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Wednesday, June 16, 2021

The Crown Rule (1858- 1947) - Part I : Government of India Act (1858)

The Crown Rule (1858- 1947) - Part-I

Government of India Act of 1858: 

This significant Act was enacted in the wake of the Revolt of 1857- also known as the First War of the Independence or the 'Sepoy mutiny'. The act is known as the 'Act for the Good Government of India' abolished the East India Company (EIC), and transferred the powers of government, territories, and revenues to the British Crown.

The Crown Rule (1858- 1947) - Part I : Government of India Act (1858)

Features of the Act:

  • It provided that India henceforth was to be governed by and in the name of Her majesty. It changed the designation of the Governor-General of India to that of Viceroy of India. He (Viceroy) was the direct representative of the British Crown in India. Lord Canning thus became the first Viceroy of India.

  • It ended the system of double government by abolishing the Board of Control and Court of Directors.


  • It established a fifteen (15) number Council of India to assist the secretary of state for India. The council was an advisory body. The secretary of state was made the chairman of the council.

  • It constituted the secretary of state-in-council as the body corporate, capable of suing and being sued in India and in England.

The Act of 1858 was, however, largely confined to the improvement of the administrative machinery by which the Indian Government was to be supervised and controlled in England. It did not alter in any substantial way the system of government that prevailed in India.

👉 Previous Page:The Crown Rule (1858- 1947) - Part III : Indian Council Act (1892)

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Jharkhand Punarsthapana evam Punarvas Niti-2008 (झारखंड पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास नीति-2008)

Jharkhand Punarsthapana evam Punarvas Niti-2008

➧ झारखंड के स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा हेतु झारखंड सरकार ने वर्ष 2008 में झारखंड पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास नीति की घोषणा की, इस नीति का मुख्य उद्देश्य इस प्रकार है 

झारखंड पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास नीति-2008

(I) जहां तक संभव हो, न्यूनतम विस्थापन, विस्थापन न करने अथवा कम-से-कम विस्थापन करने के विकल्पों को को बढ़ावा देना

(II) प्रभावित व्यक्तियों की सक्रिय भागीदारी के पर्याप्त पुनर्वास पैकेज सुनिश्चित करना तथा पुनर्वास प्रक्रिया में तेजी से कार्यान्वयन सुनिश्चित करना

(III) समाज के कमजोर वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के अधिकारों की सुरक्षा करने तथा उनके विचार के संबंध में ध्यान पूर्वक तथा संवेदनशीलता के साथ कार्रवाई किए जाने पर विशेष ध्यान रखने को सुनिश्चित करना 

(IV) पुनर्वास कार्यों को विकास योजनाओं तथा कार्यान्वयन प्रक्रिया के साथ एकीकृत करना

(V) जिस क्षेत्र में बड़ी संख्या में परिवारों का विस्थापन हो, वहां सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन लागू करना तथा पुर्नस्थापन क्षेत्र में अपेक्षित आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना 

(VI) प्रभावित परिवारों के बेहतर जीवन स्तर उपलब्ध कराने तथा सतत रूप से आए मुहैया कराने हेतु संयुक्त प्रयास करना 

पुर्नस्थापन एवं पुनर्वास

 यदि किसी परियोजना के लिए भूमि अर्जन के कारण किसी भी क्षेत्र में 100 या इससे अधिक परिवारों का  अनैच्छिक स्थापन हो रहा हो तो राज्य सरकार अधिसूचना के द्वारा उपायुक्त के स्तर के समकक्ष किसी अधिकारी को पुनर्स्थापन  और पुनर्वास प्रशासन के रूप में नियुक्त करेगी

➧ प्रशासन की सहायता के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति भी की जाएगी

➧ पर्यावरण प्रभाव तथा सामाजिक प्रभाव का मूल्यांकन जन-सुनवाई के माध्यम से 30 दिनों के अंदर पूरा किया जाएगा

पुनर्स्थापन तथा पुनर्वास योजना

➧ किसी परियोजना के लिए भूमि के अर्जन अथवा या किसी अन्य कारणवश सामूहिक रूप से किसी भी क्षेत्र में 100 या से अधिक परिवारों के अनैच्छिक परिवारों के विस्थापन की संभावना हो तो वह एस.आई.ए.स्वीकृति के 15 दिनों के अंदर आदेश के माध्यम से गांव के क्षेत्र अथवा स्थानों को प्रभावित क्षेत्र घोषित करेगा


➧ जिसमें कम से कम 2 हिंदी भाषा में होंगे, जिनका प्रचलन गांवों में अथवा क्षेत्र में होता हो, जिनके प्रभावित होने की संभावना है

 इस सर्वेक्षण से प्रभावित परिवारों के बारे में इसके अनुसार ग्राम वार सूचना दी जाएगी
 
(i) परिवार के वे सदस्य जो प्रभावित क्षेत्र में रह रहे हैं, कब से रह रहे हैं , किस व्यापार, कारोबार अथवा पेशे में लगे हुए हैं

(ii) कृषि श्रमिक अथवा गैर-कृषि श्रमिक

(iii) अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति, आदिम जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित परिवार

(iv) दिव्यांग, निराश्रित, अनाथ, विधवाएँ, अविवाहित लड़कियां, परित्यक्त महिलाएं अथवा ऐसे व्यक्ति जिनकी आयु 50 वर्ष से अधिक है, जिन्हें वैकल्पिक आजीविका उपलब्ध नहीं कराई गई है अथवा तत्काल उपलब्ध नहीं कराई जा सकती है और जो अन्यथा परिवार के  भाग के रूप में शामिल नहीं होते हैं

(v) ऐसे परिवार, जो भूमिहीन है तथा गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले, परंतु प्रभावित क्षेत्र की घोषणा की तारीख से पहले प्रभावित क्षेत्र में कम-से-कम गैर अनुसूचित क्षेत्र में 15 वर्ष एवं अनुसूचित क्षेत्र में 30 वर्षों से अन्यन अवधी से लगातार रह रहे हैं तथा जो संबंधित ग्राम सभा द्वारा प्रमाणित हो

➧ अनुसूचित क्षेत्र के 100 या इससे अधिक अनुसूचित जनजातियों के परिवारों के अनैच्छिक विस्थापन के मामले में जनजातीय सलाहकार परिषद से विचार-विमर्श किया जाएगा 


प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास 
लाभ 

➧ ऐसे किसी भी प्रभावित परिवार, जिसके पास अपना घर हो उसका घर अधिग्रहित कर लिया गया हो, को प्रत्येक एकल परिवार के लिए अर्जित किए गए भूमि के लिए ग्रामीण क्षेत्र में 10 डिसमिल तथा शहरी क्षेत्र में 5 डिसमिल तक आवास के लिए बिना किसी लागत के अंतरित की जाएगी 


➧ गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी के प्रत्येक परिवार जिनके पास वासभूमि नहीं हो जो प्रभावित क्षेत्र की घोषणा की तारीख से पहले गैर-अनुसूचित क्षेत्र में 15 वर्षों से और अनुसूचित क्षेत्र में 30 वर्षों से लगातार रह रहा हो और अनैच्छिक रूप से विस्थापित हुआ हो, को पुनर्स्थापन  क्षेत्र के ग्रामीण क्षेत्र में 55 वर्गमीटर विस्तार वाला क्षेत्र का मकान मुहैया कराया जा सकता है

