। ताकि अध्येता विषय वस्तु में रुचि ले।

पाठ प्रदर्शन विधि Lesson Demonstration Method)

पाठ प्रदर्शन शिक्षण विधि एक परंपरागत शिक्षण विधि है जिसे तकनीकी स्कूल तथा प्रशिक्षण संस्थानों में प्रयोग किया जाता है। पाठ प्रदर्शन विधि में सर्वप्रथम किसी विषय वस्तु को निर्धारित कर उसके उद्देश्य का निर्धारण करना। दूसरे चरण में प्रश्नोत्तरी तकनीक को अपनाकर प्रशिक्षु में जिज्ञासा को जागृत करना तथा अंतिम चरण में पाठ के विषय वस्तु को प्रदर्शन कर उसका मूल्यांकन किया जाता है। इस विधि का प्रयोग सामान्यतः प्रशिक्षण के लिए होता है जिसमें अ-प्रशिक्षित, अ-अनुभवी लोग भाग लेते हैं। यह विधि शिक्षक-छात्रों में पाठ संबंधी विषय में प्रवीणता हेतु बहुत ही उपयोगी विधि है।

प्रश्नोत्तर विधि (Question-Answer Method)

शिक्षण में प्रश्नोत्तर विधि प्रभावशाली शिक्षण विधि है जिसके माध्यम से प्रशिक्षुओं या अध्येताओं को विषयों में जिज्ञासा एवं रुचि को विकसित किया जाता है और कक्षा का वातावरण शांतिपूर्ण एवं शिक्षण प्रभावशाली होता है। प्रश्नोत्तर विधि के माध्यम से अध्येताओं में विषय के प्रति जिज्ञासा पैदा किया जा सकता है साथ ही साथ नए प्रश्नों को पूछकर अध्येताओं की जांच की जा सकती हैं। शिक्षक अपना मूल्यांकन कर शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावशाली एवं उपयोगी बना सकता है। प्रश्नोत्तरी विधि को अपनाकर अध्येताओं में विषय अभिरुचि पैदा करने तथा सीखने की प्रबल इच्छा शक्ति को जागृत करना होता है। शिक्षक मुख्यतः तीन स्तर पर अर्थात प्रथम निरीक्षण, दूसरा अनुभव, तीसरा जांच, की प्रक्रिया निर्धारित कर विषय वस्तु को रोचक एवं बोध्यगम बनाते है। शिक्षक अपने पाठ को विषयों से संबंधित प्रश्न को तैयार कर शिक्षण प्रशिक्षण की प्रक्रिया प्रभावी बनाते है।

शिक्षण में कक्षा प्रदर्शन बेहतर एवं प्रभावशाली होना चाहिए ताकि अध्येता अपनी शैक्षणिक योग्यतानुसार सामाजिक, राजनीतिक, व्यावहारिक एवं बोद्धिक ज्ञान को विकसित कर सके। शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षकों की केंद्रीय भूमिका होती है। किसी भी शिक्षक का कक्षा-प्रदर्शन को प्रभावित करने के उनके व्यक्तिगत कारक (Personal Factor) तथा बौद्धिक कारक (इंटेलेक्चुअल फैक्टर)हो सकते हैं। व्यक्तिगत कारक का तात्पर्य शिक्षकों के व्यक्तित्व से है। शिक्षकों को शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक रूप से विकसित होना चाहिए। शिक्षकों के व्यक्तित्व के कारण शिक्षण प्रभावित हो सकता है। इसलिए शिक्षकों को व्यक्तिगत स्तर पर सामाजिक एवं नैतिक होना चाहिए। साथ ही साथ शिक्षकों को विवेकी होना चाहिए। बौद्धिक कारक का तात्पर्य शिक्षकों के बुद्धि विवेक से है। शिक्षकों की बुद्धि और विवेक में कमी के कारण शिक्षण प्रभावित हो सकती है। शिक्षकों के बौद्धिक क्षमता के कारण संबंधित विषय में प्रवीणता प्रभावित कर सकता है। सोचने समझने की शक्ति होनी चाहिए साथ ही साथ मनोवैज्ञानिक स्तर पर शिक्षकों में भय, घबराहट नहीं होनी चाहिए। शिक्षकों को निडर, निर्भीक ऊर्जावान, सकारात्मक सोच वाला होना चाहिए।व्यक्तिगत कारक (Personal Factor) तथा बौद्धिक कारक (Intellectual Factor के अलावा अन्य निम्न कारणों से शिक्षण प्रभावित हो सकती है –

विषय का कम ज्ञान (Poor Knowledge of Subject)

शिक्षकों को अपने विषय में प्रवीण होना चाहिए। यदि शिक्षक अपने विषय का कम ज्ञान रखता है तो वह विद्यार्थी को संतुष्ट नहीं कर सकेगा। जिसका प्रभाव शिक्षण-प्रशिक्षण पर पड़ता है विषय के ज्ञान ही प्रभावशाली शिक्षण का परिचायक है।

शिक्षक का स्वास्थ्य (Health of Teacher)

स्वास्थ्य ही धन है। स्वास्थ्य के बिना किसी भी कार्य को सुचारू रूप से जारी रखना कठिन होता है। शिक्षण में शिक्षकों की केंद्रीय भूमिका होने के साथ-साथ उसे मेहनती होना चाहिए। शिक्षकों को शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ होना जरूरी है। यदि शिक्षक शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं है अर्थात बीमार है तो उसका विपरीत प्रभाव शिक्षण पर अवश्य पड़ेगा।

