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Saturday, August 1, 2026

Santhalo ka Parav Tyohar (संतालों का पर्व त्यौहार)

                                 

संतालों का पर्व त्यौहार 




                    संतालों का पर्व-त्योंहार सामूहिक रूप से मनाये जाने की परम्परा हैं। पर्व-त्यौहार अवसर एवं माह पर निर्भर होते हैं। संताली लोकगीत या लोकनृत्य मौसम या माह के अनुसार बदलते हैं। नव त्यौहार का शुभराभ 'माग' पर्व से होता है। बारह माह के आधार पर महीनों या बोगा के अनुसार होता है। जैसे- माघ माह में माघ बोंगा, फागुन माह से बाहा बोंगा चैत में रोहनी, वैशाख में एरो, झेटे के मुचरी, आसाढ़ में आसाढिया, सान में काराम, भादर में जानताड़, दासाय सोहराय में सोहराय, धाड़ पूस में साकरात, ।

                                                 पर्व तालिका

क्र. माह  /बोंगापर्व / पाराब देवस्थल    गीत      नृत्य     वाद्य        दिन 

1.    माघ   माघ बोंगा        मैदान     डाहार   डाहार    टामाक  माघ मुलुकसे  

                                                       लागड़े   लागड़े     दुमदाः 

                                                       दोड़ 

2.  फागुन  बाहा बौंगा         जाहेर       बाहा     बाहा       ''         "

                फागुनमुलुः 

 3. चैत        रोहनी          दोसिमना     पाता     पाता           ''     कुनामी तक 

                                                        सेंदरां

                                                        लगड़े 

4. बायसाघ     एरोः        मैदान          दोड.         पाता        "                  "

5. जेठ         मुचरी         मैदान             "              "            "                   "

6. आषाड़   आसाड़िया   जाहेर          "               "            "    आषाढ़ प्रथम 

7. सावन        काराम      अखड़ा      काराम      काराम      "    सावन प्रथम

                                                        दोड. 

8.भादोर     जानताड़   खेतजाकाम सापड़ा       पाता     भुवाड.          "

                                       जाहेर                         पाता     करताल

 9. दाँसाय     दाँसाय       गुरुगृह       दाँसाय    दाँसाय   भुवाड.   दासाय दुर्गापूजा के

                                                          रंगडा                                तीन दिन आगे

                                                                                      तुमदाः टामाः एमान 

10. सोहराय   सोहराय        गोटपुजा    सोहराय       सोहराय    तुमदाः    कालीपूजा 

11. आंघाड़    सोहराय          मैदान       लगड़े            डाण्टस       "        एमान 

12. पूस         सोहराय           घर           गाड़ी            गाड़ी   डाण्ठा   पोससाकरात

                     साकरात                         आसेन           आसेन

1. माघपर्व-  माघ पर्व 'मागबोंगा' या जनवरी-फरवरी माह में सम्पन्न होता है। जब नयी पत्तियाँ पेड़ पौधों में आती हैं तब यह पर्व मनाया जाता है। जब तक माघे पर्व नहीं होता है। तब कोई भी संताल व्यक्ति नयी पत्ती व्यवहार नहीं करते है पहाड़ जंगल नहीं जाते है। संताल समाज प्रकृति पुजारी है। इसलिए प्रकृति पूजा करने के बाद ही नयी पत्तियाँ प्रयोग में लाते है।

 2.बाहा पर्व - बाहा पर्व,फागुन माह या फरवरी-मार्च में गांव के जाहेर थान में मनाया जाता है। साल फूल सारजोम बाहा जब जंगल में खिल उठता है तब संताल बाहा पर्व मनाते है। इस माह में फूल बन, जंगल, नदी, मैदान सर्वत्र हरियाली छा जाती है इसलिए इसको बाहा पर्व कहते हैं। बाहा पर्व मनाने का मूल उद्देश्य उनका भाविष्य सुख समृद्धि के रूप में मनाया जाता है। बाहा पर्व तीन दिन मनाया जाता है। पहला दिन 'उम नाड़का दिन कहते हैं, इस दिन देवी देवताओं को नहलाया जाता है। दूसरे दिन 'बाहा सारदी कहते हैं एवं तीसरे दिन 'बाहा पर्व' की बिदाई एवं बाहा शिकार (बाहा सेंदरा) होता है। इसी प्रकार फागुन महीना में ही बाहा पर्व सम्पन्न हो जाता है। 