➧ परिवारों को आवंटित की गई भूमि या घर सभी ऋणों से मुक्त होगा तथा पति और पत्नी के संयुक्त नाम से होगा

➧ परियोजना से प्रभावित परिवारों से पशुओं के लिए तथा पशुशाला के लिए के निर्माण के लिए ₹35000 की राशि दी जाएगी 

➧ इन परिवारों को भवन-निर्माण की सामग्री एवं सामान तथा पशुओं के स्थानांतरण के लिए ₹15000 की वित्तीय सहायता एवं ऐसे दुकानदार जिनकी विस्थापन के कारण उनकी दुकान अथवा गुमटी प्रभावित हुई है, उसे ₹50000 की वित्तीय सहायता दी जाएगी 


शिकायत निवारण तंत्र

➧ राज्य सरकार प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापन और पुनर्वास योजना कार्यान्वयन के लिए सरकारी अधिकारी की अध्यक्षता में एक समिति गठित करेगी, जो अनुमंडल पदाधिकारी से छोटा ना हो इस समिति को पुनर्स्थापन और पुनर्वास समिति कहा जाएगा 

➧ परियोजना स्तर पर पुनर्स्थापन और पुनर्वास समिति के अंतर्गत आने वाले मामलों से छोड़कर जिले में प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापन तथा पुनर्वास के कार्य की प्रगति की निगरानी और समीक्षा करने के लिए  उपायुक्त की अध्यक्षता में एक स्थायी पुनर्स्थापन और पुनर्वास समिति गठन की जाएगी 

➧ शिकायतों का समयबद्ध रूप से निपटारा हेतु राज्य सरकार द्वारा त्रिसदस्यीय न्यायाधिकरण का गठन किया जाएगा 


निगरानी तंत्र

➧ राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक परिषद होगा, जो पुनर्स्थापन और पुनर्वास समिति के क्रियान्वयन के संबंध में परामर्श, समीक्षा एवं अनुश्रवण का कार्य करेगा  

➧ परिषद में संबंधित विभाग के मंत्री, राज्य के मुख्य सचिव तथा संबंधित विभाग के सचिव होंगे

➧ इस परिवार में राष्ट्रीय स्तर के ख्याति प्राप्त विशेषज्ञ को सदस्य के रूप में रखा जा सकता है 

➧ राज्यस्तरीय  पुनर्स्थापन और पुनर्वास की वर्ष में कम से कम 2 बैठकें आयोजित की जाएंगी

सूचना का आदान-प्रदान 

➧ विस्थापन, पुनर्स्थापन  और पुनर्वास के संबंध में सभी सूचना, प्रभावित व्यक्तियों के नाम पुनर्स्थापन और पुनर्वास पैकेज के ब्यूाेरो को इंटरनेट पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाएगा तथा परियोजना प्राधिकारियों द्वारा इस सूचना से संबंधित ग्राम-सभाओं, पंचायतों आदि को अवगत कराया जाएगा 

➧ इस नीति के अंतर्गत शामिल प्रत्येक मुख्य परियोजना के पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास के लिए राज्य सरकार के संबंधित विभाग में एक पर्यावलोकन  समिति गठित होगी

                                                                                                👉Next Page:झारखंड के अपवाह तंत्र
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Tuesday, June 15, 2021

Musical Instruments of Jharkhand: Jharkhand History - JPSC/ JSSC

Musical Instruments of Jharkhand

There is a predominance of music and dance in the lifestyle of the people of Jharkhand. The culture of Jharkhand state is wealthy and assorted as an effective exclusive in its own way. Tribal music plays a significant role in the picture of music at the national level. 

Musical Instruments of Jharkhand: Jharkhand History - JPSC/ JSSC

In everyday life, music and dance are mandatory in almost every kind of ceremony/ritual. Birth, christening, marriage rituals, agriculture, and various kind of religious occasions are not organized with music. Without musical instruments the enjoyment of Jharkhandi music is incomplete. Therefore, according to the geographical and cultural environment of Jharkhand, the instruments are provided by the available resources at the local level. All the communities of the society cooperate in the making of these instruments. Often, different materials are required to make these musical instruments to which the craftsman communities of society contribute significantly. The specialty of these instruments is that almost all the instruments except the cymbals and kartals are played by men. 

The instruments of Jharkhand can be divided into 4 (four) categories according to their design

A. First category

Musical instruments in which sound is produced by rubbing or piercing a string are called 'string instruments'. These are the instruments, which consist of silk string, iron, copper, or brass wire. They are played in two ways:

  • Silk string, string, or metal wires are pierced with fingers, elephant teeth, strikers, wood, etc. such as Kendra, Banam, Byung, Tuila, and Ektara fall into this category. These instruments are rigged or pierced with a finger or gazelle, which produces a sound. The sounds produced by sanding are controlled by the operation of the fingers of the other hand.

1. Kendra: 

Kendra is a popular stringed instrument in the Chota Nagpur region, producing gentle and compassionate vocals. In Hindustani music, this place can be given to Sarangi. Due to the intensity of the voice being slow and soft, its tone becomes secondary when played with Mandar, nagara, or dhol. For this region, it is often played with a solo song when the leather instruments stop.

It is made by tying two circular shells of dry gourd at both ends of hollow bamboo sticks of about four feet. At both ends, there are wooden poles, on which the wires are tied. The remaining strands of wire are tied into another piece adjacent to it. It looks like an indigenous form of the veena but in it, the sound emanates from running yards or seams on the strings.


2. Banam:

This string instrument is a favorite instrument of the Santhal community. It is used as an accompaniment to the song. It is made by cutting the coconut shell in half and overlaying Goh leather over it. Goh is a chameleon species, but several times larger than half of the reptile, which is abundantly available in the Santhal Pargana regions. Its leather is strong. A wooden or bamboo latch is attached to the overlaid shell. At the upper end of this sentence, there are two knots on each side. There are four strands of wire are taken out from the peg in the lower end of the coconut shell and taken from the top of the overlaid leather, and tied separately in the pegs on the upper end of the latch. Don't touch the skin or wire leather, so a thin wood is placed almost in the middle of the coconut leather shell. All four or three of its wires rise above the surface of the leather and remain taut. These wires produce a slightly thick sound when 'rubbed or sanded' by the tail of the horses. It is an indigenous form of stringed violin used in western music.

Musical Instruments of Jharkhand

Fig: Banam

3. Buang:

This is the favorite instrument of the Santhal community. This instrument consists of two parts- 1.) bow, 2.) dry gourd's Tumba, with one end open. Usually, where the bow is held, that is, in the middle, about one and a half feet tall gourd is hung around it. The lower end of the tube is open. To play it, the bow is held from the left hand, and string is played from the right hand which produces the sound of 'buang-buang'. This produces the same type of tone, so it is played on the level of the beat.


4. Tuila/Tohila:

This is an instrument with a soft tone. Its players are now extinct, as the process of playing this instrument is very complex. Due to its soft tone, it is not played with other musical instruments.

