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Saturday, October 31, 2020

झारखण्ड के प्रमुख लोक नाट्य(Jharkhand Ke Pramukh Lok Natya)

झारखण्ड के प्रमुख लोक नाट्य

(Jharkhand Pramukh Lok Natya)

नाट्य

नाट्य झारखंड के लोकजीवन का अभिन्न अंग है 

यह नाट्य मांगलिक अवसरों, पर्व-त्योहारों के अवसरों पर कभी-कभी मनोरंजन के लिए आयोजित किए जाते हैं 
यह नाट्य लोक जीवन में रंग-रास का संचार करते हैं 

झारखंड की संस्कृति तथा लोकजीवन में लोकनाट्यों का एक अपना ही अलग महत्व  है 

यहां के लोकनाट्य  में कथानक, संवाद, अभिनय, गीत,का अलग ही विशेष नज़ारा होते हैं 

यदि नहीं होते हैं तो वह है- सुसज्जित रंगमंच पात्रों का मेकअप एवं वेश-भूषा 


झारखंड राज्य में प्रचलित लोक नाट्य है 


जट-जटिन

जट-जटिन :- प्रत्येक वर्ष से लेकर कार्तिक माह तक पूर्णिमा अथवा उसके एक-दो दिन पूर्व अथवा पश्चात मात्र अविवाहिताओं द्वारा अभिनीत इस लोकनाट्य में जट -जटिन के विवाहित जीवन को प्रदर्शित किया जाता है 

भकुली बंका

भकुली बंका :-  प्रत्येक वर्ष सावन से कार्तिक माह तक आयोजित किए जाने वाले इस लोकनाट्य में जट- जटिन द्वारा नृत्य किया जाता है 

अब कुछ लोग स्वतंत्र रूप से भी इस नृत्य को करते हैं

इस लोकनाट्य में भकुली (पत्नी) एवं बंका (पति) के विवाहित जीवन को दर्शाया जाता है

सामा-चेकवा

सामा-चेकवा  :- प्रत्येक वर्ष कार्तिक महीने के पूरे शुक्ल पक्ष में चलने वाले इस लोकनाट्य में पात्र तो मिट्टी द्वारा निर्मित होते हैं 

लेकिन उनकी तरफ से अभिनय बालिकाएं करती है 

इस लोक नाट्य में चार प्रमुख पात्र हैं :- सामा (नायिका ), चेकवा(नायक), चूड़का(खलनायक) एवं साम्ब (सामा का भाई) 

इस लोक नाट्य के अंतर्गत सामूहिक गीतों के माध्यम से प्रश्नोत्तर शैली में विषय-वस्तु को प्रस्तुत किया जाता है 

यह लोक नाट्य भाई-बहन  के पवित्र प्रेम से संबंधित होता है  

किर तनिया

किर तनिया :- इस भक्ति पूर्ण लोकनाट्य में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन भक्ति-गीतों के साथ भाव एवं श्रद्धा पूर्वक किया जाते हैं 

डोमकच

डोमकच :- इस अत्यंत घरेलू एवं निजी लोकनाट्य को मुख्यतः घर-आंगन परिसर में विशेष अवसरों तथा बारात जाने के बाद देर रात्रि में महिलाओं द्वारा आयोजित किया जाता है

इस लोकनाट्य का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं किया जाता है
 
क्योंकि इसके अंतर्गत हास् -परिहास् , अश्लील हाव-भाव एवं संवाद को प्रदर्शित किया जाता है

पुरुषों को इस लोकनाट्य को देखने की मनाही होती है
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Tuesday, October 27, 2020

भूमिज विद्रोह 1832-33 (Bhumij Vidroh-1832-33)

भूमिज विद्रोह 1832-33 (Bhumij Vidroh-1833-33)


➤भूमिज विद्रोह का आरंभ 1832 ईसवी में गंगा नारायण के नेतृत्व में हुआ।  

इसका प्रभाव बीरभूम और सिंहभूम  के क्षेत्र में रहा। 

यह विद्रोह बीरभूम राजा, पुलिस अधिकारियों, मुंसिफ नामक दरोगा तथा अन्य दिकुओ के खिलाफ 
भूमिजो की शिकायतों की देन था। 


साथ ही, इसके पीछे अंग्रेजों की दमनकारी लगान व्यवस्था से उत्पन्न असंतोष भी काम कर रहा था।  

