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Sunday, June 27, 2021

National Agriculture Market e-NAM (राष्ट्रीय कृषि बाजार e-NAM)

National Agriculture Market (e-NAM)

➧ 14 अप्रैल, 2016 ईस्वी को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नई दिल्ली के विज्ञान भवन से एक राष्ट्रीय कृषि बाजार हेतु ई-व्यापार प्लेटफार्म (e-NAM) का पायलट आधार पर शुरू किया गया। 

➧ इसी देश के 8 राज्यों (उत्तर प्रदेश, गुजरात, तेलंगना, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, झारखंड और हिमाचल प्रदेश) 21 मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार के साझा प्लेटफार्म (ई-ट्रेडिंग पोर्टल) से जोड़ दिया गया है

National Agriculture Market e-NAM (राष्ट्रीय कृषि बाजार e-NAM)

 राष्ट्रीय कृषि बाजार का यह ई-व्यापार प्लेटफार्म कृषि विपणन क्षेत्र में सुधारों को प्रोत्साहित करेगा और इससे देशभर में किसी वस्तुओं के मुक्त प्रवाह के संवर्धन के साथ किसानों के उत्पादों के बेहतर विपणन की संभावनाओं में भी मदद करेगा

➧ उल्लेखनीय है कि आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) द्वारा 1 जुलाई, 2015 को कृषि-तकनीकी अवसंरचना कोष (ATIF: Agri-Tech Infrastructure Fund) के माध्यम से 'राष्ट्रीय कृषि बाजार' की स्थापना हेतु केंद्रीय क्षेत्र योजना को 2015-16 से 2017-18 अवधि हेतु 200 करोड रुपए के परिव्यय के साथ स्वीकृति प्रदान की गई थी

 वर्ष 2018-19 के बजट में झारखंड सरकार ने इस योजना में पंजीकृत किसानों को स्मार्टफोन उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है

➧ कृषि, सहकारिता एवं कृषि कल्याण विभाग DAC & FW) इस योजना का क्रियान्वयन देशभर में चयनित विनियमित कृषि बाजारों में परियोजना योग्य साझा इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म के द्वारा लघु किसानों के लिए कृषि व्यवसाय संघ (SFAC) के माध्यम से कर रहा है

➧  साझा ई-व्यापार प्लेटफार्म के साथ एकीकरण हेतु राज्यों/संघीय क्षेत्रों को :-

(i) पूरे राज्य में वैध एकल लाइसेंस, 

(ii) बाजार शुल्क की एकल बिंदु लेवी और

(iii)  कीमतें प्राप्त करने के साधन के रूप में इलेक्ट्रॉनि नीलामी के प्रावधानों  के रूप में अपने राज्य कृषि उत्पाद विपणन समिति (APMC) अधिनियमों (मंडी कानूनों) में पूर्व सुधार करना आवशयक है 

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Saturday, June 26, 2021

Jharkhand Ke Apwah Tantra (झारखंड के अपवाह तंत्र)

Jharkhand Ke Apwah Pranali

➧ जल संसाधन राज्य के जैव मंडल के विकास हेतु महत्वपूर्ण साधन है, जो प्रकृति प्रदत है 

➧ वर्षा के जल एवं दूसरे स्रोत से प्राप्त जल के बहाव की समग्र व्यवस्था अपवाह प्रणाली के नाम से जानी जाती है

➧ झारखंड के अपवाह प्रणाली के अंतर्गत नदियां, जलप्रपात एवं गर्म जलकुंड शामिल किए जाते हैं।

➧ झारखंड के अपवाह तंत्र में बड़ी आकार वाली नदियां नहीं है, यहां की अधिकांश नदियां छोटे आकार की है

➧ ये नदियां सदानीरा भी नहीं है क्योंकि इनका स्रोत अमरकंटक के पहाड़ी या छोटानागपुर के पठार द्रोणी है

झारखंड के अपवाह तंत्र

➧ जल संसाधन का संरक्षण झारखंड जैसे राज्य के लिए अति-आवश्यक है, क्योंकि राज्य में आर्कियन  ग्रेनाइट तथा  नीस जैसे चट्टाने पायी जाती है