3. एरो पर्व- यह पर्व चैत एवं वैशाख माह में मनाया जाता है। इस अवसर पर गाँव के जाहेर थान में देवी देवताओं के नाम से मुर्गी की बलि दी जाती है तथा भली भति बीज के उगने के लिए प्रार्थना की जाती है। 

4. आसाड़िया पर्व- आषाढ़ माह में 'आसाड़िया पर्व' जाहेर में सम्पन्न होता है। जब धान की फसल में हरियाली आ जाती है तब यह पर्व मनाया जाता है। 'आषाड़ पर्व' जब तक सम्पन्न नहीं होता है तब तक कोई भी संताल अपने घर जंगली घास या चारेच नहीं काटते है, तथा नहीं लाते हैं। 

5.काराम पर्व- (सावन) माह में सम्पन्न होता है। करम पेड़ देवता के रूप में पूजन होता है। 

6. दासाय पर्व - दॉसाय पर्व दासाय माह अर्थात सितम्बर-अक्टूवर दुर्गापूजा के समय सम्पन्न होता है। 

7. सोहराय पर्व- सोहराय पर्व संथाल आदिवासियों का सबसे प्रमुख त्यौहार है। यह पर्व पालतू पशु और मानव के बीच गहरा प्रेम स्थापित करता है. यह पर्व 'सोहराय बोंगा' नवम्बर दिसम्बर जनवरी माह में मनाया जाता है। यह पर्व मवेशियों का पर्व है। इसीलिए गोधन की पूजा अर्चना की जाती है। इस अवसर पर धान की नयी फसल घर में आने के उपलक्ष में देवी-देवताओं, पितरों, मवेशियों की पूजा अर्चना की जाती है।यह पर्व पाँच दिनों तक मनाया जाता है। पर्व के पहले दिन गांव के लोगों द्वारा'गोटपूजा' सम्पन्न होता है।गोटपूजा में गोधन का आह्वान करते है। मुर्गी कीबलि तथा हँड़िया चढ़ाते है। दूसरे दिन 'गोहाल पूजा की जाती है। तीसरेदिन गांव के सभी लोग गाय, बैल एवं भैंसों को धान की बाली की मालाओं आदि से सजाकर खुंटाते हैं। इसी तरह अन्तिम दिन गांव के युवक युवतियोंका दल घर-घर जाकर नाचते-गाते मनोरंजन एवं खान-पान करते हैं। इस प्रकार यह पर्व समाप्त हो जाता है।

8. साकरात पर्व- यह पर्व वर्ष के अन्तिम माह पौष में सम्पन्न होता है। यह पर्व दो दिन होता है। पहला दिन हाकू काटकोम दिन कहते है इस दिन गांव के इर्द-गिर्द मछलियों केकड़ों, पशु-पक्षियों का शिकार कियाजाता है। दूसरे दिन 'साकरात बुढ़ी' की पूजा होती हैं एक मुर्गी की बलि, घर के चौखट पर बलि चढ़ाते हैं, तथा परिवार की कुशलता के लिए उनसे प्रार्थना की जाती है। 

                           इस तरह संताल आदिम जाति के पर्व प्रकृति, कृषि तथा आलौकिक शक्तियों से सम्बन्धित हैं। यही कारण है कि संतालों के पर्व का समय कृषि पेड़ पौधे तथा आवश्यकताओं के अनुसार सुनिश्चत होता है


स्रोत संग्रह   संथाली गद्य-पद्य संग्रह
                      काल्पनिक तस्वीर

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Tuesday, July 14, 2026

Santhali Kahni "Tara-Anchar" (तारा अंचार)

 तारा आञ्चार (काहनी)

At 71, Doyen Of Tribal Languages On A New Mission - The ...
प्रो. (डॉ.) कृष्ण चंद्र टुडू

