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Thursday, July 1, 2021

Jharkhand Me Pratham (झारखंड में प्रथम)

Jharkhand Me Pratham

झारखंड का प्रथम साहित्य उल्लेख       -      ऐतरेय ब्राह्मण में  पुण्ड्र नाम से

➦ झारखंड शब्द का प्रथम प्रमाण             -      तेरहवीं सदी के ताम्रपत्र पत्र में 

➦ झारखंड में अंग्रेजों का प्रथम प्रवेश        -      सिंहभूम (1761 ईस्वी) 

➦ प्रथम जनजातीय विद्रोह                      -      ढाल विद्रोह (1767-1777 ईस्वी) 

Jharkhand Me Pratham (झारखंड में प्रथम)

 अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम विद्रोह              -       ढाल विद्रोह (1767-1777 ईस्वी) 

➦ प्रथम सुसंगठित जनजातीय विद्रोह     -       कोल विद्रोह (1831-32 ईसवी)

1857 ईस्वी के विद्रोह का सर्वप्रथम प्रारंभ  -   रोहिणी गांव में घुड़सवार सैनिकों द्वारा (12 जून,1857 ई.) 

 राज्य निर्माण हेतु प्रथम प्रयास                -   जयपाल सिंह द्वारा (1939 ई.)

 प्रथम राज्यपाल                                     -   प्रभात कुमार 

➦ प्रथम कार्यवाहक राज्यपाल                    -   विनोद चंद्र पांडे

 झारखंड उच्च न्यायालय के प्रमुख मुख्य न्यायाधीश -   विनोद कुमार गुप्ता 

 प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश              -   ज्ञान सुधा मिश्र

 प्रथम मुख्यमंत्री                                    -    बाबूलाल मरांडी (भाजपा)

 प्रथम निर्दलीय मुख्यमंत्री                      -    मधु कोड़ा 

➦ प्रथम विधानसभा अध्यक्ष                      -    इंदर सिंह नामधारी

 प्रथम विधानसभा उपाध्यक्ष                   -    बागुन सुम्ब्रई 

 प्रथम प्रोटेम स्पीकर                               -   विशेश्वर खान 

➦ प्रथम मनोनीत विधानसभा सदस्य          -  जोसेफ पेचेल गालस्टीन (एंग्लो-इंडियन)

 प्रथम विपक्ष के नेता                                -  स्टीफन मरांडी 

 झारखंड सरकार में प्रथम महिला मंत्री      -  जोबा मांझी

 प्रथम महाधिवक्ता                                  -  मंगलमय बनर्जी

 प्रथम मुख्य सचिव                                  -  विजय शंकर दुबे 

➦ प्रथम पुलिस महानिदेशक                       -  शिवाजी महान कैरे 

➦ प्रथम लोकायुक्त                                    -   न्यायमूर्ति लक्ष्मण उरांव 

➦ जेपीएससी के प्रथम अध्यक्ष                    -  फटीक चंद्र हेंब्रम 

➦ राज्य महिला आयोग की प्रथम अध्यक्ष   -  लक्ष्मी सिंह 

➦ पद्म श्री सम्मान पाने वाला प्रथम आदिवासी  - जुएल लफड़ा 

➦ प्रथम परमवीर चक्र प्राप्तकर्ता                  -   अल्बर्ट एक्का 

➦ प्रथम अशोक चक्र प्राप्तकर्ता                     -   रणधीर वर्मा 

➦ प्रथम अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी हॉकी महिला खिलाड़ी   -   सावित्री पूर्ति

 प्रथम महिला हॉकी खिलाड़ी जिसने ओलंपिक खेला   -   निक्की प्रधान

 प्रथम अंतर्राष्ट्रीय महिला एथलीट             -    विजय नीलमणि खालखो 

➦ प्रथम अंतर्राष्ट्रीय महिला अंपायर             -    असुंता लकड़ा 

➦ एवरेस्ट पर चढ़ने वाली प्रथम महिला        -    प्रेमलता अग्रवाल 

➦ प्रथम शतरंज खिलाड़ी जो विश्व विजेता बना  -  दीप सेनगुप्ता

छऊ नृत्य का विदेश में प्रथम प्रदर्शन           -    सुधेन्द्रु नारायण सिंह द्वारा (1938 ई.)

➦ प्रथम क्रांतिकारी जिन्हें पकड़ने के लिए 
अंग्रेजों ने ₹1000 इनाम की घोषणा की             -    बुधु भगत (कोल विद्रोह)

➦ प्रथम परखनली शिशु                                  -    आशीष सिंह 

➦ प्रथम हिंदी मासिक                                     -    घरबंधु 

➦ प्रथम हिंदी दैनिक                                        -   राष्ट्रीय भाषा 

➦ प्रथम अंग्रेजी दैनिक                                    -    डेली प्रेस 

➦ प्रथम हिंदी सप्ताहिक                                  -   आर्यावर्त 

 प्रथम फिल्म                                               -   आक्रांत 

➦ प्रथम नागपुरी फिल्म                                  -   सोनाकर नागपुर 

➦ प्रथम संथाली फिल्म                                   -   मुख्य बाह्य

 ➦ प्रथम विश्वविद्यालय                                -   रांची विश्वविद्यालय

 प्रथम कृषि विद्यालय                                 -  बिरसा कृषि विश्वविद्यालय

➦ प्रथम महाविद्यालय                                   -  संत कोलंबा महाविद्यालय, हजारीबाग 

➦ प्रथम चिकित्सा महाविद्यालय                    -  राजेंद्र चिकित्सा महाविद्यालय, रांची (रिम्स)

 प्रथम आयुर्वेद महाविद्यालय                       -  राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, लोहरदगा

 प्रथम तांबा कारखाना                                   -  घाटशिला 

➦ प्रथम बिजली घर                                         -   तिलैया         


➦ पठारी क्षेत्रों में खनन करके निर्मित प्रथम रेल मार्ग   -  जमशेदपुर से हावड़ा 

➦ प्रथम सीमेंट उद्योग                                   -   जपला सीमेंट उद्योग 

➦ प्रथम नगरपालिका                                     -   रांची नगरपालिका (1869 ईस्वी)

 प्रथम नगर निगम                                      -   रांची नगर निगम (1979 ईस्वी)

 रांची की प्रथम महिला मेयर                        -    रमा खलखो

 ऑस्ट्रेलियन इंडीवर फैलोशिप                     -   निमिश त्रिपाठी 

 सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त होने वाले राज्य के प्रथम निवासी   -  न्यायधीश एम, वाई.  इकबाल 

 प्रथम महिला फास्ट ट्रेक कोर्ट                      -   रांची 

 प्रथम महिला डाकघर                                  -   जमशेदपुर

 राज्य में फास्ट ट्रैक कोर्ट की प्रथम महिला न्यायधीश     -   सीमा सिन्हा

 प्रथम ईसाई मिशन                                     -   गोसनर मिशन 


➦ सर्वप्रथम कोयला खनन                              -    झरिया (धनबाद)

 प्रथम हवाई अड्डा                                       -   बिरसा मुंडा हवाई अड्डा (रांची)
 
➦ प्रथम दूरदर्शन केंद्र                                      -   रांची

 प्रथम जल विद्युत परियोजना                     -    तिलैया जल विद्युत परियोजना





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Jharkhand Ke Vividh Tathya- Part-1(झारखंड के विविध तथ्य)

Jharkhand Ke Vividh Tathya(Part-1)

(1) विवेकानंद की प्रतिमा स्थापित :- राजधानी रांची में 12 जनवरी, 2019 ईस्वी को युवा दिवस के अवसर पर बड़ा तालाब में स्थित टापू पर विवेकानंद की 30 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है

➧ इस प्रतिमा के मूर्तिकार राम वी.सुतार हैं 

Jharkhand Ke Vividh Tathya- Part-1(झारखंड के विविध तथ्य)

(2) जोहार (JOHAR -Jharkhnad Opportunities For Harnessing Rural Growth) परियोजना :- राज्य स्थापना दिवस पर डेढ़ हजार करोड़ की जोहार( Jharkhnad Opportunities For Harnessing Rural Growth) परियोजना का शुभारंभ किया है

➧ इस योजना का लक्ष्य 2 लाख ग्रामीण परिवारों की कृषि एवं गैर-कृषि आजीविका संबंधी गतिविधियों सहित उत्पादों में विविधता एवं उत्पादकता बढ़ाते हुए उनकी आय को दोगुना करना है 

➧ इसके अंतर्गत नीति आयोग द्वारा चयनित राज्य के 19 पिछड़े जिले का समग्र विकास किया जाए जायेगा 