To make this, hollow sticks about 3-4 feet are taken. On the thicker end of the sticks, a dry groud's half-cut shell is placed from the base and roots. The mouth of the severed half remains open. Inside this half, the metal ring is tightened with a thick thread of silk. The silk thread is tied two to three places on the other side of the hollow sticks. The player holds the tuila/tohila with one hand in his chest and rubs silk thread with the fingers of the other hand. With this, it removes the open end of the gourd adjacent to the chest and sometimes retracts it. This produces the desired gentle and compassionate voice.


5. Ektara:

It is commonly used by saints, monks, and fakirs to make them compatible with devotional songs hymns. The same tone emanates from this, providing the vocal base as well as maintaining the rhythm. 

To make this, half a chopped dry gourd is opened, over which the leather is applied. In the two ends of the gourd, two skulls of about three and a half feet of bamboo are tightened. The upper end of the skulls is added and bamboo or wooden peg is inserted in the middle. A wire is drawn from the center of the gourd shell and wrapped in a peg inserted in the center. The peg may rotate left. This helps in tightening or loosening the wire. The player holds both the bamboo scabs with the palm of one hand in such a way that his index finger is free to pierce the wire. When the wire is pierced, the tone is released, which is tightened or loosened on the slab to make it thin or thick at will. A triangle piece of metal is also worn to protect the finger from shock.

Musical Instruments of Jharkhand
Fig: Ektara

6. Sarangi:

Sarangi has a texture like banam. The difference is that both its base and the upper part are wider than banam. It is played with the neck by placing the upper part on the shoulder, keeping it in the lap from the base. Its tones are controlled by placing the fingernails back and forth on the strings.

Musical Instruments of Jharkhand
Fig: Sarangi

B. Second category:

Musical instruments played by mouth blowing, such as flute, shehnai, singa, mural, madanbheri, etc.

1. Bansuri (Flute):

Basuri is a popular instrument in the Jharkhand region. In the Santhal Pargana region, it's a common area to see shepherd grazing cow, bulls, and playing the flute.  

To make this, a piece of hollow bamboo about one and a half inch diameter and two and a half feet is taken. One end of this hollow bamboo piece is cut from the top of the knot so that the tips remain open. The diameter of a piece of bamboo can be less or even larger. By this thickness, the fine or thicker tone of the flute is determined. A thick or thin iron rod is heated by placing it in the fire when it becomes hot and turns red, the round end of the bamboo knot is pierced with a hot wire at a distance of about four fingers from the knot. After this, six holes are made by this process, starting with a gap of about ten to twelve fingers from this hole towards the end of the bamboo. The lip is blown by placing the lips of a hole made from this knotted end and the other areas are controlled by closing or opening with three fingers of both hands.

In the Santhal Pargana region, traditionally the top holes are closed with two fingers of the left hand and the remaining four holes with four fingers of the right hand. There is a huge difference between the playing style of Hindustani music and the tribal playing style.

Musical Instruments of Jharkhand
Fig: Bamboo Flute

2. Murali:

It is another form of the flute. The instrument which is available in the market is called Murali. The sounds come out by blowing it in the mouth. The number and size of vowel counting holes in it are also similar to that of the flute, but the difference is that the end where the mouth is blown off and half of that end is peeled off and another wood of about the same diameter is farming this way. There is little left for air to go. At this end, a small rectangular hole is made on about two fingers. Putting the splintered head in the mouth and blowing it creates a tone.


3. Kendri:

This is the favorite instrument of Santhal. It is also known as the 'Jharkhandi violin'. Its Tumba is made from turtle coconut shells. Bamboo or wood lashing is attached to Tumba. There are three wires on it. The gauze is made from the hair of the horse's tail. The rubbing of the gauze and the strings produce sounds.

Musical Instruments of Jharkhand
Fig: Jharkhandi Violin

4. Singa:

Singa is made from buffalo's horns. Its pointed end is blown. The other end of wide mouth and it bends towards forward. It is played to chase away animals during hunting. Shepherd also plays songs to control animals.

Musical Instruments of Jharkhand
Fig: Singa 


5. Dhamsa:

It is a giant instrument. It is used as an instrument such as Mandar, dhol, etc. Its shape is like a pan. Its structure is made from iron-sheet. It is played with the support of wood. Its voice is serious and weighty. In Chhau dance, the voice of dhamsa embodies scenes like war and military march.


6. Thala:

Thala is a plate made up of bronze. Its rounded edge is raised 2-3 inches. There is a hole in the middle, in which the rope is bent. With the left hand holding the rope, it is played from the right hand with the corn stick.

Musical Instruments of Jharkhand
Fig: Thala

7. Shehnai:

It is used as the main instrument in dances like Chhau, Paika, and Natua. Apart from this, it is played on occasions of marriage, worship, etc. of Sadan communities. It is also a musical instrument of the same type as the Murali, but the difference is that while there are six holes to control the tone in the flute, the shehnai has seven holes, which are about one and a half feet long pieces of the hollow wood. At the thin end, where it is expected to be blown into, 'Panna' made from the palm leaves is tied with a thread. At the other end, there is a brass or bronze clove. A leaf made of palm leaves into the lips and blows out a thin and sharp tone.


8. Madanbheri:

This Shehani is played with other leather instruments at the time of the wedding, Chhau dance. Sometimes its sound is also used to drive away wild animals. This brings out the same tone. It has a brass tube attached at the front of a wooden tube about four feet long. The air pressure from the mouth is reduced or increased to control the tone. In addition to these instruments, the marking and piercing are prominent in the sound instruments.

Musical Instruments of Jharkhand
Fig: Madanbheri


C. Third category

Musical instruments consist of various types of leather instruments, which are beaten and played with palm fingers or a small stick of wood. All these are basically percussion, as they contribute to maintaining the rhythm of the song. Mandar, Nagara, Tamak, Dhol, Dhak, etc. fall into this category.


Mandar:

It is one of the oldest musical instruments of Jharkhand, which is used by all the Jharkhandi community. It may be small or large in different communities, but the structure is the same. Mandar is often used in all the Jharkhandi dances and rituals. 

It is made by the piercing of leather and either side of the open ends of a circular shell, about three to three and a half feet long, of clay or wood. Often monkey or goat leather is used for mounting. Thin leather is tightly wrapped around it to protect a long circular shell made of clay. The fabric is attached at both open ends by making small holes in the upper end of its rounding and attaching it to a thin strip of leather. By tightening these thin strips, the tension on both the sides gets tight and the tone increases when beaten and the tone becomes thicker when loosened. The diameter of the left-handed end of the mandar is slightly larger than the right-handed end. The leather on the right-hand end is slightly thick and rough. It is played with the palm and fingers of both hands hanging like a drum, around the neck. On a nocturnal night, both the chant and the beat of the temple produce a strange magical compelling sound.

Musical Instruments of Jharkhand
Fig: Mandar/Tumdak'

Nagara:

It is a major musical instrument of Jharkhand, just like the mandar. It is used on various occasions by both tribals and sadan communities. In most dances, its accompaniment to the mandar is considered indispensable.

The size of the nagara is determined according to the location and community such as large, medium, and small. A large-sized drum is played on the ground. Medium and small-sized nagara is hung by hanging around the neck or waist. The small-sized nagara is called 'Tamak' in the Santhal community in the Santhal Pargana region.

