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Friday, June 11, 2021

Nagvanshi Shasan Vyavastha (नागवंशी शासन व्यवस्था)

Nagvanshi Shasan Vyavastha

नागवंश के संस्थापक राजा फणिमुकुट राय थे  इन्होंने 64 AD में नागवंश की स्थापना की 

➧ दरअसल मुंडा वंश का संस्थापक राजा सुतिया मुंडा के अंतिम उत्तराधिकारी राजा मदरा मुंडा हुए 

➧ मद्रा मुंडा ने सभी पड़हा पंचायतों के मानकियों से सलाहोपरांत अपने दत्तक पुत्र फनी मुकुट राय को 64 AD में सत्ता सौंपी दी

➧ यह एक जनजातीय समाज द्वारा गैर जनजातीय समाज को सत्ता सौंपने की घटना है 

नागवंशी शासन व्यवस्था

➧ चुँकि नागवंश की स्थापना मुंडा राज्य के उत्तराधिकारी राज्य के रूप में हुआ। ऐसे में नागवंशी राजा मुण्डाओं को अपना बड़ा भाई मानते थे और मुण्डाओं की परंपरागत शासन व्यवस्था मुंडा-मानकी को आदर करते थे साथ ही अपने प्रशासनिक कार्यो के संचालन में उनका सहयोग प्राप्त करते थे 

➧ नागवंशी काल में मुंडा-मानकी व्यवस्था भुईंहरी व्यवस्था के नाम से जानी जाने लगी 

➧ इस काल में पड़हा को पट्टी कहा जाने लगा, जो कि एक प्रशासनिक इकाई थी तथा मानकी को भी भुईहर कहा जाने लगा, जो कि एक प्रशासनिक पद था परंतु ग्रामीण पंचायती व्यवस्था पूर्व की भांति ही यथावत बनी रही  

➧ साथ ही फणिमुकुट राय ने विशेषकर बनारस के लोगों को छोटानागपुर आने का निमंत्रण दिया, जिसमें कुंवर लाल, ठाकुर, दीवान, कोतवाल, पांडेय मुख्य थे इन लोगो को प्रशासन में महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया गया

➧ मुगल काल में नागवंशी राजाओं की स्थिति बदली विशेषकर नागवंशी राजा दुर्जनशाल को जब जहांगीर ने 12 साल का बंदी बनाया फिर रिहाई के बाद उन्हें ₹6000 वार्षिक लगान देने को मजबूर किया तो इस क्षेत्र में प्रशासनिक स्वरूप बदल गया आरंभ में नागवंशी राजाओं ने नियमित कर वसूली का जिम्मा मुंडा-मानकी को ही सौंपा, परंतु बाद में यह जिम्मेदारी जागीरदारों को दे दी गई, जिसे जागीरदारी प्रथा का नाम दिया गया

➧ 1765 में मुगल बादशाह शाह आलम से अंग्रेजों को बंगाल, बिहार, उड़ीसा का दीवानी अधिकार प्राप्त हुआ, जिस पर आगे चलकर लार्ड कॉर्नवालिस ने 1793 में स्थायी  बंदोबस्त लागू किया इस प्रक्रिया में जमींदार को भू-स्वामी माना गया, अब लगान वसूली का कार्य जमींदारों को दिया जाने लगा इसी समय पड़हा  प्रणाली, परगना में बदल गयी 

➧ जमीनदरों ने  इस क्षेत्र का जमकर शोषण किया तथा बड़े पैमाने पर जमीन से जुड़े अधिकारों में हेर-फेर किया बंगाल-बिहार से आने वाले लोग बड़े पैमाने पर भू-स्वामी बन गए और जंगलों पर भी अधिकार कर लिया 

➧ इस सबके बीच नागवंशी शासन व्यवस्था कमजोर हुई, मुंडा-मानकी का महत्व धार्मिक क्रिया-कलापों तक सिमट कर रह गया 

➧ परंतु नागवंश का इतिहास चलता रहा अंत में 1963 में बिहार जमीदारी उन्मूलन कानून लागू होने के बाद नागवंश का अंत हो गया इसके अंतिम राजा चिंतामणि शरण नाथ शाहदेव तथा अंतिम राजधानी रातू गढ़ रही

➧ डॉ.बी.पी.केशरी की पुस्तक 'छोटानागपुर का इतिहास: कुछ सन्दर्भ तथा कुछ सूत्र' में नागवंशी शासन व्यवस्था के अंतर्गत काम करने वाले अधिकारियों का वर्णन मिलता है

1- ग्रामीण स्तर पर 

➧ ग्राम स्तर पर कई अधिकारी अपने-अपने क्षेत्र और इलाकों में अलग-अलग जिम्मेदारियों का निर्वाह करते थे

➧ ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करने वाले 22 अधिकारियों का वर्णन प्राप्त होता है 

(i) महतो 
(ii) भंडारी
(iii) पांडे 
(iv) पोद्दार 
(v) अमीन 
(vi) साहनी
(vii) बड़ाईक
(viii) विरीतिया 
(ix) घटवार
(x) इलाकावार 
(xi) दिग्वार
(xiiकोटवार 
(xiii) गोड़ाइत 
(xiv) जमादार 
(xv) ओहवार
(xvi) तोपची
(xvii) बारकंदाज 
(xviii) बख्शी 
(xix) चोबदार
(xx) बराहिल 
(xxi) चौधरी 
(xxii) गौंझू   

इनमें दो मुख्य थे:- 

(a) महतो :- गांव का महत्वपूर्ण व्यक्ति महतो या महत्तम कहलाता था

(b) भंडारी :- राजा के गांवों में खेती बारी करने तथा अन्न का भंडारण करने हेतु इनकी इसकी नियुक्ति की जाती थी 
(c) भण्डारिक :- यह भंडार गृह का प्रहरी होता था

2- पट्टी स्तर पर 

➧ इस काल में पड़हा को पट्टी कहा जाने लगा तथा इस स्तर पर काम करने वाला अधिकारी मानकी

➧ अब भुईंहरी कहलाने लगा, जबकि पड़हा को पट्टी के नाम से जाना गया
 
➧ यहां के मुख्य अधिकारी निम्न थे 

(a) भुईंहर  :- यह मानकी  पद का ही बदला हुआ रूप था परन्तु इस काल में भुईहर के न्यायिक और राजनीतिक अधिकार तो लंबे काल तक बनी रहे जबकि उनके अधिकार में कटौती की गई  

(b) जागीरदार :- मुगलकाल में लगान वसूली करने वाले करने हेतु इनकी नियुक्ति की गई 

(c) पाहन :- पड़हा में किसी भी प्रकार के आयोजन की व्यवस्था करना जैसे :- बलि, भोज, प्रसाद आदि का कार्य करता था 