(3) इटखोरी महोत्सव -19, 20 एवं 21 फरवरी, 2018 को चतरा जिला स्थित इटखोरी के भद्रकाली मंदिर परिसर में इटखोरी महोत्सव का आयोजन किया गया

➧ इटखोरी में हिंदू, जैन और बौद्ध तीनों धर्म का संगम स्थल है

 यहां नवी शताब्दी में निर्मित मां भद्रकाली मंदिर, मंदिर परिषद में 1008 से अधिक शिवलिंग की आकृति स्थित है 

➧ यहां एक बौद्ध स्तूप है, जिस पर एक सौ से अधिक बुद्ध की आकृतियां बनी है यहां झारखंड सरकार ने विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप बनाने की घोषणा की है 

(4) नए प्रखंड का गठन :- वर्तमान में 264 प्रखंड को बढ़ाकर फरवरी, 2018 में 267 कर दिया गया है नए प्रखंड के तहत धनबाद सदर से अलग कर पुटकी धनबाद जिले के ही निरसा प्रखंड से अलग कर कलीयासोल एग्यारकुंड तथा जमशेदपुर के गोलमुरी-सह-जुगसलाई प्रखंड को दो प्रखंड में विभाजित कर जमशेदपुर और मानगो का गठन किया गया है

(5) स्किल यूनिवर्सिटी :- खूंटी जिला में स्किल यूनिवर्सिटी, इंजीनियरिंग कॉलेज एवं नॉलेज सिटी की स्थापना की जाएगी

(6) बोराबिन्दा टापू :- सरायकेला-खरसावां जिला स्थित चांडिल डैम को इको-टूरिज्म स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है

➧ इसका विकास भारत सरकार की स्वदेशी दर्शन स्कीम के अनुरूप राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा । इस टापू पर राजा विक्रमादित्य की प्रतिमा स्थापित की जाएगी

(7) झारखंड आदर्श ग्राम :- राज्य में आरा और केरम गांव को आदर्श ग्राम बनाया गया है राज्य में 1000 गांवों  को आदर्श ग्राम बनाया जाएगा इन ग्रामों को नशामुक्त एवं खुले स्वच्छ खुले में शौच से मुक्त किया जाएगा

(8) निरोग बल वर्ष, 2018 :- वर्ष 2018 झारखंड में निरोग बाल वर्ग के रूप में मनाया गया इसके तहत कुपोषण से लड़ने का अभियान चलाया गया

(9) राइट टू सर्विस डिलवरी एक्ट :- इस एक्ट के तहत नागरिकों को 50 से अधिक सेवाएं ऑन-लाइन मिलने लगी है 

(10) झारखंड धर्म स्वतंत्र विधेयक, 2017 :- राज्य कैबिनेट ने झारखंड धर्म स्वतंत्र विधेयक, 2017 के ड्राफ्ट की मंजूरी दी गई है

➧ इसके तहत जबरन धर्मांतरण कराने वाले को 3 साल की जेल या ₹50000 जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया है

(11) ब्राउन फील्ड प्रोजेक्ट  :- अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर 12 जनवरी, 2018 से ब्राउन फील्ड प्रोजेक्ट शुरू किया गया है इसके तहत 800 युवाओं को प्रशिक्षण दिया जायेगा

रांची स्थित पुनदाग में ग्रीन फील्ड प्रोजेक्ट के तहत ढाई से 3 वर्ष में विश्व स्तरीय प्रशिक्षण केंद्र शुरू किया जाएगा

(12) नगरपालिका निर्वाचित प्रतिनिधि नियमावली में संशोधन :- 24 अक्टूबर, 2017 को राज्य सरकार ने झारखंड नगरपालिका निर्वाचित प्रतिनिधि नियमावली में संशोधन किया है 

➧ इसके तहत वैसे प्रतिनिधि जिनकी 8 अक्टूबर, 2013 तक 2 से अधिक बच्चे हैं, वे नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायतों के निर्वाचित षार्षद  और जनप्रतिनिधियों के रूप में अयोग्य नहीं होंगे

(12) चाईबासा की बसंती गोप देश की सर्वश्रेष्ठ पारा लीगल वॉलेंटियर :- असहायों की मददगार होने के कारण चाईबासा में मदर टेरेसा के रूप में मशहूर बसंती को नई दिल्ली स्थित प्रवासी भारतीय केंद्र में आयोजित लीगल सर्विस डे के अवसर पर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने सर्वश्रेष्ठ पारा लीगल वॉलेंटियर सम्मान से नवाजा

➧ झालसा की ओर से उन्हें पहले ही झारखंड का सर्वश्रेष्ठ पारा लीगल वॉलेंटियर चुना जा चुका है 

पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को झारखंड तीरंदाजी संघ का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है 

 साहिबगंज में कृषि महाविद्यालय स्थापित किए जाने का प्रस्ताव है  

 वर्ष 2017-18 में 963 किलोमीटर पथों के निर्माण के पथ  घनत्व बढ़कर 145 किलोमीटर प्रति हजार वर्ग किलोमीटर हो गया है

 न्यायमूर्ति अनिरुध्द बोस को झारखंड हाईकोर्ट का 12वां  मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया है इन्हें 11 अगस्त 2018 ईस्वी को नियुक्त किया गया

 शिवधारी राम को झारखंड राज्य अनुसूचित जाति का पहला अध्यक्ष नियुक्त किया गया है

 20 अगस्त, 2018 ईस्वी को चंद्रमौली सिंह को झारखंड का महालेखाकार नियुक्त किया गया है 

 झारखंड देश का पहला ऐसा राज्य है, जहां ₹1 में महिलाओं के नाम पर 50 लाख तक की संपत्ति की रजिस्ट्री हो रही है 

"शक्ति पत" नामक पुस्तक का संबंध झारखंड में संचालित सखी मंडल से है

 मैक्सलुस्कीगंज स्थित दूली गांव में एक ही स्थान पर चारों धर्मों के पूजा स्थल है 

 नेतरहाट में कृषि केंद्र की स्थापना एवं जनजातीय प्रशासनिक प्रशिक्षण केंद्र बनाने की घोषणा की गई गई है

 GST Advisory Committee गठित करते हुए 1 जुलाई, 2017 से GST लागू किया जा चुका है

 झारखंड की राजधानी रांची में स्थित जैव विविधता उद्यान का नाम "धन्वंतरी औषधीय उद्यान" गया है 

 दोरोथिया केरकेट्टा या सिमडेगा जिला के स्वच्छता एंबेसडर के रूप में जाने जाते हैं

 गांव के युवाओं को सक्रिय करने के लिए पंचायती स्तरीय "कमल क्लब" का गठन किया गया है इसमें 18 से 40 वर्ष तक के युवाओं को सदस्य बनाया गया हैं

 आदिम जनजातियों के सर्वांगीण विकास के लिए राज्य में "आदिम जनजाति प्राधिकार समिति" बनायी गयी है

 13 मार्च, 2018 को राज्य सरकार ने चतरा जिले के टंडवा अंचल के दो राजस्व ग्रामों (बचरा उत्तरी एवं बचरा दक्षिणी) को मिलाकर बचरा नगर पंचायत का गठन किया गया है 

 झारखंड नगरपालिका अधिनियम 2011 में संशोधन कर गिरिडीह जिला अंतर्गत धनवार अंचल के चार राजस्व गांव (धनवार,  मायाराम टोला, उपरैली औरबथुवाडीह) को मिलाकर धनवार नगर पंचायत एवं सरिया अंचल के राजस्व ग्राम बड़की सरैया को "बड़की सरैया" नगर पंचायत बनाया गया है

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Sunday, June 27, 2021

National Agriculture Market e-NAM (राष्ट्रीय कृषि बाजार e-NAM)

National Agriculture Market (e-NAM)

➧ 14 अप्रैल, 2016 ईस्वी को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नई दिल्ली के विज्ञान भवन से एक राष्ट्रीय कृषि बाजार हेतु ई-व्यापार प्लेटफार्म (e-NAM) का पायलट आधार पर शुरू किया गया। 

➧ इसी देश के 8 राज्यों (उत्तर प्रदेश, गुजरात, तेलंगना, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, झारखंड और हिमाचल प्रदेश) 21 मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार के साझा प्लेटफार्म (ई-ट्रेडिंग पोर्टल) से जोड़ दिया गया है

National Agriculture Market e-NAM (राष्ट्रीय कृषि बाजार e-NAM)

 राष्ट्रीय कृषि बाजार का यह ई-व्यापार प्लेटफार्म कृषि विपणन क्षेत्र में सुधारों को प्रोत्साहित करेगा और इससे देशभर में किसी वस्तुओं के मुक्त प्रवाह के संवर्धन के साथ किसानों के उत्पादों के बेहतर विपणन की संभावनाओं में भी मदद करेगा