The open end of an iron domed shell is overlaid with thick buffalo leather to make a drum. The dome shell is fitted with a leather ring to provide a base on the ground. It is made up of leather lace. The ribs are tightening by placing them in holes made on the outer edges of the overlaid leather. Tightening increases the tone and loosening make the tone slower and thicker. Silt is applied in the middle of the overlaid leather. The same technique is also practiced in medium and small-sized nagaras. Thin and short sticks are used to play them.

Musical Instruments of Jharkhand
Fig: Nagara/Tamak (single-headed cattle drum)

Dhol:

Dhol is often played on occasions of marital ceremonies, festivals, and worship. Dhol plays the main role in various festivals of Jharkhand and many folk dances.

The dhol is usually made from jackfruit and mango wood. For this, a wooden shell of about three and a half feet diameter is opened. The middle part of the wood is slightly embossed. Both are open ends are covered with goat leather. To tighten the skin of these two ends, they are tied around the forehead. Tightening and loosening in the leather are done up and down by the threaded metal ring in these fibers. The drum is played by hanging it around the neck with the palm on the left side and beating it with a thin and small stick of wood.


Dhak:

Dhak looks similar to a drum, but its size is somewhat larger than the drum. It is often played especially during the sacred hymns such as Durga-Pooja and Mansa-Pooja and 'Paika' and 'Natua' dances. Similar to the drum, the two open ends of the wooden shell are covered with goat leather and are folded together using a leather band. These rings are threaded with metal rings, which are raised or lowered from top to bottom. To play the dhak, the player hangs it on his left shoulder in such a way that the head being played is slightly slanting towards the front. At the same end, a pleasant voice comes out when hit with bamboo arches. Dhak instrumentalists community- special people are invited on occasions like matrimonial celebrations, worships festivals, etc.

Musical Instruments of Jharkhand
Fig: Dhak

D. Fourth category

In this category Jhal, Kartal, Thal, Bell, Ghungroo, Manjira, Secoe, etc. are often played on the beat. In western music, they are called 'Percussion Instruments'.

Musical Instruments of Jharkhand
Fig: Manjira


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Jharkhand Ke Audyogik Pradesh (झारखंड के औद्योगिक प्रदेश)

Jharkhand Ke Audyogik Pradesh

➧ किसी भी क्षेत्र में औद्योगिक प्रदेशों का विभाजन औद्योगिक इकाइयों की सघनता, उनके आपसी संबंध, नगरीय जनसंख्या, यातायात सुविधाओं आदि के आधार पर किया जाता है

➧ झारखंड में इस आधार पर औद्योगिक प्रदेशों का विभाजन करना जटिल कार्य है

झारखंड के औद्योगिक प्रदेश

लेकिन फिर भी झारखंड को 7 औद्योगिक प्रदेशों में विभाजित किया जाता है:-

(I) अभ्रक औद्योगिक प्रदेश 

➧ इसका विस्तार गिरिडीह, कोडरमा, धनवार, डोमचाच, क्षेत्र में है। यह क्षेत्र रूबी अभ्रक के लिए विश्व प्रसिद्ध है 

➧ यहाँ अभ्रक परिष्करण के लिए डोमचाच, झुमरी तिलैया, चकरई  एवं गिरिडीह में उद्योग लगे हुए हैं 

➧ इस क्षेत्र में सड़क एवं रेल मार्ग भी मौजूद है 

➧ इस क्षेत्र में 500 छोटे-छोटे अभ्रक उद्योग थे, जिसमें 400 से अधिक बंद हो चुके हैं


(II) दामोदर घाटी औद्योगिक प्रदेश

➧ यह झारखंड की नही, संपूर्ण भारत का विकसित औद्योगिक प्रदेशों में से एक है

➧ इस क्षेत्र में कोयले का विशाल भंडार है

➧ कोयला खनन उद्योग के अलावे, लोहा उद्योग, खाद उद्योग एवं कांच उद्योग, रिफेक्टरी उद्योग, बारूद उद्योग भी सक्रिय हैं

यह मुख्यत: धनबाद और बोकारो जिला का क्षेत्र है

➧ इस क्षेत्र में नगरीय जनसँख्या भी अधिक है और यातायात के साधन भी विकसित है
 

(III) बॉक्साइट खनन औद्योगिक प्रदेश

➧ इसका विस्तार मुख्यत: पाट क्षेत्र में है

 गुमला जिला का उत्तरी भाग, लातेहार जिला का दक्षिणी भाग एवं लोहरदगा जिले के उत्तर-पश्चिमी भाग में बॉक्साइट का विशाल भंडार है इस क्षेत्र में चाईना क्ले एवं लिग्नाइट खनिज भी प्राप्त होते हैं

 यह नगरीकरण एवं सड़कों का अभाव पाया जाता है 

➧ इस क्षेत्र में बॉक्साइट की उपलब्धता के बावजूद एलमुनियम प्रोसेडिंग प्लांट नहीं है यही कारण है कि यहां के बॉक्साइट से मुरी प्लांट में एलमुनियम का उत्पादन होता है 


(IV) रांची औद्योगिक प्रदेश

➧ इसे ऊपरी स्वर्णरेखा औद्योगिक प्रदेश भी कहते हैं इसका विस्तार रांची-रामगढ़ एवं खूंटी जिले में है 

 इस क्षेत्र में पतरातु, रामगढ़, ओरमांझी, हटिया, रांची, नामकुम, टाटीसिल्वे, मुरी  में औद्योगिक इकाईयों स्थापित है 

 इस क्षेत्र के प्रमुख इकाइयां एवं उत्पादन निम्न है 

(i) रामगढ़               :   कोक कोयला और कांच 

(ii) ओरमांझी           :   सूत उद्योग

(iii) रातू                   :   श्रीराम बॉल बेयरिंग 

(iv) सामलौंग           :   हाइटेंशन इंसुलेटर 

(v) टाटीसिल्वे          :   उषा मार्टिन

(vi) नामकुम            :   लाह उद्योग

(vii)  रांची                :   ऑटोमोबाइल, बाल्टी निर्माण, कृषि उपकरण

(viii)  हटिया            :   एच.ई.सी.

