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Friday, November 19, 2021

Jharkhand Me Jalvayu Parivartan (झारखंड में जलवायु परिवर्तन)

झारखंड में जलवायु परिवर्तन

➧ जलवायु परिवर्तन का तात्पर्य हमारी जलवायु में एक निश्चित समय के पश्चात होने वाले परिवर्तन से है सामान्यत: इसके लिए 15 वर्ष की समय-सीमा का निर्धारण किया जाता है।  

➧ वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन हमारे समक्ष एक गंभीर चुनौती के रूप में उभरा है, जिसने जैव मंडल के अस्तित्व पर एक प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है। 

 जलवायु परिवर्तन के लिए कई प्रमुख कारण जिम्मेदार हैं। 

 झारखंड में जलवायु परिवर्तन के कारण 

➧ ग्रीन हाउस गैस 

➧ पृथ्वी के चारों ओर ग्रीनहाउस गैस की एक परत बने हुए हैं, इस परत में मिथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और कार्बन ऑक्साइड जैसे गैसे शामिल है।  

 ग्रीन हाउस गैसों की यह परत पृथ्वी की सतह पर तापमान संतुलन को बनाए रखने में आवश्यक है और विशेषज्ञों  के अनुसार यदि यह संतुलन पर नहीं होगी तो पृथ्वी पर तापमान काफी कम हो जाएगा

 आधुनिक युग में जैसे-जैसे मानवीय गतिविधियां बढ़ रही है, वैसे-वैसे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भी वृद्धि हो रही है और जिसके कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है

झारखंड में जलवायु परिवर्तन

 मुख्य ग्रीन हाउस गैसें 

(1) कार्बन डाइऑक्साइड:- 

➧ इसे सबसे महत्वपूर्ण GHG (Greenhouse gases) माना जाता है और यह प्राकृतिक व मानवीय दोनों ही कारणों से उत्सर्जित होते हैं वैज्ञानिकों के अनुसार, कार्बन डाइऑक्साइड का सबसे अधिक उत्सर्जन ऊर्जा हेतु जीवाश्म ईंधन को जलाने से होता है आंकड़े बताते हैं, कि औद्योगिक क्रांति के पश्चात वैश्विक स्तर पर कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में 30% की बढ़ोतरी देखने को मिली है

(2) मिथेन: 

 जैव पदार्थों का अपघटन मिथेन का एक बड़ा स्रोत है उल्लेखनीय है कि मिथेन (CH4) कार्बन डाइऑक्साइड से अधिक प्रभावी ग्रीन हाउस गैस है, परंतु वातावरण में इसकी मात्रा कार्बन डाइऑक्साइड की अपेक्षा कम है 

(3) क्लोरोफ्लोरोकार्बन 

 इसका प्रयोग मुख्यत: रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर आदि में किया जाता है और ओजोन परत पर इसका काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है 

(4) भूमि के उपयोग में परिवर्तन

➧ वनों की कटाई वाणिज्यक या निजी प्रयोग हेतु वनों की कटाई भी जलवायु परिवर्तन का बड़ा कारक है पेड़ न सिर्फ हमें फल और छाया देते हैं, बल्कि यह वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड जैसे महत्वपूर्ण ग्रीन हाउस गैस को अवशोषित भी करते हैं वर्तमान समय में जिस तरह से वृक्षों की कटाई की जा रही है, वह काफी चिंतनीय है

(5) शहरीकरण 

➧ शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण लोगों के जीवन जीने के तौर-तरीकों में काफी परिवर्तन आया हैविश्वभर की सड़कों पर वाहनों की संख्या काफी अधिक हो गई है जीवनशैली में परिवर्तन ने खतरनाक गैसों के उत्सर्जन में काफी अधिक योगदान दिया है

➧ राज्य में जलवायु परिवर्तन के परिणाम एवं प्रभाव

झारखंड में जलवायु परिवर्तन

(1)  उच्च तापमान

➧ पावर प्लांट, ऑटोमोबाइल, वनों की कटाई और अन्य स्रोतों से होने वाला ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन पृथ्वी की अपेक्षाकृत काफी तेजी से गर्म कर रहा है 

➧ पिछले डेढ़ वर्षो में वैश्विक औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है और वर्ष 2016 को सबसे गर्म वर्ष के रूप में रिकॉर्ड दर्ज किया है 

➧ गर्मी में संबंधित मौतों और बीमारियों, बढ़ते समुद्र स्तर, तूफान की तीव्रता में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के कई अन्य खतरनाक परिणामों में वृद्धि के लिए बढ़े हुए तापमान को भी एक कारण के रूप में माना जा सकता है

(2) वर्षा के पैटर्न के बदलाव

➧ पिछले कुछ दशकों में बाढ़, सूखा और बारिश आदि की अनियमितता काफी बढ़ गई है यह सभी जलवायु परिवर्तन के परिणाम स्वरुप हो ही हो रहा है कुछ स्थानों पर बहुत ज्यादा वर्षा हो रही है, जबकि कुछ स्थानों पर पानी की कमी से सूखे की संभावना बन गई है

(3) समुद्र जल के स्तर में वृद्धि

➧ वैश्विक स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग के दौरान ग्लेशियर पिघल जाते हैं और समुद्र का जल स्तर ऊपर उठता है, जिसके प्रभाव से समुद्र के आस-पास के दीपों के डूबने का खतरा भी बढ़ रहा है

(4) वन्यजीव प्रजाति का नुकसान 

➧ तापमान में वृद्धि और वनस्पति पैटर्न में बदलाव ने कुछ पक्षी प्रजातियों को विलुप्त होने के लिए मजबूर कर दिया है विशेषज्ञों के अनुसार, पृथ्वी की एक चौथाई प्रजातियां वर्ष 2050 तक विलुप्त हो सकती हैं

(5) रोगों का प्रसार और आर्थिक नुकसान

➧ जानकारों ने अनुमान लगाया है, कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन के परिणाम स्वरुप मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों और अधिक बढ़ेंगे तथा इन्हें नियंत्रित करना मुश्किल होगा

(6) जंगलों में आग

 जलवायु परिवर्तन के कारण लंबे समय तक चलने वाले हीट वेव्स ने जंगलों में लगने वाली आग के लिए उपयुक्त गर्म और शुष्क परिस्थितियां पैदा की है हाल के ऑस्ट्रेलियाई जंगलों में लगी आग में व्यापक वन्य प्राणी का नुकसान हुआ, जिसमें इसका एक बड़ा पक्ष जलवायु परिवर्तन ही है

(7) खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव

➧ जलवायु परिवर्तन से तटों  के डूबने से कृषि भूमि का जल में डूबना प्रत्यक्ष रुप से खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा, वहीं दूसरी और खाद्यान्न उत्पादन में पोषकता की मात्रा में भी कमी आयेगी 

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Thursday, November 18, 2021

Jharkhand Me Pradushan Niyantran Ke Sarkari Prayas (झारखंड में प्रदूषण नियंत्रण के सरकारी प्रयास)

झारखंड में प्रदूषण नियंत्रण के सरकारी प्रयास

➧ पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण निवारण शोध संस्थान 

(i)  खनन पर्यावरण केंद्र  - धनबाद

(ii) वन उत्पादकता केंद्र - राँची

(iii) भारतीय लाह अनुसंधान केंद्र - राँची

(iv) झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड स्थापित (2001) - राँची

झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 

➧ झारखंड राज्य में प्रदूषण नियंत्रण हेतु 2001 ईस्वी  में झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की स्थापना की गई है संसाधनों के सतत उद्योग उपयोग के लिए झारखंड राज्य प्रदूषण बोर्ड द्वारा (JSPCB) द्वारा 2012-17 के लिए दृष्टि पत्र प्रस्तुत किया गया है 

➧ यह बोर्ड संसाधनों के सतत उपयोग पर बल देता है साथ ही जल के उपयोग को कम करने, वर्षा, जल, कृषि, लकड़ी एवं कोयला का औद्योगिक' क्षेत्र में कम उपयोग करने एवं स्वच्छ ऊर्जा उपयोग पर अधिक बल देता है 