➧ उल्लेखनीय है कि आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) द्वारा 1 जुलाई, 2015 को कृषि-तकनीकी अवसंरचना कोष (ATIF: Agri-Tech Infrastructure Fund) के माध्यम से 'राष्ट्रीय कृषि बाजार' की स्थापना हेतु केंद्रीय क्षेत्र योजना को 2015-16 से 2017-18 अवधि हेतु 200 करोड रुपए के परिव्यय के साथ स्वीकृति प्रदान की गई थी

 वर्ष 2018-19 के बजट में झारखंड सरकार ने इस योजना में पंजीकृत किसानों को स्मार्टफोन उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है

➧ कृषि, सहकारिता एवं कृषि कल्याण विभाग DAC & FW) इस योजना का क्रियान्वयन देशभर में चयनित विनियमित कृषि बाजारों में परियोजना योग्य साझा इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म के द्वारा लघु किसानों के लिए कृषि व्यवसाय संघ (SFAC) के माध्यम से कर रहा है

➧  साझा ई-व्यापार प्लेटफार्म के साथ एकीकरण हेतु राज्यों/संघीय क्षेत्रों को :-

(i) पूरे राज्य में वैध एकल लाइसेंस, 

(ii) बाजार शुल्क की एकल बिंदु लेवी और

(iii)  कीमतें प्राप्त करने के साधन के रूप में इलेक्ट्रॉनि नीलामी के प्रावधानों  के रूप में अपने राज्य कृषि उत्पाद विपणन समिति (APMC) अधिनियमों (मंडी कानूनों) में पूर्व सुधार करना आवशयक है 

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Wednesday, June 16, 2021

Jharkhand Punarsthapana evam Punarvas Niti-2008 (झारखंड पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास नीति-2008)

Jharkhand Punarsthapana evam Punarvas Niti-2008

➧ झारखंड के स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा हेतु झारखंड सरकार ने वर्ष 2008 में झारखंड पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास नीति की घोषणा की, इस नीति का मुख्य उद्देश्य इस प्रकार है 

झारखंड पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास नीति-2008

(I) जहां तक संभव हो, न्यूनतम विस्थापन, विस्थापन न करने अथवा कम-से-कम विस्थापन करने के विकल्पों को को बढ़ावा देना

(II) प्रभावित व्यक्तियों की सक्रिय भागीदारी के पर्याप्त पुनर्वास पैकेज सुनिश्चित करना तथा पुनर्वास प्रक्रिया में तेजी से कार्यान्वयन सुनिश्चित करना

(III) समाज के कमजोर वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के अधिकारों की सुरक्षा करने तथा उनके विचार के संबंध में ध्यान पूर्वक तथा संवेदनशीलता के साथ कार्रवाई किए जाने पर विशेष ध्यान रखने को सुनिश्चित करना 

(IV) पुनर्वास कार्यों को विकास योजनाओं तथा कार्यान्वयन प्रक्रिया के साथ एकीकृत करना

(V) जिस क्षेत्र में बड़ी संख्या में परिवारों का विस्थापन हो, वहां सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन लागू करना तथा पुर्नस्थापन क्षेत्र में अपेक्षित आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना 

(VI) प्रभावित परिवारों के बेहतर जीवन स्तर उपलब्ध कराने तथा सतत रूप से आए मुहैया कराने हेतु संयुक्त प्रयास करना 

पुर्नस्थापन एवं पुनर्वास

 यदि किसी परियोजना के लिए भूमि अर्जन के कारण किसी भी क्षेत्र में 100 या इससे अधिक परिवारों का  अनैच्छिक स्थापन हो रहा हो तो राज्य सरकार अधिसूचना के द्वारा उपायुक्त के स्तर के समकक्ष किसी अधिकारी को पुनर्स्थापन  और पुनर्वास प्रशासन के रूप में नियुक्त करेगी

➧ प्रशासन की सहायता के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति भी की जाएगी

➧ पर्यावरण प्रभाव तथा सामाजिक प्रभाव का मूल्यांकन जन-सुनवाई के माध्यम से 30 दिनों के अंदर पूरा किया जाएगा

पुनर्स्थापन तथा पुनर्वास योजना

➧ किसी परियोजना के लिए भूमि के अर्जन अथवा या किसी अन्य कारणवश सामूहिक रूप से किसी भी क्षेत्र में 100 या से अधिक परिवारों के अनैच्छिक परिवारों के विस्थापन की संभावना हो तो वह एस.आई.ए.स्वीकृति के 15 दिनों के अंदर आदेश के माध्यम से गांव के क्षेत्र अथवा स्थानों को प्रभावित क्षेत्र घोषित करेगा


➧ जिसमें कम से कम 2 हिंदी भाषा में होंगे, जिनका प्रचलन गांवों में अथवा क्षेत्र में होता हो, जिनके प्रभावित होने की संभावना है

 इस सर्वेक्षण से प्रभावित परिवारों के बारे में इसके अनुसार ग्राम वार सूचना दी जाएगी
 
(i) परिवार के वे सदस्य जो प्रभावित क्षेत्र में रह रहे हैं, कब से रह रहे हैं , किस व्यापार, कारोबार अथवा पेशे में लगे हुए हैं

(ii) कृषि श्रमिक अथवा गैर-कृषि श्रमिक

(iii) अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति, आदिम जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित परिवार

(iv) दिव्यांग, निराश्रित, अनाथ, विधवाएँ, अविवाहित लड़कियां, परित्यक्त महिलाएं अथवा ऐसे व्यक्ति जिनकी आयु 50 वर्ष से अधिक है, जिन्हें वैकल्पिक आजीविका उपलब्ध नहीं कराई गई है अथवा तत्काल उपलब्ध नहीं कराई जा सकती है और जो अन्यथा परिवार के  भाग के रूप में शामिल नहीं होते हैं

(v) ऐसे परिवार, जो भूमिहीन है तथा गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले, परंतु प्रभावित क्षेत्र की घोषणा की तारीख से पहले प्रभावित क्षेत्र में कम-से-कम गैर अनुसूचित क्षेत्र में 15 वर्ष एवं अनुसूचित क्षेत्र में 30 वर्षों से अन्यन अवधी से लगातार रह रहे हैं तथा जो संबंधित ग्राम सभा द्वारा प्रमाणित हो

➧ अनुसूचित क्षेत्र के 100 या इससे अधिक अनुसूचित जनजातियों के परिवारों के अनैच्छिक विस्थापन के मामले में जनजातीय सलाहकार परिषद से विचार-विमर्श किया जाएगा 


प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास 
लाभ 

➧ ऐसे किसी भी प्रभावित परिवार, जिसके पास अपना घर हो उसका घर अधिग्रहित कर लिया गया हो, को प्रत्येक एकल परिवार के लिए अर्जित किए गए भूमि के लिए ग्रामीण क्षेत्र में 10 डिसमिल तथा शहरी क्षेत्र में 5 डिसमिल तक आवास के लिए बिना किसी लागत के अंतरित की जाएगी 


➧ गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी के प्रत्येक परिवार जिनके पास वासभूमि नहीं हो जो प्रभावित क्षेत्र की घोषणा की तारीख से पहले गैर-अनुसूचित क्षेत्र में 15 वर्षों से और अनुसूचित क्षेत्र में 30 वर्षों से लगातार रह रहा हो और अनैच्छिक रूप से विस्थापित हुआ हो, को पुनर्स्थापन  क्षेत्र के ग्रामीण क्षेत्र में 55 वर्गमीटर विस्तार वाला क्षेत्र का मकान मुहैया कराया जा सकता है

➧ परिवारों को आवंटित की गई भूमि या घर सभी ऋणों से मुक्त होगा तथा पति और पत्नी के संयुक्त नाम से होगा

➧ परियोजना से प्रभावित परिवारों से पशुओं के लिए तथा पशुशाला के लिए के निर्माण के लिए ₹35000 की राशि दी जाएगी 

➧ इन परिवारों को भवन-निर्माण की सामग्री एवं सामान तथा पशुओं के स्थानांतरण के लिए ₹15000 की वित्तीय सहायता एवं ऐसे दुकानदार जिनकी विस्थापन के कारण उनकी दुकान अथवा गुमटी प्रभावित हुई है, उसे ₹50000 की वित्तीय सहायता दी जाएगी 


शिकायत निवारण तंत्र

➧ राज्य सरकार प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापन और पुनर्वास योजना कार्यान्वयन के लिए सरकारी अधिकारी की अध्यक्षता में एक समिति गठित करेगी, जो अनुमंडल पदाधिकारी से छोटा ना हो इस समिति को पुनर्स्थापन और पुनर्वास समिति कहा जाएगा 