भूमिज विद्रोह की विधिवत शुरुआत 26 अप्रैल 1832 ईस्वी को वीरभूम परगाना के जमींदार के सौतेले 
भाई और दीवान माधव सिंह की हत्या के साथ हुई।  

यह हत्या गंगा नारायण सिंह के द्वारा की गई। 

गंगा नारायण के जमींदार का चचेरा भाई था। 

दीवान के रूप में माधव सिंह काफी बदनाम हो चुका था। 

उसने कई तरह के करों को लगाकर जनता को तबाह कर दिया था।  

माधव का सिंह के खिलाफ गांगा नारायण ने भूमिजो को एक अभूतपूर्व नेतृत्व प्रदान किया।  

माधव सिंह का अंत करने के पश्चात गंगा नारायण की टक्कर कंपनी के फौज के साथ हुई। 
कंपनी की फौज का नेतृत्व ब्रैंडन एवं लेटिनेंट  तिमर के हाथों में था। 

कोल  एवं हो जनजातियों ने इस विद्रोह में गंगा नारायण का खुलकर साथ दिया।  

7 फरवरी 1833  को खरसावां के ठाकुर चेतन सिंह के खिलाफ लड़ते हुए गंगा नारायण मारा गया।  

खरसावां के ठाकुर ने उसका सर काटकर अंग्रेजी अधिकारी कैप्टन विलकिंग्सन के पास भेज दिया। 

गंगा नारायण के मारे जाने से कैप्टन विलकिंग्सन ने राहत की सांस ली। 


यद्यपि इस विद्रोह में गंगा नारायण के अन्तः पराय हुई ,किन्तु इसने यह स्पष्ट कर दिया था कि जंगल में परिवर्तन की आवश्यकता है। 

कोल की ही भांति भूमिज विद्रोह के बाद के बाद भी कई प्रशासनिक परिवर्तन लाने हेतु अंग्रेज विवश हुए। 

1833 ईस्वी की रेगुलेशन XIII  के तहत शासन प्रणाली में व्यापक परिवर्तन किया गया है।  

राजस्व नीति में परिवर्तन हुआ एवं छोटानागपुर को दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी का एक भाग मान लिया गया। 
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Monday, October 26, 2020

झारखण्ड का धरातलीय स्वरुप ( Jharkhand ka dharataliya swaroop)

Jharkhand Ka Dharataliya Swaroop

झारखण्ड का धरातलीय स्वरुप

झारखण्ड का धरातलीय स्वरुप

किसी क्षेत्र के धरातलीय स्वरूप को भौतिक स्वरूप, भौतिक विभाजन/ विभाग, भौगोलिक विभाजन, प्राकृतिक प्रदेश आदि भी कहा जाता है

जहां तक झारखंड के धरातलीय स्वरूप की बात है, तो इसमें छोटानागपुर के पठार का महत्वपूर्ण योगदान है 

यह पठार प्रायद्वीपीय पठारी भाग का उत्तर-पूर्वी खंड है

 इस पठार की औसत ऊंचाई 760 मीटर है

उल्लेखनीय है कि पारसनाथ की चोटी की ऊंचाई 1365 मीटर है

झारखंड के धरातलीय स्वरूप को मुख्य रूप से चार भागों में बांटा जाता है

1- पाट  क्षेत्र / पश्चिमी पठार 
2 -रांची पठार
3 - हजारीबाग पठार 
    a) -उपरी हजारीबाग पठार 
    b) -निचली हजारीबाग पठार या बाहर पठार 
4 - निचली नदी घाटी एवं मैदानी क्षेत्र

1-पाट क्षेत्र

1 - पाट क्षेत्र या पश्चिमी पठार :- यह  झारखंड का सबसे ऊंचा भाग है (पारसनाथ पहाड़ को छोड़कर)

पाट  का शाब्दिक अर्थ है :- समतल जमीन 

क्योंकि इस भूभाग में अनेक छोटे-छोटे पठार हैं, जिसकी ऊपरी सतह समतल है इसलिए इसे स्थानीय भाषा में पाट क्षेत्र कहते हैं

इसका विस्तार रांची जिले के उत्तर-पश्चिमी भाग से लेकर पलामू के दक्षिणी किनारा तक है
इससे पश्चिमी पठार भी कहते हैं 