 इस प्रकार की चट्टानों की छिद्रता कम होती है, फलत: भूमिगत जल ठहर नहीं पाता  अतः राज्य में भूमिगत भंडार जल सीमित है

➧ झारखंड के नदियों की उपयोगिता

(i) यहां की नदियां उद्योगों की स्थापना में सहायक है
(ii) ये नदियां शिक्षाएं, मत्स्यपालन, पन-बिजली की प्राप्ति का साधन है 
(iii) ये नदियां पेयजल का मुख्य स्रोत उपलब्ध कराती है


ये नदियों की विशेषता 

(i) झारखंड की अधिकांश नदियां उत्तर की ओर प्रवाहित होकर गंगा में मिल जाती है या फिर स्वतंत्र रूप से पूर्व की ओर बहते हुए बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है 

(ii) झारखंड की नदियों में मार्ग बदलने की प्रवृत्ति नहीं के बराबर होती है, क्योंकि ये कठोर चट्टानों से होकर प्रवाहित होती है


(iv) झारखंड की नदियां मानसून पर निर्भर है अर्थात बरसात के मौसम में इनमें बाढ़ आती है, परन्तु गर्मी के मौसम पर यह सूख जाती हैं सोन इसका अपवाद है 

(v) यहां की नदियां जलप्रपात के लिए विशिष्ट स्थिति प्रदान करती है, परंतु नौकाचालन के लिए उपयोगी नहीं होती  

➧ नदियों से जुड़े विशिष्ट तथ्य

➧ सोन नदी को छोड़कर झारखंड की सभी नदियां बरसाती है, अर्थात मौनसून पर निर्भर है 

➧ मोर/ मयूराक्षी एकमात्र झारखंड की नदी है, जिसमें नौकायान किया जा सकता है 

➧ गंगा नदी झारखंड की एकमात्र जिले साहबगंज से होकर गुजरती है इसके संरक्षण के लिए 2009 में झारखंड राज्य गंगा नदी संरक्षण प्राधिकरण गठित किया गया है


➧ दामोदर और स्वर्णरेखा नदियों की आकारिकी अध्ययन से पता चलता है कि नदियां नवोन्मेषण (पुनर्योवन) की प्रकिया से गुजरी है 

 झारखंड की वार्षिक औसत वर्षा 125 से 150 सेंटीमीटर है जबकि यहां की नदियों की क्षमता 18 पॉइंट 18 बिलियन क्यूबिक मीटर है

➧ झारखंड में 8 नदी बेसिन है - उत्तरी कोयल, दक्षिणी कोयल, शंख, दामोदर, स्वर्णरेखा, खैरकई, अजय, मयूराक्षी

 नदी अपवाह तंत्र का विभाजन

उत्तर-पश्चिम अपवाह :- सोन, पुनपुन, सकरी, फल्गु, करमनासा, पांचने, कियूल
 
उत्तरी-पश्चिम अपवाह :- उत्तरी कोयल, औरंगा, अमानत 

पूर्वी अपवाह :- दामोदर, बराबर, अजय, मयूराक्षी, ब्रम्हाणी

दक्षिण अपवाह  :- दक्षिणी कोयल, शंख   

दक्षिण-पूर्वी अपवाह :- स्वर्णरेखा, खरकई, काँची, राढू कसाई, संजय   
 

➧ उत्तरी अपवाह तंत्र

➧ यह अपवाह तंत्र  झारखंड के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि यह बिहार के मध्य भाग में अपना प्रवाह तंत्र  विकसित करती है
➧ इस प्रवाह तंत्र का विकास हजारीबाग (प्रखंड-चौपारण) और उत्तरी चतरा, उत्तरी कोडरमा जिला क्षेत्र भू-भाग में विकसित है इसके अंतर्गत सोन, कर्मनासा,पुनपुन, फल्गु, सकरी, पंचाने, कियूल आदि नदियां बहती है

(i) सोन नदी :- इसका उद्गम स्थल मैकाल श्रेणी का अमरकंटक पहाड़ी है 
➧ इसे सोनभद्र एवं हिरण्यवाह भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें सुनहरी रेत पाई जाती है 
➧ गढ़वा-पलामू की सीमा को छूते हुए यह नदी सीधे पूर्व की ओर बहते हुए गंगा नदी में मिल जाती मिल जाती हैं

