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Tuesday, May 11, 2021

Padha Panchayat Shasan Vyavastha (पड़हा पंचायत शासन व्यवस्था)

May 11, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Padha Panchayat Shasan Vyavastha

➧ यह उराँव जनजाति के परंपरागत शासन व्यवस्था है। 

➧ झारखंड में उराँव जनजाति का प्रवेश 13वीं सदी में मुस्लिम आक्रमणकारी बख्तियारुद्दीन खिलजी के साथ हुआ था। 

पड़हा पंचायत शासन व्यवस्था

➧ उराँव ने मुंडा शासन व्यवस्था को ही अपने क्षेत्र में लागू किया, जिसे पड़हा शासन व्यवस्था के नाम से जाना जाता है। उराँव जनजाति द्वारा खेती के लिए बनाई गई उपयुक्त भूमि भुईंहरी कहलाती थी तथा इस गांव का मालिक भुईंहर कहा जाता था।

➧ उराँव में पारम्परिक शासन व्यवस्था के निर्धारण हेतु पहले दीवान होते थे, जो धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों को देखते थे। बाद में पहान के सहयोग हेतु मह्तो का पद बना। इस तरह आरंभ में पहान और महतो गांवों  के अनुभवी लोगों के माध्यम से पंच-पद्धति द्वारा ग्रामीण व्यवस्था का संचालन करते थे।

➧ उराँव में कहावत है - 'पाहन गांव बनाता है, महतो गांव चलाता है'। 

➧ पड़हा शासन व्यवस्था का स्वरूप इस प्रकार होता है:-

➧ ग्राम स्तर पर :- उराँव के गांवों  में 1 ग्राम पंचायत का गठन किया जाता है और इस ग्राम पंचायत के संचालन हेतु निम्न अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है:-

(i) महतो :- भुईहर गांवों में धर्मेश (सूर्य देवता) के बाद सबसे बड़ी शक्ति का स्रोत ग्राम पंचायत थी, जिसका प्रधान महतो कहलाता था। यह गांवों के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का रक्षक था।

➧ अखरा, सासन आदि के सुरक्षा की जिम्मेदारी इसी पर थी। महतो गांव के सभी प्रशासनिक कार्य करता था, इसलिए इससे स्वतंत्र प्रधान कहा गया।

(ii) पहान :- यह गांवों में धार्मिक-अनुष्ठान, पर्व-त्यौहार, शादी-विवाह आदि का कार्य कराते थे तथा इसके बदले उन्हें कर मुक्त जमीन दी जाती थी, जिसे पहनाई भूमि कहते थे।

➧ यह पद हमेशा किसी शादी-शुदा व्यक्ति को ही दिया जाता था।

(iii) मांझी :- महतो की मदद के लिए इनकी नियुक्ति की जाती थी। यह महतो के पंचायती आदेशों को लोगों तक पहुंचाने का कार्य करता था। 

(iv) बैगा :- यह पहान का सहयोगी है तथा इसका मुख्य कार्य ग्रामीण देवता की पूजा कर उसे शांत कराना है।इसे वैद्य भी कहा जाता था।

➧ पड़हा स्तर पर :- उराँवों में कई गांव को मिलाकर (5, 7, 12, 21 या 22) एक अन्तग्रामीण पंचायत का गठन किया जाता था, जिसे पड़हा पंचायत कहते थे।

➧ यह पंचायत दो या दो से अधिक गांवों  के बीच के विवादों का निपटारा करता था तथा यह पंचायत निम्न, मध्य और उच्च तीन श्रेणी में विभाजित था।  

➧ पहले निम्न पंचायत में किसी विवाद को प्रस्तुत किया जाता, यहां निर्णय न हो तो मध्य पंचायत में विवाद को भेजा जाता था और यहां भी निपटारा न हो तो उच्च पंचायत में लोग अपील करते थे।

➧ पंचायत की कार्यवाही में पुरुष और महिला दोनों भाग लेते थे। यह उराँवों के मुख्य प्रशासनिक इकाई थी।

➧ पड़हा स्तर के मुख्य अधिकारी निम्न थे :-

(a) पड़हा राजा :- यह पड़हा पंचायत का प्रमुख होता है तथा उन मामलों का निपटारा करता है, जो महतो द्वारा नहीं किया जा सकता या फिर महतो ने उस मामले को पड़हा राजा के पास स्थानांतरित कर दिया हो।

(b) पड़हा दीवान :- पड़हा पंचायत में यह प्रमुख न्यायिक अधिकारी होता है, जो सुप्रीम कोर्ट की तरह कार्य करता है। 

➧ यह सभी पड़हा राजाओं के ऊपर होता है तथा उनके बीच समन्वय स्थापित करता है, जिस मुद्दे पर पड़हा राजा निर्णय नहीं ले पाते, उससे पड़हा दीवान के पास स्थानांतरित कर दिया जाता था।

➧ उराँवों की परंपरागत शासन व्यवस्था से जुड़े अधिकारी में कर लेने का प्रचलन नहीं था। प्रशासनिक दायित्व निभाने वाले अधिकारियों को इसके बदले कर मुक्त विशेष भूमि प्रदान की जाती थी। जैसे :-

(1) पड़हा राजा को दी गई मंझियास भूमि कहलाती थी।

(2) पाहन को दी गई भूमि पहनाई भूमि कहलाती थी। 

(3) महतो को दी जाने वाली भूमि महतोई  भूमि कहलाती थी। 

(4) पहान के सहायता हेतु दी गई भूमि पनभरा भूमि कहलाती थी। 

उराँवों की पंचायत की बैठक में महिलाएं भी भाग लेती थी, जबकि मुंडा की पंचायत बैठक में महिलाएं शामिल नहीं की जाती थी।

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Monday, May 10, 2021

Tamar Vidroh (1782-1821) तमाड़ विद्रोह(1782-21)

May 10, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Tamar Vidroh (1782-1821)

➧ इस विद्रोह का प्रारंभ मुंडा आदिवासियों ने अंग्रेजों द्वारा बाहरी लोगों को प्राथमिकता देने तथा नागवंशी शासकों के शोषण के विरुद्ध तमाड़ क्षेत्र में किया।

➧ यह अंग्रेजों के विरुद्ध सबसे लंबा, वृहत्तम और सबसे खूनी आदिवासी विद्रोह था।

➧ यह विद्रोह छ: चरणों में संचालित हुआ।

तमाड़ विद्रोह(1782-21)

➧ प्रथम चरण (1782-83) 

➧ सन 1782 में रामगढ़, पंचेत तथा बीरभूम के लोग भी तमाड़ में संगठित होने लगे तथा इस विद्रोह को मजबूती प्रदान की।  इसका नेतृत्व ठाकुर भोलानाथ सिंह ने किया था। 

➧ नागवंशी शासकों द्वारा इस विद्रोह को दबाने का प्रयास किया गया जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप विद्रोहियों ने अधिक आक्रमक रूख अख्तियार कर लिया। 

➧ साथ ही इस विद्रोह को कुछ जमींदारों का भी समर्थन मिला मिलना प्रारंभ हो गया।

➧ सन 1783 के अंत में अंग्रेजी अधिकारी जेम्स क्रॉफर्ड द्वारा विद्रोहियों को आत्मसमर्पण हेतु विवश किये  जाने के बाद विद्रोह अगले 5 वर्षों के लिए शांत हो गया।

➧ द्वितीय चरण (1789) 

➧ 5 वर्षों बाद 1789 में मुंडाओं ने विष्णु मानकी तथा मौजी मानकी के नेतृत्व में कर देने से इनकार कर दिया जिसके बाद यह विद्रोह पुनः प्रारंभ हो गया।

➧ इस विद्रोह को दबाने हेतु कैप्टन होगन को भेजा गया जो असफल रहा। 

➧ पुनः अन्य अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट कुपर को विद्रोह को शांत करने का दायित्व सौंपा गया तथा कुपर के प्रयासों के परिणाम स्वरूप विद्रोह अगले 4 वर्षों तक शांत रहा। 

➧ तृतीय चरण (1794-98) 

➧ 1794 ईस्वी में यह विद्रोह पुनः प्रारंभ हो गया तथा 1796 ईस्वी में इसने व्यापक स्वरूप धारण कर लिया।

➧ 1796 ईस्वी में राहे के राजा नरेंद्र शाही द्वारा अंग्रेजों का साथ दिए जाने के कारण सोनाहातू गांव में आदिवासियों द्वारा नरेंद्र शाही का विरोध किया गया।

➧ यह विद्रोह तमाड़ के ठाकुर भोलानाथ सिंह के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ था। 

➧ इसके अतिरिक्त सिल्ली के ठाकुर विश्वनाथ सिंह, विशुनपुर के ठाकुर हीरानाथ सिंह, बुंडू के ठाकुर शिवनाथ सिंह, एवं आदिवासी नेता रामशाही मुंडा ने इस विद्रोह में प्रमुखता से भाग लिया।

➧ विद्रोहियों द्वारा रिश्तेदार की हत्या किए जाने के बाद राहे के राजा नरेंद्र शाही फरार हो गए।

➧ 1798 ईस्वी में कैप्टन लिमंड द्वारा कई विद्रोहियों तथा कैप्टन बेन द्वारा भोलानाथ सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया जिसके परिणाम स्वरूप तमाड़ विद्रोह कमजोर पड़ गया।

➧ चौथा चरण (1807-08) 

➧ 1807 ईस्वी  में दुखन शाही के नेतृत्व में मुंडा जनजाति के लोगों ने पुनः विद्रोह प्रारम्भ कर दिया। 

➧ 1808 ईस्वी में कैप्टन रफसीज के नेतृत्व में दुखन शाही को गिरफ्तार किए जाने के बाद यह विद्रोह शांत पड़ गया।  

➧ पांचवा चरण (1810-12) 

➧1810 ईस्वी में नवागढ़ क्षेत्र के जागीरदार बख्तर शाह के नेतृत्व में यह विद्रोह पुनः प्रारंभ हो गया।

➧ इस विद्रोह के दमन हेतु अंग्रेजी सरकार द्वारा लेफ्टिनेंट एच.ओडोनेल को भेजा गया जिसने 1812 ईस्वी में नवागढ़ पर हमला कर दिया। बख्तर शाह इस हमले से बचकर सरगुजा भाग गया जिसके बाद यह विद्रोह मंद पड़ गया।