यह भूभाग त्रिभुजाकार हैं, जिसका आधार उत्तर में तथा शीर्ष दक्षिण में है 

इस क्षेत्र का उत्तरी भाग ठाढ़ एवं निचला भाग दोन कहलाता है

इस क्षेत्र की समुद्र तल से औसत ऊंचाई 900 मीटर है

इस क्षेत्र में स्थित ऊंचे पाटो में नेतरहाट पाट (1180 मीटर), गणेशपुर पाट  (1171 मीटर) एवं जमीरा पाट (1142 मीटर) मुख्य है 

इस क्षेत्र में मैदान स्थित पहाड़ियों में सानू एवं सारउ पहाड़ी मुख्य हैं

इस क्षेत्र में अनेक नदियों का उद्गम स्थल है, जैसे:- उत्तरी कोयल, शंख, फुलझर आदि 

इस क्षेत्र की अधिकांश नदियां चारों तरफ की ऊंचे पठारों से निकलकर शंख नदी में मिल जाती हैं 

उत्तरी कोयल, शंख आदि नदियों से काट छांट अधिक हुआ है

➤बारवे का मैदान इसी पाट क्षेत्र में स्थित है जिसका आकार तश्तरीनुमा है

2-रांची पठार 

रांची पठार :-यह झारखंड का सबसे बड़ा पठारी भाग है 

पाट क्षेत्र को छोड़कर रांची के आसपास के निचले इलाकों को इसमें शामिल किया जाता है

इस क्षेत्र की समुद्र तल से औसत ऊंचाई 600 मीटर है

रांची पठार लगभग चौरस है 

इस चोरस पठारी भाग से कई नदियां निकलती है, जो पठार के किनारों पर खड़ी ढाल के कारण झरनों / जलप्रपातों  का निर्माण करती है 

इसमें बूढ़ाघाघ /लोधाघाघ , हुंडरू, सदनीघाघ, घाघरी , दशम  तथा जॉन्हा / गौतम धारा आदि प्रमुख हैं

3-हजारीबाग पठार

हजारीबाग पठार :- हजारीबाग पठार को दो भागों में विभाजित किया जाता है 



(a) ऊपरी हजारीबाग पठार :- रांची पठार के लगभग समांतर किंतु छोटे क्षेत्र में हजारीबाग जिले में फैले पठार को ऊपरी हजारीबाग पठार कहते हैं 

यह दोनों पठार कभी मिले हुए थे, लेकिन अब दामोदर नदी के कटाव के कारण अलग हो गए हैं

ऊपरी हजारीबाग पठार की समुद्र तल से ऊंचाई 600 मीटर है

(b) निचला हजारीबाग पठार/ बाह्य पठार :-  हजारीबाग पठार के उत्तरी भाग को निचला हजारीबाग पठार कहते हैं

➤यह झारखंड का निम्नतम ऊंचाई वाला पठारी भाग है

छोटा नागपुर पठार का बाहरी हिस्सा होने के कारण इसे बाह्य पठार भी कहते हैं

➤इस क्षेत्र की समुद्र तल से ऊंचाई 450 मीटर है

किसी क्षेत्र में गिरिडीह के पठार पर बराकर नदी की घाटी के निकट पारसनाथ की पहाड़ी स्थित है
जिसकी ऊंचाई 1365 मीटर है

इसकी सबसे ऊंची चोटी को सम्मेद शिखर कहा जाता है 

इसे अत्यंत कठोर पाईरोक्सीन ग्रेनाईट से निर्मित माना जाता है 

4 -निचली नदी घाटी एवं मैदानी क्षेत्र


4 -निचली नदी घाटी एवं मैदानी क्षेत्र :- झारखंड का यह भाग असमान नदी घाटियों एवं मैदानी क्षेत्र से मिलकर बना है 

इस भाग की समुद्र तल से औसत ऊंचाई 150-300 मीटर है 
 
इस क्षेत्र में राजमहल की पहाड़ी स्थित है, जो कैमूर के पहाड़ी क्षेत्र तक विस्तृत है 

राजमहल की पहाड़ी का विस्तार दुमका, देवघर, गोड्डा ,पाकुड़ का पश्चिमी भाग एवं साहिबगंज का मध्यवर्ती व दक्षिणी भाग में है  