➧ परियोजना स्तर पर पुनर्स्थापन और पुनर्वास समिति के अंतर्गत आने वाले मामलों से छोड़कर जिले में प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापन तथा पुनर्वास के कार्य की प्रगति की निगरानी और समीक्षा करने के लिए  उपायुक्त की अध्यक्षता में एक स्थायी पुनर्स्थापन और पुनर्वास समिति गठन की जाएगी 

➧ शिकायतों का समयबद्ध रूप से निपटारा हेतु राज्य सरकार द्वारा त्रिसदस्यीय न्यायाधिकरण का गठन किया जाएगा 


निगरानी तंत्र

➧ राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक परिषद होगा, जो पुनर्स्थापन और पुनर्वास समिति के क्रियान्वयन के संबंध में परामर्श, समीक्षा एवं अनुश्रवण का कार्य करेगा  

➧ परिषद में संबंधित विभाग के मंत्री, राज्य के मुख्य सचिव तथा संबंधित विभाग के सचिव होंगे

➧ इस परिवार में राष्ट्रीय स्तर के ख्याति प्राप्त विशेषज्ञ को सदस्य के रूप में रखा जा सकता है 

➧ राज्यस्तरीय  पुनर्स्थापन और पुनर्वास की वर्ष में कम से कम 2 बैठकें आयोजित की जाएंगी

सूचना का आदान-प्रदान 

➧ विस्थापन, पुनर्स्थापन  और पुनर्वास के संबंध में सभी सूचना, प्रभावित व्यक्तियों के नाम पुनर्स्थापन और पुनर्वास पैकेज के ब्यूाेरो को इंटरनेट पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाएगा तथा परियोजना प्राधिकारियों द्वारा इस सूचना से संबंधित ग्राम-सभाओं, पंचायतों आदि को अवगत कराया जाएगा 

➧ इस नीति के अंतर्गत शामिल प्रत्येक मुख्य परियोजना के पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास के लिए राज्य सरकार के संबंधित विभाग में एक पर्यावलोकन  समिति गठित होगी

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Monday, June 7, 2021

Jharkhand Ke Sadan (झारखंड के सदान)

Jharkhand Ke Sadan

➧ झारखंड राज्य में सामान्यत: गैर-जनजातियों को सदान कहा जाता है परंतु ऐसा नहीं है : सभी गैर-जनजातियां सदान नहीं है वास्तव में सदान झारखंड की मूल गैर जनजातीय लोग है

 व्युत्पत्ति की दृष्टि से 'सदन' शब्द का एक तद्धित शब्द है जो सद+आन से बना है

➧ सद का कोषगत अर्थ है :- बैठना, विश्राम करना, बस जाना इस प्रकार 'सदान' शब्द का अर्थ होगा ऐसे लोग जो यहां बैठे हुए थे या बसे हुए थे 

झारखंड के सदान

➧ सदानी भाषा नागपुरी में घर में बसने वाले कबूतर को 'सदपरेवां ' कहा जाता है और जंगली कबूतर को या घर में नहीं रहने वाले कबूतर को 'बनया कबूतर' कहा जाता है ठीक इसी प्रकार 'सदपरेवा' की तरह सदानों को समझना चाहिए और 'बनया कबूतर' की तरह वनवासी या आदिवासियों को समझना चाहिए

➧ दोनों के लक्षण और चरित्र कुछ अलग है अतः इसे समझने के लिए तुलनात्मक अध्ययन की आवश्यकता है।(i) आदिवासी कबीलाई होते हैं, जबकि सदान समुदायी होते हैं

(ii) आदिवासी घुमंतू स्वाभाव के लोग हैं किंतु कुछ कबीलाई लोग अब स्थायित्व प्राप्त करने लगे है जबकि सदन स्वभावतः घुमंतू नहीं है, इनका स्वभाव स्थायी रहा है

(iii) कई आदिवासी अनुसूचित नहीं है जबकि कई सदान जनजाति के रूप में अनुसूचित है

भाषाई दृष्टि से

➧ भाषाई दृष्टि से वह गैर जनजनजातीय व्यक्ति जिसकी भाषा मौलिक रूप से (मातृभाषा की तरह) खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया और कुरमाली है वही सदान हैं 

➧ डॉक्टर बी.पी. केसरी मानते हैं कि इन भाषाओं का मूल रूप नागजाति के विभिन्न कबीलों में विकसित हुआ होगा

➧ किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि भाषा केवल एक जाति तक सीमित नहीं रहती है अतः नाग दिसुम में नागराजा होंगे तो प्रजा के रूप में केवल नाग लोग ही तो नहीं रहे होंगे अन्य जातियां भी रही होंगी और ये भाषाएं उनकी भी भाषा ही रही होंगी

धार्मिक दृष्टि से

➧ धार्मिक दृस्टि से हिंदू ही प्राचीन सदान हैं इस्लाम का उदभव 600 ईसवी पूर्व में हुआ लेकिन इनका झारखंड आगमन सोलवीं सदी में ही हो सका इनसे पहले के जैन धर्मालम्बी भी सदान है

➧ इस प्रकार आज इन सभी धर्मालम्बियों की मातृभाषा जैनी और उर्दू या अरबी फारसी न होकर खोरठा, नागपुरी, पंचपरगानिया, कुरमाली आदि ही है चाहे वह किसी भी धर्म का हो और तभी वह सदान है। जिसकी मातृभाषा सादरी नहीं है वह सदान कैसे हो सकता है?

प्रजातीय दृष्टि से 

➧ प्रजातीय दृस्टि से सदान आर्य माने जाते हैं कुछ द्रविड़ वंशी भी सदान है और यहां तक कि कुछ आग्नेय कुल के लोग भी सदान हैं 

➧ आग्नेय कुल के लोग  सदान इसलिए हैं क्योंकि इनकी भाषा आदि सादरी रही है तथा  आग्नेय कुल के होते हुए भी अनुसूचित नहीं किया गया है

➧ ठीक उसी तरह जैसे कि कुछ अनुसूचित लोग स्वयं को आग्नेय कुल का नहीं मानते है  न ही प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉयड मानते हैं वे अपने को राजपूत कहते हैं

पुरातात्विक अवशेषों से

➧ पुरातात्विक अवशेषों से पता होता है कि असुर से पहले भी कोई एक सभ्य प्रजाति यहां आयी थी अतः ऐसा प्रतीत होता है कि वह सभ्य प्रजाति सदानों की होगी जो यहां की मूलवासी थी 

➧ आखिर असुरों का लोहा गलाना क्या अपने लिए ही था? इतनी  अधिक मात्रा में लोहा का उत्पादन कोई अपने लिए ही नहीं करता है

➧ असुरों के बाद मुंडा और उसके बहुत बाद उरांव आते हैं तो ऐसा लगता है कि सदान उनके यहां आने से पहले से ही बसे हुए थे मुंडा और उरांवों का स्वागत सदानों ने किया होगा 

 इसी प्राचीनता की दृष्टि से सदान को कई कालों में विभाजित किया जा सकता है:-

(i) असुर से पहले वास करने वाले एक सभ्य प्रजाति जिसकी चर्चा इतिहासकार/मानव शास्त्री करते हैं, संभवत: वे सदन ही हों   

(ii) असुरों के काल के सदान तथा मुंडाओं से पहले आकर बसे हुए सदान या अपने पूर्वजों से उत्पन्न हुए सदान की सामान्य जनसंख्या

(iii) मुंडाओं के साथ या उनके बाद आये सदान जो उरांव से पहले काल के थे

(iv) उरांवों  के साथ या उनके बाद आये सदान और पूर्वजों से विकसित सदान जनसंख्या

(v) मुगल काल और ब्रिटिश काल के आये लोग

(vi) आजादी के बाद आकर बसे हुए गैर आदिवासी जिनमें सदानों के लक्षण दिखाई नहीं पड़ते हैं। स्मरणीय है आजकल अंग्रेजों के साथ-साथ उनके द्वारा लाये गए अन्य शोषकों को (ठेकेदार आदि) तथा आजादी के बाद आये  गैर जनजातीय लोगों को दिकू कहा जाने लगा

जातीय दृष्टि से सदनों के प्रकार

(i) वैसे जातियां जो देश के अन्य हिस्सों में है और झारखंड क्षेत्र में भी है - ब्राह्मण, राजपूत, तेली, माली, कुम्हार, सोनार, कोयरी, अहीर, बनिया, डोम, चमार, दुसाध, ठाकुर और नाग जाति आदि

(ii) वैसे जातियां जो केवल छोटानागपुर में ही मिलते हैं - बड़ाईक, देसावली, पाइक, धानुक, राउतिया, गोडािईत, घासी, भइयां, पान, प्रमाणिक, तांती, स्वांसी, कोस्टा, झोरा, रक्सेल, गोसाई, बरगाह, बाउरी, भाँट, बिंद, कंदु, लोहड़िया, खंडत, सराक, मलार आदि 