➧ छठा चरण (1819-21) 

➧ 1819 ईस्वी में यह विद्रोह पुनः भड़क उठा जिसके प्रमुख नेता रुदन मुंडा तथा कुंटा मुंडा थे।

➧ इसके अतिरिक्त इसमें दौलत राय मुंडा, मंगल राय मुंडा, गाजी राय मुंडा, मोची राय मुंडा, भद्रा मुंडा, झलकारी मुंडा, टेपा मानकी, चन्दन सिंह, घूंसा सरदार आदि ने भी भाग लिया।

➧ तमाड़ के राजा गोविंद साही द्वारा सहायता मांगे जाने पर अंग्रेज अधिकारी ई. रफसेज ने जे. कोलविन के  साथ मिलकर विद्रोह को दबाने का प्रयास किया। इस अभियान के फलस्वरुप रुदन मुंडा और कुंटा मुंडा को  छोड़कर सभी प्रमुख विद्रोही नेता गिरफ्तार हो गये।  

➧ जुलाई, 1820 में रुदन मुंडा तथा मार्च, 1821 कुंटा मुंडा के गिरफ्तार होने के साथ ही यह विद्रोह समाप्त हो गया।

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Sunday, May 9, 2021

Tilka Manjhi Andolan1783-85 (तिलका आंदोलन 1783-85)

May 09, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Tilka Manjhi Andolan(1783-85)

➧ तिलका आंदोलन की शुरुआत 1783 ईस्वी में तिलका मांझी और उनके समर्थकों द्वारा की गई थी। 

➧ यह आंदोलन अंग्रेजों के दमन व फूट डालो की नीति के विरोध में था तथा अपने जमीन पर अधिकार प्राप्त करने हेतु किया गया। 


➧ इसका मुख्य उद्देश्य था :-

(i) आदिवासी अधिकारों की रक्षा करना।

(ii) अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ना। 

(iii) सामंतवाद से मुक्ति प्राप्त करना। 

➧ इस आंदोलन का प्रमुख केंद्र वनचरीजोर था, जो वर्तमान समय में भागलपुर के नाम से जाना जाता है।

➧ झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र में इस युद्ध का व्यापक असर पड़ा। 

➧ तिलकामांझी उर्फ़ जाबरा पहाड़िया ने इस आंदोलन को जन आंदोलन का स्वरूप दिया और अपने आंदोलन के प्रचार-प्रसार हेतु 'साल के पत्तों' का प्रयोग किया।

➧ इस आंदोलन के दौरान आपसी एकता को मजबूत बनाए रखने पर विशेष बल दिया गया।

➧ इस विद्रोह में महिलाओं ने भी भाग लिया था।

➧ इस विद्रोह के दौरान 13 जनवरी, 1784 को तिलका मांझी ने तीर मारकर क्लीवलैंड की हत्या कर दी।

➧ क्लीवलैंड की हत्या के उपरांत अंग्रेज अधिकारी आयरकूट ने तिलका मांझी को पकड़ने हेतु व्यापक अभियान चलाया।

➧ अंग्रेजों द्वारा तिलका मांझी के खिलाफ कार्रवाई किए जाने पर तिलकामांझी ने छापामारी युद्ध (गोरिल्ला युद्ध) का प्रयोग किया।

➧ छापामार युद्ध की शुरुआत तिलका मांझी द्वारा सुल्तानगंज पहाड़ी से की गई थी। 

➧ संसाधनों की कमी होने के कारण तिलका मांझी कमजोर पड़ गया तथा अंग्रेजों ने उसे धोखे में पकड़ लिया।

➧ पहाड़िया सरदार जउराह ने तिलकामांझी को पकड़वाने में अंग्रेजों का सहयोग किया।

➧ 1785 ईस्वी में अंग्रेजों द्वारा तिलका मांझी को गिरफ्तार कर लिया गया।

➧ तिलका मांझी को 1785 ईस्वी में भागलपुर में बरगद के पेड़ से फांसी पर लटका दिया गया।

➧ इस स्थान को उनकी याद में बाबा तिलका मांझी चौक के नाम से जाना जाता है।

➧ झारखंड के स्वतंत्रता सेनानियों में सर्वप्रथम शहीद होने वाले सेनानी तिलका मांझी हैं। 

➧ तिलका मांझी अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने वाले प्रथम आदिवासी थे तथा इनके आंदोलन में महिलाओं ने भी महत्वपूर्ण सहभागिता दर्ज की थी।

➧ भागलपुर विश्वविद्यालय का नाम तिलका मांझी के नाम पर रखा गया है। 

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Saturday, May 8, 2021

Sardari Andolan-1858-95 सरदारी आंदोलन (1858-95)

May 08, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Sardari Andolan(1858-95)

➧ इस आंदोलन को ' मुल्की व मिल्की (मातृभूमि व जमीन) का आंदोलन' भी कहा जाता है।

➧ 1931-32 के कोल विद्रोह के समय कोल सरदार असम के चाय बागानों में काम करने हेतु चले आए थे।

काम करने के बाद जब वे अपने गांव लौटे तो पाया कि उनकी जमीनों को दूसरे लोगों ने हड़प लिया है तथा वे जमीन वापस करने से इंकार कर रहे थे।

➧ इस हड़पे गए जमीन को वापस पाने हेतु कोल सरदारों ने लगभग 40 वर्षों तक आंदोलन किया। साथ ही बलात श्रम लागू करना तथा बिचौलियों द्वारा गैर-कानूनी ढंग से किराये में वृद्धि करना भी इस आंदोलन के कारणों में शामिल था।

➧ इस आंदोलन में कोल सरदारों को उरांव व मुंडा जनजाति का भी समर्थन प्राप्त हुआ।

➧ अलग-अलग उद्देश्यों के आधार पर इस आंदोलन के तीन चरण परिलक्षित होते हैं:- 

(i) प्रथम चरण भूमि आंदोलन के रूप में (1858-81 ईस्वी तक), 

(ii) द्वितीय चरण पुनर्स्थापना आंदोलन के रूप में 1881-90 ईसवी तक)

(iii) तथा तीसरा चरण राजनैतिक आंदोलन के रूप में (1890-95 ईस्वी तक) 

(i) प्रथम चरण (1858-81 ई0)

➧ आंदोलन का यह चरण अपनी हड़पी गयी भूमि को वापस पाने से संबंधित था अतः इसे भूमि आंदोलन कहा जाता है।

➧ यह आंदोलन छोटानागपुर खास से शुरू हुआ दोयसा, खुखरा, सोनपुर और वासिया इसके प्रमुख केंद्र थे।

➧ इस आंदोलन का तेजी से प्रसार होने के परिणाम स्वरुप सरकार द्वारा भुईंहरी (उरांव की जमीन) काश्त के सर्वेक्षण हेतु लोकनाथ को जिम्मेदारी प्रदान की गयी। 

➧ इस सर्वेक्षण के आधार पर सरकार ने भूमि की पुनः वापसी हेतु 1869 ईस्वी में छोटानागपुर टेन्यूर्स एक्ट लागु किया। इस आंदोलन में पिछले 20 वर्षों में रैयतों से छीनी गई भुईंहरी व मझियास भूमि (जमींदारों की भूमि) को वापस लौटाने का प्रावधान था। 

➧ इस क़ानून को लागू करते हुए 1869-80 तक भूमि वापसी की प्रकिया संचालित रही जिससे कई गावों के रैयतों को अपनी जमीनें वापस मिल गयीं। परंतु राजहंस (राजाओं की जमीन) कोड़कर (सदनों की जमीन) व खुंटकट्टी (मुण्डाओं की जमीन) की बंदोबस्ती का प्रावधान इस कानून में नहीं होने के कारण सरदारी लोग पूर्णत: संतुष्ट नहीं हो सके। 

(ii) द्वितीय चरण(1881-90 ईस्वी)

➧ आंदोलन के इस चरण का मूल उद्देश्य अपने पारंपरिक मूल्यों को फिर से स्थापित करना था। अतः इससे पुनर्स्थापना आंदोलन कहा जाता है। 

(iii) तीसरा चरण (1890-95 ईस्वी) 

➧ इस चरण में आंदोलन का स्वरूप राजनीतिक हो गया।

➧ आदिवासियों ने अपनी हड़पी गयी जमीनें वापस पाने हेतु विभिन्न इसाई मिशनरियों, वकीलों आदि से बार-बार सहायता मांगी। परंतु सहायता के नाम पर इन्हें हर बार झूठा आश्वासन दिया गया। परिणामत: आदिवासी इनसे चिढ़ने लगे।

➧ ब्रिटिश शासन द्वारा दिकुओं व जमींदारों का साथ देने के कारण आदिवासियों का अंग्रेजी सरकार पर भी भरोसा नहीं रहा। 

➧ परिणामत: आदिवासियों ने 1892 ईस्वी मिशनरियों और ठेकेदारों को मारने का निर्णय लिया। परंतु मजबूत नेतृत्व के अभाव में वे इस कार्य में सफल नहीं हो सके।

➧ बाद में बिरसा मुंडा का सफल नेतृत्व की चर्चा होने के बाद सरदारी आंदोलन का विलय बिरसा आंदोलन हमें हो गया।

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Friday, May 7, 2021

Kol Vidroh 1831-32 (कोल विद्रोह 1831-1832)

May 07, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Kol Vidroh (1831-32) 

➧ कोल विद्रोह झारखंड का प्रथम संगठित तथा व्यापक जनजातीय आंदोलन था।अतः झारखंड में हुए विभिन्न जनजातीय विद्रोह में इसका विशेष स्थान है। 

कोल विद्रोह 1831-1832

➧ इस विद्रोह के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे। 

(i) लगान की ऊंची दरें तथा लगान नहीं चुका पाने की स्थिति में भूमि से मालिकाना हक की समाप्ति।

(ii) अंग्रेजों द्वारा अफीम की खेती हेतु आदिवासियों को प्रताड़ित किया जाना।

(iii) जमींदारों और जागीरदारों द्वारा कोलों का अमानवीय शोषण और उत्पीड़न।

(iv) दिकुओं (अंग्रेजों द्वारा नियुक्त बाहरी गैर-आदिवासी कर्मचारी), ठेकेदारों व व्यापारियों द्वारा आदिवासियों का आर्थिक शोषण।