राजमहल की पहाड़ी 2000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है  

इस क्षेत्र में कहीं-कहीं छोटी पहाड़ियां मिलती है 

नुकीली पहाड़ियों को टोंगरी  एवं गुबंदनुमा पहाड़ियों को डोंगरी कहते हैं 

इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में बड़ी-बड़ी नदियों की घाटियां हैं  
जैसे :- दामोदर, स्वर्णरेखा, उत्तरी कोयल, दक्षिणी कोयल, बराकर,शंख, अजय, मोर, ब्राह्मणी, गुमानी एवं बासलोय इत्यादि 

इस क्षेत्र में स्थित कुछ नदियां ऊंचे पठारों से निकलकर अपना मार्ग तय करती हुई गंगा में अथवा स्वतंत्र रूप से सागर में जाकर मिलती है 
 
इस क्षेत्र में स्थित मैदानी क्षेत्र में चाईबासा का मैदान सबसे प्रमुख है
  
चाईबासा का मैदान पश्चिमी सिंहभूम के पूर्वी-मध्यवर्ती भाग में स्थित है
  
यह उत्तर में दलमा की श्रेणी, पूर्वी में दलभूम की श्रेणी, दक्षिण में कोल्हान की पहाड़ी, पश्चिम में सारंडा  एवं पश्चिमी-उत्तर में पोरहाट की पहाड़ी से घिरा है 
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Sunday, October 25, 2020

झारखंड ऊर्जा नीति 2011 (Jharkhand Urja Niti 2011)

झारखंड ऊर्जा नीति 2011(Jharkhand Urja Niti 2011)

➤राज्य के आर्थिक एवं संपूर्ण विकास के लिए ऊर्जा एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है

कृषि, औद्योगिक और व्यवसायिक क्षेत्रों में विकास के लिए उर्जा को सार्वभौमिक रूप से एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में स्वीकार किया गया है

बिना ऊर्जा के कोई भी बड़ा आर्थिक विकास संभव नहीं है

वर्तमान समय में ऊर्जा की अपर्याप्त उपलब्धता राज्य के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है

ऊर्जा की मांग प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है

झारखंड में प्रति व्यक्ति ऊर्जा की औसत खपत 552 यूनिट है, जिसकी आपूर्ति डी0 वी0 सी0 ,जुस्को एंड सेल से होती है

राष्ट्रीय औसत 720 यूनिट प्रति व्यक्ति से कम है

झारखंड राज्य विद्युत बोर्ड  और तेनुघाट विद्युत निगम लिमिटेड की स्थापित क्षमता 1390 MW जिसमे की 1260 MW ताप और 130 MW जल विद्युत् है 

झारखंड औद्यौगिक नीति का मुख्य उद्देश्य राज्य के विकास को  गति प्रदान करना है, ताकि झारखंड अन्य राज्यों के समक्ष खड़ा हो सके

➤यह झारखंड राज्य का सौभाग्य है कि यहां पर ताप आधारित ऊर्जा उत्पादन की संभावना काफी अधिक है 

प्रचुर मात्रा में कोल उपलब्ध होने के कारण झारखंड राज्य पावर हब बन सकता है

जहां से दूसरे राज्य को भी विद्युत का निर्यात किया जा सकता है

झारखंड ऊर्जा नीति का मुख्य उद्देश्य

झारखंड ऊर्जा नीति का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की पूर्ति करना और विश्वसनीय गुणवत्तायुक्त, फिकायती शिकायती दर पर ऊर्जा की उपलब्धता को सुनिश्चित करना है

झारखंड ऊर्जा नीति 2011 के निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्य है 

सभी घरों में 2014 तक विद्युत की आपूर्ति को सुनिश्चित करना 

ऊर्जा की कमी को पूरा करना 

उपभोक्ता के हितों की रक्षा करना

विश्वसनीय एवं गुणवत्तायुक्त ऊर्जा की आपूर्ति उचित दर पर करना 

प्रति व्यक्ति विद्युत की उपलब्धता को 2017 तक 1000  यूनिट से अधिक करना 

बिजली के ट्रांसमिशन और वितरण क्षमता को दुरुस्त करना, ताकि विद्युत की आपूर्ति, क्षमता, गुणवत्ता को बढ़ाया और घाटे को कम किया जा सके 