(ix) तुपुदाना             :   ग्रेनाइट खनन 

(x) खूंटी                    :   ब्लैक ग्रेनाइट उद्योग 


(V) जमशेदपुर औद्योगिक प्रदेश

➧ इसका विस्तार चांडिल से घाटशिला तक है इस वृहद औद्योगिक प्रदेश में भारत का सबसे प्रसिद्ध लौह-इस्पात  कारखाना जमशेदपुर में स्थापित है

➧ इससे स्वर्णरेखा प्रौद्योगिकी प्रदेश तथा इंजीनियरिंग प्रौद्योगिकी प्रदेश भी कहा जाता है

➧ इस क्षेत्र में प्रमुख औद्योगिक केंद्र जमशेदपुर, चांडिल, कांड्रा, जुगसलाई, पोटका, पटमदा, नीमडीह आदि है

➧ झारखंड के किसी भी औद्योगिक प्रदेश की तुलना में सबसे अधिक संपन्न, सघन और वृहद् औद्योगिक प्रदेश है

➧ इस क्षेत्र में  स्टील निर्माण, वायर प्रोजेक्ट, टीन प्लेट, केबल, टूयूब, कृषि उपकरण, ग्लास उत्पादन की इकाइयां अधिक है


(VI) घाटशिला-बारहागोड़ा औद्योगिक प्रदेश

 इससे पूर्व सिंहभूम औद्योगिक प्रदेश  भी कहा जाता है, जो ज्यादा तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता

➧ इस क्षेत्र में मुख्य रूप से तांबा और यूरेनियम के खाने हैं

 तांबा का उत्पादन भोगनी, मुसाबनी, सुरादा, केन्दाडीह, पथरगोड़ा से होता है, जबकि यूरेनियम का उत्पादन घाटशिला से किया जाता है 

➧ इस क्षेत्र में अधिकांश खनन कार्य बंद हो रहे हैं यहां परिवहन संचार एवं विद्युत प्रणाली का भी अभाव है 


(VII) पश्चिमी सिंहभूम प्रौद्योगिकी प्रदेश

➧ इसका विस्तार पोरहाट से सारंडा के जंगलों के बीच है

➧ यहां के मुख्य औद्योगिक केंद्र चाईबासा, झींगपानी, नावाडीह, जामदा, मोहनपुर, कराईकेला है 

➧ यह कलकत्ता - मुंबई रेलमार्ग पर स्थित क्षेत्र है इन क्षेत्रों  में निम्न उद्योग स्थापित है 

(i) नोवामुंडी           :  एशिया की सबसे बड़ी लौह-अयस्क की खान है  

(ii) कराईकेला        :  क्रोनियम उत्पादन 

(iii) जामदा बूढ़ाबुरु : लौह-अयस्क उत्पादन 

(iv) मोहनपुर          :   मैगनीज उत्पादन 

(v) चाईबासा           :   बीड़ी उद्योग

(vi) झींगापानी        :   सीमेंट उद्योग

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Monday, June 14, 2021

Jharkhand Ke Pramukh Udyog (झारखंड के प्रमुख उद्योग)

Jharkhand Ke Pramukh Udyog

➧ झारखंड प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न राज्य है भारत के कुल खनिज भंडार का 40% झारखंड राज्य में पाया जाता है 

➧ खनिजों की उपलब्धता के कारण राज्य में औद्योगिक विकास की अपार संभावनाएं मौजूद हैं उद्योगों के विकास से आर्थिक संवृद्धि सुनिश्चित होने के साथ-साथ रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे 

झारखंड के प्रमुख उद्योग

राज्य के प्रमुख उद्योगों का वर्गीकरण

 वन संसाधन आधारित उद्योग  :- झारखंड में लाह, गोंद, साल के बीच, महुआ के फूल एवं बीज, तेंदूपत्ता आदि लघु वनोत्पाद हैं

➧ इसके अतिरिक्त राज्य में कागज, अखबारी कागज, लुगदी आदि उद्योगों की भी अपार संभावनाएं हैं

➧ खाद्य प्रसंस्करण उद्योग :- झारखंड भारत में सबसे अधिक सब्जी उत्पादक राज्यों में से एक है झारखंड में सब्जियों में टमाटर, आलू, भिंडी, गोबी, शकरकंद तथा फलों में अमरूद, आम आदि का उत्पादन होता है

➧ पापड़, चटनी, तंबाकू आदि प्रसंस्करणयुक्त उत्पादों के लिए भी यह राज्य उपयुक्त है

➧ कृषि सहायक उद्योग :- इसके अंतर्गत अचार, चटनी, फलों का मुरब्बा, पिसा अनाज आदि उत्पाद पर आधारित उद्योग आते हैं 

➧ सूती वस्त्र उद्योग :- झारखंड में विशेष जाति समुदाय द्वारा हथकरघे से कपड़े बुनने का कार्य किया जाता हैरांची जिले में ओरमांझी गांव में सूत का कारखाना तथा इरबा रांची का 'छोटानागपुर रीजनल हैंडलूम वीवर्स सोसाइटी' इसके लिए प्रसिद्ध है

रेशमी वस्त्र उद्योग :- देश भर में सबसे अधिक तसर उत्पादन झारखंड में होता है। इसका सबसे अधिक उत्पादन पलामू, रांची, हजारीबाग आदि जिलों में होता है राज्य में नगड़ी रांची में तसर अनुसंधान केंद्र एवं गोड्डा  में तसर कोआपरेटिव सोसाइटी कार्यरत है

➧ झारखंड की तसर रेशम गुणवत्ता को ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन भी दिया गया है 

वस्त्र  उद्योग :- वस्त्र  उद्योग के अंतर्गत कपड़ों की सिलाई, क्रय-विक्रय, कपड़ा बुनना, रंगना, धागा कातना आदि उद्योग आते हैं

लकड़ी उद्योग  :- इस उद्योग के अंतर्गत लकड़ी की कटाई (चिराई), फर्नीचर बनाना, लकड़ी का क्रय-विक्रय करना और लकड़ी के खिलौने बनाना आदि आता है

➧ अन्य उद्योग :- राज्य में अन्य उद्योगों में धातु उद्योग, चर्म उद्योग, साबुन बनाना, चूड़ियां बनाना, अगरबत्ती, मोमबत्ती बनाना, शहद इकट्ठा करना आदि शामिल है 

झारखंड के प्रमुख वृहद उद्योग (Large Industries)

➧ झारखंड की अर्थव्यवस्था में वृहद उद्योगों का महत्वपूर्ण योगदान है 

➧ प्रमुख वृहत उद्योगों का वर्णन निम्नलिखित है:- 

1- लौह-इस्पात उद्योग 

टाटा लौह एवं इस्पात कंपनी (टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी-टिस्को)

➧ टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी यानी टिस्को की स्थापना झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के साकची नामक स्थान दोराब जी टाटा ने की थी  

➧ दरअसल टिस्को की स्थापना का प्रारंभिक विचार जमशेदजी नौसेरवान जी टाटा का था, परंतु 1904 में इनका निधन हो गया  परंतु जमशेदजी टाटा को ही टिस्को कंपनी का वास्तविक संस्थापक माना जाता है

➧ जमशेदजी टाटा के नाम पर साकची का नाम बाद में बदलकर जमशेदपुर कर दिया गया। यह संयंत्र की स्थापना स्वर्णरेखा और खरकई नदी के संगम पर की गई

➧ टिस्को कंपनी की स्थापना 1907 में की गई  परन्तु यहाँ लौह उत्पादन का कार्य 1911 में शुरू हुआ