Santhali Kahni "Tara-Anchar"  (तारा अंचार)
काल्पनिक तस्वीर

                   चाइत् बाइसाघ दिन ताँहेंकाना। “बासयाम तोराखोन गे लोलो होय साँवते, बारडू ओटाङ राकाप इदीः काना, सेरमा पेरेच् । मोने रे चेत् चो हेच आदेया “सानो मुरमू“ दो, सेंन्दरा ए सापड़ाव ओडोक एना, सारदी सितुङ, ती रेआः सार,साप् काते, “आरारू बू “ सेत । आरारू बुरू रे दो ञुत- ञुहुम तोरा खान गे हुडिञ-माराङ, जिब जियाली आर जानवारको दाः ञूको आँड़गोना, बाहा झारना ते, आर ओकावाः तेताङ को मारतोक इदिया।

                  सानो मुरमू हों सेंदरा आड़िस मोने रे, लोलो होय, सितुङ रेयाः एलाङ ते, गोसो तोलमोज आकान होड़मो, जिवी रेनाः तेताङ मारतोक लागित, आँडगो एनाय बाहा झारना सेत् गे। आँजले पेरेचदाः ए ञू आना । तेताङ मारतोक एन ताया। रूवाड़ चालाः कानाय, आजाः रूवाड़ होर ते । आचगा गे, सारदी सितुङ रे बिजोड़ पोताम लेका कुकुडुबुर सेरेञ राहाय आजोम आम केत आ।

                 आजोम आम साँवते गोसो तोलमोज आकान होड़मोहों फांडगार आरूगोंद एना। सेरेज राहा रेयाः मोज हेडेम सिबिल आटकार गोः आदेया। मोनेय दाड़ केदा, सेरेञ राहा आजोम लागि, मेनखान आतेन आतेन ते, बाई-बाई ते सेरेज राहा मुचात् इदीयेना सारदी सितुङ रेनाः लोलो आतास रें आर सेरेत्रिजाः उमुल आलहा हों दानाङ इदीयेना, सानोवाः मेत् आहा खोन सितुङ झाँज ते।

                    दोसार हिलोः आरहों जाव दिन लेका गे ती रे आः-सार साप काते, ओडोक एनाय सेंन्दरा बिर ते चेंड़े सेन्दरा। चालाव-चालाव तुलुच् तायोम सेत् ए कोयोः रूवाड केत् आ। जेलेयाय मित् कुड़ी होपोन ए पाँजा आकाः देया, माराङ आहार रेनाः आड़े दानाङ-दानाङ ते ।

-तिंगुयेनाय सानो मुरमू लाडया बाड़े दारे बुटा रे जाव दिन लेका गे।

   हेच् सुर सेटेर साँवते जेलेयाय, आजिज मिलोन जुरी “बाहा“ गे कानाय ।

- “माई बाहा, होला दो आमगेम ताँहेंकाना“ आटूपाटू सानोय मेनकेत् आ। 

   आमाः सेरेत्र राहागित्र आजोम लाःआ, पालेत्?

-  “होय इञाः सेरेस राहा गे ताँहेंकाना, आर इगित्र ताँहेंकाना।  

“ दृबोतोर सातालाः ए लाई केआय बाहा माई दो।

-  “चेदाः नोङका दो ?“ हाहाड़ायाते सानोय रोड़ केत् आ।

 -  बाहा चेत् हों बाय लाइ लेत् आ, नाडरी रोहोड़ पोसागोः कान लेकाय आइकाव लेदा पालेत् । एन हों जाव दिन लेकागे “तारा आञ्चार’ आटेत् काते दुडुप एनाय सानोवाः सुर रे, बोहोः कुटबुर आते थिर एनाय।

              सानो मुरमू दो आटोपाटो ब्राहावाः बोहो. ए.राकाप केतुआ। राका साँवते जेल केतु आय-बाहावाःताला होरासी रे “बाहा सिन्दुर’ आर लेंगा ती रे ’भेड़हेंत् साकोम” । एनरेहों कुली केदेयाय- “बाहा नोवा दोम चेका केआ? बाहा मेत् दाः जोत् जोत्ते मेन केदायदृ “दादा तोपोल लेना लाङ मोने ते, जिवी रेनाः तारा आञ्चार गाँट काते, साखीलाङ दोहो ले या नुई लाडया बाड़े दारे गे। आलाङा जिवीत् जिवोन आखिर दिन हाबिच सारीकोमा मेनते। मेनखान तेहेज ओना तोनोल तोपोल, आलाक जाड़ी नाड़ी लेका रेचराचाः तोपागोः काना-बाहा“ माई लाइ मुचात् साँवते रा राः ए धुराव एना।