(v)अंग्रेजों द्वारा आरोपित विभिन्न प्रकार के कर (उदाहरण स्वरूप 1824 में हड़िया पर लगाया गया 'पतचुई' नामक कर)। 

(vi) विभिन्न मामलों के निपटारे हेतु आदिवासियों के परंपरागत 'पहाड़ा पंचायत व्यवस्था' के स्थान पर अंग्रेजी कानून को लागू किया जाना।

➧ इस विद्रोह के प्रारंभ से पूर्व सोनपुर परगना के सिंदराय मानकी के 12 गांवों की जमीन छीनकर सिक्खों को दे दी गई तथा सिक्खों ने सिंगराई की दो बहनों का कर अपहरण कर उनकी इज्जत लूट ली।

➧ इसी प्रकार सिंहभूम के बंदगांव में जफर अली नामक मुसलमान ने सुर्गा मुंडा की पत्नी का अपहरण कर इसकी इज्जत लूट ली।

➧ इन घटनाओं के परिणाम स्वरुप सिंदराय मानकी और सुर्गा मुंडा के नेतृत्व में 700 आदिवासियों ने उन गांवों  पर हमला कर दिया जो सिंदराय मानकी से छीन लिए गये थे।

➧ इस हमले की योजना बनाने हेतु तमाड़ के लंका गांव में एक सभा का आयोजन किया गया था जिसकी व्यवस्था बंदगांव के बिंदराई मानकी ने की थी।

➧ इस हमले के दौरान विद्रोहियों ने जफर अली के गांव पर हमला कर दिया तथा जफर अली व उसके 10 आदिवासियों को मार डाला।

➧ यह विद्रोह 1831 ईस्वी में प्रारंभ होने के अत्यंत तीव्रता से छोटानागपुर ख़ास, पलामू, सिंहभूम और मानभूम क्षेत्र तक प्रसारित हो गया। 

➧ इस विद्रोह को मुंडा,  हो,  चेरो,  खरवार आदि जनजातियों का भी व्यापक समर्थन प्राप्त था।  

➧ हजारीबाग में बड़ी संख्या में अंग्रेज सेना की मौजूदगी के कारण यह क्षेत्र इस विद्रोह से पूर्णत: अछूता रहा। 

➧ इस विद्रोह के प्रसार हेतु प्रतिक चिन्ह के रूप में तीर का प्रयोग किया गया। 

➧ इस विद्रोह के प्रमुख नेता बुधु भगत (सिली निवासी) अपने भाई, पुत्र व डेढ़ सौ (150) साथियों के साथ विद्रोह के दौरान मारे गये। बुध्दू भगत को कैप्टन इम्पे ने मारा था।

➧ अंग्रेज अधिकारी कैप्टन विलिंक्सन ने रामगढ़, बनारस, बैरकपुर, दानापुर तथा गोरखपुर की अंग्रेजी सेना की सहायता से इस विद्रोह का दमन करने का प्रयास किया। 

➧ विभिन्न हथियारों और सुविधाओं से लैस अंग्रेजी सेना के विरुद्ध केवल तीर-धनुष के लैस विद्रोहियों ने 2 महीने तक डटकर अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया। 

➧ इस विद्रोह को दबाने में पिठौरिया के तत्कालीन राजा जगतपाल सिंह ने अंग्रेज की मदद की थे जिसके बदले में तत्कालीन गवर्नर जनरल विलियम बैटिंग ने उन्हें ₹313प्रतिमाह आजीवन पेंशन देने की घोषणा की।

➧ 1832 ईस्वी में सिंदराय मानकी तथा सुर्गा मुंडा (बंदगांव, सिंहभूम निवासी) ने आत्मसमर्पण कर दिया जिसके पश्चात विद्रोह कमजोर पड़ गया।

➧ इस विद्रोह के बाद छोटानागपुर क्षेत्र में बंगाल के सामान्य कानून के स्थान पर 1833 ईस्वी का रेगुलेशन-III  लागू किया गया।

➧ साथ ही जंगलमहल जिला को समाप्त कर नन-रेगुलेशन प्रान्त के रूप में संगठित किया गया। इसे बाद  में दक्षिण-पश्चिमी सीमा एजेंसी' का नाम दिया गया।

➧ इस क्षेत्र के प्रशासन के संचालन की जिम्मेदारी गवर्नर जनरल के एजेंट के माध्यम से की जाने की व्यवस्था की गई तथा इसका पहला एजेंट थॉमस विलिंक्सन को बनाया गया। 

➧ इस विद्रोह के बाद मुंडा-मानकी शासन प्रणाली को भी वित्तीय व् न्यायिक अधिकार भी प्रदान किए । 

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Ramgarh Vidroh (रामगढ़ विद्रोह)

May 07, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Ramgarh Vidroh

➧ हजारीबाग क्षेत्र में कंपनी को सबसे अधिक विरोध का सामना रामगढ़ राज्य की ओर से करना पड़ा।

➧ रामगढ़ का राजा मुकुंद सिंह शुरू से अंत तक अंग्रेजों का विरोध करता रहा। 

➧ 25 अक्टूबर, 1772 को रामगढ़ राज्य पर दो दिशा की ओर से हमला कर दिया गया।

➧ छोटानागपुर खास की ओर से कैप्टेन जैकब कैमक और इवांस दूसरी ओर से तेज सिंह ने मिलकर आक्रमण किया।

Ramgarh Vidroh

➧ 27-28 अक्टूबर को दोनों की सेना रामगढ़ पहुंची। रामगढ़ राजा मुकुंद सिंह को भागना पड़ा कमजोर स्थिति होने के कारण ।

➧ 1774 ईस्वी में तेज सिंह को रामगढ़ का राजा घोषित किया गया।

➧ मुकुंद सिंह के निष्कासन एवं तेजसिंह को राजा बनाए जाने के बाद भी वहां की स्थिति सामान्य नहीं हुई।मुकुंद सिंह के अतिरिक्त उसके अनेक संबंधी भी अपनी खोई हुई शक्ति प्राप्त करने के लिए सक्रिय थे।

➧ सितंबर 1774 ईसवी में तेज सिंह की मृत्यु हो गयी। इसके बाद उसका पुत्र पारसनाथ सिंह गद्दी पर बैठा।

➧ मुकुंद सिंह अपने समर्थकों के साथ उस पर हमला करने की तैयारी में लगा हुआ था, परंतु अंग्रेजों के कारण उसे सफलता नहीं मिल रही थी।

➧ 18 मार्च, 1778 ईस्वी को अंग्रेजी फौज ने मुकुंद सिंह की रानी सहित उसके सभी प्रमुख संबंधियों को पलामू में पकड़ लिया।

➧ 1778 ईसवी के अंत तक पूरे रामगढ़ राज्य में अशांति की स्थिति बनी रही।

➧ रामगढ़ राजा पारसनाथ सिंह बढ़ी हुई राजस्व की राशि ₹71,000 वार्षिक देने में सक्षम ना था। इसके बावजूद रामगढ़ के कलेक्टर ने राजस्व की राशि 1778 ईस्वी में ₹81,000 वार्षिक कर दी। 

➧ मुकुंद सिंह के समर्थक ठाकुर रघुनाथ सिंह के नेतृत्व में विद्रोही तत्व विद्रोह पर उतारू थे। रघुनाथ सिंह ने 4 परगनों पर कब्जा कर लिया वहां से पारसनाथ सिंह द्वारा नियुक्त जागीरदारों को खदेड़ दिया।

➧ विद्रोहियों  के दमन के लिए कैप्टन एकरसन की बटालियन को बुलाना पड़ा। एकरसन और ले. डेनियल के संयुक्त प्रयास से रघुनाथ सिंह को उसके प्रमुख अनुयायियों के साथ बंदी बना लिया गया। रघुनाथ सिंह को चटगांव भेज दिया गया।

➧ रामगढ़ की सुरक्षा का जिम्मा कैप्टन क्रॉफर्ड को सौंप दिया गया।

➧ अंग्रेजी कंपनी के निरंतर बढ़ते शिकंजे तथा करों में बेतहाशा वृद्धि से रामगढ़ के राजा पारसनाथ अब स्वयं अंग्रेजों के चंगुल से निकलने का उपाय सोचने लगे।

➧ 1781 ईस्वी  में उसने बनारस के विद्रोही राजा चेतसिंह को सहायता प्रदान की।

➧ राजा अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए सालाना कर का कुछ भाग बचाकर अपने सैन्य शक्ति को मजबूत करने के अभियान में जुट गया।

➧ 1781 ईस्वी के अंत तक संपूर्ण रामगढ़ में विद्रोह की आग सुलगने लगी। विद्रोह की तीव्रता को देख रामगढ़ के कलेक्टर ने स्थिति को काबू में लाने के लिए सरकार से सैन्य सहायता की मांग की।

➧ 1782 ईस्वी तक रामगढ़ के अनेक क्षेत्र उजड़ गये और रैयत पलायन कर गये। स्थिति की भयावहता को देखते हुए उप कलेक्टर जी.डालमा ने सरकार से आग्रह किया कि रामगढ़ के राजा को राजस्व वसूली से मुक्त कर दिया जाए और राजस्व वसूली के लिए सीधा बंदोबस्त किया जाये। 

➧ रामगढ़ के राजा द्वारा इस नयी व्यवस्था के पुरजोर विरोध के बावजूद डलास ने जागीरदारों के साथ खास बंदोबस्त कर राजा द्वारा उनकी जागीर को जब्त किये जाने पर रोक लगा दी। अर्थात रामगढ़ का राजा अब सिर्फ मुखौटा बन कर रह गया।

➧ 1776 ईस्वी में फौजदारी तथा 1799 ईस्वी में दीवानी अदालत की स्थापना से राजा की स्थिति और भी कमजोर हो गयी। 

➧ स्थिति का लाभ उठाते हुए तमाड़ के जमींदारों ने रामगढ़ राज्य पर निरंतर हमले किये। राजा पूरी तरह अंग्रेजों पर आश्रित हो गया। यह स्थिति 19वीं शताब्दी के प्रारंभ तक बनी रही।