टिस्को कंपनी को 

(i) कच्चे लोहे की प्राप्ति  - नोवामुंडी, गुआ, होक्लातबुरु से होती है 

(ii) कोयले की आपूर्ति  - झरिया खदान तथा रानीगंज (बंगाल) खदान से होती है

(iii) मैग्नीज एवं क्रोमाइट - चाईबासा खान से होती है

(iv) चूना पत्थर एवं डोलोमाइट - सुंदरनगर (उड़ीसा) से होती है

(v) जल - स्थानीय नदियों से होता है 

➧ रेलवे के द्वारा माल की ढुलाई बंदरगाह तक होने की सुविधा है 
 सन 1948 में टाटा मोटर्स के द्वारा यहां 'टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी' (टेल्को) की स्थापना की गई
➧ यहां ट्रक, रेलवे वैगन, बॉयलर तथा अन्य गाड़ियों की चेचिस बनाई जाती है
➧ 2005 में टिस्को कंपनी का नाम बदलकर टाटा स्टील कर दिया गया 
➧ इस औद्यौगिक नगर को 'टाटानगर' भी कहा जाता है 
➧ झारखंड की औद्यौगिक राजधानी मानी जाती है  

2- बोकारो लौह स्टील प्लांट (Bokaro Steel Plant)

➧ सन 1964 में भारतीय इस्पात प्राधिकरण एवं सोवियत संघ (वर्तमान रूस) के सहयोग से भारत सरकार ने बोकारो लौह इस्पात कंपनी की स्थापना की
➧ यहां उत्पादन कार्य 1972 में शुरू हो गया । यह झारखंड का दूसरा महत्वपूर्ण लौह इस्पात उद्योग केन्द्र है
➧ यह कारखाना बोकारो जिले के माराफारी नामक स्थान पर गर्गा डैम और तेनुघाट (दामोदर घाटी) के निकट स्थापित किया गया है
➧ यह भारत का पहला स्वदेशी स्टील संयंत्र है तथा देश का चौथा सबसे बड़ा लौह इस्पात संयंत्र है
➧ यह कारखाना सैल (स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया-सेल) के अधीन कार्यरत है
➧ इस प्लांट से माल ढुलाई के लिए दिल्ली-कोलकाता मार्ग सबसे उपयुक्त है। यह मार्ग उत्पाद को बंदरगाह तक पहुंचाने में मदद करता है
➧ इस प्लांट को सस्ती बिजली और जल की आपूर्ति दामोदर बिजली परियोजना से की जाती है

 इस संयंत्र को

(i) लौह अयस्क  - क्योंझर खान से प्राप्त होती है
(ii)  कोयला -       झरिया खान से प्राप्त होती है
(ii) चूना पत्थर -  पलामू एवं मध्य प्रदेश से प्राप्त होता है 
➧ यहां हॉट रोल्ड कॉयल, रोल्ड प्लेट, रोल्ड शीट, कोल्ड रॉल्ड कॉयल आदि उपकरण तैयार किए जाते हैं 

3- रसायनिक उर्वरक उद्योग (Chemical Industry) 

➧ वर्ष 1951 में भारत सरकार ने भारत उर्वरक उद्योग निगम के अंतर्गत सिंदरी (धनबाद) में एक उर्वरक कारखाने की स्थापना की  
➧ दामोदर घाटी परियोजना से बिजली एवं जल की आपूर्ति तथा बोकारो स्टील प्लांट से कच्चे माल की आपूर्ति की जाती है
➧ यह कारखाना नाइट्रेड, अमोनियम सल्फेट और यूरिया का बड़े पैमाने पर उत्पादन करता है

4- तांबा उद्योग (Copper Industry)

➧ देश का पहला तांबा उत्पादक कारखाना भारत सरकार ने वर्ष 1924 में 'इंडियन कॉपर कारपोरेशन' के माध्यम से झारखंड के घाटशिला में स्थापित किया था 
➧ घाटशिला के बेदिया एवं मुसाबनी की खानों से कच्चा चूर्ण निकाला जाता है, जिसका चूर्ण बनाकर रोपवे के माध्यम से मउभंडारा कारखाने तक लाया जाता है
 वहां उस चूर्ण को भट्टी में डालकर तांबे से गंधक को अलग किया जाता है
➧ इंडियन कॉपर कारपोरेशन ने 1930 में घाटशिला के पास तांबा शोधन केंद्र स्थापित किया है

➧ झारखंड में इसके अलावा दो अन्य स्थानों से भी तांबा उद्योग का संचालन होता है
(i) हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के द्वारा जादूगोड़ा से 
(ii) इंडियन केबल कंपनी लिमिटेड के द्वारा जमशेदपुर से 

5- एल्युमिनियम उद्योग (Aluminum Industry)

➧ राज्य में एलुमिनियम उद्योग के लिए बॉक्साइट की अनेक खाने हैं यहां भारत में कुल एलुमिनियम अयस्क (एलुमिना) उत्पादन का 16% भाग उत्पादित होता है
➧ राज्य में बॉक्साइट का विशाल भंडार है, जिसमें सबसे अधिक भंडार लोहरदगा में है
 सन 1938 ईस्वी में रांची के निकट मुरी में इंडियन एलुमिनियम कंपनी की स्थापना की गई
➧ बिरला समूह द्वारा इस कंपनी को खरीदने जाने के पश्चात का वर्तमान नाम 'हिंडालको' (Hindustan Aluminium And Corporation- Hindalco Ltd) है 
 यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा एलुमिनियम संयंत्र है
 हिंडालको संयंत्र को ऑक्साइड के रूप में कच्चे माल की आपूर्ति लोहरदगा एवं पलामू से होती है 
 राज्य में निर्मित होने वाले एलुमिना को केरल के अलमपुरम एवं अलवाय, कोलकाता के बेलूर तथा मुंबई के लेई  करखानों में भेजा जाता है
 एलुमिनियम का उपयोग बर्तन, बिजली के तार, मोटर, रेल और वायुयान बनाने में किया जाता है 

6- सीमेंट उद्योग (Cement Industry)

➧ झारखंड में सीमेंट के कारखाने सिंदरी (धनबाद), कुमारडूबी (धनबाद),  जलपा (पलामू), चाईबासा (पश्चिमी सिंहभूम), झींकपानी (पश्चिमी सिंहभूम), खेलारी (रांची), बोकारो आदि  स्थान पर स्थित है
 राज्य में पर्याप्त चूना पत्थर एवं कोयले के भंडार होने के कारण सीमेंट उद्योग के लिए अनुकूल स्थिति बनती है
➧ झारखंड में प्रथम सीमेंट उद्योग की स्थापना 1921 में जपला (पलामू) में की गई थी
➧ झींकपानी, जमशेदपुर, बोकारो एवं सिंदरी में सीमेंट का उत्पादन स्लैग (Slag) एवं स्लेज (Sludge) से होता हैयह सीमेंट कारखानों का उत्पादन है
➧ जमशेदपुर का लाफार्ज सीमेंट कारखाना में लौह-इस्पात उद्योग के अवशिष्ट का प्रयोग होता है
➧ सीमेंट एक वजन ह्रास वाला उद्योग है तथा इसका सबसे अधिक प्रयोग भवन निर्माण, सड़क निर्माण जैसे कार्यों में किया जाता है

7- कांच उद्योग (Glass Industry)

➧ राज्य में कांच का कारखाना रामगढ़ जिले में भुरकुंडा नामक स्थान पर 'इंडो आसई ग्लास' नाम से स्थापित किया गया है
➧ कांच उद्योग में कई सारे खनिजों को कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है, जैसे :- सीसा, सिलीका, चूना-पत्थर, सुरमा, शीरा, पोटेशियम कार्बोनेट, सुहागा, सल्फेट आदि 
➧ इस सभी पदार्थों की आपूर्ति राजमहल की पहाड़ी मंगल घाट और पत्थर घाट से होती है