पर्यावरण के अनुकूल उत्पादन क्षमता को बढ़ाना  

वर्तमान विद्युत उत्पादक संयत्रों का नवीनीकरण करके उनके  उत्पादक क्षमता को बढ़ाना 

राज्य के सभी गांव एवं घरों का शीघ्र विद्युतीकरण कर उर्जा की आपूर्ति को सुनिश्चित करना 

झारखंड स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमिशन को और अधिक मजबूत करना और उसके प्रशासनिक व्यवस्था को पारदर्शी बनाना  

➤विद्युत् ऊर्जा का  सक्षम तरीके से उपयोग एवं उसके संरक्षण को सुनिश्चित करना  

ऐसी संभावना है कि झारखंड ऊर्जा नीति 2011 राज्य के विद्युत समस्या को दूर करने में सक्षम साबित होगा 

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Saturday, October 24, 2020

झारखंड में वन प्रबंधन(Jharkhand Me Van Prabandhan)

Jharkhand Me Van Prabandhan

झारखंड में वन प्रबंधन

झारखंड में वन प्रबंधन का सबसे पहले प्रयास 1882/85 में जे0.एफ.हेबिट  द्वारा किया गया था 

इसी आलोक में तत्कालीन बंगाल सरकार ने 1909 में वनों की सुरक्षा के लिए एक समिति गठित की थी 

आजादी के पहले यहां पर 95% वन निजी थे जिनका सरकारी करण हुआ 

राज्य में 33% या उससे ज्यादा वन क्षेत्र बनाने के लिए वन प्रबंधन की आवश्यकता है

कार्य

राज्य में वनों के बेहतर प्रबंधन के उद्देश्य से 31 प्रदेशिक प्रमंडलों, 10 सामाजिक वानिकी प्रमंडलों एवं चार विश्व खाद्य कार्यक्रम प्रमंडलों का सृजन किया गया है, जिसके माध्यम से वनों एवं वन्य प्राणियों के प्रबंधन, संवर्धन एवं विकास का काम किया जाता है

दायित्व

झारखंड राज्य में वनों के प्रबंधन का दायित्व प्रधान सचिव/ सचिव, वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अतिरिक्त भारतीय वन सेवा, राज्य वन सेवा संवर्ग पदाधिकारियों, वनों के क्षेत्र पदाधिकारियों, वन परिसर पदाधिकारियों और वन उप परिसर पदाधिकारियों का है

वन विभाग में वनों के प्रबंधन, संवर्धन, संरक्षण और सुरक्षा तथा विकास योजनाओं के कार्यान्वयन हेतु प्रधान मुख्य वन संरक्षक का पद स्वीकृत है

वनों के प्रबंधन एवं संरक्षण में व्यापक जनसभा सहभागिता सुनिश्चित करने के लक्ष्य से राज्य सरकार द्वारा संयुक्त वन प्रबंधन संकल्प 2001 में यथा तथा संशोधित प्रतिपादित किया गया है, जिसके आलोक में 10903 संयुक्त वन प्रबंधन समितियां गठित की गई है एवं वनों के विकास एवं संरक्षण हेतु योजनाओं के क्रियान्वयन करने के लिए राज्य के सभी प्रदेशिक वन प्रमंडल में 35 वन विकास अभिकरण का गठन एवं निबंधन कार्य पूरा किया गया है

वन प्रबंधन के लिए कार्य किये जा रहे हैं 

राज्य में 9,00,000 (लाख) हेक्टेयर से ज्यादा भूमि बंजर है 

इस भूमि पर वन रोपण का कार्य किया जा रहें है

वन  प्रबंधन प्रशिक्षण के लिए रांची में बिरसा कृषिविश्वविद्यालय से सम्बद्ध वानिकी कॉलेज में एक वानिकी संकाय स्थापित की गई है

दसवीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत झारखंड के 3424 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वन रोपण का लक्ष्य रखा गया है

राज्य में कई  स्थाई  पौधशालाओं की स्थापना की गई है

शहरी वानिकी के माध्यम से राज्य के नगरों में वृक्षारोपण किया जा रहा है

सामाजिक वानिकी से ग्रामीण जनसंख्या की वनों पर निर्भरता कम कर उसकी आवश्यकता की पूर्ति कराने का काम भी किया जा रहा है