(ii) पुनपुन नदी :- इसका उद्गम स्थल मध्यप्रदेश की पठारी भाग एवं इसका मुहाना गंगा नदी है 
➧ इस नदी की कुल लंबाई 200 किलोमीटर है 
➧ इसकी सहायक नदियों में दरधा और मोरहर है 
➧ यह झारखंड के चतरा से होते हुए बिहार के औरंगाबाद, गया, पटना में प्रवेश करते हुए गंगा नदी से मिल जाती है
 इससे कीकट एवं बमागधी  के नाम से जाना जाता है

(iii)  सकरी नदी :- यह उत्तरी छोटानागपुर के पठार से निकलकर गंगा के ताल क्षेत्र में अपना मुहाना बनाती है➧ इसकी सहायक नदियों में किउल प्रमुख है
➧ इस नदी की विशेषता यह है कि यह मार्ग बदलने हेतु कुख्यात हैं

(iv) फल्गु नदी :- इसे अंतः सलिला के नाम से भी जाना जाता है 
➧ इसकी सहायक नदी निरंजना एवं मोहना है  
➧ यह छोटा नागपुर पठार का उत्तरी भाग हजारीबाग के पठार (चतरा जिले) से निकलकर बिहार में पुनपुन से मिल जाती है  
➧ इस नदी के पौराणिक विशेषता है 
 पितृपक्ष के समय स्नान एवं पिंडदान हेतु लोग यहां आते हैं 
 इस नदी का झारखंड में केवल उद्गम स्थल है 

 उत्तर-पश्चिमी अपवाह तंत्र 

➧ इस अपवाह तंत्र का विस्तार पलामू प्रमंडल में है इस अफवाह तंत्र की प्रमुख नदियां इस प्रकार हैं :-

(i) उत्तरी कोयल नदी :- इस नदी का उद्गम स्थल रांची पठार के मध्य भाग में स्थित है
 यह गढ़वा, पलामू, लातेहार होते हुए सोन नदी में जाकर गिरती है
 इसकी कुल लंबाई 260 किलोमीटर है
 इसकी सहायक नदियों में औरंगा एवं अमानत है 
➧ झारखंड के लातेहार जिले में बूढ़ाघाघ जलप्रपात, जो झारखंड का सबसे ऊंचा जलप्रपात है और जिसकी ऊंचाई 450 फीट है इसी नदी पर स्थित है

(ii) औरंगा नदी :- यह लोहरदगा जिले के किसको प्रखंड के उत्तरी सीमा से निकलती है
➧ इसकी सहायक नदियां  घाघरी, गोवा नाला, धाधरी, सुकरी आदि है 
➧ यह आगे चलकर लेस्लीगंज और बरवाडीह की सीमा बनाते हुए कोयल नदी में जाकर गिरती है

(iii) अमानत नदी :-  यह चतरा जिले से निकलकर बालूमाथ होते हुए पांकी प्रखंड में प्रवेश करती है 
➧ इसकी प्रमुख सहायक नदियां जिजोई, माईला, जमुनियाँ, खैरा, चाको, सलाही, पाटम आदि है

➧ पूर्वी अपवाह तंत्र 

(i) दामोदर नदी :- यह झारखंड स्थित छोटा नागपुर पठार के टोरी (लातेहार) से निकलकर हुगली नदी में मिलती है
 इसकी कुल लंबाई 592 किलोमीटर है, जबकि यह नदी झारखंड में 290 किलोमीटर की दूरी तय करती है
 इसका अपवाह क्षेत्र 12,800 वर्ग किलोमीटर तक विस्तृत है
 इसकी सहायक नदियों में बराकर, बोकारो, कोनार, जमुनिया, कतरी आदि हैं 
➧ यह झारखंड के हजारीबाग, गिरिडीह, धनबाद, बोकारो, लातेहार, रांची, लोहरदगा आदि जिले में प्रवाहित होती है 
➧ इसे देवनदी, बंगाल का शोक आदि नामों से भी जाना जाता है
 यह झारखंड की सबसे प्रदूषित नदी है 
➧ यह झारखंड की सबसे लंबी और बड़ी नदी है