3- राज्य स्तर पर  

➧ नागवंशी  राजा को महाराज कहकर संबोधित किया जाता था तथा वह प्रशासन का सर्वोच्च बिंदु था
➧ महाराजा के सहयोगी अधिकारी दीवान, पांडेय, कुँअर, लाल, ठाकुर आदि नाम से जाना जाने जाते थे, इन्हें राजा  भी कहा जाता था और सामान्य: राज्य  परिवार से जुड़े सदस्य ही इन पदों पर बिठाये जाते थे
उदाहरण स्वरूप जरियागढ़ राजा ठाकुर महेंद्र नाथ शाहदेव थे बड़कागढ़ के राजा ठाकुरमर विश्वनाथ शाहदेव आदि

➧ राजा के प्रमुख सहयोगी अधिकारी निम्न थे 
(a) दीवान :- यह शासन में वित्तीय मामलों का प्रमुख था 
(b) पांडेय  :- पंच में या पड़हा राजा की अनुमति से लिए गए निर्णय को मौखिक रूप से सभी को अवगत कराता था 


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Jharkhand Itihas Se Jude Aitihasik Srot (झारखंड इतिहास से जुड़े ऐतिहासिक स्रोत)

Jharkhand Itihas Se Jude Aitihasik Srot

➧ किसी भी क्षेत्र के इतिहास एवं संस्कृति जानने का मुख्य साधन ऐतिहासिक स्रोत होते हैं 

➧ ऐतिहासिक स्रोतों को दो भागों में वर्गीकृत करते हैं

(I) पुरातात्विक स्रोत  :- इसके के अंतर्गत उपकरण, हथियार,  अभिलेख, शिलालेख, चित्रकला, सिक्के, स्थापत्य और मूर्तियों जैसे साधन आते हैं 

झारखंड इतिहास से जुड़े ऐतिहासिक स्रोत

(II) साहित्यिक स्रोत :- इसके अंतर्गत समकालीन धार्मिक एवं धर्मेत्तर में साहित्यों के विवरण शामिल किये  जाते हैं  


जिनका वर्णन निम्नवत है :-

पुरातात्विक सामग्री

(i) सिंहभूम  :  यहां से 1 लाख ईसा पूर्व के पाषाण उपकरण एवं औजार प्राप्त हुए हैं 

(ii) झरिया  :  यहां से पुरापाषाण कालीन पत्थर की कुल्हाड़ी एवं भाला जैसे औजार मिले हैं 

(iii) बोकारो  :  यहां से पुरापाषाण कालीन हस्त कुठार मिला है

(iv) हजारीबाग  :  यहां से पूरापाषाण कालीन हस्त कुठार एवं खुरचनी अवशेष मिले हैं 

(v) चक्रधरपुर :  यहां से नवपाषाण कालीन चाकूनुमा धारदार पत्थर मिला है 

(vi) बारूडीह  :  यहां से पॉलिशदार प्रस्तर की कुल्हाड़ी, कुदाल, छेनी जैसे औजार मिले हैं 

(vii) बसिया  :   गुमला के इस स्थान से तांबे की कुल्हाड़ी मिली है

(viii) बूढ़ाडीह :  तमाड़ के निकट इस स्थान से सुंदर कुलहाड़ा प्राप्त हुआ है

अभिलेख एवं शिलालेख 

(i)  अशोक का 13वाँ  शिलालेख : इस शिलालेख में झारखंड को आटविक क्षेत्र कहकर वर्णित किया गया है

(ii)  समुद्रगुप्त का प्रयाग प्रशस्ति  :- इस अभिलेख में झारखंड का उल्लेख मुरुण्ड देश के रूप में किया गया है

(iii)  महेंद्रपाल का इटखोरी शिलालेख :- हजारीबाग में स्थित यह अभिलेख पाल वंश के प्रभाव को दर्शाता है

(iv)  ताम्रपत्र अभिलेख :- यह 13वीं  सदी का है तथा इसका संबंध उड़ीसा के शासकों से है इसी शिलालेख में पहली बार छोटानागपुर क्षेत्र के लिए झारखंड शब्द प्रयोग में लाया गया  

(v) कवि गंगाधर का प्रस्तर अभिलेख :- यह धनबाद के गोविंदपुर में स्थित है तथा इस अभिलेख में धनबाद के मान राजवंश की चर्चा मिलती है  

(vi) गहड़वाल शासकों का शिलालेख :- यह पलामू क्षेत्र से प्राप्त हुआ है तथा मान राजा से संबंधित है

(vii) हापामुनी मंदिर के अभिलेख :- गुमला के घाघरा में स्थित इस मंदिर के कुछ हिस्सों पर भी ऐतिहासिक वर्णन मिलता है 

(viii) बोड़ेया मंदिर अभिलेख :- रांची के बोड़ेया गांव में 1727 ईस्वी में निर्मित इस मंदिर के दीवारों पर भी ऐतिहासिक वर्णन प्राप्त होते हैं  

चित्रकला 

(i) हजारीबाग के इस्को गांव से प्रागैतिहासिक काल की कई चित्रें  प्राप्त होती है, जैसे:- आदिमानव का चित्र, भूल भुलैया जैसी आकृति आदि

(ii) गढ़वा जिले के भवनाथपुर से भी प्रागैतिहासिक आखेट के चित्र मिले हैं, जिसकी तुलना सिंधु सभ्यता के पेंटिंग से की जा रही है

स्थापत्य एवं मूर्तियां 

(i) पारसनाथ पहाड़ी :- गिरिडीह जिले में स्थित इस पहाड़ी पर कई जैन तीर्थकर की मूर्तियां और मंदिर निर्मित है

(ii) बाबूसराय :- सिंहभूम स्थित इस स्थान से सातवीं-आठवीं शताब्दी के कई हिंदू देवी, देवताओं और जैन तीर्थकरों की मूर्तियां प्राप्त होती हैं

(iii) दुमदूमा :- हजारीबाग के इस स्थान से पालकालीन मूर्तियां मिले हैं

(iv) खुखरागढ़ :- रांची के बेड़ो प्रखंड में स्थित इस स्थान से 14वीं शताब्दी के मिट्टी के बर्तन एवं ईटों  द्वारा निर्मित मंदिर के अवशेष मिले हैं

(v) प्रतापपुर :- चतरा जिले में स्थित इस स्थान से मुगलकालीन कुंपा किला के अवशेष मिले हैं 

(v) कोलुआ पहाड़ :- हंटरगंज स्थित इस स्थान से एक मध्यकालीन दुर्ग का अवशेष मिलता है जिसमें हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म की मूर्तियां भी प्राप्त हुई है  

सिक्के

(i) रांची  : यहां से कुषाणकालीन सिक्के मिले हैं 

(ii) सिंहभूम : यहां से रोमन सम्राट के सिक्के मिले हैं 

(iii) चाईबासा : यहां से इंडो सिथियन राजाओं के सिक्के मिले हैं 

साहित्य स्रोत 

(i) प्राचीन कालीन : -प्राचीन काल में ऋग्वेद, अर्थवेद, ऐतरेय ब्राह्मण, वायु पुराण, विष्णु पुराण, भागवत पुराण, महाभारत, टॉलमी, फाह्यान, व्हेनसांग, राजपूत कालीन संस्कृति साहित्य में झारखंड की सभ्यता संस्कृति का वर्णन प्राप्त होता है 

