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Thursday, September 3, 2020

Jharkhand ki Rajvyavastha Part-3 (Jharkhand Legislative Assembly)

Jharkhand Ki Rajvyavastha Part-3

विधानसभा (The Legislative Assembly)



विधायिका

➤भारतीय संविधान में संघीय शासन व्यवस्था होने के कारण राज्यों में अलग विधानमंडल की व्यवस्था की गई है 
 संविधान के अनुसार राज्य विधानमंडल में एक सदन हो सकता है या दो सदन हो सकता है 
 यह राज्य  की इच्छा पर निर्भर करता है 
 झारखंड राज्य में एक सदनीय विधान मंडल अर्थात केवल एक विधानसभा है 
 यहां राज्यपाल और विधान मंडल को मिलाकर विधानमंडल बनता है  
➤जिन राज्यों में द्विसदनीय विधानमंडल है, जैसे :- भारत के 5 राज्यों बिहार, जम्मू कश्मीर, कर्नाटक महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश में है, वहां राज्यपाल, विधानसभा एवं विधान परिषद को मिलाकर विधानमंडल बनता है 

विधानसभा (Legislative Assembly)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 170 से संबंधित राज्य में एक विधानसभा के होने का उपबंध है  
जिसके सदस्यों का निर्वाचन राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष मताधिकार द्वारा किया जाता हैइस अनुच्छेद के अनुसार किसी भी राज्य के विधानसभा में सदस्यों की कुल संख्या अधिकतम 500 और न्यूनतम 60 होनी चाहिए  
भारत में सिक्किम में (32), गोवा में (40), अरुणाचल प्रदेश  (40) मिजोरम (40) विधानसभा सदस्यों वाले राज्य है जो इसके अपवाद है 
 राज्य के विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्र का निर्धारण परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है  
वर्तमान झारखंड में विधानसभा सदस्यों की संख्या 82 है, जिसमें 81 सदस्यों का निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर और एक सदस्य का मनोनीत राज्यपाल द्वारा एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में किया जाता है

अवधि

विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है  
राज्य में आपात स्थिति लागू होने पर संसद के द्वारा इसकी अवधि 6 माह तक बढ़ाई जा सकती है 
इस तरह से इसका कार्यकाल 1 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है 
 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 172 (१) में वर्णित है किसी दल के बहुमत नहीं होने पर अथवा सरकार के बहुमत नहीं होने की स्थिति में राज्यपाल के द्वारा विधानसभा को उसके कार्यकाल पूर्ण रूप होने से पहले ही विघटित किया जा सकता है
 राज्यपाल के द्वारा विधानसभा का अधिवेशन बुलाया जाता है, लेकिन विधानसभा के दो सत्रों के बीच 6 महीने के अधिक मध्यवकाश नहीं होना चाहिए 
झारखंड विधानसभा की कुल 82  सीटों में से अनुसूचित जनजाति के लिए (28), अनुसूचित जाति के लिए (9) सीटें आरक्षित हैं तथा शेष (44) सीट सामान्य श्रेणी की हैं

विधानसभा सदस्य बनने की योग्यताएं

वह भारत का नागरिक हो और  कम से कम 25 वर्ष की उम्र का हो
वह भारत सरकार या किसी राज्य के अधीन लाभ के पद पर ना हो 
वह दिवालिया या पागल ना हो

 सदस्य की समाप्ति

 विधानसभा की सदस्यता निम्नलिखित परिस्थितियों में समाप्त हो सकती है 

विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र  दे दें 
 यदि सदस्य अन्य किसी राज्य की विधान मंडल का सदस्य निर्वाचित हो जाए
 यदि वह सदन की अनुमति के बिना लगातार 60 दिन तक सदन में अनुपस्थित रहे
यदि वह दलबदल का दोषी साबित हो जाए
 विधानमंडल के किसी सदस्य की योग्यता या अयोग्यता का अंतिम निर्णय राज्यपाल चुनाव आयोग के परामर्श से करता है

विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष

विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भारतीय संविधान के  अनुच्छेद 178 के तहत  प्रत्येक राज्य में विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद का निर्धारित है
 इसका चुनाव संबंधित विधानसभा के सदस्यों के द्वारा किया जाता है
 लोकसभा अध्यक्ष के जैसे विधानसभा अध्यक्ष विधानसभा की कार्रवाई चलाने का अधिकारी होता है
 विधानसभा अध्यक्ष विधानसभा का सबसे उच्च अधिकारी होता है
 विधानसभा अध्यक्ष की अनुपस्थिति में विधानसभा उपाध्यक्ष सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता करते हैं 
अध्यक्ष का कार्यकाल 5 वर्ष या नई विधानसभा के प्रथम बैठक के ठीक पहले तक होता है 
विधानसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष को कम से कम 14 दिन की पूर्व सूचना के उपरांत लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को विधानसभा में पास करा के पद से हटाया जा सकता है

विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार

 राज्यपाल का सन्देश विधानसभा में और विधानसभा का निर्णय राजपाल को देता है
किसी विधेयक में पक्ष और विपक्ष का मत समान नहीं हो, तो अध्यक्ष मत विभाजन में भाग नहीं लेता है 
लेकिन मत समान होने की स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष विधेयक के लिए निर्णायक मत देता है
 कोई विधेयक दोनों सदन में पास हो जाने के बाद विधानसभा अध्यक्ष उस विधेयक पर अपने हस्ताक्षर करते हैं
 विधानसभा अध्यक्ष का पद निष्पक्ष होता है

विधानसभा उपाध्यक्ष (द डिप्टी स्पीकर)

विधानसभा उपाध्यक्ष विधान सभा का दूसरा प्रमुख अधिकारी होता है 
विधान सभा अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उसका सारे कार्य विधानसभा उपाध्यक्ष करता है
वह विधानसभा अध्यक्ष को त्यागपत्र देकर अपना पद छोड़ सकता है 
झारखंड के प्रथम विधानसभा उपाध्यक्ष बागुन सुम्ब्रई थे 

विधानसभा के कार्य

विधायी कार्य  :- विधानसभा को राज्य सूची और समवर्ती सूची के सभी विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है  
कोई भी साधारण विधेयक विधानसभा परिषद् में पास होने के बाद विधान परिषद में पेश किया जाता है लेकिन देश के 7 राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, जम्मू कश्मीर, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की व्यवस्था है 
झारखंड में विधान परिषद की व्यवस्था नहीं है 

वित्तीय कार्य :- धन  विधेयक केवल विधानसभा में ही पेश हो सकता है 
एक बार धन विधेयक विधानसभा में पारित होने के बाद विधान परिषद में उसे पेश किया जाता है 
विधान परिषद को 14 दिन के अंदर पास करना होता है नहीं तो स्वत: पारित मान लिया जाता है
इसके बाद वह राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है राज्यपाल को धन विधेयक पर अपनी स्वीकृति देनी ही पड़ती है

संवैधानिक कार्य :- संविधान के कुल अनुच्छेदों में संशोधन करने में भारतीय संसद को संशोधन करने के लिए देश के आधे राज्यों के विधान मंडलों की स्वीकृति जरुरत होती है
 विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों को राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेने का अधिकार है 
विधानपरिषद् के सदस्यों को राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेने का अधिकार प्राप्त नहीं है 
 














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