(ii) बराकर नदी :- इसका उद्गम स्थल छोटा नागपुर का पठार है 
➧ यह 225 किलोमीटर की दूरी तय कर दामोदर नदी में जाकर गिरती है
➧ यह झारखंड के हजारीबाग, गिरिडीह, धनबाद आदि जिले में अपना अपवाह क्षेत्र बनाती हैं

(iii) अजय नदी :- यह बिहार के मुंगेर जिले से निकलकर लगभग 288 किलोमीटर की यात्रा करते हुए भागीरथ नदी पश्चिम बंगाल में अपना मुहाना बनाती है
 इसकी सहायक नदियों में पथरो एवं जयंती का नाम आता है
 इसकी अपवाह क्षेत्र में देवघर, दुमका, जामताड़ा है

(iv) मयूराक्षी नदी :-इस नदी का उद्गम स्थल त्रिकूट पहाड़ी (देवघर) में स्थित है
 यह कुल 250 किलोमीटर की दूरी तय कर पश्चिम बंगाल के हुगली में जाकर मिलती है
➧ इस नदी की सहायक नदियों में धोवाइ, टिपरा, भामरी है 
➧ इस नदी का अपवाह क्षेत्र दुमका, साहिबगंज, देवघर और गोड्डा है
➧ झारखंड में इस नदी की विशेषता यह है कि यह नौगाम्य नदी है

(v) ब्राह्मणी नदी :- इस नदी का उद्गम स्थल दुमका जिले के उत्तर में स्थित दुधवा पहाड़ी से है
 इसकी सहायक नदियों में गुमरो और ऐरो मुख्य हैं 
➧ यह पश्चिम बंगाल के हुगली में अपना मुहाना बनाती है
 इसका अपवाह क्षेत्र दुमका, साहिबगंज, देवघर, गोड्डा है

(vi) गुमानी नदी :- इस नदी का उद्गम स्थल राजमहल की पहाड़ी है 
➧ यह अपना मुहाना गंगा नदी (पश्चिम बंगाल) में बनाती है
 यह राजमहल की पहाड़ियों से निकलकर उत्तरी-पूर्वी खंड का निर्माण करती है
 इस नदी के दो प्रमुख सहायक नदियां है जिसमें मेरेल नदी उत्तर की ओर से आकर बुढ़ेत के पास मिलती है 
अन्य सहायक नदियों में दक्षिण की ओर से छोटी नदियां आकर मिलती है, जो छोटे मैदानी क्षेत्र का निर्माण करते हैं

(vii) बंसोलोई :- इस नदी का उद्गम स्थल गोड्डा जिले के बांस पहाड़ी से हुआ है 
➧ यह दुमका के पचावारा के नजदीक प्रवेश करती है तथा मुराराई रेलवे स्टेशन के पास गंगा में मिल जाती है

➧ दक्षिणी-पूर्वी अपवाह तंत्र

➧ इस अपवाह तंत्र में स्वर्ण रेखा, राढू, खरकई, कांची, संजय, कसाई आदि नदियां शामिल है
 
(i) स्वर्णरेखा नदी :- यह रांची के नगड़ी (प्रखंड) से निकलकर करीब 470 किलोमीटर की दूरी तय कर स्वतंत्र रूप से बंगाल की खाड़ी में गिरती है
➧ यह झारखंड की एकमात्र नदी है जो स्वतंत्र रूप से बंगाल की खाड़ी में गिरती है, अन्यथा सभी नदियां किसी ना किसी नदी में जाकर मिल जाती है 
➧ इसकी सहायक नदियों में काकरो, कांची, खरकई, जामरू, राढू, संजय आदि शामिल है 
➧ इसकी अपवाह क्षेत्र रांची और सिंहभूम में है
➧ इसे स्वर्णरेखा नदी के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इस नदी की रेत में सोने का अंश पाया जाता है 
 इसी नदी पर हुंडरू जलप्रपात का निर्माण होता है 

(ii) खरकई नदी :- झारखंड और उड़ीसा के मध्य सीमा का निर्माण खरकई नदी द्वारा किया जाता है 
➧ इस नदी पर खरकई जलाशय परियोजना स्थित है
 यह स्वर्णरेखा के सहायक नदी है
 इसके किनारे लौहनगरी जमशेदपुर स्थित है