(iii) कई सदान जातियां ऐसी है जिनका गोत्र अवधिया, कनौजिया, तिरहुतिया, गोड़ , पुर्विया, पछिमाहा, दखिनाहा आदि है। जिसे पता चलता है कि इनका मूल स्थान यहां न होकर कहीं बाहर है 

(iv) परंतु कुछ जातियां ऐसी हैं जिनका गोत्र है स्थानीय आदिवासी समुदायों की तरह हैं जिससे इनका मूल स्थान छोटानागपुर ही होगा यह माना जा सकता है

सदानों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूपरेखा 

➧ सदान और आदिवासी दोनों झारखंड के मूल निवासी हैं और उनकी संस्कृति साझा एवं एक-दूसरे से मिलजुल कर रहने की संस्कृति है

धर्म  :- सदानों  में सराक नामक एक छोटे क्षेत्र में अवस्थित जाति जैन धर्म से प्रभावित हैं। वे सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करते हैं तथा मांस, मछली का सेवन नहीं करते हैं

➧ यह लोग सूर्य एवं मानसा के उपासक हैं कुछ सदान वैष्णव परंपरा से प्रभावित हैं

➧ सोलवीं सदी के बाद से इस्लाम धर्मावलम्बी  भी यहां बस गए जो कालांतर में सदान कहे गये

➧ हिंदुओं में देवी-देवता की पूजा-अर्चना ही धार्मिक परम्परा है इसके अतिरिक्त प्रत्येक सदान कुल देवी-देवता की पूजा- अर्चना करते हैं

➧ हिंदू, मुस्लिम, जैन, वैष्णव, कबीरपंथी जैसे विविध धर्मावलम्बियों के कारण एक और गुरु पुरोहित की परंपरा है तो दूसरी और मुल्ला-मौलवियों की प्रथा भी है

 यह कहना आप्रासंगिक कतई नहीं है कि सदानों की धार्मिक परम्परा में कही पुरोहित और कर्मकांड भी व्याप्त है तो किसी अन्य क्षेत्र के सदानों में इस कर्मकांड का लेशमात्र भी नहीं दिखाई देता है 

शारीरिक गठन :- सदानों के शारीरिक गठन में आर्य, द्रविड़ एवं आस्ट्रिक तीनों के कमोवेश लक्षण दिखाई पड़ते हैंफिर भी ये आदिवासियों से बिल्कुल भिन्न दिखाई पड़ते हैं। सदानों में गोरे, काले और साँवले तीनों रंग दिखाई पड़ते हैं ऊंचाई भी नाटे, मध्यम एवं लंबे तीनों इनमें दिखाई पड़ते हैं 

वेशभूषा  :-सदानों में धोती, कुर्ता, गमछा, चादर प्रचलित थे किंतु वर्तमान समय में उपयुक्त वस्त्रों के अतिरिक्त पैंट, शर्ट, कोट, टाई, पायजामा, सलवार, कुर्ता, साड़ी आदि प्राय: सभी तरह के बिहार और बंगाल के प्रचलित वस्त्र धारण करते दिखाई पड़ते हैं 

आभूषण :- बंगाल, बिहार में प्रचलित आभूषण सदानों में खूब प्रचलित है यही नहीं आदिवासियों में प्रचलित कुछ आभूषण सदानों में भी प्रचलित है। पोला, साखा, कंगन, बिछिया, हार, पाइरी, हंसली, कंगना, सिकरी, छूछी, बुलाक, बेसर, नथिया, तरकी, करन फूल, मांगटीका, पटवासी, खोंगसो आदि आभूषण महिलाओं में प्रचलित हैसदानों में आदिवासियों की तरह गोदना का भी प्रचलित है

गृहस्थी के सामान :- आजकल स्टील, प्लास्टिक, हेंडालियम एवं अल्मुनियम के समान प्राय: गांव से शहर तक सभी सदानों के घरों में दिखाई पड़ते हैं किंतु गांव में अभी भी 60% सदान आदिवासी मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते हैं घरों में हड़िया, गगरी, चुका, ढकनी अवश्य दिखाई पड़ते हैं 

➧ सदानों में पीतल और कांसा के बर्तन रखना समृद्धि का  घोतक माना जाता है सामूहिक भोज में पत्तल, दोना का ही प्रचलन है 

 खेती बारी के सामानों में सदान और आदिवासियों के उपकरणों का नाम एक ही है

शिकार के औजार :- सदानों में भी शिकार वैसे ही प्रचलित है जैसे आदिवासियों में मछली मारने के लिए जाल, कुमनी, बंसी डांग, पोलई, आदि  औजार हैं तो तीर-धनुष और तलवार, भाला, लाठाचोंगी, गुलेल आदि भी औजार होते हैं सदानों में बंदूक रखने की प्रथा जमीनदारी के कारण रही है अब यह प्रचलन कम हुआ है 

नातेदारी :- सदान समाज पितृ सत्तात्मक होता है अतः पिता के बड़े भाई को बड़ा या बड़का बाबूजी कहते हैं। माता की बहन मौसी है पिता का छोटा भाई काका या पितिया पिता के पिता दादा, पिता की मां दादी। मातृकुल में माँ का भाई मामा,माँ के पिता नाना कहे जाते हैं। मातृकुल में वैवाहिक संबंध वर्जित है 

 मजाक वाले रिश्ते में बड़े भाई की पत्नी भौजी, बहन के पति बहनोई या भाटु, पति के छोटे भाई देवर, पत्नी की छोटी बहन साली के साथ-साथ दादा-दादी, नाना-नानी भी मजाक वाले संबंध है

पर्व त्यौहार :- पर्व-त्योहारों सदानों की पहचान के लिए बहुत बड़ा आधार है सदानों के त्यौहार वही है जो आदिवासियों के लिए भी हैं होली, दीपावली, दशहरा, काली पूजा के अतिरिक्त जितिया, सोहराय, कर्मा, सरहुल मकर सक्रांति, टुसु, तीज आदि सदानों के प्रमुख पर्व-त्यौहार है मुसलमान ईद, मुहर्रम आदि मनाते हैं 

नृत्य एवं गीत :- सदानों के गांवों की पहचान अखरा से होती है अखरा आदिवासियों की तरह सदानों के गांवों में भी होते हैं मधुकर पुर गांव (जिला बोकारो) में नृत्य गीत संबंधी जो सूचना मिलती है उसके आधार पर यह स्पष्ट है कि कर्म उत्सव में लड़कियों का सामूहिक नृत्य अखरा में होता है 

➧ जावा जगाने के लिए प्रति रात नृत्य होता है इसके अतिरिक्त शादी विवाह में भी महिलाएं नृत्य करती हैं डमकच, झुमटा, झूमर आदि सामूहिक नृत्य है जो आम महिलाएं अखरा में या घर-आंगन में करती हैं 

➧ इसके अतिरिक्त छऊ नृत्य, नटुआ, नृत्य, नचनी नृत्य, घटवारी नृत्य, महराई आदि विविध प्रकार के नृत्य होते हैं 

सदानों के गीत कई प्रकार के होते हैं जिसके राग भी उन्हीं के नाम अथवा सूर के नाम पर नामित है

गीतों के प्रकार निम्नलिखित हैं डमकच, झुमटा, अंगनाई, या जनानी झूमर, सोहर, विवाह गीत, मदारनी झूमर, रंग, फगुआ, पावस, उदासी, सोहराय आदि

निष्कर्षत: सदान, आदिवासियों के समकालीन, कहीं उनसे भी प्राचीन समुदाय है जो इसका जनसमुदाय हैं जो झारखंड का मूल निवासी है यह समुदाय स्वदेशी संस्कृति से आवृत विभिन्न जातियों, धर्मों का समूह है जो खोरठा, नागपुरी, पंचपरगानिया और कुरमाली भाषाएं बोलता है

➧ अंग्रेजों ने आदिवासियों और सदानों की आपसी मित्रता देखकर इनमें कई तरह के दरार उत्पन्न करने की चेष्टा की उन्हें इसमें आंशिक सफलता भी मिली आज समय की जरूरत है झारखंड के निवासी यह समझे की यहाँ का इतिहास क्या है? आदिवासियों का इतिहास क्या रहा है? सदानों की सहभगिता झारखण्ड में क्या रही है? की सही परिभाषा क्या हो सकता है ?