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Pahadiya Vidroh 1772-82 (पहाड़िया विद्रोह 1772-82)

May 07, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Pahadiya Vidroh (1772-82)

➧ पहाड़िया जनजाति की तीन उपजातियां हैं

(i) माल पहाड़िया 

(ii) सौरिया पहाड़िया

(iii) कुमारभाग पहाड़िया।

➧ पहाड़िया जनजाति संथाल परगना प्रमंडल की प्राचीनतम जनजाति है वास्तव में यही यहां के प्रथम आदिम निवासी हैं।

पहाड़िया विद्रोह 1772-82

(i) माल पहाड़िया :- ये मुख्यत: बांसलोई नदी के दक्षिण में बसे हैं।

(ii) सौरिया पहाड़िया :- ये बांसलोई नदी के उत्तर  राजमहल, गोड्डा और पाकुड़ क्षेत्र में निवास करती हैं।

(iii) कुमारभाग पहाड़िया:- ये बांसलोई नदी के उत्तरी तट पर बसे हैं।

➧ पहाड़िया विद्रोह चार चरणों (1772, 1778, 1779, 1781-82) में घटित हुआ तथा सभी चरणों में इस विद्रोह के कारण भिन्न-भिन्न थे। 

➧ 1772 ईस्वी में यह विद्रोह तब प्रारंभ हुआ पहाड़िया जनजाति के प्रधान की नृशंस एवं विश्वासघाती हत्या मनसबदारों ने कर दी, जबकि पहाड़िया जनजाति के लोग राजमहल क्षेत्र में मनसबदारों के अधीन थे और मनसबदारों से उनके अच्छे संबंध थे। विद्रोह के इस चरण का नेतृत्व रमना आहड़ी ने किया।

➧ 1778 ईस्वी में यह आंदोलन जगन्नाथ देव के नेतृत्व में प्रारंभ किया गया। जगन्नाथ देव ने पहाड़िया जनजाति को अंग्रेजों द्वारा प्रदत नकदी भत्ता को साजिश करार देते हुए उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध संगठित करने का प्रयास किया।

➧ अंग्रेजी सरकार के क्लीवलैंड द्वारा पहाड़िया जनजाति के लोगों को विश्वास में लेने हेतु इस प्रकार का नकदी भत्ता देने की घोषणा की गई थी।

➧ 1779 ईस्वी में इस विद्रोह का तीसरा चरण प्रारंभ हुआ।

➧ 1781-82 ईस्वी में यह विद्रोह महेशपुर की रानी सर्वेशरी के नेतृत्व में प्रारंभ किया गया। यह विद्रोह 'दामिन-ए-कोह' के विरोध में किया गया था। 

➧ 1790-1810 के बीच अंग्रेजों द्वारा इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में संथालों को आश्रय दिया गया तथा 1824 ई0 में अंग्रेजों द्वारा पहाड़िया जनजाति की भूमि को 'दामिन-ए-कोह' का नाम देकर सरकारी संपत्ति घोषित कर दिया गया।

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Thursday, May 6, 2021

Tana Bhagat Andolan-1914 (ताना भगत आंदोलन-1914)

May 06, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Tana Bhagat Andolan-1914

➧ ताना भगत आंदोलन का प्रारंभ जतरा भगत के नेतृत्व में 21 अप्रैल, 1914 ईस्वी में गुमला में हुआ 

➧ इस आंदोलन को बिरसा मुंडा के आंदोलन का विस्तार माना जाता है। 

➧ यह एक प्रकार का संस्कृतिकरण आंदोलन था जिसमें एकेश्वरवाद को अपनाने, मांस-मदिरा के त्याग, आदिवासी नृत्य पर पाबंदी तथा झूम खेती की वापसी पर विशेष बल दिया गया।

ताना भगत आंदोलन-1914

➧ इस आंदोलन को प्रसारित करने में मांडर में शिव भगत, घाघरा में बलराम भगत, विशुनपुर में भीखू भगत तथा सिसई में देवमनिया नामक महिला ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।  

➧ इस आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य स्वशासन की स्थापना करना था।   

➧ इस आंदोलन को प्रारंभ में कुरुख धर्म आंदोलन के नाम से जाना गया, जो कुडुख या उरांव जनजाति का मूल धर्म है

➧ 1916 में जतरा भगत को गिरफ्तार करके 1 वर्ष की सजा दे दी गई। परंतु बाद में उसे शांति बनाए रखने की शर्त पर रिहा कर दिया गया। 

➧ जेल में रिहा होने के 2 महीना बाद ही जतरा भगत की मृत्यु हो गई। इनकी मृत्यु का कारण जेल में उनको दी गई प्रताड़ना थी। 

➧ मांडर में इस आंदोलन के नेतृत्वकर्ता  शिबू भगत द्वारा टाना भगतों को मांस खाने की स्वीकृति प्रदान की गई, जिसके परिणाम स्वरूप टाना भगत को दो भागों में विभक्त हो गए। इनमें मांस खाने वाले वर्ग को 'जुलाहा भगत' तथा शाकाहारी वर्ग को 'अरुवा  भगत' (अरवा चावल खाने वाले) का नाम दिया गया।

➧ धार्मिक आंदोलन के रूप में प्रारंभ यह आंदोलन बाद में राजनीतिक आंदोलन में परिवर्तित हो गया।

➧ 1916 ईस्वी के अंत तक इस आंदोलन का विस्तार रांची के साथ-साथ पलामू तक फैल गया। 

➧ टाना भक्तों ने पलामू के राजा के समक्ष स्वशासन प्रदान करने, राजा का पद समाप्त करने, भूमि कर को समाप्त करने तथा समानता की स्थापना की मांग रखी। 

➧ राजा ने इन मांगों को अस्वीकृत कर दिया जिसके कारण टाना भगतों व राजा के समक्ष तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। 

➧ इस आंदोलन का विस्तार सरगुजा तक हो गया था। 

➧ 1921 ईस्वी में छोटानागपुर प्रमंडल में ताना भगत आंदोलन से जुड़े सिन्हा भगत, देवीया भगत,  शिबू भगत, माया भगत, व सुकरा भगत को गिरफ्तार कर उन्हें सजा दी गई, परंतु आंदोलन जारी रहा।

➧ दिसंबर, 1919 ईस्वी में तुरियां भगत एवं जीतू भगत ने चौकीदारी कर एवं जमींदारों को मालगुजारी नहीं देने का आह्वान किया।

➧ यह आंदोलन पूर्णत: अहिंसक था तथा  टाना भगतों ने इस आंदोलन के तृतीय चरण में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

➧ 1921 ईस्वी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में ताना भगतों  ने 'सिद्धू भगत' के नेतृत्व में भाग लिया था। 

➧ इस दौरान ताना भगतों ने शराब की दुकानों पर धरना, सत्याग्रह एवं प्रदर्शनों में अपनी भागीदारी आदि द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन को मजबूत किया।  

➧ महात्मा गांधी से प्रभावित होकर ताना भगतों  ने चरखा व खादी वस्त्रों का अनुकरण किया। महात्मा गांधी के अनुसार टाना भगत उनके सबसे प्रिय थे।  

➧ ताना भगतों ने कांग्रेस के 1922 ईस्वी के गया अधिवेशन व 1923 के नागपुर अधिवेशन में भाग लिया था।

➧ यह विशुद्ध गांधीवादी तरीके से लड़ा गया पहला आदिवासी अहिंसक आंदोलन था। 

➧1930 ईस्वी में सरदार पटेल द्वारा बारदोली में कर ना देने का आंदोलन चलाया गया था जिस से प्रभावित होकर टाना भगतों ने भी सरकार को कर देना बंद कर दिया।

➧ 1940 के रामगढ़ अधिवेशन में ताना भगतों ने महात्मा गांधी को ₹400 उपहार स्वरूप प्रदान किए थे।  

➧ 1948 ईस्वी में 'रांची जिला ताना भगत पुनर्वास परिषद' अधिनियम पारित किया गया था।

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Kharwar Andolan-1874 (खरवार आंदोलन-1874)

May 06, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Kharwar Andolan-1874

➧ खरवार, संथालों की ही एक उपजाति है तथा यह प्राचीन काल को अपना स्वर्ण-युग मानते थे एवं अपने प्राचीन मूल्य को पुनः स्थापित करना चाहते थे। 

➧ इस प्रकार परंपरागत मूल्यों की पुनर्स्थापना हेतु यह एक जनजातीय सुधारवादी आंदोलन था। इस आंदोलन के दौरान एकेश्वरवाद व् सामाजिक सुधार पर विशेष जोर दिया गया। 

➧ इस आंदोलन की भागीरथ मांझी उर्फ़ बाबा के नेतृत्व में शुरुआत 1874 ईस्वी में संताल परगना क्षेत्र में हुई।

➧ भागीरथ मांझी का जन्म गोड्डा के तालडीहा गांव में हुआ था।

खरवार आंदोलन-1874

➧ भागीरथ मांझी द्वारा नेतृत्व प्रदान किए जाने के कारण इसे 'भागीरथ मांझी का आंदोलन' भी कहा जाता है। 

➧ आंदोलन के दौरान भागीरथ मांझी ने स्वयं को बौसी गांव का राजा घोषित किया तथा ब्रिटिश सरकार/ जमींदारों को कर नहीं देने की अपील करते हुए खुद लगान प्राप्त करने की व्यवस्था प्रारंभ की।  

➧ इस आंदोलन के दौरान जनजातीय लोगों में सुधार हेतु निम्न विचारों का प्रचार-प्रसार किया। 

(i) सूर्य एवं दुर्गा की उपासना के अतिरिक्त अन्य किसी भी देवी-देवता की उपासना का परित्याग।

(ii) सूअर, मुर्गी, हड़िया व नाचने-गाने का परित्याग। 

(iv) सिदो-कान्हू (संथाल विद्रोह के नेता) के जन्म स्थल को तीर्थ स्थल के रूप में मान्यता।

(v) संथाल विरोधियों का प्रतिकार तथा उपपंथो की संख्या को 12 तक सीमित करना। 

(vi) उपासकों का साफाहोड़ (समर्पण के साथ उपासना करने वाले), भिक्षुक/बाबाजिया ( उदासीनता के साथ उपासना करने वाले) तथा मेल बरागर (बेमन से उपासना करने वाले) में वर्गीकरण।