                    “बाहा आम नुना चाँड़े,नुना लोगोन, इञ बागी कातेम ओडोक चालाःआ मेनते इञाः उइहार हों बाङ ताँहेंकाना आर नुनाः दुलाड़ ताहेंकाते रेहों, मोने आजाड़ी लेका तिस रेहों आमाः बाप्ला रेनाः काथा बाम लाई आहिञा, नोवा खोन हाहाड़ा दो चेत् हुय दाया आ।“ - सानोय मेन केतुआ।

                    “आर बाड़ती जाहाँनाः बाङ बिलोम काते, देलाङ जाहाँसेत् मेत्

लुतुर ओनते गेलाङ जिरा। “ - बाहाय मेन केत आ। आ पाटू सानोय मेन केत् आ- आलोम रागा, “नोङका दो चेका हुय दायाःआ। “ बाङा, बालाङ त्रिरा, आलाङा जिवित लिखोन तोपोल बानूः आनाङ । नोवा धारती रें तेहेत्र माँझी मोड़े होड़को तोल आकात् आ आमाः आञ्चार लुगड़ी, नोवा दो ओहोञ राड़ा केया। आलोम रागा, दू ओड़ाः ते रूवाड़मे,राही डाली ते सेटेर आकान, ओड़ाः दुवार रिनिच् सोनोत पेड़ा सागुनाय में जायजुग लागित् । दुलाड़ेम जिवित् जिबोन भूर । आलोम रागा, मेदाः आलोम जोरोया । दिसोम रे ताँहेंन लागित साँवताम आम केत् ।  ”दृ सानो मुरमू नोवा मेनकाते आजा धुती आञ्चार लगड़ी ते बाहावाः मेत्दाःए जोत्काः नाय एटाः सेत कोयोः काते।

                   आडी आडी काथाकिन रोपोड़ एना, मेनखान ओकोय हो ओकोय ते बाङकिन सांबडावोः काना। सानोवाः मोने जिवी रे सेदाय मारे काथा उइहार-उइहार ते कॉहिस हेच इदियाय काना, काइच काइच् ते तेहेञ आजिज सोहाग रिनिच जिवी मिरूय फारकाव ओडोकोः कानते, सानोवाः खाञ्चार खोन। दिसागे बाडे आइकाऊ लाओं, मोने-मोने ते चेत् कोचोय मेनकेत् । मुचात् तेत् आजोम एना- “नोवा होड़मो रेनाङ गोनोङ गे बानूः आनाङ, आर नोवा होड़मो दोहो काते चेत् इञ चेकाया ? “ सेदाय काथा उइहार-उइहार ते, बाई-बाई ते, आ सारए राकाप केआ, सार ए फेत् केआ, ताला कोड़ाम रे । जेल जेल ते सानो मुरमूवाः जिवी चालाव एना बाहावाः सामाङरे । मिलोन जुरी सानो बागियाः नाय, जाय जुग लागित नोवा धारती ओतेत दो।

                        बाहा आडीगेय राः हालाङ केतु आ, मेनखान चेकायाय, बाई-बाई तेय मेन केत् आ- “बिधी बिधान्तार रेनाः कोलोम दो ओकोय हों बाडे एड़ावकेया। इञाः नुसिब रे दो नोवा गे ओल ताँहेंकाना पालेत् । आर चेत ए चेकाया बाहा दो, बागियाः देयाय जाय जुग लागित आजिज मिलवा गाते । बाँदेयाकात् साड़ी लुगड़ी रेनाङ तारा आञ्चार चिरा काते,सानोवाः बोहोः ए पोटोम एसेत्काः ना, मोने जिवी रेनाङ सेदाय रोपोड़ काथा उइहार-उइहार ते । -पाटू दाड़ केत् आय ओड़ाः ते। जेलकोवाय बारयात कोड़ा हों  मेनाः कोगेया, आच बिदाये लागित ताँगि होर रे । 