ज्ञान-संचार प्रक्रिया (Knowledge-Communication)

ज्ञान का संचार करने के लिए शिक्षकों को अपने विषय में प्रवीणता हासिल करना होगा तभी वह अपने छात्रों को सही ज्ञान का संचार कर सकता है। अन्यथा वह ज्ञान के संचार में असफल हो जाएंगे। विषयों का अच्छी जानकारी या अपने ज्ञान के आधार पर अपने अध्येताओं को सही ज्ञान या सूचना का संचार कर सकता है। संचार प्रक्रिया में कोई शोरगुल नहीं होना चाहिए। संचार प्रक्रिया में बाधा शिक्षण को प्रभावित करती है।

मानसिक स्तर (Mental level)

शिक्षकों को समझना होगा कि अध्येताओं की क्या जरूरत है? उसकी मानसिक स्तर को टटोलना होगा तभी शिक्षण को प्रभावकारी बनाया जा सकता है। यदि शिक्षक अध्येताओं के मानसिक स्तर की समझ स्तर को समझे बैगर या अपने स्तर से शिक्षण जारी रखता है तो वह शिक्षण प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।

तैयारी (Preparation)

किसी भी कार्य को सुचारू रूप से संपादित करने के लिए संबंधित कार्य की तैयारी करनी होती है। यदि शिक्षण में शिक्षक जिस विषय वस्तु का कक्षा प्रस्तुतीकरण करने जा रहा है तो उस विषय वस्तु से संबंधित विषयों की तैयारी करनी होती है। यदि विषयों की तैयारी किये बगैर कक्षा-प्रदर्शन प्रस्तुत करता है तो शिक्षण प्रभावित हो सकता है। शिक्षण में विद्यार्थी की ओर से कई प्रकार से प्रश्न किए जा सकते हैं जिसका जवाब देना कक्षा शिक्षकों का दायित्व होता है। यह तभी संभव है जब पढ़ाए जाने वाले विषय वस्तु की अच्छी तैयारी के साथ कक्षा प्रस्तुतीकरण किया जाए।

तत्क्षण बौद्धिक क्षमता (Presence of mind)

शिक्षकों को तत्क्षण बौद्धिक क्षमता रखना आवश्यक होता है। उदाहरण स्वरूप शिक्षक विषय वस्तु को कक्षा में पढ़ा रहे हैं परंतु अध्येता विषय वस्तु में रुचि नहीं ले रहा है और उसे समझने में कठिनाई महसूस हो रहा है तो शिक्षकों को तुरंत किसी शिक्षण सहायक तकनीक या तत्कालिक उदाहरण को प्रस्तुत कर विषय वस्तु को बोधगम्य बनाना अनिवार्य हो जाता है अन्यथा शिक्षण प्रभावित होता है। शिक्षकों में विषय वस्तु को रोचक और बोधगम्य बनाने की काल होनी चाहिए।

असंतुलित छात्र-शिक्षक औसत (Unbalanced Student-Teacher Ratio)

विद्यालय या विश्वविद्यालय के लिए शिक्षक-छात्र औसत का मानक निर्धारण किया गया है। उसके अनुसार कक्षा का संचालन किया जाए तो शिक्षण प्रभावी तथा उपयोगी होगा। यदि शिक्षक छात्र का मानक औसत असंतुलित होता है तो उसका स्पष्ट प्रभाव शिक्षण पर दिखाता है। छात्र-शिक्षक असंतुलित औसत की स्थिति में शिक्षकों का व्याख्यान सुनने में कुछ छात्रों के लिए कठिनाई हो सकती है। साथ ही साथ शिक्षण प्रक्रिया प्रभावित होती है

आधारभूत संरचना (Infrastructure)

किसी भी संस्थान का आधारभूत संरचना शिक्षण को प्रभावित कर सकती है। आधारभूत संरचना जैसे उपस्कर, प्रसाधन, स्वच्छ पेयजल, खेलकूद की सुविधा एवं पुस्तकालय आदि स्वस्थ एवं प्रभावशाली शिक्षण के लिए अनिवार्य होता है। यदि शिक्षण संस्थानों में आवश्यक सुविधाओं से अनिभिज्ञ होकर संस्थान में शिक्षण को प्रभावी नहीं बनाया जा सकता है। पुस्तकालय और सूचना प्रौद्योगिकी की मूल भूत सुविधाएं होना आवश्यक है।

शिक्षण सहायक उपकरण (Teaching Aids/Tools)

सहायक उपकरण किसी कार्य को संपादित करने में सहायता प्रदान करता है। किसी विषय वस्तु तथा तथ्य को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने के लिए तथा कक्षा को प्रभावी बनाने के लिए शिक्षकों के द्वारा सहायक सामग्री का उपयोग किया जाता है। जब किसी शिक्षण सहायक सामग्री उपयोग के बिना अध्यापन कार्य को संपादित करते हैं तो विषय वस्तु को स्पष्ट करने में कठिनाई होता है और फिर शिक्षण कार्य प्रभावित हो सकता है। संतुष्टि जनक ढंग से विषय को प्रस्तुत करने में शिक्षण के आवश्यक सामग्री का उपयोग या प्रयोग किया जाना चाहिए। केवल व्याख्यान विधि से शिक्षण कार्य प्रभावी नहीं हो सकता। शिक्षण सामग्री का उपयोग कर किसी विषय वस्तु को रोचक और बोधगम्य बनाया जा सकता है। इस प्रकार शिक्षण सहायक सामग्री शिक्षण को प्रभावित करती है।

स्रोत :-इंटरनेट और किताब 


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