➧ इस आंदोलन की व्यापकता को देखते हुए अंग्रेज सरकार ने भागीरथ मांझी एवं उनके सहयोगी ज्ञान परगनैत को गिरफ्तार कर लिया।  

➧ नवंबर, 1877  में दोनों को रिहा कर दिया गया जिसके बाद यह आंदोलन संथाल परगना से होते हुए हजारीबाग तक फैल गया।

➧ हजारीबाग में इस आंदोलन का नेतृत्व दुबू बाबा ने किया।

➧ खरवार आंदोलन का दूसरा चरण दुविधा गोसाई के नेतृत्व में 1881 ईसवी की जनगणना के खिलाफ प्रारंभ किया गया। परंतु ब्रिटिश सरकार द्वारा दुविधा गोसाई की गिरफ्तारी के बाद यह आंदोलन समाप्त हो गया।

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Wednesday, May 5, 2021

Safahod Andolan-1870 (साफाहोड़ आंदोलन-1870 ई0)

May 05, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Safahod Andolan-1870

➧ साफाहोड़ आंदोलन का अर्थ होता है - 'सिंगबोंगा के प्रति समर्पण'।  

➧ इस विद्रोह के अंतर्गत लाल हेंब्रम उर्फ लाल बाबा ने आदिवासियों के धार्मिक व चारित्रिक उत्थान पर बल दिया। 

साफाहोड़ आंदोलन-1870 ई0

➧ उन्होंने पाया था कि संताल विद्रोह की विफलता का सबसे बड़ा कारण लोगों में धार्मिक भावना तथा आत्म बल की कमी थी।

➧ लाल बाबा ने इस आंदोलन में शामिल लोगों को 'राम-नाम' का मंत्र दिया तथा मांस-मदिरा के सेवन से रोका। 

➧ इस आंदोलन के दौरान लाल बाबा ने संताल परगना में 'देशोद्धारक दल ' की स्थापना की।

➧ इस आंदोलन में लाल बाबा को पैका मुर्मू ,पगाम मरांडी, रसिक लाल सोरेन तथा भतु सोरेन का सहयोग प्राप्त होगा।

➧ बंगम मांझी भी इस विद्रोह के प्रमुख नेता थे। 

➧ इस आंदोलन का संबंध मूलत: संथाल जनजाति से है।  

➧ इस आंदोलन का मूल उद्देश्य संस्थानों में धार्मिक पवित्रता पर बल देना था।

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Hari Baba Andolan-1931 (हरि बाबा आंदोलन-1931ई0)

May 05, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Hari Baba Andolan-1931

➧ यह आंदोलन हरिबाबा उर्फ दुका हो के नेतृत्व में सिंहभूम क्षेत्र में चलाया गया। 

➧1930 के दशक में सिंहभूम के दुका हो, जो हरिबाबा के नाम से जाने जाते थे, एक आंदोलन की शुरुआत की  जिसे "हरिबाबा आंदोलन" से जाना गया। 

➧ हरिबाबा आंदोलन का मुख्य उद्देश्य टुटती और बिखरती सामाजिक, धार्मिक व्यवस्था का शुद्धीकरण था। 

➧ यह एक प्रकार का शुद्धि आंदोलन था।  

➧ इस आंदोलन के द्वारा हो जनजाति के लोगों को बाहरी अत्याचारों से बचाने हेतु संगठित करना था।

हरि बाबा आंदोलन-1931ई0

➧ इस 
आंदोलन में बारकेला क्षेत्र के भूतागांव निवासी सिंगराई हो, भड़ाहतु क्षेत्र के बलिया हो तथा गढ़िया क्षेत्र के हरि, दुला व बिरजे हो ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।  

➧ इस आंदोलन के दौरान सरना धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया।
   
➧ यह आंदोलन भी गांधी जी के विचारों से प्रभावित था।

➧ गांधीजी के आत्मशुद्धि और त्याग को हरिबाबा आंदोलन ने भी अपनाया क्योकि उन्हें उम्मीद थी की इस आंदोलन के जरिये वे दिकुओं को भगा सकते हैं।  

➧ गांधीजी के प्रभाव से यह आंदोलन राजनीतिक बन गया। उनका विश्वास था की अंग्रेज सरकर को भागने में गांधीजी जी ही समर्थ हैं। 

➧ 15 मई ,1931 ईस्वी को उन्होंने उग्रता का भी परिचय दिया और सिंहभूम में टेलीग्राफ के तारों को उखाड़ फेका।

➧ यह देखकर सरकार ने इस आंदोलन के दमन की कार्रवाई की। 

➧ दमन के फलस्वरूप हरिबाबा आंदोलन पूरी तरह बिखर गया। 

➧ हरि बाबा के शिष्य हनुमान की पूजा करते थे, जेनऊ धारण करते थे, मांस भक्षण, नशा सेवन के विरोधी थे। इनके अनुयायियों ने सरना पूजा स्थल जहां देशाउली बोंगा रहते हैं, के पेड़ों को काट गिराया। 

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Tuesday, May 4, 2021

Ghatwal Vidroh 1772-1773 (घटवाल विद्रोह 1772-1773 ई0)

May 04, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Ghatwal Vidroh 1772-1773

➧ घटवाल विद्रोह रामगढ़ के घटवालों द्वारा किया गया।  

➧ रामगढ़ के राजा मुकुंद सिंह के राज्य पर उसके एक संबंधी तेज द्वारा अधिकार जताने पर अंग्रेजों ने तेज सिंह का समर्थन किया।  

➧ परिणाम: अपने राजा मुकुंद सिंह के प्रति अंग्रेजों द्वारा किए गए इस दुर्व्यवहार के विरुद्ध घटवालों ने विद्रोह कर दिया।  

घटवाल विद्रोह 1772-1773 ई0

➧ यह विद्रोह 25 अक्टूबर, 1772 ईस्वी को तब प्रारंभ हुआ जब रामगढ़ के राजा मुकुंद सिंह के राज्य पर कैप्टन कैमक की  सेना ने दक्षिण की ओर से तथा उत्तर की ओर से तेज सिंह ने एक साथ धावा बोल दिया।  

➧ इस आक्रमण में मुकुंद सिंह वहां से भाग निकला तथा घटवाल के लोगों से समर्थन की मांग की।  

➧ घटवाल के लोगों ने मुकुंद सिंह का साथ दिया और कैमक का विरोध करने लगे। 

➧ परंतु जब घटवालों ने यह महसूस किया कि मुकुंद सिंह पुनः राजा नहीं बन सकता, तब उन्हेंने  मुकुंद सिंह का साथ छोड़ दिया। इस प्रकार यह विरोध बिना किसी विस्फोटक स्थिति उत्पन्न किए ही समाप्त हो गया।  

➧ इस विद्रोह में छै वह चंपा के राजा ने भी मुकुंद सिंह का साथ दिया था।

➧ अंग्रेजी में ठाकुर तेज सिंह को रामगढ़ का शासक घोषित कर दिया। 

➧ तेज सिंह की मृत्यु के बाद पारसनाथ सिंह रामगढ़ का राजा बना।  

➧ मुकुंद सिंह अपनी गद्दी खोने के बाद से कभी शांत नहीं रहा तथा वह लगातार अंग्रेजों का विरोध करता रहा।  

➧ रघुनाथ सिंह मुकुंद सिंह का समर्थक था। अंग्रेजों ने रघुनाथ सिंह से समझौता करना चाहा। परंतु उसने इंकार कर दिया जिसके परिणाम स्वरूप एकरमैन और डेनियल के संयुक्त प्रयास से रघुनाथ सिंह को  गिरफ्तार कर चटगांव भेज दिया गया। 

➧ रामगढ़ में अशांत माहौल के कारण कैप्टन क्रॉफर्ड  को रामगढ़ की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई।

➧ रामगढ़ अशांत माहौल के कारण रैयत पलायन करने लगे जिसे देखते हुए उपकलेक्टर जी.डलास ने सरकार से विनती की रामगढ़ के राजा को राजस्व वसूली से मुक्त कर दिया जाए और राजस्व वसूली के लिए प्रत्यक्ष बंदोबस्त की व्यवस्था की जाए।

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Bhogta Vidroh 1770-1771 (भोगता विद्रोह 1770-1771)

May 04, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Bhogta Vidroh 1770-1771

➧ यह भोगता विद्रोह चेरों विद्रोह के प्रथम चरण के समानांतर प्रारंभ हुआ तथा उसके पूरक के रूप में संचालित हुआ। 

➧ इस विद्रोह का नेतृत्व जयनाथ सिंह भोगता (चित्रजीत राय का दीवान) ने किया। 

भोगता विद्रोह 1770-1771
➧ विद्रोह का मुख्य कारण कंपनी द्वारा जयनाथ सिंह को पलामू किला छोड़ने संबंधी दिया जाने वाला आदेश था। 

➧ यद्यपि जयनाथ सिंह कुछ शर्तों के साथ किला छोड़ने को तैयार था, परंतु अंग्रेज इसे अनैतिक करार दे रहे थे।

➧ परिणाम : जयनाथ सिंह ने कंपनी के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

➧ इस विद्रोह में भोगता एवं चेरों ने साथ मिलकर अंग्रेजों से लोहा लिया।

➧ जयनाथ सिंह पराजित होकर सरगुजा भाग गया जिसके बाद अंग्रेजों द्वारा गोपाल राय को राजा घोषित कर दिया गया और विद्रोह समाप्त हो गया।

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Chero Vidroh 1770-1819 (चेरो विद्रोह 1770-1819)

May 04, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Chero Vidroh 1770-1819

➧ प्रथम चरण (1770-1771)

➧ उत्तराधिकार की इस लड़ाई में पलामू के चेरो राजा चित्रजीत राय ने अपने दीवान जयनाथ सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर लिया।

➧ इस विद्रोह का मूल कारण अंग्रेजों द्वारा पलामू की राजगद्दी के दावेदार गोपाल राज को राय को समर्थन प्रदान करना था। 