झारखंड में प्रदूषण नियंत्रण के सरकारी प्रयास

 झारखंड ऊर्जा नीति 2012 :- ग्रीन हाउस गैस को कम करने के लिए यह नीति बनाई गई। इसमें गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के विकास पर विशेष बल दिया गया है इस नीति में 10 वर्षों में कुल ऊर्जा उत्पादन का 50% ,गैर परंपरागत स्रोत से उत्पादन करना है JREDA (Jharkhand Renewable Energy Development Authority)  का गठन 2001 में किया गया किया गया है 

➧ झारखंड राज्य एक्शन प्लान (JSPCB) - 2014 

 राज्य सरकार द्वारा प्रदूषण से निपटने और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों के समाधान हेतु बनाया गया

 झारखंड में सबसे अधिक प्रदूषित क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना

➧ जनसंख्या परिवर्तन से प्रभावित अति संवेदनशील क्षेत्रों की मानचित्र तैयार करना

➧ कोयला एवं खनन आधारित उद्योगों से उत्पन प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपाय करना

 झारखंड राज्य जल नीति-2011

➧ जल संसाधन के उचित प्रबंधन के लिए यह नीति बनायी गयी। 

 जल संसाधन, विशेषकर नदी जल संरक्षण के लिए भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा 20 फरवरी, 2009 को राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन किया गया है 

➧ इस प्राधिकरण के अंतर्गत गंगा नदी से संबंधित राज्यों को नदी संरक्षण संबंधी कार्यों को करने के लिए निर्देश दिया गया है इस प्राधिकरण के आलोक में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा-3 के तहत झारखंड राज्य गंगा नदी संरक्षण प्राधिकरण का गठन 30 सितंबर 2009 को भविष्य को किया गया था

 प्राधिकरण का पदेन अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है और इनका मुख्यालय रांची में स्थित है

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Tuesday, November 16, 2021

Jharkhand me dhwani Pradushan Ke Karan Aur Prabhav (झारखंड में ध्वनि प्रदूषण के कारण एवं प्रभाव)

झारखंड में ध्वनि प्रदूषण के कारण और प्रभाव

➧ अनियंत्रित, अत्यधिक तीव्र एवं असहनीय ध्वनि को ध्वनि प्रदूषण कहते हैं ध्वनि प्रदूषण की तीव्रता को डेसिबल इकाई में मापा जाता है

(i) कृषि योग्य भूमि की कमी

(ii) भोज्य पदार्थों के स्रोतों को दूषित करने के कारण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक

(iii) भू-संख्लन से होने वाली हानियां 

(iv) जल तथा वायु प्रदूषण में वृद्धि

ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव

(1) ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव से श्रवण शक्ति का कमजोर होना, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, उच्चरक्तचाप अथवा स्नायविक, मनोवैज्ञानिक दोष उत्पन्न होने लगते हैं लंबे समय तक ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव से स्वभाविक परेशानियां बढ़ जाती हैं 

(2) ध्वनि प्रदूषण से ह्रदय गति बढ़ जाती है, जिससे रक्तचाप, सिर दर्द एवं अनिद्रा जैसे अनेक रोग उत्पन्न होते हैं  

(3) नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर ध्वनि प्रदूषण का बुरा प्रभाव पड़ता है तथा इससे कई प्रकार की शारीरिक विपरीत विकृतियां उत्पन्न हो जाती हैं गैस्ट्रिक, अल्सर और दमा जैसे शारीरिक रोगों तथा थकान एवं चिड़चिड़ापन जैसे मनोविकारों का कारण भी ध्वनि प्रदूषण ही है 

झारखंड में ध्वनि प्रदूषण के कारण एवं प्रभाव

➧ झारखंड में ध्वनि प्रदूषण

➧ झारखंड ध्वनि प्रदूषण के मामले में अन्य राज्यों की अपेक्षा कम प्रभावित है उच्च ध्वनि प्रदूषण राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में दिल्ली, (लाजपत नगर), महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश राज्य आदि शामिल है। ध्वनि प्रदूषण अनियंत्रित वाहनों, त्योहारों व उत्सव, राजनैतिक दलों के चुनाव प्रचार व रैली में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल, औद्योगिक क्षेत्रों में उच्च ध्वनि क्षमता के पावर सायरन , हॉर्न तथा मशीनों के द्वारा होने वाले शोर के द्वारा होता है झारखंड के शहरी क्षेत्रों (खासकर औद्योगिक नगर) में इन सभी ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है

 हाल ही में सर्वे के अनुसार राजधानी रांची में सबसे ज्यादा प्रदूषण के प्रभाव देखे गए, जिसमें अशोक नगर (रांची) प्रमुख क्षेत्र रहा 

➧ प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने जांच के लिए शहर को 4 जोन में बांटा था :-

क्षेत्र                                जोन                                डेसिबल 

झारखंडहाई  कोर्ट               साइलेंट जोन                         45 -  50 डेसिबल 

अल्बर्ट एक्का चौक            कमर्शियल जोन                      55 - 65

कचहरी चौक                     कमर्शियल जोन                      55 - 65 

अशोक नगर                     रिहायशी जोन                         45 - 55 

➧ धनबाद में सबसे ज्यादा ध्वनि प्रदूषण रिकॉर्ड किए गए। यहां प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने तीन जगहों पर दीपावाली के दिन ध्वनि प्रदूषण की जांच की, जिसमें हीरापुर इलाके में सबसे ज्यादा 107 पॉइंट 5 डेसीबल ध्वनि प्रदूषण का स्तर रहा वही बैंक मोड़ में 107 पॉइंट 2  डेसीबल और बरटांड़ में 106 पॉइंट 7 डेसीबल प्रदूषण दर्ज किया गया 

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Monday, November 15, 2021

Jharkhand me Bhumi Pradushan Ke Karan Aur Prabhav (झारखंड में भूमि प्रदूषण के कारण और प्रभाव)

झारखंड  में भूमि प्रदूषण के कारण और प्रभाव

➧ भूमि प्रदूषण से अभिप्राय जमीन पर जहरीले, अवांछित एवं अनुपयोगी पदार्थों की भूमि में विसर्जित करने से है, क्योंकि इससे भूमि का निम्नीकरण होता है तथा मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है लोगों की भूमि के प्रति बढ़ती लापरवाही के कारण भूमि प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। 

 भूमि प्रदूषण के कारण

(i) कृषि में उर्वरकों, रसायनों तथा कीटनाशकों का अधिक प्रयोग । 

(ii) औद्योगिक इकाइयों, खानों तथा खदानों द्वारा निकले ठोस कचरे का विसर्जन। 

(iii) भवनों, सड़कों आदि के निर्माण में ठोस कचरे का विसर्जन

(iv) कागज तथा चीनी मिलों से निकलने वाले पदार्थों का निपटान, जो मिट्टी द्वारा अवशोषित नहीं हो पाते। 

(v) प्लास्टिक की थैलियों का अधिक उपयोग, जो जमीन में दबकर नहीं गलती। 

 (vi) घरों, होटलों और औद्योगिक इकाइयों द्वारा निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों का निपटान, जिसमेँ  प्लास्टिक, कपड़े, लकड़ी, धातु, काँच, सेरामिक, सीमेंट आदि सम्मिलित है। 

➧ भूमि प्रदूषण के प्रभाव

(i) कृषि योग्य भूमि की कमी

(ii) भोज्य पदार्थों के स्रोतों को दूषित करने के कारण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक

(iii) भू-संख्लन से होने वाली हानियां 

(iv) जल प्रदूषण तथा वायु प्रदूषण में वृद्धि

झारखंड  में भूमि प्रदूषण के कारण और प्रभाव

➧ झारखंड में भूमि प्रदूषण के प्रभाव

➧ झारखंड प्रदेश में लगभग 10 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि का अम्लीय भूमि (पी.एच. 5.5 से कम) के अंतर्गत आती हैं ।  

➧ यदि विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्र में पड़ने वाले जिलों में अम्लीय भूमि की स्थिति को देखें तो उत्तरी-पूर्वी जोन (जोन-IV) के अंतर्गत जामताड़ा, धनबाद, बोकारो, गिरिडीह, हजारीबाग और रांची के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 50% से अधिक भूमि अम्लीय समस्या से ग्रसित है । 