(iii) काँची :- इस नदी पर झारखंड का दशम जलप्रपात स्थित है, जिसकी ऊंचाई 144 फीट हैहै
 यह राढू नदी की सहायक नदी है

➧ दक्षिणी अपवाह तंत्र 

 इस अपवाह तंत्र में दक्षिणी कोयल एवं और शंख नदी को शामिल किया जाता है 
(i) दक्षिणी कोयल :- यह रांची के नगड़ी प्रखंड से निकलकर शंख नदी (उड़ीसा) में गिरती है
 इसकी कुल लंबाई 470 किलोमीटर है
 इसकी सहायक नदी कारो है 
➧ इसका अपवाह क्षेत्र लोहरदगा, गुमला, पश्चिमी सिंहभूम और रांची में है
 शंख नदी के साथ मिलकर यह उड़ीसा में ब्राह्मणी नदी के नाम से भी जानी जाती है

(ii) शंख नदी :- यह गुमला के चैनपुर से निकलकर लगभग 240 किलोमीटर की दूरी तय कर दक्षिणी कोयल में मिलती है
 इसके अपवाह क्षेत्र में झारखंड का गुमला जिला आता है


 
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Friday, June 25, 2021

Martial Law Vs. National Emergency - JPSC/ JSSC (Indian Polity)

Martial Law Vs. National Emergency

A detailed Comparison:

Martial Law Vs. National Emergency - JPSC/ JSSC (Indian Polity)

Martial Law

National Emergency

1

It affects only Fundamental Rights. 

It affects Fundamental Rights and Center-State relations, distribution of revenues, and legislative powers between center and state and may extend the tenure of the Parliament.

2 

It suspends the government and ordinary law courts.

It continues the government and ordinary law courts.

3 

It is imposed to restore the breakdown of law and order due to any reason.

It can be imposed only on three grounds- war, external aggression, or armed rebellion.

4 

It is imposed in some specific areas of the country.

It is imposed either in the whole country or in any part of it.

5 

It has no specific provision in the Constitution. It is implicit. 

It has specific and detailed provisions in the Constitution. It is explicit. 


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Sunday, June 20, 2021

Sadan of Jharkhand: Jharkhand History- JPSC/ JSSC

Sadan of Jharkhand

Sadans are the original non-tribal people of Jharkhand, but not all non-tribes are Sadans. The Sadan= people who were settled here or inhabited the place.

In the Sadani language, the house pigeon in Nagpuri is called 'Sed Parewa' and the wild pigeon or the pigeon that does not live in the house is called 'Ban Parewa'. Similarly, the Sadan should be treated as 'Sed Parewa'.There is a fundamental difference between the Adivasis and the Sadans, the Adivasis are tribes and nomads, while the Sadans are communities and permanent residence.

Sadan of Jharkhand: Jharkhand History- JPSC/ JSSC


Concerning language, a non-tribal person whose language is basically Khortha, Nagpuri, Panchapargani, and Kurmali in the Sadan. In this consideration, Dr. Bisheshwar Prasad Keshari (Dr. B.P.Keshari) believes that the original form of these languages must have developed in different tribes of Nagajati. But language is not limited to caste only. Therefore, Nagaraja will be in Nagadihsum. So as people, there will be no hag people or people of other castes and language will also be there. 

Hinduism is the ancient Sadan in terms of religion. Islam originated in the 6th (sixth) century. Jainism is also the religion among Sadan. Today the mother tongue of all these religious people is Urdu or Arabic, Persian, or Jain's language but they have languages like Khortha, Nagpuri, Panchpargania, and Karmali, etc. Whether the person from any religion can be a Sadan only when his mother tongue is Saadri language.

Sadan is an Aryan in terms of race. Some Dravidians are also called Sadans. Even some Aryan people are Sadans. They were the Diwan, Thakur, Pandey, Karta, and Lal among the four-five pillars in the Pariha Panchayat of Oraon and Mundas. The Manaki Munda, Pahan, Mahato belonged to their pegs, there were also Lal, Pandey, Thakur, Diwan, etc. as assistants, who ran the business. That is to say, Sadan lived with Munda and Oraon in the royal system or in other business activities.