वन समितियां गठित कर वन क्षेत्रों के प्रबंधन एवं संरक्षण कार्य किए जा रहे हैं 

निजी वन भूमि पर वृक्षारोपण के लिए मुख्यमंत्री जनवन योजना की शुरुआत की गई है 

बॉस  वृक्ष रोपण पर विशेष बल दिया जा रहा है 

राज्य में 116 स्थाई नर्सरी को और अधिक उन्नत बनाया जा रहा है 

जंगली जानवरों के आक्रमण से किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर ढाई लाख रुपया दिया जाएगा 

ग्रामीणों के आय के साधन बढ़ाने हेतु सेल्फ हेल्प ग्रुप एवं ग्राम वन प्रबंधन समितियों  के माध्यम से पलाश एवं कुसुम के पौधों पर लाह  उत्पादन हेतु निशुल्क प्रशिक्षण, प्रयुक्त होने वाले मशीन एवं टूल्स तथा लाह कीट सुलभ कराया जा रहा है

ई-गवर्नेंस के तहत विभागीय वेबसाइट तैयार की गई है ताकि सूचनाएं तुरंत उपलब्ध हो सके 

वेबसाइट का नाम फॉरेस्ट डॉट झारखंड डॉट गवर्नमेंट डॉट इन है 

जनसाधारण में प्रकृति के प्रति लगाव उत्पन्न करने, विशेषकर उन्हें वन्य प्राणियों एवं संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए संरक्षित क्षेत्रों तथा इनके बाहर उपयुक्त वन क्षेत्र में एनवायरमेंटल फ्रेंडली सस्टेनेबल तरीके से इको-टूरिज्म को प्रोत्साहित करने के लिए इको टूरिज्म नीति, 2015, अक्टूबर, 2015 में अधिसूचित की गई है

अधिसूचित वन भूमि, गैर-वन भूमि पर मुख्य रूप से स्थल विशिष्ट वनरोपण  योजनाएं,भूसंरक्षण योजना, जल्दी बढ़नेवाले पौधे की योजना, तसर वन रोपण, शीशम वनरोपण के लिए वित्तीय वर्ष 15-16 में 6900 लाख का बजट उपबंध स्वीकृत है

पथ -तट रोपण सह वानिकी योजना के अंतर्गत आम नागरिकों को स्वच्छ ,स्वास्थ्य कारक एवं आराम देह वातावरण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सड़कों के किनारे, सरकारी परिसरों तथा स्कूलों, कॉलेजों, सरकारी कार्यालयों, पहाड़ियों इत्यादि पर उपयुक्त छायादार/ फलदार/ फूलदार /इमारती कास्ट/अन्य  सौंदर्य कारक प्रजातियों का वृक्ष रोपण किया जा रहा है

स्थाई पौधशाला एवं सीड् आर्चड्स  योजनान्तर्गत मुख्य रूप से बॉस गोबियन वृक्षरोपण हेतु औसतन 5 से 8 फीट लंबे पौधे तैयार किए जा रहे हैं

वन प्रबंधन में संयुक्त वन प्रबंधन की नीति एक सफल और उपयोगी नीति है ,जो वनों के प्रति आम नागरिकों में उनके कर्तव्यों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करती हैं 

झारखंड में वन संवर्धन और प्रबंधन की विधिवत  शिक्षा के लिए रांची में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय से संबद्ध वानिकी कॉलेजों में वानिकी संकाय स्थापित है

झारखंड में प्राकृतिक संसाधनों को बेहतर प्रबंधन के लिए वन अभिलेखों एवं वन सीमाओं का डिजिटलाइजेशन एवं जियोरेफरेंसिंग करने की योजना है

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Friday, October 23, 2020

झारखंड में वन नीति(Jharkhand Me Van Niti)

झारखंड में वन नीति

(Jharkhand Me Van Niti)


स्वतंत्र भारत के प्रथम वन नीति 1952 में बनी थी

1952 से 1988 के बीच वनों का इतना विनाश हुआ कि वनों और उनके उपयोग पर एक नई नीति बनाना आवश्यक हो गया