चेरो विद्रोह 1770-1819

➧ इस विद्रोह के प्रथम चरण का दमन जैकब कैमक द्वारा किया गया। 

➧ चेरो विद्रोहियों को पराजित करने के बाद अंग्रेजों ने पलामू किले पर कब्जा कर लिया तथा 1 जुलाई 1771 ईस्वी को गोपाल राय को पलामू का राजा घोषित कर दिया। 

➧ द्वितीय चरण (1800-1819

➧ इस विद्रोह का दूसरा चरण सन 1800 ईस्वी में भुखन सिंह के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ।

➧ इसका कारण चेरो जनजाति के लोगों में ज्यादा कर वसूली तथा पट्टों के पुनः अधिग्रहण के खिलाफ  व्याप्त असंतोष था। 

➧ 1802 ईस्वी में कर्नल जोंस के नेतृत्व में राजा भुखन सिंह को गिरफ्तार करके फांसी दे दी गई, जिसके बाद यह विद्रोह कमजोर पड़ने लगा।

➧ 1809 ईस्वी में अंग्रेजों द्वारा इस विद्रोह का पूरी तरह से दमन करने हेतु जमींदारी पुलिस बल का गठन किया गया। 

➧ 1813 ईस्वी में चेरो राजा चूड़ामन राय द्वारा बकाया चुकाने में असमर्थ के कारण अंग्रेजों ने उसके राज्य को नीलाम कर दिया।  

➧ 1815 ईस्वी में अंग्रेजों ने नीलाम किए गए राज्य को देव के राजा घनश्याम सिंह से बेच दिया जिसके परिणाम स्वरुप ऐतिहासिक चेरो  राजवंश समाप्त हो गया। 

➧ उपरोक्त घटनाओं के परिणाम स्वरूप चेरो जनजाति के लोग, जागीरदार एवं पूर्व के राजा व उनके समर्थकों ने सामूहिक रूप से अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने का निर्णय लिया तथा 1817 में अंग्रेजों के विरुद्ध पुणे एक व्यापक विरोध प्रारंभ हो गया। 

➧ विद्रोह के इस दूसरे चरण का नेतृत्व चैनपुर के ठाकुर रामबख्श सिंह एवं रांका के शिव प्रसाद सिंह ने किया। 

➧ इस विद्रोह का दमन करने हेतु अंग्रेजों ने रफसेज को नियुक्ति किया जिसने जागीरदारों एवं विद्रोही नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

➧ इसके बाद भी विद्रोह को दबाया नहीं जा सका। 

➧ अंततः 1819 ईस्वी में अंग्रेजों ने पलामू को नीलाम करने के नाम पर अपने अधिकार में ले लिया।  

➧ पलामू की नीलामी के बाद अंग्रेजों ने इसके शासन की जिम्मेदारी भरदेव के राजा घनश्याम सिंह को सौंप दी। 

➧ 1819 में चेरो  ने घनश्याम सिंह और अंग्रेजों के विरुद्ध फिर से विद्रोह कर दिया।

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Monday, May 3, 2021

Chuar Vidroh 1769-1805 (चुआर विद्रोह-1769-1805)

May 03, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Chuar Vidroh 1769-1805

➧ अंग्रेज जंगल महल के भूमिजों को चुआर /चुआड़ (नीची जाति के लोग) कहते थे जिसके कारण इनके  विद्रोह का नाम चुआर विद्रोह पड़ा।

➧ सामान्यत: चुआर लोग पशु-पक्षियों के शिकार, जंगलों में खेती व वनोत्पादों के व्यापार द्वारा अपना भरण-पोषण करते थे।

चुआर विद्रोह-1769-1805

➧ इसके अलावा ये लोग स्थानीय जमींदारों के यहां सिपाही (पाइक) के रूप में कार्यरत थे।

➧ अंग्रेजों द्वारा चुआरों  की भूमि पर अवैध कब्जा कर जमींदारों को बिक्री करने, जमींदारों के लगान में  अप्रत्याशित वृद्धि व लगान नहीं देने पर जमीन की नीलामी करने, बाहरी लोगों को इनके इलाके में बसाने, स्थानीय चुआरों के स्थान पर बाहरी पुलिस को उनके स्थान पर नियुक्त करने तथा अन्य आर्थिक मुद्दों के विरुद्ध यह विद्रोह किया गया। 

➧ यह विद्रोह सिंहभूम, मानभूम, बाड़भूम और पंचायत राज्य में हुआ।  

➧ घटवाल, पाइक एवं जमींदार समुदायों के समर्थन के कारण इस विद्रोह ने व्यापक रूप धारण कर लिया। 

➧ इस विद्रोह में भूमिज जनजाति ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

➧ इस विद्रोह में श्याम गंजम, रघुनाथ महतो, सबल सिंह, जगन्नाथ पतवार (1769-71 तक), मंगल सिंह (1782- 84 तक), लाल सिंह, दुर्जन सिंह और मनोहर सिंह (1798-99 तक) ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

➧ दुर्जन सिंह मानभूम तथा बाड़भूम  में इस विद्रोह के प्रमुख नेता थे

➧ इस विद्रोह का प्रमुख नारा था- 'अपना गांव अपना राज, दूर भगाओ विदेशी राज'।

➧ ले गुडयार, कैप्टन फोब्स एवं मेजर क्रॉफ्ड को इस विद्रोह के दमन हेतु भेजा गया था।

➧ लगभग 30 वर्ष से अधिक समय तक इस अशांत क्षेत्र में शांति बहाल करने हेतु अंग्रेजों ने इस क्षेत्र के लोगों को कुछ सुविधाएं देने का निर्णय लिया।

➧ 6 मार्च, 1800 ईस्वी को एक प्रस्ताव द्वारा जमीनदारी-घटवारी पुलिस व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया गया जिसके तहत स्थानीय लोगों को पुलिस अधिकारियों के रूप में नियुक्ति की व्यवस्था की गई। 

➧ साथ ही पाइको की जब्त भूमि की वापसी व जमींदारों की भूमि की अवैध नीलामी पर रोक का भी निर्णय लिया गया।

➧ 1805 ईसवी में जंगलमहल जिला के निर्माण के बाद इस क्षेत्र में पुनः शांति व्यवस्था बहाल हुई।

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Dhal Vidroh 1767-1777 (ढाल विद्रोह-1767-1777)

May 03, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

➧ Dhal Vidroh (1767-1777)

➧ ढाल विद्रोह झारखंड प्रदेश में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम विद्रोह था। 

ढाल विद्रोह-1767-1777

➧ ढाल विद्रोह का अर्थ है "ढाल  राजा के नेतृत्व में संपूर्ण ढाल राज्य की जनता का विद्रोह"। 

➧ अंग्रेजों ने सिंहभूम  की दीवानी प्राप्त कर सिंहभूम के क्षेत्र को अपने अधिकार में ले लिया जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप वहां के लोगों ने विद्रोह कर दिया। 

➧ इस विद्रोह का  प्रारंभ 1767 ईस्वी  में सिंहभूम क्षेत्र में हुआ था जो 1777 ईस्वी तक (10 वर्ष) तक चला। 

➧ इस विद्रोह को धालभूम के अपदस्थ राजा जगन्नाथ ढाल ने नेतृत्व प्रदान कर व्यापक स्वरूप प्रदान किया।

➧ जगन्नाथ ढाल को अपदस्थ कर अंग्रेजों ने नीमू ढाल को धालभूम का राजा बनाया था। 

➧ इस विद्रोह का दमन करने के लिए कंपनी ने लेफ्टिनेंट रुक तथा चार्ल्स मेगन को भेजा, परन्तु ये अधिकारी दमन करने में असफल रहे। 

➧ 1777 ईस्वी में कंपनी शासन द्वारा जगन्नाथ ढाल को राजा स्वीकार किये जाने के बाद यह विद्रोह समाप्त हो गया। 

➧ ढालभूम का राजा बनाये जाने के बदले में जगन्नाथ ढाल द्वारा अंग्रेजों को तीन वर्षो तक क्रमश: 2000/-, 3000/- तथा अधिकतम ₹4000 वार्षिक कर के रूप में देना स्वीकार किया। 

➧ 1780 ईस्वी में इस राशि को बढ़ाकर 4267 रूपये कर दिया गया।  

➧ झारखण्ड में अंग्रेजों का प्रवेश सिंहभूम की ओर से हुआ था।

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Wednesday, April 21, 2021

Jharkhand Me Dharmik Andolan (झारखंड में धार्मिक आंदोलन)

April 21, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Jharkhand Me Dharmik Andolan

झारखंड में धार्मिक आंदोलन

➤6ठी सदी ईस्वी पूर्व में बौद्ध तथा जैन धर्म आंदोलन हुए जिसका व्यापक असर झारखण्ड में भी 
पड़ा। 

➤धार्मिक आंदोलन को दो वर्गों में विभाजित किया गया है।  

➤जैन धर्म और बौद्ध धर्म 

➽ जैन धर्म 

➤जैन धर्म  का झारखंड पर गहरा प्रभाव पड़ा।  

➤जैनियों के  23वें तीर्थकर पाशर्वनाथ का निर्वाण 717  ई0 पू0 में गिरिडीह जिला के इसरी के निकट एक पहाड़ पर हुआ। जिसका नामकरण उन्ही के नाम पर पार्शवनाथ/पारसनाथ पड़ा।  

➤जैन ग्रंथो में भगवान महावीर के 'लोरे-ए-यदगा' की यात्रा का संदर्भ है जिस का मुंडारी में अर्थ 'आंसुओं की नदी' होता है।

➤जैन घर्म के 24 तीर्थकरों में से 20 तीर्थकरों ने इसी पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया। 

➤पारसनाथ पहाड़ी की ऊंचाई 1365 मीटर / 4478 फीट है। 

➤यह गिरिडीह जिला में अवस्थित है।

➤यह पहाड़ जैन धर्मवलबियों का प्रमुख तीर्थ स्थल है।

➤इसे जैन धर्म का मक्का कहा जाता है।

➤छोटा नागपुर का मानभूम (वर्तमान में धनबाद) यह जैन सभ्यता व संस्कृति का केंद्र था।

➤दामोदर व कसाई नदियों की घाटी से जैन धर्म संबंधी अवशेष प्राप्त हुए हैं। 

➤हनुमान्ड गॉव पलामू में स्थित है, यहां से जैनियों  के कुछ पूजा स्थल प्राप्त हुए हैं। 

