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Monday, January 18, 2021

Jharkhand Ki Chitrakala (झारखंड की चित्रकला/चित्रशैली)

Jharkhand Ki Chitrakala


Jharkhand Ki Chitrakala (झारखंड की चित्रकला/चित्रशैली)

झारखंड की चित्रकला और उसकी प्रमुख शैलियाँ

➤झारखंड की जनजातियों में चित्रकला उनकी भावना के उद्गार का एक माध्यम है। 

जनजातियों की कला का प्रेरणा स्रोत उनके आस-पास का प्राकृतिक वातावरण है 

जनजातियों के चित्रकला एवं शिल्पकला उनकी सामाजिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों संस्कृति आदि को प्रतिबिंबित करती है 

सोहराय चित्रकला

सोहराय जनजातियों की एक प्रसिद्ध स्थानीय चित्रकला शैली है

यह उनके प्रसिद्ध पर्व सोहराय से जुड़ी शैली है

इस कला में जंगली जीव-जंतुओं, पक्षियों और पेड़-पौधों को अंकित किया जाता है

यह चित्रकारी वर्षा ऋतु के बाद घरों की लिपाई-पुताई से प्रारंभ होता है

इस चित्रकारी में कला के देवता प्रजापति या पशुपति का चित्रण मिलता है तथा पशुपति का सांड की पीठ पर खड़ा चित्रण किया जाता है

➤'मंझू  सोहराई'  तथा 'कुर्मी सोहराय' इस चित्रकला की दो प्रमुख शैलियाँ  हैं 

यह चित्रकला हजारीबाग जिले में अत्यंत प्रसिद्ध है

सोहराय और कोहबर चित्रकला को 2020 में (भौगोलिक संकेतक) प्रदान किया गया है 

➤यह झारखंड में किसी भी श्रेणी में प्राप्त होने वाला प्रथम जी आई टैग है  

इसके लिए सोहराय कला विकास सहयोगी समिति, हजारीबाग द्वारा आवेदन दिया गया था

जादूपटिया चित्रकला 

यह संथाल जनजाति की सर्वाधिक मशहूर  लोक चित्रकला शैली रही है, जो अब लगभग समाप्त हो चुकी है 

यह शैली संथालों  की सामाजिक, धार्मिक, रीति-रिवाजों और मान्यताओं को उकेरती है 

➤इन चित्रों की रचना करने वाले को संथाली भाषा में जादो  कहा जाता है

जादो  (चित्रकार) एवं पटिया (कागज या कपड़ा के छोटे-छोटे टुकड़े) को जोड़कर बनाए जाने वाला चित्र फलक है

इस चित्रकला में कागज के छोटे-छोटे टुकड़े को जोड़कर निर्मित 15 से 20 फीट चौड़े पटो पर चित्रकारी की जाती है

प्रत्येक पट  पर 4 से 16 तक चित्र बनाए जाते हैं

इसमें चित्रकारी हेतु मुख्य रूप से लाल, हरा, पीला, भूरा और काले रंगों का प्रयोग होता है 

इसमें बाघ  देवता और जीवन के बाद के दृश्यों का चित्रण किया जाता है

यह चित्रकला दुमका जिले में अत्यंत प्रसिद्ध है 

कोहबर चित्रकला

यह फारसी शब्द कोह (गुफा) तथा हिंदी शब्द वर (दूल्हा अथवा दंपति) से मिलकर बना है, जिसका सामान्य अर्थ है- गुफा में विवाहित जोड़ा 

यह चित्रकारी विवाह के मौसम में जनवरी से जून महीना तक की जाती है

इसमें घर-आंगन में विभिन्न ज्यामितीय आकृतियों में पेड़-पौधों, फूल-पत्तों आदि का चित्रण किया जाता है

बिरहोर जनजाति इस कला में निपुण मानी जाती है

इसमें सिकी  (देवी) का चित्रण मिलता है 

गूंज चित्रकला

गूंज कला में पशुओं,  वन्य तथा पालतू जानवरों एवं वनस्पतियों की तस्वीरें बनाई जाती हैं 

इस चित्रकला के माध्यम से संकटग्रस्त जानवरों को रीति-रिवाजों में दर्शाया जाता है

पईत्कार चित्रकला

यह चित्रकारी आमदुबी (सिंहभूम)  गांव में अत्यंत प्रसिद्ध है, जिसके कारण इस गांव को पईत्कार का गांव भी कहा जाता है

➤इसे झारखंड का स्क्रॉल चित्रकला भी कहते हैं 

यह प्राचीन काल से झारखंड में विद्यमान है कि  माना जाता है कि इसकी शुरुआत सबर जनजाति द्वारा की गई थी

इससे भारत का सबसे पुराना आदिवासी चित्रकला माना जाता है

चित्रकला गरुड़ पुराण में भी मिलती है

झारखंड के अतिरिक्त यह चित्रकला बिहार, उड़ीसा तथा पश्चिम बंगाल में भी लोकप्रिय है 

इस चित्रकला के माध्यम से जनजातियों द्वारा विभिन्न कहानियों तथा स्थानीय रीति का वर्णन किया जाता है 

इसके माध्यम से जीवन के बाद होने वाली घटनाओं का वर्णन किया जाता है

राणा तेली एवं प्रजापति चित्रकला

➤इन तीन चित्रकलाओं का प्रयोग उक्त  तीन उपजातियों द्वारा किया जाता है

इस चित्रकला में पशुपति (भगवान शिव) को पशुओं  एवं पेड़-पौधों के देवता के रूप में प्रदर्शित किया जाता है

इस चित्रकला में धातु के तंतुओं का प्रयोग किया जाता है


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