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Sunday, June 6, 2021

Jharkhand Ke Adivasi (झारखंड के आदिवासी)

Jharkhand Ke Adivasi 

➧ आदिवासी / जनजातीय जनसंख्या यहां के मूल निवासी और उसी अर्थ में 'आदिवासी' कहे जाते हैं किंतु इनका जातिगत इतिहास परंपरा और परंपरागत कथा कहानियों के अर्थ तथा गीतों में छिपे भाव स्पष्ट करते हैं कि ये लोग निश्चय ही कहीं बाहर से आकर इस धरती पर बसे हैं

झारखंड के आदिवासी

➧ यह क्षेत्र पूर्व पाषाण काल और पाषाण काल में भी बसा हुआ था इसका प्रमाण मिलता है खुदाई में पाए गए उस काल के उपकरणों व हथियारों से तथा सिक्कों से जो प्रमाणित करते हैं कि कोई अत्यंत सभ्य प्रजाति यहां कोलारियन जनजातियों के आने के पहले निवास करती थी

➧ कोलारियन जनजातियों के इस पठारी भू-खण्ड में प्रवेश के पहले जो प्रजाति यहां रहती थी उनके बारे में कुछ अधिक कहना मुश्किल है परंतु यह कहा जा सकता है कि वे लोग लोहा गलाकर काम करना जानते थे तथा अन्य धातुओं जैसे :- तांबा , पीतल का भी प्रयोग करते थे

➧ उनकी कला विकसित थी तथा एक निश्चित अर्थव्यवस्था थी वे किसी स्थायी गांव में रहते थे जो किसी नदी के किनारे बसा हुआ होता था वर्तमान लोहरदगा जिले में पाट क्षेत्रों में रहने वाले असुरों को उन्हीं लोगों की अवशेष  संख्या माना जाता है इन्हीं असुरों को हराकर या उन्हें जीतकर मुंडाओं ने अपना अधिपत्य इस पठारी भू-खंड पर सबसे पहले जमाया था 

➧ वर्तमान में जितनी जनजातियां झारखंड क्षेत्र में है उनमें असुर और मुंडा निश्चित तौर पर आरंभिक वाशिन्दे हैं मुंडारी लोक कथाओं में लगातार प्रव्रजन की पुष्टि होती है ऐसा उल्लेख है कि जब भारत में आर्यों का आगमन हुआ उसे काल में यहां जिन जातियों का अधिपत्य था वे वर्तमान मुंडा जनजाति के संभवतः पूर्वज थे

➧ आर्यों द्वारा परास्त होकर मुंडाओं ने गंगा का अनुसरण करते हुए पूर्व की ओर आगे बढ़ना जारी रखा आर्यों का विस्तार होता गया और मुंडाओं की सुरक्षात्मक प्रवृति स्वयं को सिकुड़ती गयी

➧ यह लंबे समय तक चलता रहा। आर्यों और गैर आर्यों के बीच युद्ध की परंपरा ऋग्वेद काल से महाभारत काल तक लगभग 4000 वर्षों तक चलती रही

मुख्य बिंदु झारखंड की आदिवासी 

(i) भारतीय राष्ट्रीयता की आत्मा जिन विभिन्न सामाजिक तत्वों पर आधारित है, उनमें सर्वदेशीय प्रमुख तत्वों के अतिरिक्त झारखंड का एक विशिष्ट तत्व है - जनजाति सभ्यता एवं संस्कृति 

(ii) झारखंड की पहचान जनजातियों की सांस्कृतिक विशिष्टता का परिणाम है

(iii) पुरापाषाण काल से ही झारखंड जनजातियों का प्रमुख अधिवास स्थल रहा है

(iv) झारखंड की अनेक जनजातियों का उल्लेख हिंदू पौराणिक ग्रंथों में मिलता है 

(v) झारखंड की जनजातियों को आदिवासी, आदिम जाति, वनवासी, गिरिजन, सहित अन्य कई नामों से पुकारा जाता है, किंतु आदिवासी शब्द जिसका शाब्दिक अर्थ आदिकाल से रहने वाले लोग होता है, सबसे अधिक प्रचलित है 

(vi) झारखंड में 32 प्रकार की जनजातियां पाई जाती है जो संविधान के अनुच्छेद- 342 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित है 

(vii) झारखंड में 24 जनजातियां प्रमुख जनजातियां की श्रेणी में आती है, जबकि अन्य 8 (बिरहोर, कोरवा, असुर , परहिया, बिरजिया, सौरिया पहाड़िया, मॉल पहाड़िया, तथा सबर ) को आदिम जनजातियों की श्रेणी में रखा गया है

➧ 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की जनजातियों की कुल जनसंख्या का प्रतिशत 26 पॉइंट 2 है इसमें आदिम जनजातियों का प्रतिशत 0.72 प्रतिशत है

➧ आदिम जनजातियां, अनुसूचित जनजातियों के अंतर्गत आने वाले वैसे जनजातियां है, जिनकी अर्थव्यवस्था कृषि पूर्वकालीन है, यानी जो अपना जीवनयापन इन दिनों भी आखेट तथा कंद-मूल संग्रह करने के साथ-साथ झूम खेती (स्थानांतरित कृषि) से करते हैं

 यहां की कुल जनजातियां आबादी का 92 पॉइंट 86 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में और 7.14% आबादी शहरों में निवास करती हैं

प्रजातीय तत्वों के आधार पर

(i)  झारखंड की सभी जनजातियों को 'प्रोटो-आस्ट्रोलॉयड' वर्ग में रखा गया है

(ii) ग्रियर्सन ने झारखंड क्षेत्र की जनजातीय भाषाओं को आस्ट्रिक (मुंडा भाषा) और द्रविड़ियन समूहों में बांटा है

(iii) अधिकांश जनजातियां भाषाएं आस्ट्रिक समूह की है सिर्फ उरांव जनजाति को 'कुड़ुख' भाषा और माल पहाड़िया एवं सौरिया पहाड़िया की मालतो भाषा द्रविड़ समूह की मानी जाती है

(iv) झारखंड की जनजातियां श्रीलंका की बेड्डा तथा ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों से काफी हद तक मिलती-जुलती है

समाज और संस्कृति 

(i) झारखंड की प्रत्येक जनजाति के अपने-अपने धार्मिक कर्मकांड, सामाजिक, आचार-विचार, विधि-विधान, परिवार-गोत्र, जन्म- मृत्यु, संस्कार आदि होते हैं, जो अन्य जनजातियों से उनकी अलग पहचान तय करते हैं

(ii) जनजातियां गांव में कुछ विशिष्ट संस्थाएं होती हैं, जो इनकी संस्कृति को विलक्षणता प्रदान करती है गांव के बीच में 'अखड़ा' (नाच का मैदान एवं पंचायत स्थल) होता है गांव में सरना (पूजा स्थल) भी होता है

(iii) जनजातियां गांव की एक अन्य प्रमुख विशेषता युवागृह (शिक्षण-प्रशिक्षण संस्था) है उरांव जनजाति में इसे घुमकुड़िया  और मुंडा, असुर,  कोरा जनजातियों में गितिओड़ा के नाम से जाना जाता है

(iv) जनजातियों में गोत्र को किली, पारी, कुंदा आदि के नामों से जाना जाता है 

(v) जनजातीय परिवार प्राय: एकल होते हैं संयुक्त परिवार बहुत कम पाए जाते हैं

(vi) झारखंड का जनजातीय समाज पितृसत्तात्मक है 

(vii) उत्तराधिकार पुरुष पंक्ति में चलता है पिता की संपत्ति में पुत्र को समान हिस्सा मिलता है, उसमें लड़की का हक नहीं होता

(viii) जनजातीयसमाज में पुरुष-महिला का सम्मानजनक स्थान है इनका समाज लिंग-भेद की इजाजत नहीं देता

विवाह संस्कार परम्परा

(i) जनजातीय परिवार साधारणत: एक विवाही होता है, लेकिन विशेष परिस्थिति में दूसरी-तीसरी पत्नी रखने की मान्यता है 

(ii) बाल विवाह की प्रथा प्रया: नहीं है दहेज प्रथा भी नहीं है, बल्कि 'वधू मूल्य' की परंपरा है 

(iii) वधु-मूल्य विभिन्न जातियों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है  जैसे :- 'पोन' (संथाल, हो, करमाली, सौरिया पहाड़िया) 'गोनोंग' (मुंडा) 'पोटे' (सबर),  'डाली' (किसान, परहिया), 'हरजी' (बनजारा), 'सुकदम'(कवर) आदि  

(iv) विवाह के पूर्व सगाई का रस्म केवल बनजारा जनजाति के लोग करते हैं तथा दहेज लेते और वधू-मूल्य देते हैं

(v) वैवाहिक रस्म-रिवाज में सिंदूर लगाने की प्रथा प्राय: सभी जनजातियों में है केवल खोंड जनजाति में जयमाला का रिवाज है