➤सिंहभूम  के बेनुसागर से सातवीं शताब्दी की जैन मूर्तियां प्राप्त हुई है।

➤सिंहभूम के आरंभिक निवासी जैन धर्म को मानने वाले थे जिन्हें 'सरक' कहा जाता था। यह गृहस्थ जैन मतावलंबी थे। 

➤सरक ,श्रावक का बिगड़ा हुआ रूप है। हो जनजाति के लोगों ने इन्हें सिंहभूम  से बाहर निकाल दिया था।

➤कोल्हुआ पहाड़ यह चतरा जिले में अवस्थित है।

➤इसका संबंध बौद्ध और जैन धर्म दोनों से है।

➤यहां पर जैन व बौद्ध धर्म की अनेकों मूर्तियों के अवशेषों विद्यमान है।

➤इस पहाड़ पर 10वें तीर्थकर शीतनाथ को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

➤यहां पर 9 जैन तीर्थकारों की प्रतिमा है।

➤इस पहाड़ के पत्थर पर एक पद्चिन्ह है जिसे जैन धर्म के अनुयायी पार्शवनाथ का  पद्चिन्ह  मानते हैं। 

➽बौद्ध धर्म 

➤बौद्ध धर्म का झारखंड पर गहरा प्रभाव पड़ा।

➤झारखण्ड के विभिन्न स्थलों से बौद्ध धर्म संबंधी अवशेष प्राप्त हुए हैं। 

➤मूर्तियाँ गॉव यह पलामू में अवस्थित है।

➤यहां से एक सिंह शीर्ष मिला है जो सांची स्तूप के द्वार पर उत्कीर्ण सिंह शीर्ष से मेल खाता है।

➤कुरुआ गांव यहां से बौद्ध स्तूप की प्राप्ति हुई है।

➤सूर्यकुंड यह हजारीबाग जिले में अवस्थित है।

➤यहां से बुद्ध  की प्रस्तर मूर्ति मिली है।

➤बेलवादाग यह खूंटी जिला में स्थित है, यहां से बौद्ध विहार के अवशेष प्राप्त हुए हैं। 

➤कटूंगा गांव यह गुमला जिले में स्थित है, यहां से बौद्ध की एक प्रतिमा मिली है।

➤पटंबा गांव स्थित है यह जमशेदपुर में अवस्थित है ,यहां से बुद्ध की 2 प्रतिमाएं मिली है।

➤दीयापुर और दालमी  यह धनबाद जिला में अवस्थित है,यहां से बौद्ध स्मारक प्राप्त हुए हैं।  

➤बुद्धपुर में बुद्धेश्वर मंदिर निर्मित है। यह बौद्ध स्थल दामोदर नदी के किनारे अवस्थित है। 

➤घोलमारा यहाँ से प्रस्तर की खंडित बुद्ध मूर्ति मिली है।  

➤ईचागढ़ यह सरायकेला-खरसावां जिला में स्थित है, यहाँ से तारा की मूर्ति मिली है, जो एक बौद्ध देवी है।इस मूर्ति को रांची संग्रहालय में रखा गया है। 

➤सीतागढ़ पहाड़ यह हजारीबाग जिले में स्थित है, यहां से प्राप्त बौद्ध  विहार का उल्लेख फाह्यान  द्वारा किया गया है। यहां से भगवान बुद्ध की चार आकृतियों वाला एक स्तूप मिला है।

➤बंगाल के पाल शासकों के शासन के दौरान झारखंड में बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा विकसित हुयी।

➤झारखंड में  'कुमार गुप्त' के प्रवेश के उपरांत बौद्ध धर्म का ह्रास प्रारंभ हो गया।

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Tuesday, April 13, 2021

Jatiya Panchayat Shasan Vyavastha (जातीय पंचायत शासन व्यवस्था)

April 13, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Jatiya Panchayat ShasanVyavastha

(जातीय पंचायत शासन व्यवस्था)




➤झारखंड में विभिन्न प्रकार की गैर-जनजातियां निवास करती है, जिनमें तेली, साहू, कुर्मी, महतो, मलिक, अंसारी इत्यादि प्रमुख हैं
। 

➤इन सभी जातियों का जातिगत पंचायत होता है और पंचायत का निर्णय सभी को मानना आवश्यक होता है।  शादी-ब्याह मरनी-जननी या किसी विवाद का निपटारा जातिगत पंचायत में किया जाता है।

➤जातिगत पंचायत में एक अध्यक्ष होता है, जो सचिव और कार्यकारिणी के सदस्यों के सहायता से अपने कामों को पूरा करता है। जातिगत निर्णय को नहीं मानने वाले को दंड स्वरूप जाति से निष्कासन कर दिया जाता है, जिसे 'सामाजिक बहिष्कार' कहते हैं।

➤झारखंड के प्रमुख जातिगत पंचायतों में कुर्मी महापंचायत, महतो पंचायत, तेली-साहू पंचायत, मलिक पंचायत, मोमिन कॉन्फ्रेंस आदि प्रसिद्ध है।

➤जातीय पंचायत शासन व्यवस्था झारखंड की एक अद्भुत शासन व्यवस्था का प्रतीक है। इस प्रकार की शासन व्यवस्था मुख्यत: उसी क्षेत्र में देखने को मिलती है, जहां जनजातीय और गैर जनजातीय लोग एक साथ एक ही गांव में या अगल-बगल के गांव में निवास करते हैं।

➤यह एक प्रशासकीय व्यवस्था कम और सामाजिक व्यवस्था ज्यादा नजर आती है।

➤जब जनजातियों एवं गैर जनजातियों के बीच कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो विवाद को सुलझाने के लिए जनजातियां समाज के मुंडा, मानकी, मांझी, परगनेत आदि में से कोई स्थिति अनुसार गैर जनजातीय समुदाय के जातीय पंचायत के प्रमुख या सदनों के सामाजिक प्रमुख के साथ मिलकर समस्या का निदान करते हैं।

➤जिस पक्ष की गलती पकड़ में आती है, उसे उसी के समाज के रीति-रिवाज, परंपरा, रूढ़िवादिता के अनुसार आदेश निर्गत किया जाता है। आदेश नहीं मानने पर समाज से बहिष्कृत भी किया जा सकता है।

➤जातीय पंचायत शासन व्यवस्था में दो जनजातीय समाज जैसे मुंडा एवं उरांव समाज या संथाल और हो समाज या किसी भी प्रकार के अंतर जनजातीय विवाद का निपटारा किया जाता है।

➤यहाँ  विशेष बात ध्यान में रखी जाती है कि किसी भी प्रकार से एक ही क्षेत्र विशेष में रहने वाले अलग-अलग जनजातीय समाज या गैर जनजातीय लोगों के बीच सामाजिक ताना-बुना नहीं बिगड़े, क्योंकि जनजातीय समाज और गैर जनजातीय समाज दोनों एक-दूसरे पर आश्रित है।

➤सदान  लोग मुंडा समाज को अपने बड़े भाई के समान आदर देते हैं। 

➤अंतरजातीय पंचायत को बाला पंचायत 84 (चौरासी)  पंचायत कहते हैं।

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Monday, March 15, 2021

Jharkhand Ke Prachin Rajvansh (झारखंड के प्राचीन राजवंश)

March 15, 2021HOME, JH-HISTORY-HINDI No comments:

Jharkhand Ke Prachin Rajvansh

(झारखंड के प्राचीन राजवंश)


➤प्राचीन काल में राज्य निर्माण का कार्य मुंडाओं ने शुरू किया। बाद में अन्य राजवंशों ने अपने-अपने राजवंशों ने अपने-अपने राज्य स्थापित किए। 

➤इनमें तीन राजवंश प्रमुख थे

1) छोटानागपुर के नागवंश 

2) पलामू के रक्सैल 

3) सिंहभूम के सिंहवंश 

1) मुण्डा राज्य (सुतिया नागखण्ड)

➤झारखंड की जनजातियों में मुंडाओं की प्रधानता थी और राज्य निर्माण की प्रतिक्रिया भी उन्होंने ही सबसे पहले शुरू की।  

➤छोटा नागपुर में रिता/रिसा मुंडा प्रथम मुंडा जनजातीय नेता था, जिसने निर्माण की प्रक्रिया शुरू की।

➤उसने सुतिया पाहन को मुंडाओं का शासक चुना और नये राज्य का नाम दिया गया -सुतिया नागखंड।

➤सुतिया ने अपने राज्य को 7 गढ़ों व  21 परगनों में विभक्त किया था। 

➤7 गढ़ों-लोहागढ़ (लोहरदगा) , हजारीबाग (हजारीबाग) , पालुनगढ़ (पलामू) , मानगढ़ (मानभूम) , सिंहगढ़ (सिंहभूम) , केसलगढ़ और सुरजगढ़ (सुरगुजा)।

➤ 21 परगनों - ओमदंडा , दोइसा, खुखरा , सुरगुजा , जसपर ,गंगपुर ,पोरहट , गिरगा , बिरुआ , लचरा ,बिरना , सोनपुर , बेलखादर , बेलसिंग , तमाड़ , लोहारडीह , खेरसिंग , उदयपुर, बोनाई , कोरया , और चंनमंगकर। 

➤इनमें  कुछे परगनों के नाम आज भी यथावत बने हुए हैं। 

➤सुतिया पाहन द्वारा स्थापित राज्य संपूर्ण झारखंड में फैला था परंतु दुर्भाग्यवश यह राज्य जल्द ही समाप्त हो गया।

2) छोटानागपुर (कोकरा) का नागवंश

➤छोटा नागपुर में स्थापित नागवंशी  राज्य मुख्यत: जनजातियों का राज्य था 

➤इस राज्य की स्थापना प्रथम शताब्दी में फणिमुकुट राय ने की थी।

➤फणिमुकुट राय पुंडरीक और नाग एवं वाराणसी की ब्राह्मण कन्या पार्वती का पुत्र था। 

➤फणिमुकुट राय का विवाह पंचेत के गोवंशीय राजपूत घराने में हुआ था।

➤फणिमुकुट राय के राज्य में 66 परगने थे । ( 22 घटवारी में, 18 खुखरागढ़ में, 18 दोयसागढ़ में और 8 जरचीगढ़ में )