 इसी तरह पश्चिमी पठारी जोन (जोन -V) में सिमडेगा, गुमला और लोहरदगा में 69 से 72% तक अम्लीय भूमि की समस्या है, जबकि पलामू, गढ़वा और लातेहार में अम्लीय भूमि का क्षेत्रफल 16% से कम है, दक्षिणी-पूर्वी जोन (जोन -VI) में अम्लीय भूमि की समस्या सबसे ज्यादा है 

➧ इस क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले तीनों जिलों-सरायकेला, पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम में अम्लीय भूमि का क्षेत्रफल  70% के करीब है इस प्रकार हम कह सकते हैं कि झारखंड प्रदेश में मृदा अम्लीयता प्रमुख समस्याएं है 

➧ अम्लीय भूमि की समस्या का प्रभाव 

➧ गेहूं , मक्का, दलहन एवं तिलहन फसलों की उपज संतोषप्रद नहीं हो पाती है

 मृदा अम्लीयता के कारण एलयूमिनियम, मैगनीज और लोहा अधिक घुलनशील हो जाते हैं और पौधों को अधिक मात्रा में उपलब्ध होने के कारण उत्पादन पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है

➧ अम्लीय भूमि में मुख्यत: फास्फेट, सल्फर, कैल्शियम एवं बोरॉन की कमी होती है

 अम्लीय भूमि में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण और कार्बनिक पदार्थों का विघटन नहीं होता है इसके अलावा सूक्ष्म जीवों की संख्या एवं कार्यकुशलता में कमी आ जाती है

 झारखंड में पोषक तत्वों का वितरण और विवरण

➧ झारखंड में मुख्य पोषक तत्वों में फास्फोरस एवं सल्फर की कमी पाई जाती है कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 66 % भाग में फास्फोरस एवं 38% भाग में सल्फर की कमी पाई गई है

 पोटेशियम की स्थिति कुल भौगोलिक क्षेत्र के 51 प्रतिशत भाग में निम्न से मध्य है

➧ नाइट्रोजन की स्तिथि 70% भाग में निम्न से मध्यम पाई जाती है, जबकि कार्बन 47% भाग में मध्यम स्थिति में पाई जाती है

 फास्फोरस की कमी होने के नुकसान 

(i) फास्फोरस की कमी दलहनी और तिलहनी फसलों की उपज को प्रभावित करती है

(ii) फसल विलंब से पकते हैं और बीजों या फलों के विकास में कमी आती है

 उपाय

(i) जहां फास्फोरस की कमी हो, मिट्टी जांच प्रतिवेदन के आधार पर सिंगल सुपर फास्फेट (SPP) या डी. ए. पी. का प्रयोग करना चाहिए

(ii) लाल एवं लैटीरिटिक मिट्टीयों  में जिसका पी.एच.(PH) मान 5.5 से कम हो, रॉक फास्फेट का उपयोग काफी लाभदायक होता है 

➧ सल्फर की कमी से होने वाले नुकसान 

(i) कीट-व्याधि का प्रभाव बढ़ता है, जिससे फसलों की उत्पादकता घटती है इतना ही नहीं फसल पूरी तरह से बर्बाद हो जाते है

 उपाय

(i) जिन जिलों में सल्फर की कमी ज्यादा पाई गई है, वहां एल. एस. पी. का प्रयोग कर इसकी कमी को पूरा किया जा सकता है

(ii) इसके अलावा फास्फोरस, जिप्सम का प्रयोग भी सल्फर की कमी को दूर करने में लाभदायक है क्योंकि दलहनी एवं तिलहनी फसलों में सल्फर युक्त खाद का प्रयोग लाभदायी होता है 

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Jharkhand me Jal Pradushan Ke Karan Aur Prabhav (झारखंड में जल प्रदूषण के कारण और प्रभाव)

झारखंड में जल प्रदूषण के कारण और प्रभाव

➧ जल में घुलनशील अथवा अघुलनशील पदार्थों की मात्रा में वृद्धि के कारण जब जल की गुणवत्ता जैसे रंग, स्वाद आदि में परिवर्तन आता है, तो पृथ्वी पर पानी का प्रदूषित होना जल प्रदूषण कहलाता है

 जल प्रदूषण में जीवाणु, रसायन और कण  जैसे प्रदूषकों द्वारा जल का संदूषण किया जाता है, जो पानी की शुद्धता को कम करता है

झारखंड में जल प्रदूषण के कारण और प्रभाव

➧ जल प्रदूषण के कारण 

(i) मानव मल का नदियों, नहरों आदि में विसर्जन

(ii) सफाई तथा सीवर (मल-जल निकास पाइप) का उचित प्रबंधन का न होना

(iii) विभिन्न औद्योगिक इकाइयों द्वारा अपने कचरे तथा गंदे पानी का नदियों तथा नहरों में विसर्जन करना 

(iv) कृषि कार्यों में उपयोग होने वाले जहरीले रसायनों और खादों का पानी में घुलना

(v) नदियों में कूड़े-कचरे, मानव-शवों और पारंपरिक प्रथाओं का पालन करते हुए उपयोग में आने वाले प्रत्येक घरेलु सामग्री का समीप के जल स्रोत में विसर्जन

(vi) गंदे नालों, सीवरों के पानी का नदियों में छोड़ा जाना

(v) कच्चा पेट्रोल, कुओं से निकालते समय समुद्र में मिल जाता है, जिससे जल प्रदूषित होता है 

(vi) कुछ कीटनाशक पदार्थ जैसे डीडीटी, बीएचसी आदि के छिड़काव से जल प्रदूषित हो जाता है तथा समुद्री जानवरों एवं मछलियों आदि को हानि पहुंचाता है  अंततः खाद्य श्रृंखला को प्रभावित करते हैं 

 जल प्रदूषण के प्रभाव

(i) इससे मनुष्य,पशु तथा पक्षियों के स्वास्थ्य को खतरा उत्पन्न होता है इससे टाइफाइड, पीलिया, हैजा, गैस्ट्रिक आदि बीमारियां पैदा होती हैं। 

(ii) इससे विभिन्न जीव तथा वनस्पति प्रजातियों को नुकसान पहुंचाता है

(iii) इससे पीने के पानी की कमी बढ़ती है, क्योंकि नदियों, नहरों यहां तक की जमीन के भीतर का पानी भी प्रदूषित हो जाता है

(iv) सूक्ष्म-जीव जल में घुले हुए ऑक्सीजन के एक बड़े भाग को अपने उपयोग के लिए अवशोषित कर लेते हैं जब जल में जैविक द्रव बहुत अधिक होते हैं तब जल में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, जिसके कारण जल में रहने वाले जीव-जंतुओ की मृत्यु हो जाती है

(v) प्रदूषित जल से खेतों में सिंचाई करने पर प्रदूषक तत्व पौधे में प्रवेश कर जाते हैं इन पौधों  अथवा इन के फलों को खाने से अनेक भयंकर बीमारियां उत्पन्न हो जाती हैं

(vi) मनुष्य द्वारा पृथ्वी का कूड़ा-कचरा समुद्र में डाला जा रहा है नदियाँ  भी अपना प्रदूषित जल समुद्र में मिलाकर उसे लगातार प्रदूषित कर रही है वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है, कि यदि भू-मध्य सागर में कूड़ा-कचरा समुद्र में डालना बंद न किया गया तो डॉल्फिन और टूना जैसे सुंदर मछलियों का यह सागर भी कब्रगाह बन जाएगा 

(vii) औद्योयोगिक प्रक्रियाओं से उत्पन्न रासायनिक पदार्थ प्रायः क्लोरीन, अमोनिया, हाइड्रोजन सल्फाइड, जस्ता निकिल एवं पारा आदि विषैले पदार्थों से युक्त होते हैं 