(ii) मध्यकालीन  :- इस काल में कबीर और मलिक मोहम्मद जायसी के रचनाओं में झारखंड का वर्णन है इसके अलावे अफ्रीफ की शम्म-ए-सिराज, सलीमुल्ला की तारीख-ए-फिरोजशाही, गुलाम हुसैन की तारीख-ए-बांग्ला, जहांगीर की आत्मकथा सियार-उल-मुतखरीन, शाहबाज खाँ की तुजुक-ए-जहाँगीरी, अब्दुल की मथिरउल-उमरा एवं मिर्जा नाथ बहारिस्तान-ए-गैबो आदि रचनाएं झारखण्ड की समाजिक-सांस्कृतिक इतिहास का वर्णन प्रस्तुत करते हैं 

(iii) आधुनिक काल  :- इस काल में डब्ल्यू डब्ल्यू हंटर, डाल्टन, जैसे अधिकारियों के लेख मिश्नरी संस्थाओं के अभिलेखागार, विलियम इरविन व जॉन बैपटिस्ट विदेशी यात्रियों के विवरण इतिहास जानने के मुख्य स्रोत हैं 

महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल 

स्थान         जिला         अवशेष

इस्को          हजारीबाग    विशाल पर्वत पर आदि मानव द्वारा निर्मित चित्र, शैल चित्र दीर्घा, भूल-भुलैया आकृति 

भवनाथपुर   गढ़वा        प्रागैतिहासिक आखेट का चित्र (शिकार का चित्र), जिसमें हिरण, भैंसा, आदि पशु है, प्राकृतिक गुफा आदि 

पलामू         पलामू      पाषाण काल के तीनों चरणों के पाषाण उपकरण मिलते हैं 

बारूडीह      सिंहभूम    हस्त-निर्मित मृदभांड, कुल्हाड़ी, पत्थर का रिंग  

बानाघाट    सिंहभूम    नवपाषाण कालीन पत्थर, मृदभांड 

नामकुम     रांची        तांबे एवं लोहे के औजार तथा बाण के फलक

लोहरदगा  लोहरदगा   कांसे का प्याला 

मुरद          रांची         तांबे की सिकड़ी, कांसे की अंगूठी

लूपगढ़ी      -              प्राचीन कब्र के अवशेष 

बारहगंडा  हज़ारीबाग  तांबे की खान

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Saturday, June 5, 2021

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-8 (झारखंड की आदिम जनजातियां Part-8)

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-8

सबर जनजाति 

➧ सबर जनजाति का संबंध प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉयड समूह से है।  

➧ इनका संबंध मुंडा जनजातीय समूह से है

झारखंड की आदिम जनजातियां Part-8

➧ यह झारखंड की अल्पसंख्यक आदिम जनजाति है।  

➧ इस जनजाति के अस्तित्व का पहला उल्लेख त्रेता युग में मिलता है। इसके अलावा इनका उल्लेख महाभारत महाकाव्य में भी मिलता है। 

➧ इनकी तीन प्रमुख शाखाएं हैं 

(i) झारा 

(ii) बासु 

(iii) जायतापति 

इसमें से केवल झारा सबर झारखंड में पाई जाती है, शेष सबर उड़ीसा में पाए जाते हैं। 

➧ ब्रिटिश शासन काल में 'आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871' के तहत इन्हें आपराधिक जनजाति में से एक के रूप में वर्गीकृत किया गया था।  

 प्रसिद्ध साहित्यकार महाश्वेता देवी ने विशेष रूप से सबर जनजाति पर काम किया है

➧ झारखंड में इसका संकेन्द्रण मुख्यत:सिंहभूम क्षेत्र में है इसके अतिरिक्त यह जनजाति रांची, हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, गिरिडीह, पलामू तथा संथाल परगना में भी निवास करती हैं। 

➧ इनकी भाषा उड़िया, बंगला तथा हिंदी है 

समाज एवं संस्कृति 

➧ इनका समाज पितृसत्तात्मक होता है 

➧ इस जनजाति में गोत्र एवं बहुविवाह की प्रथा नहीं पाई जाती है 

 इस जनजाति में वधू मूल्य को 'पोटे' कहा जाता है 

➧ इस जनजाति में युवागृह नहीं पाया जाता है 

➧ इस जनजाति में डोमकच तथा पंता साल्या नृत्य लोकप्रिय है  

➧ इनके परंपरागत पंचायत का प्रमुख 'प्रधान' कहलाता है 

➧ इनका प्रमुख त्यौहार मनसा पूजा, दुर्गा पूजा, काली पूजा आदि है

आर्थिक व्यवस्था 

➧ इनका प्रमुख पेशा कृषि कार्य, वनोत्पादों का संग्रह तथा मजदूरी है

धार्मिक व्यवस्था 

➧ इनके प्रमुख देवता काली है 

➧ इस जनजाति में पूर्वज पूजा का विशेष महत्व है 

➧ मृत पूर्वज को 'मसीहमान' या 'बूढ़ा-बूढ़ी' कहा जाता है तथा इन्हें मुर्गा की बलि चढ़ाई जाती है 

➧ इनके गांव का पुजारी देहुरी कहलाता है

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Thursday, June 3, 2021

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-7 (झारखंड की आदिम जनजातियां Part-7)

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-7

परहिया जनजाति 

➧ परहिया जनजाति का संबंध प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉयड प्रजातीय समूह से है

➧ रिजले ने इस जनजाति को लघु द्रविड़ जनजाति कहा है

 ये मूलत: पलामू प्रमंडल में निवास करते हैं

झारखंड की आदिम जनजातियां Part-7

 इसके अतिरिक्त रांची, चतरा, हजारीबाग और संथाल परगना क्षेत्र में भी यह निवास करते हैं

समाज एवं संस्कृति

➧ इस जनजाति में नातेदारी प्रथा बिल्कुल हिंदुओं की तरह है

 इस जनजाति में नातेदारी की व्यवस्था 'धैयानिया' तथा 'सनाही' में विभाजित होता है

➧ 'धैयानिया' जन्म से जुड़ा नातेदारी संबंध है जिसके सदस्य को 'कुल कुटुंब' कहा जाता है जबकि 'सनाही' विबाह द्वारा जुड़ा संबंध है जिसके सदस्य को हित कुटुंब कहा जाता है

➧ इस जनजाति में गोत्र नहीं पाया जाता है

➧ इस जनजाति में साक्षी प्रथा का प्रचलन पाया जाता है

➧ इस जनजाति में मां के वंशज को प्राथमिकता दी जाती है

➧ इस जनजाति में 'आयोजित विवाह' सबसे अधिक प्रचलित है

 इनके घर को 'सासन' के नाम से जाना जाता है तथा इनके द्वारा निर्मित झोपड़ीनुमा घर को 'झाला' कहा जाता है 