According to history, there was a decent species here before the Asura. Certainly, these civilized species belonged to the Sadans, who were the original inhabitants. After all, the work of making iron for Ausra was done by only someone else. The Asura were followed by Munda followed by Oraon. Sadan was inhabited before their arrival. Munda and Oraon were welcomed by the Sadans. The British successes in imposing the surname 'Diku' under a conspiracy policy, which confused the tribals and the Kol rebellion (1831-32), in which the Sadans and the Adivasis had clashed. Later, Birsa Munda understood the British conspiracy and he had targeted only the British. In the Birsa Munda era, the Mughal, Pathan, Sikh, Kirani Babu, and British were called 'Diku', who use to exploit the tribals and create differences between them and the houses.

Types of Houses according to Caste:

  • Caste like those found in another part of the country viz. Brahmin, Rajput, Mali, Kumhar, Kurmi, Sonar, Baniya, Ahir, Chamar, Dushadh, Thakur, and Nagajati.
  • Many Sadan caste whose gotras are Avadhiya, Kanuajia, Tirhutia, Gaur, Dakhinaha, etc. this shows their original place is somewhere outside.

Social and Cultural Framework:

The cultural structure of Sadans is Adivasis is almost the same. The cultural structure of the Sadan family is most like the Sanatani family, but many social, religious, and cultural functions are performed like the tribals, such as weddings, festivals, dances, songs, languages, etc. Both Sadan and Adivasis are native to Jharkhand. They have a shared culture. Due to this, there is a glimpse of Aryanism as well as tribalism in the houses.


Religion and Belief:

The caste located in a small area called Sadan Sarak is influenced by Jainism. Like the Jains, they do not eat after sunset and do not consume nonvegetarian meat and fish. They are worshipers of the sun with resolution. Some Sadans are influenced by the Vaishnava tradition. Along with worshipping the deities of the Hindus, the Sadan people also worship deities. Along with Ojha Mati, craft and ghost are also popular. It would be relevant to say that the religious tradition of the Sadans is entranced calling in the spirits priesthood and ritualism.


Physical Emergence:

Arya, Dravidian, and Austric are seen in the physical emergence of the houses. The shades of white, black with short, medium, and tall heights are seen in the houses.


Attire:

Sadan traditionally wears a dhoti, gamcha, and chadar. But in recent times they used to pants, shirts, coats, ties, etc.


Jewel/Jems:

The Sadan people use jewelry like pola, sankha, bracelets, necklaces, sikari, bullak, basar, nathya, karn flower, etc, Tattooing is also practiced in the houses like tribals.


Hunting Gadget:

Sadan uses nets, kumani bansidang, polai, and tools like arrow-bows, swords, spears, lathis, and tongs for hunting like tribals. The tradition of holding guns by the Sadan came influencing of Zamindars.


Household Goods:

Sadan people use earthenware in the villages. Handiya, gagri, chukka, dhakni are commonly used goods in houses. Keeping brass and bronze utensils in the houses is considered a sign of prosperity. Both sides of the plate are used in group meals. Sadan and Adivasis use the same equipment in farming and plowing.


Kinship/Relationship:

Sadan society is patriarchal. Society is controlled by men rather than women, passing power, property, etc. from father to son rather than from mother to daughter. Marital relationship is forbidden in the maternal and paternal clan.


Festivals:

The festivals of the Sadan are a very long list. A person who is not a Sadan will not derive pleasure or enjoy the festivals here. Holi, Diwali, Dussehra, Kali-Puja, Jitiya, Sohrai, Karma, Sarhul, Makar Sankranti, Tusu, Teej, etc. are the major festivals among the Sadans. While Muslim Sadan celebrates Eid, Muharram, etc.


Dance/Songs:

Houses are identified with the village of Akhara. The collective dance of girls takes place in Akhara in Karam Utsav. There is an overnight dance to awaken Jawa. Apart from these, women also dance in wedding viz. Dumkach, Jhumta, Jhumar are all group dances. Ghatwari dance, Jamda dance, Chokra dance, Luri Savari dance, Rajput Jhalak dance- all these dances together are called colorful male dance. Apart from these Ganesh dance and Kathak dance are the classical dance.