(viii) यदि जल पीने के माध्यम से अथवा इस जल में पलने वाली मछलियों को खाने के माध्यम से शरीर में पहुंच जाए तो गंभीर बीमारियों का कारण बन जाता है, जिसमें अंधापन, शरीर के अंगो का लकवा मार जाना और श्वसन क्रिया आदि का विकार शामिल है जब यह जल, कपड़ा धोने अथवा नहाने के लिए नियमित प्रयोग में लाया जाता है, तो त्वचा रोग उत्पन्न हो जाता है  

 झारखंड में जल प्रदूषण का प्रभाव 

➧ राज्य में जल प्रदूषण का खतरा दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है, क्योंकि औद्योगिक उत्पादन की उच्च क्षमता प्राप्त करना और जनसंख्या का संकेंद्रण विशिष्ट संसाधन प्राप्त क्षेत्रों में होना निरंतर बढ़ जा रहा है 

 झारखंड को मुख्यतः सतही जल प्रदूषण एवं भौम जल प्रदूषण दोनों ही रूप में जल प्रदूषण का सामना करना पड़ रहा है। चूकिं भौम  जल स्तर में प्रदूषण का मुख्य कारण खनन का अवैज्ञानिक तरीका है, इसका विशेष उदाहरण धनबाद का झरिया क्षेत्र  एवं स्वयं धनबाद शहर आदि हैं। 

➧ वहीं औद्योगिक निस्तारण ने दामोदर को राज्य की सबसे अधिक प्रदूषित नदी होने का दर्जा प्रदान किया है

➧ स्वर्णरेखा नदी भी जल प्रदूषण के चपेट में है, जबकि राज्य में कई नदियों को शहरी विकास ने अपने में समा लिया, जिससे पारितंत्र को नुकसान पहुंचा है। उदाहरण के लिए राँची का हरमू नदी, जो कभी मध्यम आकार की नदी थी, परंतु वर्तमान में यह शहरी बड़ी नालों में बदल चुकी है। 

➧ राज्य में पाट क्षेत्र  एवं रांची हजारीबाग पठार के किनारों के सहारे कई जल प्रपातों का निर्माण होता है, जो पर्यटन का मुख्य केंद्र है, परंतु पर्यटकों के द्वारा इन जलप्रपातों के आस-पास सिंगल यूज प्लास्टिक का प्रयोग करना, इन जल प्रपातों की आयु पर प्रश्न खड़ा कर सकता है अतः इस पर अवसंरचनात्मक रूप से कार्य करने की जरूरत है। 

➧ राज्य की नदियों में प्रदूषण की स्थिति

झारखण्ड में दामोदर नदी का प्रदुषण

 ➧ इस नदी के किनारे लगभग सभी प्रकार के प्रदूषण पैदा करने वाले उद्योग अवस्थित है। लगभग 130Mn लीटर औद्योगिक अपशिष्ट और 65 मिलियन लीटर अनुपचारित घरेलु मल-जल प्रतिदिन दामोदर नदी को प्रदूषित कर रही है। 

➧ दामोदर और उसकी सहायक नदियों में वर्तमान में बड़े पैमाने पर कचरों का जमाव किया जा रहा है, जो वर्षा के दिनों में फैलकर नदियों में आ जाता है। 

➧ फल स्वरुप नदियों का जल एवं भौम जल स्तर दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिस कारण निकटवर्ती गांवों व कस्बों पर जल संकट की समस्या सामने आ रही है। क्योंकि नलकूप एवं कुआँ के जल प्रदूषित होकर सूख जाते हैं। 

➧ दामोदर घाटी के कोयला में थोड़ी मात्रा में सल्फर एवं पायराइट की भी विद्यमान है। 

➧ दामोदर में लोहे की मात्रा में 1 से 6mg/1 है। यद्यपि यह बहुत अधिक नहीं है, किंतु परितंत्र  के लिए इनकी यह मात्रा पर मात्रा भी खतरनाक साबित होती है, क्योंकि जलीय जीव इससे समाप्त होते हैं एवं स्व नियमन की घटना में परिवर्तन आता है।  

➧ दामोदर नदी में मैग्नीज, क्रोमियम, शीशा, पारा, फ्लूराइट कैडमियम और तांबा आदि की मात्रा भी पाई जाती है, जो मुख्यतः इनकी सहायक नदियों की अवसादो के द्वारा लाई जाती है। 

➧ इन छोटे कणों के द्वारा मनुष्यों में कई बीमारियों को जन्म दिया जाता है, जिसमें कमजोरी, एनोरेक्सिया, दिल्पेप्सिया, मुंह में धातु का स्वाद, सर दर्द , हाई ब्लड प्रेशर और एनेमिया आदि मुख्य हैं। 

➧ दामोदर की अवसादो में कैल्शियम और मैग्नीशियम की कमी तथा पोटेशियम का संकेंद्रण है इन अवसादों में आर्सेनिक, पारा, शीशा, क्रोमियम, तांबा, जिंक, मैगनीज़, लोहा और टिटैनियम जैसे धातु भी मिलते हैं।  

झारखंड के दामोदर नदी के आस-पास रहने वाले लोग दामोदर का प्रदूषण से काफी प्रभावित है, दामोदर एवं इसकी सहायक नदियों के जल में प्रदूषण की मात्रा उच्च होने के कारण पेयजल के रूप में इन नदियों का प्रयोग लगभग समाप्त हो गया है।  

➧ स्वर्णरेखा नदी का प्रदूषण 

➧ स्वर्णरेखा नदी रांची नगर से 16 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में नगड़ी गांव (रानी चुवा)  नामक स्थान से निकलती है

➧ यह लगभग 28,928 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अपना बेसिन बनाती है इस नदी के किनारे भारत की सबसे बड़ी औद्योगिक कंपनी टाटा इस्पात निगम लिमिटेड (टिस्को) बसा हुआ है 

➧ सर्वेक्षण में पाया गया कि नगड़ी से लेकर गालूडीह तक है यह नदी पांच स्थानों पर काफी प्रदूषित हो गई है, इसका कारण यह है:- 

क्षेत्र                                           प्रदूषण

(i) नगरी से हरीमा डैम                    दर्जनों चावल मिल

(ii) हरीमा डैम से गेतलसूद डैम       फैक्ट्री, रांची नगर की नालियाँ 

(iii) गेतलसूद डैम से चांडिल डैम     मुरी एल्युमीनियम कारखाना

(iv) चांडिल डैम से गालूडीह बराज   शहरी कचरा, उद्योग 

(v) गालूडीह बराज से आगे तक       शहरी कचरा, उद्योग

➧ स्वर्णरेखा नदी रांची से जमशेदपुर तक पहुंचते-पहुंचते लगभग सूख जाती है जमशेदपुर शहर में मानगो पुल से नदी जल के गुजरने के दौरान बदबू साफ महसूस किया जाता है, क्योंकि यहां जल के सड़ने की क्रिया प्रारंभ हो चुकी है 

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Wednesday, October 27, 2021

Jharkhand me Pradusan Ke Karan Ewam Parinam (झारखंड में प्रदूषण के कारण एवं परिणाम)

झारखंड में प्रदूषण के कारण एवं परिणाम

➧ ऐसे हानिकारक पदार्थ है जो वायु, भूमि और पानी में पाए जाते हैं, जिनके कारण जीवित प्राणियों और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, प्रदूषण कहलाता है

➧ प्रदूषण हानिकारक गैसों, द्रवों तथा अन्य खतरनाक पदार्थों के द्वारा उत्पन्न होता है, जो प्राकृतिक वातावरण में भी पाया जा सकता है। 

➧ प्रदूषण के कारण कुछ ऐसे विषाक्त पदार्थ भी उत्पन्न होते हैं, जिनके कारण मिट्टी और हवा अशुद्ध, प्रदूषक, दूषित या खतरनाक पदार्थ के रूप में तब्दील हो जाते हैं, जो पर्यावरण को अनुपयुक्त या असुरक्षित कर देते हैं

➧ प्रदुषण के प्रकार 

(I) वायु प्रदूषण

(II) जल प्रदूषण 

(III) भूमि प्रदूषण 

(IV) ध्वनि प्रदूषण

झारखंड में प्रदूषण के कारण एवं परिणाम

➧ झारखंड में वायु प्रदूषण के कारण एवं प्रभाव

➧ यह हानिकारक धुआँ एवं रसायनों जैसे विभिन्न प्रदूषकों के साथ मिलकर प्राकृतिक हवा का संदूषण है इस प्रकार का संदूषण पदार्थों के जलने से या वाहनों द्वारा उत्सर्जित गैसों या उद्योगों के उप-उत्पाद के रूप में निकलने वाले हानिकारक धुआँ के कारण हो सकते हैं