➧ इस जनजाति में वधु मूल्य को 'डाली' कहा जाता है

 इसमें परिवार की गिनती क़ुराला (चूल्हे) से होती है

 इनकी पंचायत को भैयारी या जातिगोढ़ तथा ग्राम पंचायत का मुखिया महतो/प्रधान कहलाता है 

 इनका प्रमुख त्योहार सरहुल, करमा, धरती पूजा, सोहराय आदि हैं

आर्थिक व्यवस्था

➧ इस जनजाति का मुख्य पेशा बांस की टोकरी बनाना तथा ढोल बनाना है 

➧ पारंपरिक रूप से यह जनजाति स्थानांतरणशील कृषि करती थी जिससे 'बियोड़ा' या 'झूम' कहा जाता है

धार्मिक व्यवस्था

➧ इनके सर्वाधिक प्रमुख देवता 'धरती' है 

➧ इस जनजाति में 'मुआ पूजा' (पूर्वजों की पूजा) का सबसे अधिक महत्व है

➧ इस जनजाति में अलौकिक शक्तियों पर अत्यधिक बल दिया जाता है

 इनके धार्मिक प्रधान को 'दिहुरी' कहा जाता है

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Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-6 (झारखंड की आदिम जनजातियां Part-6)

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-6

कोरवा जनजाति 

➧ इस जनजाति कोलेरियन जनजाति समूह का जनक माना जाता है 

➧ यह जनजाति प्रजातीय दृष्टि से प्रोटो आस्ट्रोलॉयड समूह से तथा भाषायी से ऑस्ट्रो-एशियाटिक समूह से सम्बंधित हैं 

झारखंड की आदिम जनजातियां Part-6

 इन्हें झारखंड सरकार द्वारा शिकारी-संग्रहकर्ता माना जाता है 

➧ यह जनजाति मूलत: पलामू प्रमंडल में पायी जाती है तथा झारखंड में इनका आगमन मध्यप्रदेश में हुआ था 

सामाजिक एवं संस्कृति 

➧ इनकी दो उपजातियां पहाड़ी कोरवा (पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले) तथा डीहा/डिहारिया कोरवा (नीचे गाँव में रहने वाले) हैं  

 इस जनजाति में 6 गोत्र पाए जाते हैं जो हटरटियें, खरपो, सुइया, कासी, कोकट तथा बचुंग है 

➧ इस जनजाति में एकल विवाह का प्रचलन है तथा सम गोत्र विवाह निषिद्ध है 

 इस जनजाति में चढ़के विवाह में कन्या के यहां तथा डोला विवाह में वर के यहां विवाह होता है

➧ इनका प्रमुख त्यौहार करमा है

 इस जनजाति में सर्प पूजा का विशेष महत्व है

 इस जनजाति की पंचायत को मायरी कहा जाता है

आर्थिक व्यवस्था  

➧ यह जनजाति की कृषि, शिकार, पशुपालन, शिल्प निर्माण, मजदूरी, आदि आर्थिक क्रियाकलाप करते हैं 

➧ इस जनजाति में स्थानांतरणशील कृषि को 'बियाेड़ा' कहा जाता है

धार्मिक व्यवस्था

➧ इसके प्रमुख देवता सिंगबोंगा, ग्रामरक्षक देवता 'गमेलह' तथा पशु रक्षक देवता 'रक्सेल' है

➧ इनके पुजारी को बैगा कहा जाता है

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Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-5 (झारखंड की आदिम जनजातियां Part-5)

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-5

बिरजिया जनजाति 

➧ बिरजिया जनजाति सदान समुदाय की आदिम जनजाति हैं, जिनका प्रजातीय संबंध प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉयड समूह से है

 इस जनजाति के लोग स्वयं को पुंडरीक नाग के वंशज मानते हैं 

 इस जनजाति को असुर जनजाति का हिस्सा माना जाता है 

झारखंड की आदिम जनजातियां Part-5

➧ झारखंड के लातेहार, गुमला और लोहरदगा जिले में इस जनजाति का सबसे अधिक संकेन्द्रण है 

➧ बिरजिया शब्द का अर्थ 'जंगल की मछली' (बिरहोर का अर्थ है-जंगल का आदमी) होता है 

समाज एवं संस्कृति

➧ इनका परिवार पितृसत्तात्मक पितृवंशीय होता है

➧ यह जनजाति सिंदुरिया तथा तेलिया नामक वर्गों में विभाजित है 

➧ विवाह के दौरान 'सिंदुरिया' द्वारा सिंदूर का तथा 'तेलिया' द्वारा तेल का उपयोग किया जाता है

 तेलिया वर्ग पुनः दूध बिरजिया तथा रस बिरजिया नामक उपवर्गों में विभाजित हैं। दूध बिरजिया गाय का दूध पीते हैं व मांस नहीं खाते हैं जबकि रस बिरजिया दूध पीने के साथ-साथ मांस भी खाते हैं 

➧ इस जनजाति में बहु विवाह की प्रथा पायी जाती है

➧ इस जनजाति में सुबह के खाना को 'लुक़मा', दोपहर के भोजन को 'बियारी' तथा रात के खाने को 'कलेबा' कहा जाता है

➧ इन के प्रमुख त्यौहार सरहुल, सोहराई, आषाढ़ी पूजा, करम, फगुआ आदि हैं 

➧ इनके पंचायत का प्रमुख बैगा कहलाता है  

आर्थिक व्यवस्था 

➧ इनका  प्रमुख पेशा कृषि कार्य है  

➧ पाट क्षेत्र में रहने वाले बिरजिया स्थानांतरणशील कृषि करते हैं 

धार्मिक व्यवस्था 

➧ इनके प्रमुख देवता सिंगबोंगा, मरांग बुरु आदि हैं 

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Wednesday, June 2, 2021

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-4 (झारखंड की आदिम जनजातियां Part-4)

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-4

असुर जनजाति

➧ असुर जनजाति झारखंड की प्राचीनतम एवं आदिम जनजाति है जिनका प्रजातीय संबंध प्रोटो और ऑस्ट्रोलॉयड समूह से है 
➧ इस जनजाति को 'पूर्वादेवी' भी कहा जाता है
➧ इस जनजाति को सिंधु घाटी सभ्यता का प्रतिष्ठापक माना जाता है
➧ झारखंड में इस जनजाति का प्रवेश मध्यप्रदेश में से हुआ था

झारखंड की आदिम जनजातियां Part-4

➧ इनकी भाषा असुरी है जो ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा समूह से संबंधित है
➧ इनकी भाषा को मालेय भाषा भी कहा जाता है
 ऋग्वेद में इनका वर्णन निम्न नामों से किया जाता है :-
अनासह: चिपटी नाक वाले 
अव्रत : भिन्न आचरण करने वाले 
मृध: वाच:  अस्पष्ट बोलने वाले 
सुदृढ़ - लौह दुर्ग अथवा अटूट दुर्ग निवासी 
➧ झारखंड में इनका संकेन्द्रण मुख्यत: लातेहार (नेतरहाट के पाट क्षेत्र में सबसे अधिक) गुमला तथा लोहरदगा जिला में है