The songs of the Sadans are named after their Ragas and Sur viz. Dumkach, Jhumta, Agnayi, Mardani Jhumar, Sohrai, etc.

Sadan community is also a contemporary of the tribals, who are natives of Jharkhand. Seeing the mutual friendship between the tribals and the Sadans, the British tried to create a rift between them. But they got partial success over this.

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The Crown Rule (1858- 1947) - Part VII : Indian Independence Act (1947)

The Crown Rule (1858-1947) - Part VII

Indian Independence Act (1947)

On February 20, 1947, British Prime Minister Clement Atlee declared that the British rule in India would end by June 30, 1948; after which the power would be transferred to responsible Indian hands. This announcement was followed by the agitation by the Muslim League demanding partition of the country. 

The Crown Rule (1858- 1947) - Part VII : Indian Independence Act (1947)

Again on June 3, 1947, the British Government made it clear that any constitution framed by the Constituent Assembly of India (formed in 1946) cannot apply to those parts of the country which were unwilling to accept it. 

On the same day (June 3, 1947), Lord Mountbatten, the Viceroy of India, put forth the partition plan, known as the Mountbatten Plan. The plan was accepted by Congress and the Muslim League. The immediate effect was given to the plan by enacting the Indian Independence Act (1947).

Features of Act:

  • It ended the British Rule in India and declared India as an Independent and Sovereign state from August 15, 1947.

  • It provided for the partition of India and the creation of two (2) independent dominions of India and Pakistan with the right to secede from the British Commonwealth.

  • It abolished the office of Viceroy and provided for each dominion, a governor-general, who was to be appointed by the British King on the advice of the Dominion cabinet. His Majesty's Government in Britain was to have no responsibility concerning the Government of India and Pakistan.

  • It empowered the constituents assemblies of the two (2) dominions to frame and adopt any constitution for their respective nations and to repeal any act of the British Parliament, including the Independence Act itself.

  • It empowered the constituents assemblies of both the dominions to legislate for their respective territories till the new constitutions were drafted and enforced. No Act of the British Parliament passed after August 1947 was to extend to either of the new dominions unless it was extended thereto by a law of the legislature of the dominion.

  • It abolished the office of the secretary of state for India and transferred his functions to the secretary of state for Commonwealth Affairs.

  • It proclaimed the lapse of British paramountcy over the Indian princely states and treaty relations with tribal areas from August 15, 1947.


  • It provided for the governance of each of the dominions and the provinces by the Government of India Act (1935), till the new constitutions were framed. The dominions were, however, authorized to make modifications in the Act.

  • It deprived the British Monarch of his right to veto bills or ask for the reservation of certain bills for his approval. But, this right was reserved for the Governor-General. The governor-general would have full power to assent to any bill in the name of His Majesty.

  • It designated the governor-general of India as the provincial governors as constitutional (nominal) heads of the states. They were made to act on the advice of the respective council of ministers in all matters.


  • It discontinued the appointment to civil services and reservation of posts by the secretary of state for India. The member of the civil services appointed before August 15, 1947, would continue to enjoy all the benefits they were entitled to.

At the stroke of midnight of 14-15 August 1947, the British rule came to an end, and power was transferred to the two (2) new independent Dominions of India and Pakistan. Lord Mountbatten became the first governor-general of the new Dominion of India. He swore in Jawahar Lal Nehru as the first Prime Minister of independent India. The Constituent Assembly of India formed in 1946 became the Parliament of Indian dominion.

Table: First Cabinet of Free India (1947)

 Sl No.

Members

Portfolios Head

 1.

Jawaharlal Nehru

Prime Minister, External Affairs, Commonwealth relations, Scientific research.

 2.

Sardar Vallabhbhai Patel

Home, Information, Broadcasting, States. 

 3. 

Dr. Rajendra Prasad

Food, Agriculture.

 4.

Maulana Abul Kalam Azad 

Education.

 5.

Dr. John Mathai 

Railways, Transport.

 6.

R.K. Shanmugham Chetty

Finance. 

 7.

Dr. B.R. Amdedkar

Law.

 8.

Jagjivan Ram

Labour.

 9.