 विशेषज्ञों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग को वायु प्रदूषण के सबसे बड़े दुष्प्रभावों में से एक माना जाता है

 वायु प्रदूषण के कारण 

(I) वाहनों से निकलने वाला धुआं

(II) औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला धुआं तथा रसायन 

(III) आण्विक संयंत्रों से निकलने वाली गैसें तथा धूल-कण 

(IV) जंगलों में पेड़ पौधे के जलने से, कोयले के जलने से तथा तेल शोधन कारखानों आदि से निकलने वाला धुआं

(V) ज्वालामुखी विस्फोट से उत्पन्न गैस जैसे-जलवाष्प, So2

➧ वायु प्रदूषण के प्रभाव 

➧ वायु प्रदूषण हमारे वातावरण तथा हमारे ऊपर अनेक प्रभाव डालते हैं। उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :-

(i) हवा में अवांछित गैसों की उपस्थिति से मनुष्य, पशुओं तथा पक्षियों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है 

➧ इसमें दमा, सर्दी-खांसी, अंधापन, श्रव का कमजोर होना, त्वचा रोग जैसी बीमारियां पैदा होती हैं  

➧ लंबे समय के बाद जननिक विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती है तथा अपनी चरम सीमा पर यह घातक भी हो सकती है  

(ii) वायु प्रदूषण से सर्दियों में कोहरा छाया रहता है, इससे प्राकृतिक दृश्यता में कमी आती है तथा आंखों में जलन होती है। 

(iii) ओजोन परत, हमारी पृथ्वी के चारों ओर एक सुरक्षात्मक गैस की परत है, जो हमें सूर्य से आने वाले हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाती है। वह प्रदूषण के कारण जीन अपरिवर्तन, अनुवांशिकीय तथा त्वचा कैंसर के खतरे बढ़ जाते हैं। 

(iv) वायु प्रदूषण के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ता है, क्योंकि सूर्य से आने वाले गर्मी के कारण पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन तथा नाइट्रस ऑक्साइड का प्रभाव कम नहीं होता है , जो कि हानिकारक है। 

➧ झारखंड में वायु प्रदूषण के प्रभाव 

➧ झारखंड में खनिजों के उत्खनन का अवैज्ञानिक स्वरूप, बढ़ता शहरीकरण एवं निजी परिवहन का प्रयोग आदि विषय वस्तु प्रदूषण के मुख्य कारण है। 

 हाल ही में ग्रीनपीस रिपोर्ट के सर्वे में देश में सबसे अधिक वायु प्रदूषक शहर के रूप में झरिया को शीर्ष स्थान प्राप्त हुआ है, जो झारखंड में प्रदूषण के बढ़ते मात्रा को लेकर सजग होने का संकेत देता है।  

➧ बड़े शहरों में धनबाद ,रांची, बोकारो और रामगढ़ जैसे शहर वायु प्रदूषण के उच्च प्रभाव से ग्रसित है। शिकागो विश्वविद्यालय, अमेरिका की शोध संस्थान 'एपिक' द्वारा तैयार वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक के नए विश्लेषण के अनुसार वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति के कारण झारखंड के नागरिकों की जीवन प्रत्याशा में औसत 4.4 वर्ष कम हो रही है

 देशों में मेट्रो शहरों की तरह झारखंड की वायु भी जहरीली होती जा रही है एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स के अनुसार रांची, गोड्डा और कोडरमा के लोग अपनी औसत जीवन के लगभग 5 वर्ष अधिक जी सकते है, अगर वायु की गुणवत्ता विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O) डब्ल्यू.एच.ओ. के दिशा निर्देशों के अनुरूप हो 

➧ राजधानी रांची समेत झारखंड के अन्य जिले और शहर के लोगों का जीवन काल भी घट रहा है  वे बीमार जीवन जी रहे हैं  गोड्डा के लोगों का जीवनकाल 5 वर्ष तक घट गया है  

➧ इसी तरह कोडरमा, साहेबगंज, बोकारो, पलामू और धनबाद भी इसी सूची में पीछे नहीं है। यहां के लोगों के जीवन काल क्रमश:  4 पॉइंट 9 वर्ष, 4.8 वर्ष, 4.8 वर्ष, 4.7 वर्ष और 4.7 वर्ष तक घट गया है। यहां के लोगों का जीवनकाल इतना ही बढ़ जाता, अगर लोग स्वच्छ और सुरक्षित हवा से सांस लेते।

 उनकी जीवन प्रत्याशा की उम्र बढ़ सकती है, अगर वहां के वायुमंडल में मौजूद सूक्ष्म तत्वों  एवं धूलकणों की सघनता 10 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक सीमित हो, एक्यूएलआई के आंकड़े के अनुसार राजधानी रांची के लोग 4.1 ज्यादा जी सकते हैं अगर विश्व स्वास्थ संगठन के मानकों को हासिल कर लिया जाए

 झारखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (जेएसपीसीबी) ने दिवाली की रात बिरसा चौक पर वायु प्रदूषण की जांच कराई

 दीपावली के दिन वायु में pm10 (सूक्ष्म धूलकण) की औसत मात्रा मानक से 175 पॉइंट 96 प्रतिशत अधिक पहुंच गयी 

 इस स्तर पर सांस, फेफड़े, एलर्जी रोगियों की परेशानी बढ़ने लगती है । दूसरी ओर पीएम 2.5 (अति सूक्ष्म धूलकण)  भी निर्धारित सीमा से 95.08% अधिक तक रिकॉर्ड किया गया

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Saturday, September 11, 2021

Hot Spring of Jharkhand- JPSC/ JSSC/ PSC

Hot Spring of Jharkhand

Many hot water bodies are found in Jharkhand. Where there is an intersection of the groundwater level and the surface, the water of the earth starts coming out, which is called 'hot springs'.

  • Charakkhudra: 10 km from Tundi on Dhanbad-Giridih Road
  • Tetulia: Dhanbad
  • Kava: Hazaribagh 
  • Tatapani: Latehar
  • Dauri: Chatra
  • Jahripani: Dumka
Hot Spring of Jharkhand
  • Tapatpani: On the banks of More river near Kumrabad in Dumka
  • Nunbil: Near Kenalguta Dumka
  • Baramasia: Pakur
  • Ranibahal: On the banks of More river in Ranibahal on Dumka-Suri road
  • Jhumka: On the banks of More river near Ranibahal
  • Shivpur Sota: Pakur
  • Ladla Udah: Pakur.

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British Law in India before 1857 - JPSC/ JSSC/ PSC

British Law in India before 1857

After the victory in the Battle of Plassey (1757), the Company made the imperialist expansion and consolidation of the Company in India by two-pronged methods;

  • Policy of amalgamation through diplomatic and administrative machinery.

Under the first policy, the company defeated big Indian powers like Bengal, Mysore, Maratha, and Sikh one by one and subjugated their empire. But to subjugate other princely states and princely states, he adopted three major diplomatic and administrative policies-

British Law in India before 1857

  • Warren Hasting's Ring Fence Policy
  • Wellesley Subsidiary Treaty
  • Dalhousie's Lapse Principle.

Policy of Ring Fence: The purpose of this policy was to protect the company's borders by creating a buffer zone. In these policies, the states included within the 'ring fence' were assured of military assistance against external aggregation, at their own expense.

Subsidiary Alliance: It was a type of friendship treaty Lord Wellesley used during 1798-1805 to establish relations with the native states. According to the rulers of this treaty, the company will decide the foreign relations of the Indian kings. The big states would keep the British army in their state at their own expense. Those states would have to have an English resident in their court. The company will protect the state from external enemies but will not interfere in the internal affairs of the state.

With this treaty, the independence of Indian states ended, the economic burden increased and they became dependent on the mercy of the British. But, the British benefited immensely from this.