                  ओड़ाः गानाडे लेबेत् साँवते हिलीत् तेत् ए मेन केत्आ- “माई ओकातेम चालाव लेना“ । चेत् हों बाङ ए लाईलेत् आ। कुसुत् कुसुत् राराः ए धुराव एना। एनखान गोड़ोम एगाँत् ए हेच एना, बाहा सुर ते। हेच् साँवते बुझाव ए छुटाव एना। - “गोड़ोम कुड़ी “आलोम रागा । कुड़ी होपोन जोनोम दो एटाः ओड़ाःगे। मित् दिन बाङ मित् दिन चालाः तेगे हुयूरू आ। इञ हों तो जानाम ओड़ाः बागी कातेञ हेच आकाना नोवा चाम्पानागार ते दो।“ माई एटाः ओड़ाः ते कुड़ी होपोनबो चालाव लेन एनाङ धारती आयोवाः रिन हालाःआ। आर नोवा गे काना कुड़ी होपोनाः धोरोम दो। एन हों राराः कान गेयाय बाहा दो। “मा, मा लोगोन सापड़ा मे, बिदाय मेया ले नावा चिरूनागार बाजार ते“ दृ आर हों गोड़ोम एंगात लाँदा सातालाः ए मेनकेतुआ।

                आडी गेय राः केतुआ। कोड़ाम चेतान ते हिडिर-हिडिर मेत दाः जोरोयेना। तारा आञ्चार लोहोत् चाबायेना। इखान चेकायाय, निट ते। आडी जाँक जोमोक राही डाली ते । हान्ते सानोवाः गोयच होड़मो, आको ओड़ाः होड़ हेच्काते को इदिकेत्आ। बाप्ला तायोम इदी रूवाड़,आगू रूवाड़ केत्किना को । आतो टोला रिन कोड़ा कुडीकोहों “सिसिर हाँडी“ एम काते को बिदाय कात कोवा । एकोड़िया केत् किना को मेनखान ओना आरे माहा हों, पारोम एना। बाहा को इदी रूवाड़ केदेया जाँवाय ओड़ा “चिरू नागर ते । किदू दाका जोम बाड़ा काते सानाम को जापित केत् आ ओड़ारे । जापित् साड़ा सातित्र ओक्तो, ताला त्रिदा बेड़ा रे लाड़ ए जोटेत् आदेया बाहायिच जिवी जुरी सामोल हाँसदाः दो। आडी गेको रान मुरगान केदेया, आडी गेको ओझा पाती केदेया। मेनखान बाङ ए बेस लेना। जिवी बेड़ा बाङ रूवाड़ लेना, बगियाः नाय जाय जुग लागित धारती ओतेत् सामोल दो। सामोल दो कायरा ढोंगा रेको आतू कादेया दारड़ा गाड़ारे । बाहा दो गेल सेरमा हाबिच जाँवाय ओड़ाः रे ताँहेंएनाय । मित् दिन दो कुड़ाम सेत रे दुडुप काते मोने मोनेते मेन जोङ काना । चेत् इञ चेकाया नोडे दो ? ओकोय साँव इञ ताँहेंना? जाहाँयगे इञ रेनको ताँहेंकाना, सानाम को  चालाब एना, इञ हुञ चालाः आ। जांहासेत् मेत् लुतुर,ओन्ते गित्र चालाः आ। होर गे होर दोय उदुःआञा,लाहा अकागित्र ताँहेंना। मित् दिन दो बाई बाई ते जुत् हुम तोरा ओडोक चालाव एनाय । कोयोः रूवाड़ सानाय काना जाँवाय ओड़ाः । मेनखान बाय कोयोः रूवाड़ दा यात् आ। जानाम ओड़ाःए हेच एना, हिली दादा बाङकिन बुगिना आडिगे किन एद्रे आड़िस आया। मित् दिन दो मोने जिवी काँहिस एनते, मोने गोटा काते मेन जोङ कानाय एकलारे “नोवा होड़मो दो चेत् ए चिकाया? चेत् ए कामीया, आपान आपिन बो हेच आकाना नोवा धारती ते दो, आर, आपान आपिन बो रूवाड़ चालाः आ, ओकोय हों ओकोय रिन हो बोन बाङ काना। “ आड़ी लेकान काथा बाहावाः मोने रे गुलावाते तारको राकाप् एना जिवीरे । ताकेर हारकेत् तारकोयेना ताला कोड़ाम रे । लाहा एनाय माड़ाङ सेत्गे, माराङ आहार रेनाः लाडया बाडे दारे बुटा तेगे। सेटेर साँवते,हानते नाते कायोः बाड़ा केत् आय। देच् एनाय दारेते, बादेयाकात् साड़ी लुगड़ी रेनाः तारा आञ्चार चिरा काते, बिन बाहा हारमालाय बेनाव केत् आ, आराव केत आय होटो रे, मेनखान जेल जेल ते, बाई बाई ते हासित एना होटोः रेनाः ’तारा आञचार बाहा माला’ दो। लाडया बाड़े दारे रेनाः डार रे,बाहामाई दोय आकायेना, जिवी मिरू हों फारकाव ओडोक एना जायजुग लागित, होड़मो खानचार खोन। खान गे सेरमा रे बिजली साँवते हुडुर साडेयेना। बाहा माईवाः जियोन खेलोड दो तारा आञ्चार लेका तारा रेगे मुचात्एना।

