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Thursday, January 14, 2021

Pragaitihasik Kal Me Jharkhand (प्रागैतिहासिक काल में झारखंड)

प्रागैतिहासिक काल में झारखंड

(Pragaitihasik Kal Me Jharkhand)



➤वह काल जिसके लिए कोई लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है ,बल्कि पूरी तरह पुरातात्विक साक्ष्यों पर निर्भर रहना पड़ता है उससे प्रागैतिहासिक इतिहासिक काल कहते हैं

प्रागैतिहासिक इतिहासिक

प्रागैतिहासिक काल को तीन भागों में विभाजित किया जाता है

1) पुरापाषाण काल 

2) मध्य पाषाण काल

3) नवपाषाण काल

1) पुरापाषाण काल:-

इसका कालक्रम 25 लाख ईस्वी पूर्व से 10 हजार ईस्वी पूर्व माना जाता है


➤इस काल में कृषि का ज्ञान नहीं था तथा पशुपालन का शुरू नहीं हुआ था

➤इस काल में आग की जानकारी हो चुकी थी,किंतु उसके उपयोग करने का ज्ञान नहीं था 
 
झारखंड में इस काल के अवशेष हजारीबाग, बोकारो ,रांची, देवघर, पश्चिमी सिंहभूम, 

पूर्वी सिंहभूम इत्यादि क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं

हजारीबाग से पाषाण कालीन मानव द्वारा निर्मित पत्थर के औजार मिले हैं

2) मध्य पाषाण काल:-

मध्य पाषाण काल का कालक्रम 10,000 ईसवी पूर्व से 4000 ईसवी पूर्व तक माना जाता है


झारखंड में इस काल के अवशेष दुमका, पलामू, धनबाद , रांची, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम आदि क्षेत्रों से मिले हैं

3) नवपाषाण काल:-

नवपाषाण काल का कालक्रम 10,000 ईसवी पूर्व से 1,000 ईसवी पूर्व तक माना जाता है

 इस काल में कृषि की शुरुआत हो चुकी थी 

इस काल में आग के उपयोग करना प्रारंभ कर चुके थे 

झारखंड में इस काल में अवशेष रांची, लोहरदगा, पश्चिमी  सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, आदि क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं 

छोटानागपुर प्रदेश में इस साल के 12 हस्त कुठार पाए गए हैं

नवपाषाण काल को तीन भागों में विभाजित किया गया है

1) ताम्र पाषाण काल

2) कांस्य युग 

3) लौह युग

1) ताम्र पाषाण काल:- 

➤इसका कालक्रम 4,000 ईस्वी पूर्व  से 1000 ईसवी पूर्व तक माना जाता है

➤यह काल हड़प्पा पूर्व काल, हड़प्पा काल तथा हड़प्पा पश्चात काल तीनों से संबंधित है 

पत्थर के साथ-साथ तांबे का उपयोग होने के कारण इस काल को ताम्र पाषाण काल कहा जाता है

मानव द्वारा प्रयोग की गई प्रथम धातु तांबा ही थी 

झारखंड में इस काल का केंद्र बिंदु सिंहभूम था  

इस काल में असुर,बिरजिया तथा बिरहोर जनजातियां तांबा गलाने तथा उससे संबंधित उपकरण बनाने की कला से परिचित थे 

झारखंड के कई स्थानों से तांबा की कुल्हाड़ी तथा हजारीबाग के बाहरगंडा से तांबे की 49 खानों के अवशेष प्राप्त हुए हैं 

2) कांस्य युग:-

इस युग में तांबे में टिन मिलाकर कांसा निर्मित किया जाता था तथा उससे बने उपकरणों का प्रयोग किया जाता था  

छोटानागपुर क्षेत्र के असुर (झारखंड की प्राचीनतम जनजाति) तथा बिरजिया जनजाति को कांस्य युगीन औजारों का प्रारंभकर्ता  माना जाता है 

3) लौह युग:- 

इस युग में लोहा से बने उपकरणों का प्रयोग किया जाता था।  

झारखंड के असुर तथा बिरजिया जनजाति को लौह  युग से निर्मित औजारों का प्रारम्भकर्ता  माना जाता है। 

असुर तथा बिरजिया  जनजातियों के जनजातियों ने  उत्कृस्ट लौह तकनीकी का विकास किया। 

इस युग में झारखंड का संपर्क सुदूर विदेशी राज्यों से भी था। 

झारखंड में निर्मित लोहे को इस युग में मेसोपोटामिया तक भेजा जाता था,जहां दश्मिक  में इस लोहे से तलवार का निर्माण किया जाता था। 

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