Principle of Lapse: It is also called the 'Policy of Peaceful Merger'. It was used by Lord Dalhousie, who was the Governor-General of India from 1848-1856 AD. Dalhousie believed that the problems of the subjects increased due to the old system of administration by false princely states and artificial intermediary powers. Therefore, to remove the problems of the public, these princely and intermediary powers should be under the company. Based on this arbitrary logic, he annexed the following states in their Company;

This policy of Dalhousie caused intense discontent among the Indian princely states, which became a major cause of the Revolt of 1857.

In this way, the Company, due to its power, diplomacy, and efficiency of administrative machinery, subjugated most of the Indian territory and established the supremacy of the Company.

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Thursday, September 9, 2021

Major Forts/ Historical Places of Jharkhand- JPSC/ JSSC/ PSC

Major Forts/Historical Places of Jharkhand

1. Palamu Fort, near Betla National Park: This fort is 5 km from Betla National Park in the Latehar district. It is situated on the distant Auranga River. It was built by the Cherovanshi rulers in their capital city Palamu. There are two (2) forts here- the old fort and the new fort. These two forts are jointly known as Palamu Fort. These two forts were considered impregnable in their time. There is no difference of many days between the construction of the old and new fort. 

  • Old Fort- it was built by the Cherovanshi ruler Pratap Rai (a contemporary of Mughal emperor Shah Jahan). 
  • New Fort- it was built by the  Cherovanshi ruler Medini Rai, 1658-74 AD (a contemporary of the Mughal emperor Aurangzeb).

The 'Nagpuri Darwaza' (Nagpuri Gate) of the new fort is visible due to its attractive architectural style. The height of the doo is 40 feet (12 m) and the width is 15 feet (4.5 m). The remains of 4 two-storeyed palaces, several temples, and one mosque have three domes and were built in 1661 AD by Dawood Khan, the then Mughal Subedar of Bihar, after the Palamu conquest.

Major Forts Historical Places of Jharkhand- JPSC JSSC PSC

2. Narayanpur Fort, Nawagarh (Latehar)This fort is 8 km from Latehar in the Latehar district located in far south Nawagarh. It was built by Jaj Das, the accountant of Cherovanshi ruler Bhagwat Rai.

3. Shahpur Chandani, Medininagar (Palamu)Actually, this is the name of a fort. It is situated in the Palamu district from Daltonganj to the west south bank of the Koel River. This fort was built by the Cherovanshi ruler Gopal Rai in 1772 AD.

4. Bishrampur Fort, Bishrampur (Palamu): This fort is built by the Cherovanshi ruler of Bishrampur. There is a temple near the fort. It took about 9 years to build the fort and the temple.

5. Chainpur Palace (Palamu): This palace is situated on the banks of the Koel river in Medininagar (former name-Daltonganj), the headquarter of the Palamu district. This palace was built by the descendants of the Rajput Diwan Pooranamal of the Chero king. 

6. Rohila Fort, Alinagar (Palamu): This fort is 10 km from Japla in Palamu district located away in Alinagar. Since this fort was built by Rohila Sardar Muzaffar Khan, hence it is known as 'Fort of Rohillas'. This fort is triangular in shape.

7. Kunda Fort, Kunda (Chatra): This fort is situated in Kunda of Chatra district. It was built by the Cherovanshi royal family.

8. Raj Bhavan of Nagfeni, Nagfenigaon (Gumla): This Raj Bhawan is located in Nagfeni village of Sisai police station in Gumla district. The construction of this Raj Bhawan started around 1704 AD but could not be completed. A king was building a palace here, but he died before the palace could be built. Although a picture of the king, his seven queens, and a dog is found on a stone here, the identity of this king has not yet been identified. A historian has described Nagfeni as the 'City of Serpants'.

9. Navratnaragh/ Doisagarh, Nagargram (Gumla): This palace is situated near Nagargram in the Gumla district. This palace was built by Nagvanshi king Durjanshal when his capital was Doisa. Based on historical evidence (like Ranchi, Gazetteer, etc.), this palace was originally five-storeyed, and each floor had 9 rooms. Now only 3 floors are left. Although there is a public opinion that this palace was 9 storeyed, out of which 6 floors got submerged in the ground. The center of special attraction of this palace is its 'treasury house'. The entire palace is surrounded by jagged walls in the Kangura style.

10. Tilma Fort, Tilma village (Khunti): This fort is located in the Tilma village of Karra block of Khunti district. This fort was built in 1737 AD by a Nagavanshi Thakur (feudal) named Akbar to attain salvation.

11. The Palace of Palkot, Palkot (Gumla): This palace is located in Palkot of Gumla district. Nagavanshi ruler Yadunath Shah (1715-24 AD) made Palkot his capital in place of Doisa and built many buildings here. One of these palaces remains the palace of Palkot and the rest has turned into ruins. This palace is considered important from an architectural point of view.

12. Ratu Palace, Ratu (Ranchi): This palace was built by Nagvanshi Maharaj Udai Pratap Nath Shahdeo in 1900. The Nagvanshi ruler shifted his capital from Palkot to Ranchi in 1870. The vastness of this palace is visible.

13. Kesnagarh Fort, Kesnagarh (West Singhbhum): This fort is situated at Kesnagarh, south-east of Chaibasa in Singhbhum district.

14. Jagannathpur Fort, Jagannathpur (West Singhbhum): This fort is 38 km from Chaibasa in West Singhbhum. It was built by Porhat king Jagannath Singh.

15. Jaintgarh Fort, Jaintgarh (West Singhbhum): This fort is 55 km from Chaibasa in West Singhbhum. It is situated in Jaintgarh on the bank of the Dakshin Vaitarni river. It was built by Porhat king Kala Arjun Singh.

16. Rajwadi of Chakradharpur, Chakradharpur (West Singhbhum): This Rajwadi is located in Chakradharpur of West Singhbhum. It was built by Narpati Singh (son of Raja Arjun Singh) during 1910-20 AD. This Rajwadi is built of bricks. The Rangmahal of this palace with a structure of three floors is famous for its beauty. Later it was sold by Shashank Manjari, daughter of Raja Narpati Singh.

17. Teliagarh Rajmahal Hill (Sahebganj): This history-famous fort is situated on Rajmahal hill, Sahebganj. It was called 'the entrance of Bengal'. The Sur ruler Sher Shah defeated the Sultan of Bengal Ghiyasuddin Mahmud here in 1535 AD. Now, this fort has become a ruin and only one wall is left on it.

18. Panchkot Fort, Panchet Pahar (Dhanbad): This fort is situated at a distance of 16 km from Barakar in the Dhanbad district. It is situated on the south-eastern slope of the distant Panchet mountain. It was built by Govanshi Naresh Gomukhi of Panchet. Due to being surrounded by five Kotas (walls), this fort was named 'Panchkot'.

19. Jharigarh Palace, Jharia (Dhanbad): This palace is located in the Dhanbad district. It was built by the Jharia king in his capital Jhariagarh. Jharia king has also built some palaces in his headquarters, Katrasgarh, whose remains are found.

20. Ramgarh Fort (Ramgarh): This fort is located in Ramgarh of Ramgarh district. It was built by Ramgarh Naresh Sabal Rai. The architecture of this fort is influenced by the Mughal style.

21. Badam Fort (Hazaribagh): This fort is 32 km from Hazaribagh town in Hazaribagh district. Nestled in the southwest is located in Badam. It was built by Ramgarh Naresh Hemant Singh in 1642 AD. Hemant Singh has also built a Shiva temple here.

22. Padma's Fort, Padma (Hazaribagh): This fort is situated on the banks of the National Highway (NH-33) in Hazaribagh district at a place called the Padma. It was built by the Maharaja of Padma. Currently, this fort has been made a Police Training Center by the State Government.

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Tuesday, September 7, 2021

Gandhi Era and Jharkhand: Jharkhand History- JPSC/ JSSC/ PSC

Gandhi Era and Jharkhand

With the Champaran (Bihar) Satyagraha in the year 1917, Mahatma Gandhi took an active step in Indian politics and was completely dominated by it till 1947. That is why it is called the 'Gandhi Era'. 