➤फणिमुकुट राय ने सुतियाम्बे को अपनी राजधानी बनायी।

➤सुतियाम्बे में उन्होंने एक सूर्य मंदिर की स्थापना की थी। 

➤फणिमुकुट राय के समय यहां की जनता मुख्यत: जनजातीय थी। उनके राजा बनने के बाद ही यहां पर ब्राह्मण , राजपूत और अन्य हिंदू जातियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई। 

➤फणिमुकुट राय को नागवंश का आदिपुरुष माना जाता है। 

➤फणिमुकुट राय का दीवान पांडे भवराय श्रीवास्तव थे। 

➤चौथा नागवंशी राजा प्रताप राय ने सुतयाम्बे से राजधानी बदल-कर स्वर्णरेखा नदी के तट पर चुटिया ले गया। 

➤नई राजधानी में बाहर से लोगों को बुलाकर बसाया गया। 

➤प्रताप राय के राज्य में सर्वत्र शांति व्यवस्था कायम थी। 

➤एक अन्य नागवंशी राजा भीमकर्ण ने राजधानी परिवर्तन किया और उसे चुटिया से कोखरा ले गया। 

➤भीमकर्ण को सरगुजा के हैहयवंशी रक्सेल राजा के साथ भीषण युद्ध करना पड़ा। 

➤बरवा की इस लड़ाई में भीमकर्ण विजयी हुआ। 

➤भीमकर्ण ने रेक्सेलो से जो कुछ लुटा उसमें वासुदेव की एक मूर्ति भी थी।  

➤भीमकर्ण ने भीमसागर का निर्माण कराया जो आज भी है। 

➤नागवंशी राजा ने दोयसा में नवरत्न नामक 5 मंजिला भवन का निर्माण करवाया।

➤यह राजवंश मध्यकाल और आधुनिक काल तक जारी रहा। 

➤नागवंशी राजाओं  की राजधानियों का क्रम इस प्रकार रहा :-  सुतायाम्बे , चुटिया, कोखरा , दोयसा,  पालकोट, रातूगढ़।

3) पलामू का रक्सेल वंश 

➤पलामू में प्रारंभ में रक्सेलों का अधिपत्य था। 

➤ये रक्सेल राजपूताना क्षेत्र से रोहतासगढ़ होते हुए पलामू पहुंचे थे। फिर स्वयं को राजपूत कहते थे।

➤रक्सेलों ने कुछ समय तक सुरगुजा को अपने राज्य में मिला लिया था।

➤इस समय की महत्वपूर्ण जनजातियां खरवार, गोंड, माहे , कोरवा, पहाड़िया तथा किसान थी। 

➤इनमें सबसे अधिक संख्या खरवारों की थी, जिसके शासक प्रताप धवल थे। 

➤रक्सेलों का शासनकाल काफी दिनों तक चला, लेकिन बाद में उन्हें चेरो द्वारा अपदस्थ कर दिया गया।

4) सिंहभूम का सिंहवंश
 
➤सिंहभूम को पोरहाट के सिंह राजाओं की भूमि के नाम से जाना जाता है, सिंहवंश के उत्तराधिकारियों  का दावा है कि सिंहभूम में 'हो' जाति के प्रवेश के पूर्व से ही वे अपना राज्य स्थापित कर चुके थे।

➤लेकिन हो जनजाति के सदस्य इस दावे का खंडन करते हुए प्रतिवाद करते हैं कि सिंहभूम का नामकरण उनके कुलदेवता सिंगबोंगा के नाम पर हुआ है।   

➤यह मत ज्यादा सही प्रतीत होता है। सिंह राजवंशी राठौर राजपूत थे, जो पश्चिमी भारत से आए थे और  उन्होंने आठवीं शताब्दी में इस क्षेत्र का आधिपत्य जमा लिया।

➤सिंहवंश की पहली शाखा के संस्थापक काशीनाथ सिंह थे। 

➤इस वंश ने 52 पीढ़ियों तक राज किया।

➤सिंह वंश की दूसरी शाखा का सत्ताभिषेक 1205 ईस्वी  के करीब हुआ था। इस शाखा के संस्थापक दर्प  नारायण सिंह थेा।

➤दर्प नारायण सिंह की मृत्यु के बाद युधिष्ठिर शासक बना, जो 1262ईस्वी से 1271 ईस्वी तक शासन करता रहाा। 

➤युधिष्ठिर का उत्तराधिकारी काशीराम सिंह था, जिसके समय में नयी राजधानी 'पोराहाट' में थी। 

➤इस राजवंश का चौथा शासक अच्चुत सिंह था।

➤तेरहवाँ राजा जगन्नाथ द्वितीय अत्याचारी व निरंकुश था, जिसके कारण 'भुइया' लोगों ने विद्रोह कर दिया था।

 5)अन्य राजवंश

➤मानभूम  का मान राजवंश :- मान राजाओं का राज्य हजारीबाग और मानभूम में विस्तृत था।

➤गोविंदपुर (धनबाद) में कवि गंगाधर (1373 - 78 ईसवी)  द्वारा रचित शिलालेख और हजारीबाग के दूधपानी नामक स्थान में 8वीं सदी के शिलालेख में इनका उल्लेख है। 

➤रामगढ़ राज्य  :- रामगढ़ राज्य की स्थापना 1368 ईस्वी के लगभग बाघदेव सिंह ने की थी। 

➤ये अपने बड़े भाई सिंहदेव के साथ नागवंशी महाराजा की सेवा में थे।

➤कालांतर में  बाघदेव सिंह और उनके भाई सिंहदेव सिंह का नागवंशी राजाओं के साथ मतभेद हो गया।

➤नागवंशी राजा से अलग होकर यह लोग कर्णपुरा आ गए। यहां पर स्थानीय राजा को पराजित कर पर अधिकार कर कर्णपुरा पर अधिकार कर लिया।

➤दोनों भाइयों ने लगभग 21 परगनों पर कब्जा किया।

➤उन लोगों ने सिसिया को अपनी पहली राजधानी बनाया। बाद में राजधानी बदलकर उरदा, फिर बादाम और अंत में रामगढ़ गये। 

➤राजा हेमंत सिंह (1604 - 1661 ) ने अपनी राजधानी उर्दा से हटाकर बादाम में स्थापित की।

➤राजा दलेल सिंह अपनी राजधानी बनाम से हटाकर 1670 में रामगढ़ ले गया।

➤राजधानी परिवर्तन का मुख्य कारण भौगोलिक एवं ऐतिहासिक दृष्टिकोण से बदाम का असुरक्षित होना था।

➤1772 ईस्वी में सिंहदेव वंश के तेज सिंह (1772 से 80 तक) रामगढ़ के राजा बने। उन्होंने अपने शासन का संचालन इचाक (हजारीबाग) से किया।

➤1880 ईस्वी के प्रारंभ में रामगढ़ राज्य एक तीसरे वंशज के हाथों में चला गया। इस वंश के प्रथम राजा ब्रह्मदेव नारायण सिंह थे। इस वंश की राजधानी रामगढ़ से हटाकर हजारीबाग से लगभग 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पदमा में स्थापित की गयी।

➤पदमा में एक राजप्रसाद का भी निर्माण किया गया, जो आज भी विद्यमान है।

➤कामाख्या नारायण सिंह 1937 ईस्वी में रामगढ़ की गद्दी पर बैठे। इनकी राजधानी भी अंतिम समय तक पदमा में ही रही।

➤1368 ईस्वी में बाघदेव द्वारा स्थापित गणराज्य रामगढ़ राज बिहार राज्य भूमि सुधार अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत 26 जनवरी, 1955 को समाप्त हो गया।

➤रामगढ़ राज्य की राजधानियों का क्रम इस प्रकार रहा :- उर्दा-सिसई, बादाम, रामगढ़ , इचाक, पदमा।

➤पलामू का चेरों वंश :- पलामू का चेरो वंश छोटानागपुर के नागवंशी एवं मानभूम के पंचेत राज्यों की तरह ही महान राजवंश था।

➤चेरो वंश की स्थापना भागवत राय ने की थी। इस वंश के राजाओं का राज्य क्षेत्र पलामू था।

➤सिंहभूम का धाल वंश :- सिंहभूम के धालभूम क्षेत्र में  धाल राजाओं का शासन था। धाल राजा संभवत: जाति के धोबी थे।

➤पंचेत  के राजा भी संभवत: धोबी ही थे। उन्होंने एक ब्राह्मण कन्या से विवाह कर लिया था। इसी विवाह से उत्पन्न बालक ने धालभूम राज्य की स्थापना की थी।

➤खरगड़ीहा राज्य :- 'खरगड़ीहा (वर्तमान गिरिडीह जिला) राज्य' रामगढ़ राज्य के उत्तर-पूर्व में स्थित था।

➤इस राज्य की स्थापना 15वीं सदी में हंसराज देव नामक एक दक्षिण भारतीय ने की थी।

➤मूलत: उसने बंदावात जाति के एक शासक को पराजित कर हजारीबाग के 90 किलोमीटर लम्बे क्षेत्र को अपने अधिकार में कर लिया।

➤इस राज-परिवार का वैवाहिक संबंध अधिकांशत: उत्तर बिहार के ब्राह्मण जमींदार परिवारों के साथ था।

➤पंचेत राज्य :- पंचेत राज्य मानभूम क्षेत्र का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य था।

➤इस राज्य की उत्पत्ति और स्थापना के विषय में प्रचलित जनश्रुति के अनुसार इसकी स्थापना काशीपुर के राजा और रानी की तीर्थयात्रा के क्रम में पैदा हुए पुत्र ने किया था।

➤बड़ा होने पर यह बालक पहले मांझी बना,फिर परगना चौरासी का राजा बना।इसी राजा ने आगे  पंचेतगढ़ का निर्माण किया।

➤राजा ने कपिला गाय की पूँछ को राजचिन्ह के रूप में स्वीकार किया। 

➤इस प्रकार प्राचीन और पूर्व-मध्य काल में छिटपुट आक्रमणों के बावजूद झारखण्ड के लगभग सभी क्षेत्र स्वंतत्र बने  और छोटानागपुर क्षेत्र अपनी क्षेत्रीय स्वंछदता कायम रखने में कामयाब रहा। 






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