 (vi) जनजातियों में विवाह के रस्म पुजारी, यथा पाहन, दउरी, नाये आदि द्वारा संपन्न कराए जाते हैं कुछ जनजातियों में विवाह ब्राह्मण कराते हैं

अर्थव्यवस्था

➧ कृषि जनजातीय अर्थव्यवस्था का मूल आधार है, किंतु जीवकोपार्जन के अन्य साधन जैसे:- वनोवत्पाद संग्रह, शिकार करना, शिल्पकारी, पशुपालन और मजदूरी को भी अपनाया जाता है

➧ जनजातियों का प्राचीन धर्म सरना धर्म है इसमें प्रकृति पूजा प्रमुख है

➧ इनके अधिकांश पर्व कृषि और प्रकृति से जुड़े होते हैं सरहुल, करमा और सोहराय यहां के मुख्य पर्व है

धार्मिक व्यवस्था

➧ अधिकांश जनजातियों के सर्वोच्च देवता सूर्य है, जिससे संथाल, मुंडा, असुर, भूमिज आदि सिंगबोंगा, हो सिंगी, माल पहाड़िया बेरु, महली सुरजी देवी, सबर यूडिंग सूम, खोंड बेलापुन  नाम से पुकारते हैं 

➧ उरांव अपने सर्वोच्च देवता को धर्मेश और सौरिया पहाड़ियां बोड़ो गोसाईं, गोंड बुढादेव, बिंझिया विध्यवासिनी देवी, बंजारा बंजारा देवी, गोड़ैत पुरबिया, बिरहोर वीर, बूथड़ी पोलाठाकुर, खड़िया गिरिंग, खरवार मुचुकरनी,  भूमिज गोराई ठाकुर, लोहरा विश्वकर्मा तथा परहिया धरती कहते हैं

➧ जनजातियों का अपना धार्मिक विशेषज्ञ (पुजारी) होता है जैसे:- पाहन (मुंडा , उरांव आदि) में बैगा (खरवार, खड़िया, असुर बिंझिया, किसान आदि) देउरी ( परहिया, सबर, बूथड़ी आदि) देहुरी (माल पहाड़िया), नायके (संथाल), नाये (बिरहोर) , लाया (भूमिज) , गोसाई (चेरो) देवोनवा (हो) आदि 

नृत्य-संगीत और खानपान

➧ यहां की जनजातियां लोक सांस्कृतिक विरासत भी समृद्ध है
➧ शास्त्रीय नृत्य-संगीत का झारखंड में भले अभाव हो लेकिन लोक संगीत और लोक नृत्यों की यहां भरमार है
➧ वही जीवन है यहां के लोगों का झारखंडी भाषाओं में एक लोकप्रिय कहावत है :- यहां बोलना ही संगीत और चलना ही नृत्य है
➧ सरहुल, जदूर, करम, जतरा, झूमर, ब्रोया, माठा, डोमकच, सोहराय, अंगनई, चाली, फगुडांड़ी, आदि यहां के प्रमुख राग/गीत-नृत्य है
➧ नृत्य में परंपरागत परिधान, फूल-पत्तों, पंखों, आभुषणों से श्रृंगार करने और सजने-संवरने परंपरा है
➧ जनजातीय परिवार प्राय: मांसाहारी होते हैं केवल टाना भगत और साफहोड़ समूह मांस-मदिरा से परहेज करते हैं 
➧ जनजातियों में शराब पीना सार्वलौकिक प्रथा है चावल से बनी शराब (हड़िया) इनका प्रिय पेय है
➧ जनजातियों में मृत्यु के बाद शव को गाड़ने और जलाने की दोनों प्रथाएं है, दाह-संस्कार कम होता है
➧ जनजातियों के ग्रामीण जीवन में 'हाट' का भी काफी महत्व है, हाट सप्ताहिक, अर्थ साप्ताहिक या पाक्षिक लगता है
➧ यहां क्रय-विक्रय के अलावे मिलना-जुलना, समाचार-विनिमय, वैवाहिक-संबंधों आदि की चर्चा भी होती है
➧ राजनीतिक क्षेत्र में भी यहां के जनजातियों की विशेष भूमिका रही है
➧ जनसंख्या की दृष्टि से झारखंड के प्रमुख जनजातियों में पहले स्थान पर संथाल तथा दूसरे स्थान पर उरांव और तीसरे स्थान पर मुंडा तथा चौथे स्थान पर हो है

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Sunday, May 16, 2021

Jharkhand Me Aapda Prabandhan Ikai (झारखंड में आपदा प्रबंधन इकाई)

Jharkhand Me Aapda Prabandhan Ikai

झारखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण(JSDMA)

➧ राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम (NDMA) 2005 की धारा 14 (1) के आधार पर 28 मई, 2010 ईस्वी को झारखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (JSDMA) का गठन किया गया है 

➧ जिसके दो मुख्य उद्देश्य है:-

(I) अलग-अलग स्तर पर आपदा नियंत्रण के लिए योजना एवं रणनीति का निर्माण करना

(II) आपदा के बाद पुनर्निर्माण कार्य एवं सामान्य जीवन बहाल करने बहाली हेतु प्रोजेक्ट तैयार करना

झारखंड में आपदा प्रबंधन इकाई

 JSDMA की एक प्रमुख भूमिका विभिन्न विभागों तथा धन जुटाने वाली विभिन्न संस्थाओं को सहयोग  करना है। जैसे:- 

(i) भारत सरकार 
(ii) विश्व बैंक 
(iii) D.F.I.D

➧ राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है तथा इसमें अधिकतम 9 सदस्य होते हैं

➧ राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की गठन की शक्ति राज्यपाल के पास होती है

➧ झारखंड राज्य में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की सहायता हेतु राज्य कार्यकारी समिति भी गठित की गई है

➧ जिसके अध्यक्ष मुख्य सचिव झारखंड सरकार होते हैं

➧ इस समिति का कार्य राष्ट्रीय नीति, राष्ट्रीय योजना के साथ राज्य नीति और राज्य योजना का समन्वय करना होता है


➧ 
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के कार्य 

(i) आपदा पर त्वरित कार्यवाही  हेतु योजना तैयार करना

(ii) ऐसी ढांचा का विकास करना, ताकि आपदा के प्रभाव को कम किया जा सके

(iii) राज्य, जिला, प्रखंड, पंचायत स्तर पर एक सूचना नेटवर्क तैयार करना, ताकि स्थानीय लोगों तक जरूरी सूचनाएं उपलब्ध कराई जा सके

(ivआपदा न्यूनीकरण हेतु भौगोलिक सूचना प्रणाली विकसित करना

(v) राज्य मिशनरी एवं स्वैच्छिक संगठन एवं संस्थाओं के बीच बेहतर ताल-मेल बैठाना

 (viउपयुक्त दिशा निर्देश के जरिए स्थानीय लोगों में आपदा के प्रति जागरूकता फैलाना एवं प्रशिक्षण देना

➧ राज्य आपदा विभाग का गठन 

➧ अक्टूबर 2004 ईस्वी में झारखंड राज्य में आपदा विभाग का गठन किया गया था। इस विभाग का प्राथमिक कार्य आपदा ग्रसित व्यक्तियों को तुरंत राहत प्रदान करना है

➧ राहत कार्य के लिए धन की व्यवस्था 'राज्य आपदा रिस्पांस कोष' इसको से की जाती है

➧ 'राज्य आपदा रिस्पांस कोष' में धन संग्रह में 75% हिस्सेदारी केंद्र सरकार की और 25% हिस्सेदारी राज्य सरकार की होती है

➧ जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण

➧ यह आपदा प्रबंधन की तीसरी इकाई होती है इसके तहत झारखंड के 24 जिलों में जिला दंडाधिकारी/समाहर्त्ता या उपायुक्त की अध्यक्षता में जिला आपदा प्रबंधन समिति गठित की गई है

➧ इस समिति के अन्य सदस्यों में जिले के मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी, पशु चिकित्सा पदाधिकारी,जल एवं सिंचाई विभाग के अभियंता एवं एनजीओ (NGO) के प्रतिनिधि सदस्य शामिल किए जाते हैं 

➧ इसका मुख्य कार्य जिले की जरूरतों के अनुसार जिला आपदा योजना विकसित करना तथा इसका क्रियान्वयन करना होता है

➧ यह प्राधिकरण स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित करने तथा आवश्यक दिशा-निर्देश देने का कार्य भी करती है

➧ झारखंड आपदा प्रबंधन समिति

➧ इसका गठन प्रखंड स्तर पर किया जाता है इसका अध्यक्ष प्रखंड विकास पदाधिकारी होते हैं 

➧ इसके सदस्यों में समाज कल्याण पदाधिकारी, ग्रामीण जलापूर्ति अधिकारी, अग्निशामक सेवा के अधिकारी, एनजीओ के प्रतिनिधि एवं वरिष्ठ नागरिक को शामिल किया जाता है 