Abul Kalam Azad was under house arrest in Ranchi: [31 March 1916 - 31 December 1919]

The British government had ordered the detention of Maulana Abul Kalam Azad in connection with the Home Rule Movement. To comply with the government order, when Maulana Azad reached Ranchi from Calcutta in April 1916, there was a crowd of visitors at the station. He was taken to the Dak Bungalow by Phaeton. After 10 days they started living in Morabadi. From there he used to go to the Jama Masjid in Upper Bazar to offer Namaz. A few days later, Maulana Azad moved from Morabadi to a rented house near Jama Masjid. People wore black badges at the behest of Maulana Azad to protest against the official celebration of Turkey's defeat in World War I (1914-18). On July 8, 1916, he was alerted and asked to attend the police station daily. In this sequence, he tried to break the wall of untouchability in Ranchi. Maulana Azad laid the foundation of Anjuman Islamia, Ranchi and Madarsa Islamia, Ranchi in August, 1917. By selling the press, he also invested his money in the madrasa.

The government ordered Maulana Azad to go to Morabadi again and the restrictions on him were increased. Still, people like Ghazanfar Mirza, Mohammad Ali, Dr. Purna Chandra Mitra, Devaki Nandan Prasad, Gulab Tiwari, and Nagarmal Modi continued to closely resemble him. But when Gandhiji came to Patna and sought permission to meet Maulana Azad, who was under house arrest in Ranchi, the government did not allow him to meet. Maulana Azad was released on completion of his period of detention. On January 3, 1920, Maulana Azad left Ranchi for Calcutta.

Gandhi Era and Jharkhand: Jharkhand History- JPSC/ JSSC/ PSC

Mahatma Gandhi's stay in Ranchi: [3-6 June, 5-11 July, 22 September-4 October 1917]

Shyam Krishna Sahai was in London in the year 1917. There he invited Gandhiji to come to Ranchi. Gandhiji came to Ranchi for the first time in June 1917. He had reached Ranchi from Motihari in Bihar in connection with Champaran Satyagraha. After coming here, he stayed with Shyam Krishna Sahay. Along with it was Braj Kishore Babu. He met the Lieutenant Governor of Bihar, Edward Albert Gate, at the Raj Bhawan in Ranchi. The outline of the Champaran movement was prepared by staying in Ranchi. After several meetings, Gandhiji signed his report on October 3, 1917, challenging the government. On October 4, 1917, left Ranchi for Champaran. In this way, the people of Jharkhand had long-term contact with Gandhiji. He was accompanied by his wife Kasturba Gandhi, and son Devdas Gandhi. The people of Jharkhand were highly impressed by Gandhiji's simplicity and his principles and agreed to participate in the Indian independence movement.

Anti-Rowlett Act Satyagraha: [1919 AD]

The Rowlett Act was passed on March 21, 1919, based on the report of the Sedition Committee headed by Justice Sidney Rowlett to curb seditious activities in India. This was called the 'Black Law'. Since there was no trial against this law, it was said 'no appeal, no lawyer, no plea'. Countryside strikes and public meetings were organized against this law. 

As far as Jharkhand is concerned, the wave of anti-Rowlett Act Satyagraha spread in Jharkhand too. In Ranchi, it was led by Bareshwar Sahai and Gulab Tiwari. Ramdin Pandey, the teacher of the Zila School in Palamu, observed a fast on April 6,1919, along with his six students. In Jamshedpur and Chaibasa also some people celebrated protest day. Due to the widespread violence, Mahatma Gandhi suspended the anti-Rowlett Act Satyagraha on April 18, 1919. Thus ended this Satyagraha.

Establishment of District Congress Committees: [1919-20 AD]

Gradually the campaign of Congress increased in Jharkhand and Congress committees started being established in the districts. In the year 1919, Bindeshwari Pathak and Bhagwat Pandey established the Palamu District Congress Committee. District Congress Committee was established in Ranchi and Hazaribagh in 1920 AD.

Calcutta Session of Congress (Special Session): [September 1920]

In September 1920, the special session of the All India National Congress (AINC) was held in Calcutta. It was presided over by Lala Lajpat Rai. Mahatma Gandhi emerged as the leader of the nation from this convention. The representatives of Jharkhand who came to participate in the convention urged Mahatma Gandhi to declare Jharkhand as an independent. To this Mahatma Gandhi replied with one line- 'Sow cotton, spin the spinning wheel, Chotanagpur will be free'. In the Calcutta session itself, the epoch-making and important non-cooperation resolution was passed for the first time, which was confirmed in the Nagpur session of the Congress annual session (December 1920 AD).

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Monday, September 6, 2021

Mughal Era Jharkhand: Jharkhand History- JPSC/ JSSC/ PSC

Mughal Era Jharkhand: Jharkhand History

Mughal Era Jharkhand

Mughal Administrator: The number of small and big states in Jharkhand increased further during the Mughal period. The biggest change was that after defeating the Raxales, the Chero established a new kingdom in Palamu. Yet Jharkhand was spared from Muslim encroachment. Ultimately, Sher Khan paved the way for the entry of Muslims into it. Sher Shah had got the right over Rohtasgarh in 1538 AD. But when he lived in a military campaign or was in trouble, the Chero people would come out of the jungles of Jharkhand to persecute the peasants and plunder with travelers on the way to Bengal, or sometimes even in the army camps of Sher Shah screaming. Therefore, Sher Shah needed to suppress them. In the course of Sher Shah's struggle with the Mughals, this area was his shelter. So he was understanding the importance of this area.

Babur-Humayun Era Jharkhand:

During the reign of Mughal emperors Babur (1526-30 AD) and Humayun (1530-40 AD), Jharkhand was out of their sphere of influence, so the regional kings of Jharkhand continued to rule without any external interference. Since Babur had established the Mughal dynasty by overthrowing the Afghans while living in Bihar-Bengal were trying to gather power again and compete with the Mughals. Thus during the reign of Babur and Humayun, Jharkhand became a haven for the anti-Mughal Afghans. Humayun had entered Bhurkunda (Hazaribagh) on one occasion during the Mughal-Afghan conflict. Humayun's greatest enemy Sher Shah used this area several times in the Mughal-Afghan conflict (1530-40 AD).

Akbar's reign:

In the year 303 (1585 AD) of the reign of the Mughal Emperor Akbar, the first military conflict of the Mughals with Jharkhand started. The only thing that happened in the preceding 45 years was that under pressure from the Mughals, the Afghan rebels would take shelter in the forests here and reach Jharkhand in pursuit of the Mughals. During the reign of Akbar, there were three (3) major ruling dynasties in Jharkhand:

During Akbar's time, the Mughal paid attention to this region for political, strategic, and economic reasons. With the possession of this area, the problem of elephants was removed for the Mughal army. Probably diamonds were also obtained from the Sankh river in this region. In 1585 AD, the Mughal army invaded this region. At this time the king of Kokrah was Madhukaran Shah. It seems that he was also taken captive and presented in the royal court, where because of his humble nature, the emperor again sent him to Kokrah. Thus by end of the 16th century, the neutrality of Kokrah had been broken and the region had come under the control of Mughals and had to pay annual taxes to them. The biggest thing was that the king here had become a trusted subordinate of the Mughals, as is evident from the help given by him to the Mughals during the Orissa campaign. Like Kokrah, the Singh dynasty kings of Singhbhum also became accomplices of the Mughals. By 1589 AD, under the leadership of Man Singh, Chero was also defeated and made a part of the empire. 