समाज एवं संस्कृति

➧ असुर गोत्र को पारस कहते हैं 
➧ इनके युवागृह को 'गीतिओड़ा' कहा जाता है
 इस जनजाति में बहिगोत्रीय विवाह का प्रचलन पाया जाता है
➧ असुर जनजाति के प्रमुख गोत्र केरकेट्टा, बघना, बेंग, अईद, बरवा
➧ इस जनजाति में वधू मूल्य को 'डाली टका' कहा जाता है
➧ इस जनजाति में 'इदी मी' नामक एक विशेष परंपरा है, जिसके तहत बिना विवाह किए लड़का-लड़की पति- पत्नी की भांति साथ में रहते हैं परंतु इन्हें कभी-न-कभी आपस में विवाह करना अनिवार्य होता है
➧ इनका परिवार मातृसत्तात्मक होता है तथा इसमें संयुक्त परिवार की प्रणाली पायी जाती है
➧ इस जनजाति में कुंवारे लड़के या लड़कियों द्वारा केले का पौधा लगाना वर्जित होता है
➧ इस जनजाति में गर्भवती स्त्री द्वारा ग्रहण देखना निषिद्ध है 
➧ इस जनजाति में दिन के भोजन को 'लोलोघेटू जोमेकू' तथा रात के भोजन को 'छोटू जोमेकु' कहा जाता है 
➧ हड़िया इनका प्रमुख पेय है जिसे 'बोथा' या 'झरनुई' भी कहा जाता है
➧ इनके प्रमुख त्योहार सरहुल, सोहराई , कथडेली, सरही, कुटसी (लोहा गलाने के उद्योग की उन्नति हेतु) , नवाखानी आदि है
➧ इनकी संस्कृति को 'मय संस्कृति' कहा जाता है
➧ इनके नृत्य स्थल को अखरा कहा जाता है

आर्थिक व्यवस्था 

➧ इस जनजाति का प्रमुख पेशा परंपरागत रूप से लोहा गलाना है

धार्मिक व्यवस्था

➧ इस जनजाति के सर्वोच्च देवता सिंगबोंगा है तथा इनके धार्मिक प्रधान को बैगा कहा जाता है
➧ बैगा का सहायक 'सुबारी' कहलाता है 
➧ इस जनजाति में जादू-टोना करने वाले व्यक्ति को माटी कहा जाता है 

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Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-3 (झारखंड की आदिम जनजातियां Part-3)

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-3  

बिरहोर जनजाति 

➧ बिरहोह जनजाति घुमन्तु  जीवन व्यतीत करते हैं
➧ प्रजाति रूप से यह जनजाति प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉयड समूह से संबंधित है, जबकि भाषायी रूप से इनका संबंध ऑस्ट्रो -ऑस्ट्रोलॉयड समूह से है
➧ इनकी भाषा बिरहारी है

झारखंड की आदिम जनजातियां Part-3

➧ यह जनजाति स्वयं को सूर्यवंशी मानती हैं
➧ यह जनजाति मूलत: झारखंड राज्य में ही पायी जाती हैं
➧ झारखंड में इनका संकेन्द्रण मुख्यत: हजारीबाग, चतरा, कोडरमा, बोकारो, धनबाद, गिरिडीह, रांची, गुमला, सिमडेगा, लोहरदगा, गढ़वा, पलामू, लातेहार और सिंहभूम क्षेत्र में है


समाज और संस्कृति 

➧ इनका परिवार पितृसत्तात्मक और पितृवंशीय होता है 
 इनके बस्ती को टंडा तथा इनकी झोपड़ी को कुम्बा/कुरहर कहा जाता है 
➧ इनमें भी बड़ी झोपड़ी को 'ओड़ा कुम्बा' व छोटी झोपड़ी को 'चु कुम्बा' कहा जाता है
➧ इस जनजाति में 13 गोत्र पाए जाते हैं
➧ इस जनजाति में युवागृह को 'गितिजोरी, गत्योरा या गितिओड़ा' कहा जाता है
➧ लड़कों के गितिओड़ा' को 'डोंडा कांठातथा लड़कियों के गितिओड़ा' को डिंडी कुंडी कहा जाता है
 इस जनजाति में 10 प्रकार के विवाहों का प्रचलन है
➧ क्रय विवाह इस जनजाति में सबसे अधिक प्रचलित है, जिसे 'सदर बापला' कहा जाता है 
 इनका प्रमुख त्योहार करमा, सोहराई, नवाजोम, जितिया, दलई आदि है
 इस जनजाति में डंग , लांगरी, मुतकर नामक नृत्य अत्यंत प्रचलित है
 तुमदा (मांदर या ढोल), तमक (नगाड़ा) तथा तिरियों (बांस की बांसुरी) इनके प्रमुख वाद्य यंत्र है

आर्थिक व्यवस्था

➧ इस जनजाति का प्रमुख पेशा लकड़ी काटना, शिकार करना एवं खाद्य संग्रहण करना है
➧ घुमंतू जीवन जीने वाले बिरहोरों को उलथू या भूलियास तथा स्थायी जीवन जीने वाले बिरहोरों को जांघी या थानिया कहा जाता है
 इस जनजाति में भूमि को सामुदायिक संपत्ति माना जाता है जिसे बेचना निषिद्ध होता है 
➧ बिरहोर जनजाति के लोग पीतल, तांबे और कांसे के कार्य में दक्ष होते हैं 

धार्मिक व्यवस्था 

➧ इनके प्रमुख देवता सिंगबोंगा, ओरा, बोंगा, कान्दो बाेंगा, होपरोम बोंगा, टण्डा बोंगा, एवं देवी माई हैं  
➧ इनके धार्मिक प्रधान को 'नाये' कहते हैं

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Tuesday, June 1, 2021

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-2 (झारखंड की आदिम जनजातियां Part-2)

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-2

सौरिया पहाड़िया 

➧ सौरिया पहाड़िया प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉयड प्रजाति समूह से संबंधित है 
➧ इन्हे संथाल परगना का आदि निवासी माना जाता है 
➧ इनका प्रमुख संकेन्द्रण राजमहल क्षेत्र के 'दामिन-ए-कोह' में है  

झारखंड की आदिम जनजातियां Part-2

➧ इस जनजाति ने अंग्रेजी शासन के पूर्व कभी भी अपनी स्वतंत्रता को मुगलों या मराठों के हाथ में नहीं सौंपा।
➧ यह जनजाति स्वयं को मलेर कहती है 
➧ इनकी भाषा मालतो है जो द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित है
➧ यह जनजाति बोलचाल हेतु बंगला भाषा का भी प्रयोग करती हैं