स्रोत संग्रह   संथाली गद्य-पद्य संग्रह
                      काल्पनिक तस्वीर




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Saturday, May 29, 2021

Santali Grammar (Noun) संज्ञा (ञुनुम)

Santali Grammar (Noun) संज्ञा (ञुनुम)

किसी व्यक्ति ,वस्तु, स्थान, भाव आदि के नाम को संज्ञा कहते है। 
अर्थ के आधार पर संताली में संज्ञाएँ निम्नलिखित है।  
1) जातिवाचक संज्ञा -(Common Noun) जा़त ञुनुम :- जिस संज्ञा शब्दों से जाति का बोध हो, उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे गाय (डंगरी), नदी (गाडा)  इत्यादि।

Santali Grammar (Noun) संज्ञा (ञुनुम)

2) व्यक्तिवाचक संज्ञा -(Proper Noun) ञुतूम ञुनुम
 :- जिस संज्ञा शब्दों से किसी खास व्यक्ति, वस्तु या स्थान का बोध हो उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं 
। जैसे :-राम, कृष्ण, हिमालय, (स्थान का नाम) चंपा फूल इत्यादि।

3) समूह वाचक संज्ञा (Collective Noun) गादेल ञुनुम :- जिस संज्ञा शब्दों से समूह का बोध होता है, उसे समूहवाचक संज्ञा कहते हैं । जैसे -मेला (पाता), सेना (फाद) आदि। 


5) भाववाचक संज्ञा (Abstract Noun) गुनान ञुनुम :- जिस संज्ञा शब्दों से किसी व्यक्ति या वस्तु के गुण या धर्म, दशा, स्वभाव, आदि का बोध होता है, उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे :- बलवान (दाड़ेयान), कसैलापन (कासा), बुढ़ापा (हड़ाम) आदि।


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Saturday, May 22, 2021

Santhalo Ka Udbhav Aur Vikas (संतालों का उद्भव और विकास)

Santhalo Ka Udbhav Aur Vikas

➧ संतालों  के उद्भव और विकास के संबंध में अनेक गीत एवं कहानियां मिलती हैं 

➧ संतालों  का जन्म हिहिड़ी-पिपीड़ी देश में हुआ है 

➧ हिहिड़ी-पिपीड़ी एक देश है जहां मनुष्य के प्रथम पूर्वज पिलचु पहड़ाम और पिलचू बूढ़ी रहे थे

संतालों का उद्भव और विकास

➧ दोनों की उत्पत्ति हंस और हंसिनी (हांस-हांसली) के अण्डे  हुई थी और उन्हीं दोनों ने मानव वंश की नींव डाली 

 पिलचु दंपति के 7 पुत्र एवं पुत्र 7 पुत्रियां  जन्म ली थी। 

 7 (सात) पुत्र  का नाम "सेंदरा, सांदोम, चारे, माने, आचारे, डेला और लेटा" थे। 

➧ 7 (सात) पुत्री का नाम  "छीता, कापरा, हिसी, डुमनी, दानगी, पुङ्गी और नायन" थी 

➧ जब ये लोग जवान हुए तो इन्होने अनजाने में विवाह सम्बन्ध स्थापित किये थे। कालांतर में जब मनुष्यो के जीवन में पाप समावेश होने लगा तो मरांग बुरु (ठाकुर) जी को अत्यंत क्लेश एवं दुख दर्द अनुभव हुआ, तब ठाकुर ने 7 दिन 7 रात अग्नि की वर्षा की थी 

➧ अग्नि वर्षा में 1 जोड़ी (जुड़ी पुरुष-स्त्री)  "हाराता पहाड़" की गुफा में छुपी हुई थी . 