Mughal Era Jharkhand

Jahangir's reign:

During the reign of Jahangir, a completely new era began in the history of Mughal-Jharkhand relations. Especially in the context of Mughal-Nagvanshi and Mughal-Chero. Jahangir was also aware of the subject of diamonds found in Jharkhand. He has mentioned this in his autobiography Tajuk-e-Jahangir

During the time of Jahangir, the rule of Kokrah was in hands of Durjan Sal. He also stopped paying annual taxes to the Mughal court. Therefore, disciplinary action was necessary against him. In 1615, Ibrahim Khan attacked Kokrah and presented the Durjan Sal as a prisoner to the royal court. From there he was sent to the Gwalior Fort after being sentenced to 12 years of imprisonment. Along with the Durjan Sal, some of his family members and kings were also prisoners. After this victory, Ibrahim Khan presented some diamonds and elephants to the royal court. Jahangir was deeply interested in the diamonds that could be obtained from this region. It is said that once a purple-colored diamond was found in this area. The emperor wanted complete information about the purity of the diamond. He did not know that Durjan Sal is a very good connoisseur of diamonds. This quality of Durjan Sal became the means of liberation from his prisoner life. Durjan Sal, at the behest of the emperor, checked the purity of the diamond and told it to be pure. The emperor was pleased with him and returned him to his kingdom. Permission was given to the wicked that if he had any demand, he could put it before the emperor. He made two (2) demands;

  • Rajagan and his family members who were imprisoned in Gwalior Fort should be freed.

The emperor accepted both the above demands. Durjan Sal also agreed to pay 6,000 annual taxes and the Patta of his kingdom was given to him by the emperor.

In the time of Jahangir, there is a mention of the rule of two Chero kings in Palamu. But they are not mentioned in any Persian source other than the Chero Geneology of Jahangir. At the time of Jahangir, the Bishnupur of Manbhum was occupied by the Mughals. According to Baharistan-e-Gawi, the Subedar Islam Khan of Bengal attacked Veer Hammir, the zamindar of Panchet with the help of Subedar Afzal Khan of Bihar and zamindars under him. Without resistance, he surrendered to the commander of the invading army, Sheikh Kalam. There is a lack of specific information about other states during the period of Jahangir.

Shah Jahan's reign:

By the beginning of the Shah Jahan's reign, the Mughals were fully acquainted with Chotanagpur. They were also now taking a keen interest in the internal matter of this region and were making every effort to establish their dominance over the residents here. Even now the Mughals had a deep connection with only two parts of this region- Kokrah and Palamu. 

In the first phase of Shah Jahan's reign, the ruler of this place was Durjan Sal. Durjan Sal ruled Kokrah for about 13 years after being freed from captivity. On his return here, he made Doisa a more strategically secure place in place of his capital Khukhra and it was decorated with many beautiful buildings. Surrounded by hills on three sides and the South Koel River on one side, the Doisa was often formidable to the enemies. There is a clear influence of Mughal architecture in the construction of the buildings established in Doisa, in which the palace of Durjan Sal, Navratgarh, or Navratnagarh is most important. It was five-storeyed but only three stories remain. After the death of Durjan Sal, Raghunath Shah probably became the ruler, and even during his period, the Mughal Nagvanshi relations remained cordial. By the end of Shah Jahan's reign, the seclusion of Kokrah had come to an end and it was now associated with the life of the people of North India. The Nagvanshi rulers were now adopting cultured administrative and architectural traditions from the border states. In this way, new concepts of power and culture developed in the forest zone.

Although even during the time of Shah Jahan, the reason for the interest of the Mughals in this area was diamond. During the reign of Shah Jahan, the Chero and Mughal relations of Palamu became more visible. In fact from this time of history of Palamu seems orderly and authentic. Probably at this time also the Chero rulers remained under the control of the Mughal rulers for a few days. Pratap Rai was the ruler of Chero during the reign of Shah Jahan. Shah Jahan appointed it a Hazari Mansabdar. The kings of the Singh dynasty of Singhbhum had close contacts with Mughals. It was during Shah Jahan's time that he agreed to pay regular annual taxes to the Mughals. There is a lack of clear information on the relations of Shah Jahan with the Manbhum (present-day Singhbhum, Dhanbad, and Hazaribagh) region.

Aurangzeb's reign:

During the reign of Aurangzeb, Jharkhand was also a victim of his imperialist mentality like other parts of India. During his time he established closer relations with the region. Also, areas like Manbhum and Singhbhum, which were almost untouched till then, were now forced to pay annual taxes. During the reign of Aurangzeb, Raghunath Shah, the Nagvanshi king of Korah, ruled for the most part. He was a man of extreme religious and charitable nature. His religious teacher was Harinath. It is said that on one occasion Raghunath donated his entire kingdom to Harinath. When Guru Harinath refused to accept such a huge donation, Raghunath declared that he was Harinath's slave and he (Raghunath) too the name of Guru. The word 'Nath' was added to his name. All subsequent Nagavanshi kings began to include the words 'Shah' and 'Nath' in their names (the first given by the Mughal emperor Akbar and the second given by Guru Harinath). Raghunath decorated his capital Doisa with many buildings and public utilities and also got many temples built here. Jagannath Temple is the most notable among these temples. Two inscriptions engraved on the wall of this temple show that it was built in 1682 AD during the reign of Raghunath Shah. Raghunath Shah built the 'Madan Mohan Temple' at a place called Boreya. The 'Ram Sita Mandir' was built in Chutiya by Hari Brahmachari. During the reign of Raghunath Shah, it appears from architectural works that the kingdom of Kokrah was internally prosperous. There was only one invasion of the Mughals during his period. Chero (Palamu) ruler Medini Rai attacked Kokrah and plundered the capital. Apart from the property looted from here, there was also a huge stone gate, which was installed by Medini Rai in the 'New Fort' of Palamu, which is still famous as 'Nagpur-Darwaja'

Ram Shah became the ruler after the death of Raghunath Shah. Even at this time, the Mughal-Nagvanshi relations were cordial.

In the year of Aurangzeb's rule, the Chero king of Palamu was Medini Rai. He ruled from 1658 AD to 1674 AD. Perhaps initially he accepted Mughal authority, but he took full advantage of the succession battle of Shah Jahan's sons. The Chero had returned to their traditional anti-Mughal policy and started plundering and attacking the Mughal territories because of their safe haven. In fact, this free-loving caste did not accept even the nominal suzerainty of the Mughals. He not only stopped paying taxes to the Mughals' territories. This was the situation for an imperialist ruler like Aurangzeb. Aurangzeb ordered Dawood Khan, the Subedar of Bihar, to attack Palamu and collect taxes from the Chero king. He also ordered many jagirdars and faujdars of Bihar to help in this campaign of Dawood. As a result, a long military campaign started against the Chero ruler of Palamu on 23 April 1660 which lasted till December 1660. Ultimately the Chero was defeated by Medini Rai fled. The Palamu conquest was an important milestone in Dawood's military life. In this campaign, he displayed tactical skill, quick decision power, and leadership. In this memory of the Palamu victory, Dawood built a mosque in Palamu's Purana Quila in 1662 AD. While returning from there, Dawood Khan took the 'Singh Darwaza' of Palamu Fort with him and got it installed in his fort at Dawoodnagar.

After the Palamu conquest, Mankali Khan was appointed as Faujdar there, which lasted till 1666 AD. After the transfer of Mankali Khan, the administration there came into the hands of the Subedar of Bihar. After being defeated by Dawood, Medini Rai fled to Sarguja and returned to Palamu again after the departure of Mankali Khan and took control of his lost kingdom. Medini Rai has been called the 'Nyasi Raja'. He soon brought Palamu out of poverty and brought him to the pinnacle of prosperity. It seems that keeping in mind the improved condition of Palamu under him, the Mughals allowed Palamu to remain under him. Even today, Palamu people remember Medini Rai's reign as the 'Golden age of Chero rule'. Even after Medini Rai was restored to the throne of Palamu, Aurangzeb did not stop taking interest in this area and here the Mughals remained nominally sovereign.

Aurangzeb does not seem to have had any special influence on the territories included in the present Hazaribagh, Singhbhum, and Manbhum districts. At that time there were five major kingdoms in the Hazaribagh region. During the time of Aurangzeb, Dhanbad and Purulia districts remained largely outside the Mughal influence. These were only two areas in the whole of Chotanagpur, which were completely spared from Muslim invasions. At the time of Aurangzeb sitting on the throne, the Panchet kingdom regularly paid taxes to the Mughals. Porhat of Singhbhum was ruled by his contemporary king Mahipal at the time of Aurangzeb, but there is no evidence of Aurangzeb's sovereignty over it because the geographical position here was such that Singhbhum could never be included in Aurangzeb's empire and Porhat's Singh-king maintained their independence.

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