समाज और संस्कृति 

 यह जनजाति मुख्यत: पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती है तथा इनके आवाज को 'अड्डा' कहा जाता है
➧ इस जनजाति की सामाजिक व्यवस्था पितृसत्तात्मक है
➧ इस जनजाति में विवाह में लड़की की सहमति आवश्यक मानी जाती है
➧ इस जनजाति में आयोजित विवाह सर्वाधिक प्रचलित विवाह है 
➧ इनमें विवाह संस्कार संपन्न कराने वाले व्यक्ति को 'वेद सीढू' कहा जाता है
➧ इसमें बहिजार्तीय विवाह निषिद्ध है 
➧ इस जनजाति में विवाह विच्छेद तथा पुनर्विवाह की प्रथा पायी जाती है 
➧ इस जनजाति में वधू मूल्य को 'पोन' कहा जाता है
➧ इस जनजाति में गोत्र नहीं पाया जाता है
➧ इनके गांव का मुखिया व पुजारी माँझी कहलाता है 
➧ यह ग्राम पंचायत की अध्यक्षता भी करता है
➧ इनके गांव के प्रमुख अधिकारी सियनार (मुखिया), भंडारी, (संवेशवाहक), गिरि कोतवर है
➧ इस जनजाति के प्रमुख त्योहार फसलों पर आधारित होते है जिसे आड़या कहा जाता है 

इन के प्रमुख त्यौहार निम्न इस प्रकार हैं 

गांगी आड़या -  भादो में नई फसल कटने पर
ओसरा आड़या - कार्तिक में घघरा फसल कटने पर
पुनु आड़या - पूस में बाजरे की फसल कटने पर 
सलियानी पूजा - माघ या चैत में होती है

➧ इस जनजाति में पिता की मृत्यु हो जाने पर बड़ा पुत्र का संपत्ति का अधिकार होता है
➧ यदि कोई पुत्र नहीं है तो संपत्ति पर परिवार के साथ रहने वाले घर जमाई का अधिकार होता है 

आर्थिक व्यवस्था 

➧ ललित प्रसाद विद्यार्थी ने सांस्कृतिक आधार पर झारखंड की जनजातियों का वर्गीकरण किया है
➧ पहाड़ी ढाल पर रहने वाले लोग जोत को कोड़कर कृषि कार्य करते हैं, जिसे 'भीठा' या 'धामी' कहा जाता है

धार्मिक व्यवस्था 

➧ इस जनजाति के प्रमुख देवता लैहु गोसाई हैं
➧ इस जनजाति में 
सूर्य देवता को 'बैरु गोसाई' 
चाँद देवता को 'विल्प गोसाई' 
काल देवता को 'काल गोसाई' 
राजमार्ग देवता को 'पो गोसाई' 
सत्य देवता को 'दरमारे गोसाई' 
जन्म देवता को 'जरमात्रे गोसाई' तथा शिकार के देवता को 'औटगा' कहा जाता है
➧ इस जनजाति में पूर्वज पूजा का विशेष महत्व है
➧ धार्मिक कार्यों का संपादन 'कांदा मांझी' द्वारा किया जाता है तथा इसके सहायक को 'कोतवार' व चालवे कहा जाता है
 रिजले के अनुसार इस जनजाति का धार्मिक संबंध जीववाद से है

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Monday, May 31, 2021

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-1 (झारखंड की आदिम जनजातियां Part-1)

Jharkhand Ki Aadim Janjatiyan Part-1

Mal Paharia

➧ माल पहाड़िया एक आदिम जनजाति है जिसका संबंध प्रोटो और ऑस्ट्रोलॉयड समूह से है
➧ रिजले के अनुसार इस जनजाति का संबंध द्रविड़ समूह से है
 रसेल और हीरालाल के अनुसार यह जनजाति पहाड़ों में रहने वाले सकरा जाति के वंशज हैं

झारखंड की आदिम जनजातियां Part-1

➧ बुचानन हेमिल्टन ने इस जनजाति का सम्बन्ध मलेर से बताया है 
इनका संकेन्द्रण मुख्यत संथाल परगना क्षेत्र में पाया जाता  है परन्तु यह जनजाति संथाल क्षेत्र के साहेबगंज को छोड़कर शेष क्षेत्रों में पायी जाती है 
➧ इनकी भाषा मालतो है जो द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित है 

➧ समाज एवं संस्कृति

➧ इस जनजाति में पितृसत्तात्मक एवं पितृवंशीय सामाजिक व्यवस्था पाई जाती है 
 इस जनजाति में गोत्र नहीं होता है
➧ इस जनजाति में अंतर विवाह की व्यवस्था पाई जाती है
इस जनजाति में वधु -मूल्य (पोन या बंदी)  के रूप में सूअर देने की प्रथा है क्योंकि सुअर इनके आर्थिक और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है 
➧ इस जनजाति में अगुवा (विवाह हेतु कन्या ढूंढने वाला व्यक्ति) को सिथ सिद्धू या सिथूदार कहा जाता है
➧ इस जनजाति में वर द्वारा सभी वैवाहिक खर्चों का भुगतान किया जाता है
➧ इनके गांव का मुख्य मांझी कहलाता है, जो ग्राम पंचायत का प्रधान भी होता है
➧ इस जनजाति ने माघ माह में माघी पूजा तथा अगहन माह में घंघरा पूजा की जाती है
➧ यह जनजाति कृषि कार्य के दौरान खेतों में बीज बोते समय बीचे आड़या नामक पूजा (ज्येष्ठ माह में) तथा फसल की कटाई के समय गांगी आड़या पूजा करती है
➧ बाजरा के फसल की कटाई के समय पुनु आड़या पूजा की जाती है 
➧ करमा, फगु और नवाखानी इस जनजाति के प्रमुख त्यौहार है    

आर्थिक व्यवस्था

➧ इनका मुख्य पेशा झूम कृषि, खाद्य संग्रहण एवं शिकार करना है 
➧ इस जनजाति में झूम खेती को कुरवा कहा जाता है  
➧ इस जनजाति में भूमि को चार श्रेणियों में विभाजित किया जाता है 
➧ ये हैं - सेम भूमि (सर्वाधिक उपजाऊ), टिकुर भूमि (सबसे कम उपजाऊ), डेम भूमि (सेम व् टिकुर के बीच) तथा बाड़ी भूमि (सब्जी उगते हेतु प्रयुक्त)
➧ इस जनजाति में उपजाऊ भूमि को सेम कहा जाता है

धार्मिक व्यवस्था

➧ इनके प्रमुख देवता सूर्य एवं धरती गोरासी गोसाईं है 
➧ धरती गोरासी गोसाईं को वसुमति गोसाई या वीरू गोसाईं भी कहा जाता है
➧ इस जनजाति में पूर्वजों की पूजा का विशेष महत्व दिया जाता है 
➧ इनके गांव का पुजारी देहरी कहलाता है

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Thursday, May 27, 2021

Kora Janjati Ka Samanya Parichay (कोरा जनजाति का सामान्य परिचय)

Kora Janjati Ka Samanya Parichay

➧ कोरा जनजाति प्रजातीय दृष्टि से प्रोटो- आस्ट्रोलॉयड समूह से संबंधित है परंतु रिजले ने इन्हें द्रविड़ प्रजाति  समूह में वर्गीकृत किया है 