Sardar Baldev Singh

Defense. 

 10.

Raj Kumari Amrit Kaur 

Health. 

 11.

C.H. Bhabha 

Commerce.

 12.

Rafi Ahmad Kidwai

Communication.

 13.

Dr. Shyama Prasad Mukherjee

Industries, Supplies.

 14.

V.N. Gadgil

work, Mines, Power. 

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The Crown Rule (1858- 1947) - Part VI : Government of India Act (1935)

The Crown Rule (1858-1947) - Part VI

Government of India Act (1935)

The Act marked a second milestone towards a completely responsible government of India. It was a lengthy and detailed document having 321 Sections and 10 Schedules.

The Crown Rule (1858- 1947) - Part VI : Government of India Act (1935)

Features of Act:

  • It provided for the establishment of an All India Federation consisting of provinces and princely states as units. The Act divided the powers between the Centre and units in terms of three (3) lists- Federal List (for Centre, with 59 items), Provincial List (for provinces, with 54 items), and the Concurrent List (for both, with 36 items). Residuary powers were given to the Viceroy. However, the federation never came into being as the princely states did not join it.

  • It abolished dyarchy in the provinces and introduced 'provincial autonomy' in its place. The provinces were allowed to act as autonomous units of administration in their defined spheres. Moreover, the Act introduced responsible governments in provinces, that is, the governor was required to act with the advice of ministers responsible to the provincial legislature. This came into effect in 1937 and was discontinued in 1939.


  • It introduced bicameralism in six (6) out of eleven (11) provinces. Thus, the legislatures of Bengal, Bombay, Madras, Bihar, Assam, and the United Provinces were made bicameral consisting of a legislative council (Upper House) and a legislative assembly (Lower House). However, many restrictions were placed on them.

  • It further extended the principle of communal representation by providing separate electorates for depressed classes (scheduled caste), women, and labor (workers).

  • It abolished the Council of India, established by the Government of India Act, (1858). The secretary of state for India was provided with a team of advisors.


  • It provided for the establishment of a Reserve Bank of India (RBI) to control the currency and credit of the country.

  • It provided for the establishment of a Federal Public Service Commission and a Provincial Public Service Commission and Joint Public Service Commission for two (2) or more provinces.

  • It provided for the establishment of a Federal Court, which was set up in 1937.


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Saturday, June 19, 2021

The Crown Rule (1858- 1947) - Part V : Montagu-Chelmssford Reforms (1919)

The Crown Rule (1858-1947) - Part V

On August 20, 1917, the British Government declared, for the first time, that its objective was with the gradual introduction of responsible government in India as the Government of India Act.

The Crown Rule (1858- 1947) - Part V : Montagu-Chelmssford Reforms (1919)

The Government of India Act of 1919 was thus enacted, which came into force in 1921. This Act is also known as Montagu-Chelmsford Reforms (Montagu was the secretary of State for India and Chelmsford was the Viceroy of India).

Features of the Act:


  • It further divided the provincial subjects into two (2) parts- transferred subjects and reserved subjects. The transferred subjects were to be administered by the governors with the aids of ministers responsible for the legislative council. The reserved subjects were to be administered by the government and his executive council without being responsible to the legislative council. This dual scheme of governance was known as 'dyarchy'- a term is derived from the Greek word 'di-arche' = double rule. However, this experiment was largely unsuccessful.

  • It introduced, for the first time, bicameralism and direct elections in the country. Thus, the Indian legislative council was replaced by a bicameral legislature consisting of an Upper House (Council of State) and a Lower House (Legislative Assembly). The majority of members of both Houses were chosen by direct election.

  • It required that the three (3) of the six (6) members of the Viceroy's executive council (other than the commander-in-chief) were to be Indian.

  • It extended the principle of communal representation by providing a separate electorate for Sikhs, Indian Christians, Anglo-Indians, and Europeans.


  • It created a new office of the High Commissioner for India in London and transferred to him some of the functions hitherto performed by the secretary of State for India.

  • It provided for the establishment of a public service commission. Hence, a Central Public Service Commission was set up in 1926 for recruiting civil servants.


  • It provided for the appointment of a statutory commission to inquire into and report on its working after ten (10) years of its coming into force.

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