➧ इस समिति का मुख्य कार्य स्थानीय जरूरतों के अनुसार आपदा प्रबंधन योजना का निर्माण करना एवं उसे लागू करना होता है


ग्रामीण आपदा प्रबंधन समिति

➧ इसका गठन ग्राम स्तर पर किया जा रहा है तथा इसका अध्यक्ष मुखिया होते हैं

 इस समिति का कार्य ग्राम स्तर पर आपदा से बचाव हेतु उपायों को विकसित करना है तथा उसे सफलतापूर्वक लागू करना है

➧ राज्य आपदा प्रबंधन योजना

➧ आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा 2009 ईस्वी में राज्य आपदा प्रबंधन तैयार की गई है इसके तहत आपदा में बचाव एवं प्रशिक्षण हेतु कई कदम उठाए गए हैं

➧ झारखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सहयोग से राज्य एवं जिला स्तरीय इमरजेंसी सेंटर की स्थापना करेगी तथा उसे वी-सेट उपग्रह से जोड़ा जाएगा

➧ इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर (E.O.C)का गठन N.D.M.A अधिनियम 2005 के तहत राज्य के सभी 24 जिलों में किया गया है


➧ झारखंड राज्य में 2007 ईस्वी से आपदा प्रबंधन केंद्र का परिचालन श्री कृष्ण लोक प्रशासन संस्थान (SKIPA) रांची से किया जा रहा है

➧ तेरहवीं वित्त आयोग की सिफारिश के बाद 2012ईस्वी के बाद से 'वित्तीय सहायता आपदा प्रबंधन विभाग' का संचालन झारखंड सरकार द्वारा किया जा रहा है

TNA: (Training Need Analysis) कार्यक्रम पायलट कार्यक्रम के तहत रांची और धनबाद में जिला में चलाया गया है

 2015 ईस्वी में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के सहयोग से विद्यालय सुरक्षा कार्यक्रम चलाया गया था

➧ राज्य ग्रामीण विकास संस्थान (S.I.R.D), जो रांची में स्थित है पंचायती राज विभाग का शीर्ष प्रशिक्षण संस्थान है, इसमें सरकारी पदाधिकारियों, चुने हुए पंचायत प्रतिनिधियों और स्वयंसेवी संगठन के कार्यकर्ताओं को सामुदायिक नेतृत्व का प्रशिक्षण दिया जाता है

JSAC: 'झारखण्ड स्पेस एप्लीकेशन सेंटर' झारखण्ड सरकार की विशेषीकृत एजेंसी है। जो झारखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के दूर संवेदन कार्टोग्राफी, से संबंधित महत्वपूर्ण सूचनाएं उपलब्ध कराती है 

SRIJAN: (आपदा प्रबंधन ज्ञान सह-सूचना प्रदर्शन केंद्र) राज्य में आपदाओं की जानकारी और उनसे उत्पन्न होने वाली समस्याओं तथा उनके प्रभाव को कम करने के लिए सृजन विभाग विकसित किया जा रहा है

➧ इसके लिए राज्य के प्रमुख शैक्षिक एवं तकनीकी संस्थान कार्य कर रहे हैं जो निम्नलिखित हैं :-

(I) बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची  सूखा के लिए 
(II) आई.एस.एम, धनबाद,  खनन आपदा के लिए 
(III) बी.आई.टी. मेसरा, रांची भूकंप के लिए
(IV) जे.सैक, रांची बाढ़ ,जंगलों की आग, सुखा 

➧ आपदा प्रबंधन में झारखंड राज्य संबंधित समस्याएं

➧ उच्च जोखिम वाले क्षेत्र में जनसंख्या दबाव एवं मानवीय गतिविधियों में वृद्धि
➧ विकास योजनाओं में आपदा प्रबंधन को समुचित महत्व ना देना
 आपदा प्रबंधन से संबंधित कानूनों का ठीक से लागू ना होना
 आपदा प्रबंधन संबंधित प्रशिक्षण का अभाव
 आपदा प्रबंधन के प्रति आम लोगों में जागरूकता की कमी
➧ आवश्यक उपकरण एवं संसाधनों का अभाव
 राहत कार्य में विभिन्न संस्थाओं एवं एजेंसियों के बीच सामंजस्य का अभाव
➧ आपदा से संबंधित चेतावनी तंत्र का विकास कम होना
 

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Aapda Prabandhan Ki Sanrachnatmak Ikai (आपदा प्रबंधन की संरचनात्मक इकाई)

Aapda Prabandhan Ki Sanrachnatmak Ikai


आपदा प्रबंधन की संरचनात्मक इकाई

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA)

➧ आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 3(1) के तहत 27 नवंबर,  2006 ई0 को गठित राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, जो कि आपदा प्रबंधन का एक शीर्ष निकाय है

➧ इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं तथा यह आपदा प्रबंधन के लिए नीतियांँ , योजनाएँ  और दिशा निर्देश देने, आपदा आने के समय प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी है

➧ राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण सभी प्रकार की प्राकृतिक अथवा मानव जनित आपदाओं से निपटने के लिए विशेषकर रासायनिक, जैविक और नाभिकीय विकिरण जैसी आपात स्थितियों के संबंध में दिशा-निर्देश तैयार करने प्रशिक्षण और तैयारी गतिविधियों को सुगम बनाने के लिए उत्तरदायी है 

➧ संस्थागत ढांचा के अंतर्गत ही राष्ट्रीय कार्यकारी समिति का गठन किया गया है राष्ट्रीय कार्यकारी समिति के अध्यक्ष केंद्रीय गृह सचिव होते हैं

➧ राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA)

 राज्य में 'राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण' (SDMA) का गठन किया गया है। राज्य स्तर पर इसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री द्वारा की जाती है 

➧ इसका कार्य राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार राज्य योजनाओं को संचालित करना है तथा राज्य योजनाओं के कार्यान्वयन, उनका समन्वय तथा तैयारी के उपायों का प्रावधान निर्धारित करना है

➧ झारखंड राज्य में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को सहायता करने के लिए एक राज्य कार्यकारी समिति है

➧ राज्य कार्यकारी  समिति के अध्यक्ष राज्य सरकार के मुख्य सचिव होते हैं इस समिति का मुख्य कार्य राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को सूचना प्रदान करना है

➧ जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA)

➧ राज्य में जिला स्तर पर 'जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण' (DDMA) का गठन किया गया हैजिसके अध्यक्ष जिला मजिस्ट्रेट या उपायुक्त होते हैं

➧ इसका 25 (1) के तहत किया गया है जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण राष्ट्रीय एवं राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों के अनुरूप कार्य करता है

➧ राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नीति, 2005 के आलोक में प्रशिक्षण कार्य हेतु 'राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान' (N.I.D.M) की स्थापना की गई है

➧ यह संस्थान अन्य अनुसंधान संस्थाओं के साथ मिलकर प्रशिक्षण अनुसंधान एवं क्षमता विकास का कार्य करता है 

➧ राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नीति के निर्देशानुसार राहत एवं बचाव कार्य के लिए 'राष्ट्रीय आपदा कार्रवाई बल' (N.D.R.F) का गठन 2006 में लिया गया 

➧ NDRF का गठन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 44 और 45 के तहत किया गया है इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है

➧ 2006 में आठ बटालियन का गठन BSF, CRPF, ITBP, CISF की 2-2 बटालियन को मिलकर किया गया है प्रत्येक बटालियन में 1149 जवान कार्यरत हैं

➧ इसका गठन किसी खतरनाक आपदा की स्थिति अथवा रासायनिक जैविक, नाभिकीय विकिरण संबंधी मानव निर्मित एवं प्राकृतिक दोनों प्रकार की आपदाओं में विशिष्ट कार्रवाई करने के उद्देश्य से किया गया है

➧ आपदा प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदार राज्यों की होती है केंद्र, राज्य तथा जिला स्तरों पर कार्यरत सभी संस्थागत तंत्र प्रभावी तरीके से आपदाओं के प्रबंधन में सहायता करती हैं

➧ आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 में राज्य सरकारों को अन्य बातों के साथ-साथ आपदा प्रबंधन योजनाओं को तैयार करने, विकास योजनाओं में आपदाओं के निवारण अथवा रोकने के उपायों पर विचार करने, निधियों का आवंटन, शीघ्र चेतावनी प्रणालियों (E.W.S) को स्थापित करने एवं आपदा प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं में किया गया है

➧ प्रारंभ में प्रत्येक राज्यों को राज्य आपदा कार्रवाई बल (S.D.R.F) की एक बटालियन तैयार करना है

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