 इस जनजाति को कई स्थानों पर दांगर भी कहा जाता है 

कोरा जनजाति का सामान्य परिचय

➧ इस जनजाति की बोली का नाम भी कोरा है जो मुंडारी परिवार(ऑस्ट्रो-एशियाटिक) से संबंधित है

➧ इस जनजाति का संकेन्द्रण मुख्यत: हजारीबाग, धनबाद, बोकारो, सिंहभूम एवं संथाल परगना क्षेत्र में है

➧ समाज एवं संस्कृति

➧ इस जनजाति का परिवार पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय होता है 

➧ रिजले के अनुसार इस जनजाति की 7 उपजातियां है  

 यह जनजाति मुख्यत: ठोलो, मोलो , सिखरिया और बादमिया नामक वर्गों में विभाजित है

➧ कोरा लोग अपने घर को ओड़ा तथा गोत्र को गुस्टी कहते हैं 

➧ इस जनजाति के युवागृह को 'गीतिओड़ा' कहा जाता है 

➧ इस जनजाति में समगोत्रीया विवाह निषिद्ध माना जाता है  

 इस जनजाति में गोदना की प्रथा पाई जाती है तथा ये गोदना को स्वर्ग या नरक में अपने संबंधियों को पहचानने हेतु आवश्यक चिन्ह मानते हैं

➧ इनके गांव के प्रधान को महतो कहा जाता है

➧ कोरा जनजाति के प्रमुख गोत्र है :-मागडू , कच, चीखेल, मेरोय, बुटकोई    

➧ इनके गोत्रों  में सबसे ऊपर 'कच' तथा सबसे नीचे 'बूटकोई' है

 इस जनजाति के प्रमुख त्यौहार सवा लाख की पूजा (सवा लाख देवी-देवताओं की पूजा), नवाखानी, भगवती दाय, काली माय पूजा, बागेश्वर पूजा, सोहराई आदि है 

➧ जनजाति के प्रमुख नृत्य खेमटा, गोलवारी, दोहरी, झिंगफुलिया आदि है 

➧ आर्थिक व्यवस्था 

➧ इस जनजाति का परंपरागत पेशा मिट्टी कोड़ना था. जिसके कारण ही इनका नाम 'कोड़ा' पड़ा  

➧ धार्मिक व्यवस्था 

➧ इनके पुजारी को बैगा कहा जाता है

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Wednesday, May 26, 2021

Kanwar Janjati Ka Samanya Parichay (कंवर जनजाति का सामान्य परिचय)

Kanwar Janjati Ka Samanya Parichay

➧ यह जनजाति कौरवों के वंशज के हैं 

➧ इस जनजाति का संबंध प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉयड प्रजाति समूह से है

➧ इनकी भाषा का कवराती (कवरासी) या सादरी है

कंवर जनजाति का सामान्य परिचय

➧ कंवर झारखंड की 31वीं जनजाति है जिसे भारत सरकार ने 8 जनवरी, 2003 में जनजाति की श्रेणी में शामिल किया है 

➧ यह जनजाति पलामू, गुमला व सिमडेगा जिले में निवास करती  हैं 

समाज और संस्कृति

➧ इनका परिवार पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय होता है 

➧ इस जनजाति में कुल 7 गोत्र पाए जाते हैं, जिसके नाम प्रहलाद,  अभीआर्य, शुकदेव, तुण्डक, वरिष्ठ, विश्वामित्र व पराशर है

 इनका समाज वहिविर्वाही होता है अर्थात विवाह हेतु अपने वंश या  गोत्र के बाहर की कन्या को ढूंढा जाता है जिसे 'कूटमैती प्रथा' कहते हैं

➧ इस जनजाति में चार प्रकार के विवाह प्रचलित है जिसमें क्रय विवाह सर्वाधिक प्रचलित है

➧ इसके अतिरिक्त इसमें सेवा विवाह, ढुकु विवाह, जिया विवाह का प्रचलन पाया जाता है

➧ इस जनजाति में वधू मूल्य को सुक-दाम कहा जाता है

➧ वधु मूल्य रूप में नगद के अतिरिक्त 10 खण्डी चावल दिए जाने पर इसे 'सुक-मोल' कहा जाता है

➧ इस जनजाति का पंचायत प्रधान सयान कहलाता है तथा इनकी ग्राम पंचायत का संचालन प्रधान या पटेल करता है 

➧ इस जनजाति के लोग मुख्यत: करम, तीज, जयाखानी, हरेली, पितर पूजा आदि पर्व मनाते हैं

आर्थिक व्यवस्था 

➧ इस जनजाति का प्रमुख पेशा कृषि कार्य है

➧ धार्मिक व्यवस्था 

➧ कंवर सरना धर्मावलंबी है तथा इस जनजाति का सर्वोच्च देवता भगवान है, जो सूर्य का प्रतिरूप है

 इनके ग्राम देवता को खुँट देवता कहा जाता है

➧ इनके गांव का पुजारी पाहन या वैगा कहलाता है

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Bedia Janjati Ka Samanya Parichay (बेदिया जनजाति का सामान्य परिचय)

Bedia Janjati Ka Samanya Parichay

➧ यह जनजाति एक अल्पसंख्यक जनजाति है 

➧ प्रजातिया दृष्टि से यह जनजाति द्रविड़ समूह से संबंधित है

➧ यह अपने को वेद निवस या वेदवाणी कहते हैं

बेदिया जनजाति का सामान्य परिचय

➧ इस जनजाति के लोग स्वयं को ऊंच हिंदू मानते हैं 

➧ अपने नाम के साथ ये बेदिया और मांझी की उपाधि धारण करते हैं

 इस जनजाति का संकेन्द्रण मुख्यत: रांची, हजारीबाग और बोकारो जिला में है 

➧ समाज एवं संस्कृति 

➧ इस जनजाति में बधु मूल्य को 'डाली टाका' के नाम से जाना जाता है 

➧ इनके गांव के मुखिया को प्रधान कहा जाता है। इसे महतो या ओहदार भी कहते हैं  

➧ इसके नाच के मैदान को अखाड़ा कहते हैं  

➧ इस जनजाति में सबसे प्रचलित विवाह 'आयोजित विवाह' है

 इसमें विजातीय विवाह को ठुकुर ठेनी कहा जाता है तथा यह सामाजिक रूप से  निषिद्ध होता है

 इस जनजाति में पुरुषों का परंपरागत वस्त्र केरया, कच्छा/भगवा है जबकि महिलाओं का परंपरागत वस्त्र ठेठी और पाचन है

➧ इस जनजाति में दशहरा, दिवाली, छठ, सोहराय, कर्मा आदि पर्व धूमधाम से मनाया जाता है

➧बेदिया जनजाति के प्रमुख गोत्र :- थेरहर , सूड़ी, चिडरा, बाम्बी, बड़वार, काछिम, फेचा     