➧ उन्हीं के वंशज "होड़" अर्थात मनुष्य कहलाया

 जब इनकी वंशज अधिक बढ़ गए तब इन्होंने हाराता से सासाड. बेडा (लोहित सागर) गए थे

➧ सासाड. बेड़ा में ये लोग 12 (बारह) गोत्र में विभाजित हुए थे

 हांसदा:, मारडी, सोरेन, हेम्ब्रम, टुडू , किस्कू, बास्के , बेसरा , चौड़े, पांवरिया, गोंडवार, मुर्मू। 

➧ सासाड. बेड़ा से जारपी दिसोम, आयरे दिसोम, क़ांयडे दिसोम, और चाम्पा दिसोम गाये थे 

➧ जब ये चाम्पा दिसोम में गये तो उन्होनें गोत्रों के अनुसार सामाजिक कार्य विभाजित किये थे।  

(i) किस्कू -रापाज 

(ii) मुर्मू -ठाकुर 

(iii) हेम्ब्रम -कुंवर 

(iv) सोरेन -सिपाही 

(v) मारडी- किंसाड़ 

(vi) हांसदा -पुरुधूल  

(vii) टुडू -मादाड़िया 

(viii) बेसरा -गायनाहिया 

(ix) बास्के -बेपारिया

(x) पावरिया -ओझा  

(xi) चौड़े -सुसारिया 

(xii) गोंडवार-सुसरिया। 

➧ चाम्पागाड़ में ये लोग बहुत दिनो तक रहे थे

➧ यहां इन्होंने विभिन्न दिशाओं में काफी प्रगति किए थे। यहां रहते-रहते इन्होंने अपनी-अपनी राज्य की स्थापना की थी 

➧ 12 गोत्रों के अनुसार अलग-अलग किले बनाए थे  

(i) हांसदा के लिए कुटामपुरीगाड़

(ii) मुर्मू के लिए चाम्पागाड़ 

(iii) किस्कू के लिए कोंयडागाड़ 

(iv) सोरेन के लिए चाईगाड़ 

(v) हेम्ब्रम के लिए खैरीगाड़  

(vi) मारडी के लिए बदोलीगाड़

(vii) टुडू के लिए लुईबाड़ीलुकुयबाड़ीगाड़ 

(viii) बेसरा के लिए बिनसारियागाड़

(ix) बास्के के लिए हारवा लोयोड. 

(x) पावरिया के लिए बामागड़ 

(xi) चौड़े के लिए कोडेगाड़ 

(xii) बेदिया के लिए होलोडगाड़ 

 इसके बाद इन्होंने तोड़े पुखरी, एयायनाई (सात नदी), गाड़ नाई , सिर दिसोम, सिकार दिसोम होते हुए "सान्त" अर्थात सिलदा परगना प्रदेश में आये थे सान्त प्रदेश में इन्हें संताल कहलाया 

 विकास के क्रम में संतालों के साथ अनेक घटना घटी है उन घटनाओं को ताजा रखने के लिए 'पर्व त्योहारों' में,  भित्ति चित्रों में, कृषि कार्य से संबंधित औजारों आदि में विभिन्न प्रकार के चित्रों अंकित करते हैं

➧ संतालों का उद्भव और विकास से संबंधित लोकगीत, लोककथा, लोककहानी, लोकगाथा , लोकसंगीत, मुहावरे, लोकोक्तियां, लोरी, पहेलियां आदि पाए जाते हैं 

➧ यह सब मौखिक रूप से युगों से संताली लोक जीवन में चले आ रहे हैं 

➧ जिससे संतालों का उद्भव और विकास का पता चलता है सहायक पुस्तकें :-

1. टुडू मांझी रामदास 'रेस्का'- खेरवाड़ बांसों धोरोम पुथी,1882  

2. टुडू डॉ. कृष्ण चंद्र - सानताड़ी होड़ साँवहेंत कथा, 2008  

3. स्क्रेफसरुड एल. ओ. - मारे हापड़ामको रेया: काथा, 1887

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