पहले की वन नीतियों का केंद्र केवल राज्य का सृजन था

1980 के दशक में स्पष्ट हो गया कि वनों का संरक्षण उनके अन्य कार्यों के लिए भी आवश्यक है, जैसे मृदा और जल व्यवस्थाओं के संरक्षण के लिए, जो पारितंत्र को सुरक्षित रखने में सहायक होते हैं

इनमें स्थानीय निवासियों के लिए वनों से प्राप्त वस्तुओं और सेवाओं के उपयोग की व्यवस्था भी होनी चाहिए

इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए 1988 ईस्वी में राष्ट्रीय वन नीति की घोषणा की गई

भारत की राष्ट्रीय वन नीति, 1988 के अनुसार किसी प्रदेश के कुल क्षेत्रफल के 33 पॉइंट 33 प्रतिशत भाग पर वन का विस्तार होना चाहिए

झारखंड के कुल क्षेत्रफल का 29 पॉइंट 61 प्रतिशत भाग पर वन है

राज्य में वन क्षेत्र को 33% से अधिक करने के लिए झारखंड सरकार ने वन नीति बनाई है


1) प्रत्येक गांव में एक वन समिति होगी, जिसमें गांव के प्रत्येक परिवार का एक सदस्य होगा 

2) राज्य में 200 वन समितियों का गठन किया गया है

3) ग्रामीणों की आवश्यकता अनुसार वृक्षारोपण किया जाएगा

4) वन उत्पादों को सरकारी एजेंसियों के माध्यम से खरीद की जाएगी

5)  वनों की सुरक्षा का भार ग्रामीण और वन विभाग दोनों के ऊपर होगा
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Thursday, October 22, 2020

जनजातीय सुरक्षा एवं विकास संबंधित संवैधानिक प्रावधान (Janjatiye Suraksha Aur Vikas Sambandhit Sanvaidhanik Pravadhan)

जनजातीय सुरक्षा और विकास संबंधित संवैधानिक प्रावधान

(Constitutional Provisions Related To Tribal Security And Development)






जनजातीय सुरक्षा संबंधी प्रावधान 

अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा से संबंधित प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 15 (4), 16(4), 19(5), 23,29, 46, 164(1) ,330, 332, 334, 335, 338, 339(1), 5वी अनुसूची में दिए गए हैं  

अनुच्छेद 15(4) :- सामाजिक आर्थिक एवं शैक्षणिक हितों का विकास

अनुच्छेद 16(4) :- पदों वह सेवाओं में आरक्षण

अनुच्छेद 19(5) :-संपत्ति में जनजातियों के हितों की सुरक्षा

अनुच्छेद 23 :- मानव के दुर्व्यवहार और बाल श्रम का प्रतिषेध 

अनुच्छेद 29 :- अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण 

अनुच्छेद 46 :- अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य कमजोर वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि

अनुच्छेद 164(1) :- कुछ राज्यों में (जिसमें झारखंड भी शामिल है) जनजातियों के कल्याण के लिए एक मंत्री भी नियुक्त 

अनुच्छेद 330 :- लोकसभा में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों को सुरक्षित रखा गया है

अनुच्छेद 332 :- राज्य की विधान सभाओ  में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का रिज़र्व 

अनुच्छेद 334 :- स्थानों के आरक्षण एवं विशेष प्रतिनिधित्व का (60) वर्ष के पश्चात न रहना 

अनुच्छेद 335 :- सेवाओं एवं पदों के लिए अनुसूचित जातियों  एवं अनुसूचित जनजातियों के दावे 

अनुच्छेद 338 :- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग

अनुच्छेद 339(1) :- राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन एवं अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के संबंध में रिपोर्ट देने के लिए राष्ट्रपति द्वारा आयोग की नियुक्ति

पांचवी अनुसूची :- अनुसूचित क्षेत्रों में एवं अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन एवं नियंत्रण के बारे में उपबंध

जनजातीय विकास कल्याण संबंधी प्रावधान 

अनुसूचित जनजातियों के विकास (कल्याण) से संबंधित प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 275 एक एवं 340 दो में दिए गए हैं 

अनुच्छेद 275(1) :-  कुछ राज्यों को संघ से अनुदान 

अनुच्छेद 339(2) :-  दो  केंद्रीय कार्यपालिका द्वारा राज्यों को अनुसूचित जनजाति के विकास के लिए उपयुक्त कार्यक्रमों को लागू करने का निर्देश



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