8- अभ्रक उद्योग

➧ झारखंड अभ्रक उत्पादन में कभी देश का प्रथम राज्य हुआ करता था, तथा यहां अभ्रक की सबसे उन्नत किस्म की रूबी अभ्रक पाया जाता था 
➧ परंतु वर्तमान समय में अभ्रक उत्पादन झारखंड में लगभग बंद है तथा अभ्रक उत्पादन में भारत का प्रथम राज्य आंध्रप्रदेश बन गया है 
➧ झारखंड में अभ्रक का सबसे प्रसिद्ध खान कोडरमा खान है अभ्रक उत्पादन कोडरमा के अलावा गिरिडीह और हजारीबाग जिले में किया जाता है 

9- कोयला उद्योग

➧ राज्य में कोयले का अनुमानित भंडार 82,439 मिलियन टन है, जो भारत में सबसे अधिक है यह भारत के कुल कोयला भंडार का लगभग 26 पॉइंट 16% है कोयला उत्पादन में राज्य का तीसरा स्थान है
➧ झारखंड में झरिया, बोकारो, रांची, उत्तरी कर्णपुरा, धनबाद की खानों में कोयला उत्पादन का कार्य किया जाता है 
➧ झारखंड में कोयला निकालने वाली प्रथम कंपनी बंगाल कोल थी  
वर्त्तमान में कोल इंडिया की दो बड़ी इकाइयां झारखंड में कार्यरत है :-
(i) सेंट्रल कोल फील्ड ,रांची
(ii) भारत कोकिंग कोल लिमिटेड, धनबाद
➧ केंद्रीय खनन अनुसंधान केंद्र धनबाद में स्थित है इसकी स्थापना 1926 में लॉर्ड इरविन के समय की गई थीयह भारत का सबसे प्राचीन खनन शोध केंद्र है तथा वर्तमान में आई.आई.टी. का दर्जा प्राप्त है

10- इंजीनियरिंग उद्योग 

➧ झारखंड में मुख्य रूप से रांची और जमशेदपुर में इंजीनियरिंग उद्योग कार्यरत है 

हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन-एच.ई.सी. (Heavy Engineering Corporation)

➧ हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन की स्थापना वर्ष 1958 (31 दिसंबर) में भारत सरकार ने रूस और चेकोस्लोवाकिया की सहायता से रांची, (झारखंड) में की थी

➧ भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपने रांची यात्रा के दौरान 15 नवम्बर, 1963 को एच.ई.सी. को आधुनिक उद्योगों का मंदिर कहा था 

➧ यह एशिया का सबसे बड़ा हैवी इंजीनियरिंग करखाना था

➧ इस संयंत्र में 1964 ई.में उत्पादन शुरू हुआ 

➧ एच.ई.सी. स्टील, खनन, रेलवे, बिजली, रक्षा, अंतरिक्ष अनुसंधान, परमाणु और रणनीति क्षेत्रों के लिए भारत में पूंजी उपकरणों के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में से एक हैं

➧ एच.ई.सी. की कुल 3 शाखाएँ हैं

➧ जो रांची के समीप हटिया नामक स्थान पर कार्यरत हैं

(i) भारी मशीन निर्माण संयंत्र (Heavy Machine Building Plan-HMBP) :- यह रूस के सहयोग से स्थापित की गई है

➧ यह संयंत्र किसी भी उद्योग की संरचना डिजाइन करने का छमता रखता है 

➧ यह इस प्लांट में लौह-इस्पात संबंधी भारी उपकरण जैसे एस्केवेटर, क्रेन, ऑयल, ड्रिलिंग, उपकरण आदि  बनाते हैं साथ ही सीमेंट, खाद्य तेल, खनन, ड्रिलिंग मशीन आदि का भी कार्य होता है

(ii) फाउंड्री फ़ार्ज़ संयंत्र (Foundry Forge Plant-FFT) - इस सयंत्र की स्थापना की चेकोस्लोवाकिया की सहायता से की गई है यह एक ढलाई भट्टी है 

➧ यहां भारी मशीनों एवं उपकरणों के निर्माण के लिए बड़े-बड़े उच्चता तापीय बॉयलोरो में गलाकर आवश्यक आकृतियों में ढाला जा रहा है। यह अन्य दो शाखाओं की मांग को पूरा करने का काम करता है

(iii) हैवी मशीन टूल प्लांट (Heavy Machine Tools Plants-HMTP) - इसकी स्थापना रूस की सहायता से की गई है यहां विभिन्न प्रकार के मशीन के पुर्जे बनाए जाते थे बोकारो लौह-इस्पात कंपनी के लिए आवश्यक मशीन और उपकरण की आपूर्ति यहीं से की जाती है

11- यूरेनियम उद्योग 

➧ झारखंड में यूरेनियम प्रोसेसिंग प्लांट पूर्वी सिंहभूम जिले में घाटशिला के निकट बादूंहुडांग गांव में लगाया जाना है
➧ इसका इसका औपचारिक नाम तुरामडीह यूरेनियम प्रोजेक्ट होगा
➧ राज्य सरकार ने इस कारखाने के निर्माण की मंजूरी दे दी है परंतु यह कारखाना अभी आरंभ नहीं हुआ है 
➧ एक अनुमान के तहत झारखंड में 40 लाख  टन यूरेनियम का भंडार है

12- विस्फोटक उद्योग 

➧ झारखंड में विस्फोटक उद्योग की स्थापना आई.सी.आई द्वारा गोमिया (बोकारो) में किया गया

13- कोयला धोवन उद्योग(Coal Washeries Industry)

➧ कोयला धोवन गृहों के द्वारा कोयले से शेल,फायरक्ले आदि अशुद्धियों को दूर किया जाता है 
➧ झारखंड में जामादोबा, बोकारो, लोदला, करगाली, दुगदा, पाथरडीह, कर्णपुरा आदि प्रमुख कोयला धोवन केंद्र हैं
➧ करगाली कोल वाशरी (बोकारो) एशिया की सबसे बड़ी कॉल वाशरी है 

14- रिफैक्ट्री उद्योग (Refractory Industry) 

➧ इस उद्योग के अंतर्गत उच्च ताप सहन करने वाले धमन भट्टियों का निर्माण किया जाता है जिसका प्रयोग लौह-इस्पात उद्योग सहित विभिन्न उद्योगों में किया जाता है
➧ झारखंड में चिरकुंडा, कुमारधुबी, धनबाद, रांची रोड, मुग्मा आदि में इस प्रकार के उद्योगों का विकास हुआ है
➧ दामोदर घाटी क्षेत्र में पायी जाने वाली मिट्टी इस उद्योग की स्थापना हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण है

15- उर्वरक उद्योग (Fertilizer Industry)

➧ भारत का प्रथम उर्वरक कारखाना 1951 ईस्वी में सिंदरी (धनबाद) में फर्टिलाइज़र कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया दवारा स्थापित किया गया है
➧ यह पूर्वी भारत का सबसे बड़ा उर्वरक कारखाना है  
➧ यहाँ से अमोनियम सल्फेट, नाइट्रेट एवं यूरिया का उत्पादन किया जाता है 