➧ आर्थिक व्यवस्था

➧ इनका प्रमुख पेशा  कृषि कार्य है

धार्मिक व्यवस्था 

➧ इस जनजाति के प्रमुख देवता सूर्य है तथा इसमें सूर्याही पूजा का प्रचलन है

➧ इस जनजाति के धार्मिक स्थल को सारना कहा जाता है

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Kol Janjati Ka Samanya Parichay (कोल जनजाति का सामान्य परिचय)

Kol Janjati Ka Samanya Parichay

➧ यह जनजातीय प्रोटो-आस्ट्रोलॉयड समूह से संबंधित हैं 

➧ इनकी भाषा का नाम भी कोल है तथा भाषायी रूप से इनका संशोधन कोलेरियन समूह से है 

कोल जनजाति का सामान्य परिचय

➧ कोल झारखण्ड की 32वीं जनजाति है जिसे  भारत सरकार ने 2003 में जनजाति की  श्रेणी में शामिल किया है

➧ झारखंड में इस जनजाति का संकेन्द्रण मुख्यत: देवघर, दुमका, व गिरिडीह जिले में है

➧ समाज और संस्कृति 

➧ इनका परिवार पितृसत्तात्मक और पितृवंशीय होता है

➧ यह जनजाति 12 गोत्रों में विभक्त है, जिनके नाम हांसदा , सोरेन , किस्कू, मरांडी, हेम्ब्रम, बेसरा, मुर्मू, टुडू, चौड़े , बास्के ,चुनिआर और किसनोव है

 इस जनजाति में वधू मूल्य को 'पोटे' कहा जाता है

 इनके गांव प्रधान को मांझी कहा जाता है

➧ आर्थिक व्यवस्था

➧ इस जनजाति का परंपरागत पेशा लोहा गलाना तथा उनके सम्मान बनाना है 

➧ वर्तमान में इस जनजाति के लोग तीव्रता से कृषि को अपना व्यवसाय बना रहे हैं 

➧ धार्मिक व्यवस्था 

➧ कोल जनजाति के लोग सरना धर्म के अनुयायी हैं तथा इनका प्रमुख देवता सिंगबोंगा है 

➧ इस जनजाति में शंकर भगवन, बजरंगबली, दुर्गा एवं काली मां की भी पूजा की जाती है 

➧ इस जनजाति पर हिंदू धर्म का सर्वाधिक प्रभाव है

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Tuesday, May 25, 2021

Gond Janjati Ka Samanya Parichay (गोंड जनजाति का सामान्य परिचय)

Gond Janjati Ka Samanya Parichay

➧ गोंड जनजाति भारत की दूसरी सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है तथा इनका मूल निवास मध्य प्रदेश और गोंडवाना क्षेत्र में है

➧ झारखंड में इस जनजाति का मुख्य निवास क्षेत्र गुमला तथा सिमडेगा में है

गोंड जनजाति का सामान्य परिचय

 इसके अतिरिक्त यह जनजाति रांची, पलामू और कोल्हान में भी निवास करती हैं 

➧ इस जनजाति का संबंध द्रविड़ समूह से है

➧ इस जनजाति की भाषा गोंडी है, किंतु ये लोग बोलचाल में सादरी-नागपुरी का प्रयोग करते हैं 

➧ समाज और संस्कृति 

➧ यह जनजाति निम्न  तीन वर्गों में विभाजित है :-

 राजगोंड -  अभिजात्य वर्ग 

घुरगोंड  - सामान्य वर्ग

कमियां  - खेतिहर मजदूर 

 गोंड लोग संयुक्त परिवार को भाई बंद तथा संयुक्त परिवार के विस्तृत रूप को भाई बिरादरी कहते हैं

➧ यह जनजाति पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय है 

➧ इस जनजाति में युवागृह को घोटूल/गोटूल कहा जाता है

➧ इनका प्रमुख पर्व फरसा पेन, मतिया, बूढ़देव, करमा, सोहराई, जितिया आदि है 

➧ इनका प्रमुख पर फंसा पेन मतिया गुरदेव कर्मा सोहराय सरहुल जितिया आदि हैं

 आर्थिक व्यवस्था 

 इस जनजाति का प्रमुख पेशा कृषि कार्य है 

➧ इस जनजाति द्वारा झुम खेती को दीपा या बेवार कहा जाता है

➧ धार्मिक व्यवस्था 

➧ इनके प्रमुख देवता ठाकुर देव (अन्य नाम- बूढ़ा देव) और ठाकुर देई है

➧ ठाकुर देव सूर्य के तथा ठाकुर दीई धरती के प्रतीक हैं

 गोंड जनजाति में प्रत्येक गोत्र द्वारा 'परसापन' नामक कुल देवता की पूजा की जाती है

➧ कुल देवता की पूजा करने वाले व्यक्ति को 'फरदंग' कहते हैं

➧ इस जनजाति में पुजारी को वैगा कहा जाता है तथा इसके सहायक को मति कहा जाता है 

➧ इस जनजाति में शवों के दफनाने के स्थान को 'मसना' के नाम से जाना जाता है

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Chik Badaik Janjati Ka Samanya Parichay (चीक बड़ाईक जनजाति का सामान्य परिचय)

Chik Badaik Janjati Ka Samanya Parichay

➧ चीक बड़ाईक झारखंड की एक बुनकर जनजाति है जो झारखंड के लगभग सभी जिलों में पाई जाती हैं। 

➧ हालांकि इस जनजाति का सर्वाधिक संकेन्द्रण गुमला-सिमडेगा क्षेत्र में पाया जाता है। 

 इनकी भाषा नागपुरी है। 

चीक बड़ाईक जनजाति का सामान्य परिचय

 समाज एवं संस्कृति

➧ इनका समाज पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय होता है। 

➧ यह  जनजाति बड़ गोहड़ी (बड़ जात) तथा छोट गोहड़ी (छोट जात) नामक दो वर्गों में विभाजित है।  

➧ इस जनजाति के प्रमुख गोत्र  तनरिया, खम्बा एवं तजना है

➧ इस जनजाति में अन्य जनजातियों की तरह अखरा (नृत्य स्थल) तथा पंचायत व्यवस्था नहीं मिलती है

➧ इस जनजाति में पुनर्विवाह को सगाई कहा जाता है

 इनका प्रमुख त्योहार सरहुल, नवाखानी, करमा, जितिया बड़ पहाड़ी, सूर्याही पूजा, देवी माय, देवठान, होली, दीपावली आदि है 

➧ इस जनजाति में पहले नर बलि की प्रथा प्रचलित थी, जो अब समाप्त हो गया है 

➧ आर्थिक व्यवस्था 

 इनका मुख्य पैसा कपड़ा बुनना है जिसके कारण इन्हें हाथ से बने कपड़ों का जनक भी कहा जाता है  

➧ धार्मिक व्यवस्था 

➧ इस जनजाति के प्रमुख देवता सिंगबोंगा है   

➧ देवी माई इनकी प्रमुख देवी है   

➧ इस जनजाति में शवों के दफनाने के स्थान को 'मसना' कहा जाता है  

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