अन्य करखाने

 भारत सरकार ने झारखंड में केंद्रीय प्रबंधन के अंतर्गत कुछ बड़े कारखाने खाले हैं

(i) सी.सी.एल. (रांची)

(ii) बोकारो इस्पात लिमिटेड (बोकारो)

(iii) ई.सी.एल. (संथाल परगना)

(iv) बी.सी.सी.एल. (धनबाद)

(v) हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (पूर्वी सिंहभूम)

(vi) एच.ई.सी. (रांची)

➧ राज्य में बिरला समूह के दो कारखाने स्थित है

(i) 'हिंडालको' (मुरी) - एलुमिनियम उत्पादन हेतु 
(ii) बिहार कास्टिक सोडा एवं केमिकल्स फैक्ट्री रेहला (पलामू) है
➧ झारखंड राज्य के 12 जिलों में जिला उद्योग केंद्र (District Industry Center) कार्यरत हैं 
 झारखंड में वृहद उद्योग की संख्या 167 है, जो राज्य के 15 जिला में स्थापित है  
 पूर्वी सिंहभूम जिले में सबसे अधिक 85 उद्योगों की स्थापना हुई है  

झारखंड में वन आधारित उद्योग 

(1) लाह उद्योग

➧ लाह उत्पादन की दृष्टि से भारत में झारखंड का स्थान प्रथम है यहां भारत के कुल उत्पादन का 60% उत्पादन होता है
➧ लाह  के कीड़ों को पालने का कार्य कुसुम, पलास, बेर के पौधों पर किया जाता है 
➧ झारखंड अपने कुल लाह उत्पादन का 90% निर्यात करता है 
 लातेहार टोरी लाह निर्यात की दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान रखता है
 सबसे अधिक लाह का उत्पादन खूंटी जिले में किया जाता है
 भारतीय लाह अनुसंधान संस्थान रांची जिले के नामकुम में 1925 में स्थापित किया गया था

(2) रेशम उद्योग 

➧ भारत में 70% तसर रेशम का उत्पादन अकेले झारखंड करता है
➧ राज्य में 40% रेशम उत्पादन सिंहभूम क्षेत्र में तथा 26% रेशम उत्पादन संथाल परगना क्षेत्र में होता है
➧ तसर अनुसंधान केंद्र राँची के नगड़ी में स्थापित किया गया है 

(3) तंबाकू उद्योग

➧ झारखंड में तंबाकू उद्योग का मुख्य उत्पाद बीड़ी उद्योग में है 
➧ बीड़ी का निर्माण एवं केन्दु पत्ता एवं तंबाकू से किया जाता है 
➧ राज्य में बीड़ी निर्माण का कार्य सरायकेला, जमशेदपुर, चक्रधरपुर, संथाल परगना क्षेत्र में किया जाता है 

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Sunday, June 13, 2021

Chik Baraik Tribes Governance System: Jharkhand History- JPSC/ JSSC

Chik Baraik Tribes Governance System

The Chik Baraiks (Badaiks) is the weaver tribe of the Jharkhand. They mainly weave cloth. The tribe is also called the father of handmade clothes.

Native: Ranchi, Khunti, Gumla, Simdega, and Lohardaga districts.

The Chik Baraik tribes are included in Scheduled Tribe (ST) in Jharkhand, Bihar, and West Bengal. They are also known as Chikwa in Chattisgarh, Badaik in Odisha, and included as Scheduled Caste (SC).

Chik Baraik Tribes Governance System: Jharkhand History- JPSC/ JSSC

Culture:

The traditional occupation of Chik Baraik is making clothes such as dhoti, saree, gamcha, etc. 

Language: they speak Nagpuri an Indo-Aryan language.

They have several clans among the tribe which is taken from various animals, objects, and places including Boda (Russell's viper), Chand (Moon), Baunkra (Heron), Jamakiar, Kothi, Kouwa (Crow), Kanjyasuri (Kanji Pani), Loha (Iron), Malua, Naurangi, Rajhans (Hamsa), Singhi (Asian stinging catfish), etc.

Their deities are Devi Mai, Surjahi (Sun), and Bar Pahari. They also worship moon, earth, and other deities. Snake is also worshiped as the ancestor of the caste.

Festivals: the traditional festivals are Asari, Nawakhani, Karam, Jitia, Sohrai, Fagun, etc. Their folk dance is Jhumair, Domkach, Fagua, etc.

Governance System:

Chik Baraik does not have its own ethnic governance system. Each of their villages has 15 families there residing. They live in mixed villages. Therefore, their problems are solved by the mixed gram panchayat. Many villages join together to form their in-house council, which is called Raja, Diwan, Panare, etc. are there to help him. All these positions are heredity. All disputes are settled by this council. According to their customs, they have rules and regulations, which are decided by keeping them in mind. Illegal sex, consensual or non-tribal sex is considered a serious offense. They have to face caste-boycott or harsh punishment for such crimes. 

Present Scenario:

At present, the All India Chik-Baraik Welfare Committee has been formed, which is making a significant contribution to the development of Chik Baraik.

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Saturday, June 12, 2021

Chero Tribes Governance System: Jharkhand History- JPSC/ JSSC

Chero Tribes Governance System

The Chero is an ancient tribe in Jharkhand, but they are also found in Bihar, Madhya Pradesh, and Uttar Pradesh. They belong to the proto-austroloid family. In Jharkhand, the tribe is primarily concentrated in Palamu, Latehar, and Garhwa district.

Chero Tribes Governance System: Jharkhand History- JPSC/ JSSC

History:

The Chero community claims to be the descendants of the Rajput (Kshatriyas), who were a powerful race of Indian warriors whose kingdom existed between the 18th and 19th centuries. The Chero were once the lords of all the provinces surrounding the sacred Ganges River. While other members of the tribe claim to be Nagavanshi

Society:

The community has a traditional caste council that maintains strong social control over the community. They are Hindu but also worship several tribal deities, such as Sairi-Ma, Ganwar Bhabhani, Dulha Deo.

The Chero of Jharkhand has two sub-divisions:

  • Barahazari 
  • Terahazari

These two groups are endogamous and do not inter-marry. They practice clan exogamy and their main clans are the Mawar, Kuanr, Mahato, Rajkumar, Manjhia, Wamwat, Hantiyas. These clans are of unequal status and the Chero practice clan hypergamy. Caste boycott is also done for violating rules. They speak Hindi, Bhojpuri, and Nagpuri.

The Chero of Jharkhand are mainly farmers, with many were substantial landowners. Oxen buffaloes and cows are yoked to plow and carts to help them work in the fields. Goats, fish, and fowl are important components of their diet and are also used as sacrifices in religious ceremonies. 

Governance:

The Chero caste has its own Panchayat, which works at the village level, region, and Mandal level.

The head of the Panchyat is called "Mukhiya", and at the district level is called as "Chairman".

Function:

  • Village disputes are settled in the panchayat.
  • The guilty are to be punished or fined. The decisions of the panchayat are final.

Like many people in India, the Chero belongs to a particular social class or caste. They are officially classified as landowners and farmers. In general, they are a proud race and have never forgotten that their bloodline is one of royalty.

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